नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम की समीक्षा

पुस्‍तक समीक्षा- नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम

समीक्षक-रमेश चौहान

नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम
नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम

नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम

नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम – परिचय

किस नगर तक आ गये हमडॉ. अजय पाठक
कृति का नाम‘‘किस नगर तक आ गए हम’’
कृतिकारडॉ. अजय पाठक, बिलासपुर
प्रकाशकश्री प्रकाशन दुर्ग
कृति स्वामित्वश्रीमती रीता पाठक
प्रकाषन वर्ष2016
सामान्य मूल्यरू. 250.00
विधापद्य
शिल्पनवगीत
भाषाहिन्दी
पुस्तक की उपलब्धताकृतिस्वामी के पास
समीक्षकश्री रमेशकुमार सिंह चौहान, नवागढ़
किस नगर तक आ गये हम

डॉं. अजय पाठक- एक परिचय

कृतिकार डॉ. अजय पाठक साहित्य क्षितिज में एक प्रदिप्तमान तारा है । आप न केवल छत्तीसगढ़ अपितु अखिलभारतीयस्तर पर ख्यातीलब्ध ‘नवगीतकार’ हैं । अब तक आपके चौदह कृति प्रकाषित हो चुके हैं इसमें गीत संग्रह ‘जंगल एक गीत है’ को भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित ‘मेदिनी पुरस्कार‘ से सम्मानित किया गया है । ‘मुगलकाल में शिक्षा, साहित्य एवं ललित कला’, कवि हरिवंशराय बच्चन की लोकप्रिया कृति ‘मधुशाला’ के दर्शन पर आधातिर कृति ‘तेरी मेरी मधुशाला और पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल एवं उनका साहित्यिक अवदान नामक गद्य संकलन प्रकाशित कर चुके हैं । आप एक सफल कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार निबंधकार भी हैं, किन्तु साहित्य जन मानस में आपके ‘नवगीत गीतकार’ का प्रतिबिम्ब मुखर है ।

नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम – आम आदमी की पीड़ा का लेखा-जोखा है-

यह एक नवगीत प्रधान काव्य संग्रह है, जो काव्य संग्रह ही ना होकर मानव जीवन के प्रतिदिन की दिनचर्या के सुख-दुख और जीवनसंघर्ष की एक गान-गाथा है । इस कृति के केन्द्र में आज की पूंजीवादी संस्कृति और व्यवस्था का दंष झेलते आहत और लहुहुहान हो चुके आम आदमी की पीड़ा का लेखा-जोखा है ।

नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम-समसामयिक संदर्भो को समसामायिक ढंग से उकेरती है

इस काव्य संग्रह की दूसरी और सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रकृति के साथ जुड़ाव है । इस कृति में प्रकृति का सौन्दर्य नैसर्गिक रूप में विद्यमान है । प्रकृति के साथ गाँव-गली, खेत-खलिहान को जोड़ते हुये पारिवारिक रिष्तों, मान्यताओं और धारणओं को समाहित करती है । निष्कर्षतः यह कृति समसामयिक संदर्भो को समसामायिक ढंग से उकेरती है ।

नवगीत संग्रह- किस नगर तक आ गये हम 53 काव्य-मणकों की एक सुवासित माला है-

‘यह कृति 53 काव्य-मणकों से पिरोया हुआ काव्य की एक सुवासित माला है । नये प्रतिको से छुवन से एक अलग एहसास की अनुभूति कराती हुई यह नवगीत काव्य यात्रा ‘ज़िदगी’ शीर्षक से प्रारंभ होती है, जहाँ जीवन प्रकृति में रमता है-

जिंदगी-

झील में दिल खोलकर 
 किरणें नहाती हैं
 रात हँसती है ठठाकर
 भोर गाती है

 पूर्णिमा है चैत की
 है चाँद पूरा भी गगन में
 चाँदनी बिसखरी हुई है
 योजनों तक साल वन में

 वेग से बहती हवा
 कुछ गुनगुनाती है 

यौवन के दिन बीते-

‘यौवन के दिन बीते’ शीर्षक से कवि जीवन के सुनहरे अवसरों के खो जाने से मन में उपजे उस मनोदषा को मनोहारी ढंग से प्रस्तुत करते जिसमें व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है-

नहीं बहकते पाँव गली में
 ओर-छोर तक जाकर
 दम लेता है संयम सीधे
 घर तक ही पहुँचाकर
 जीत-जीत कर हारे मन को
 हार-हार कर जीते

 समय काटना लक्ष्य हुआ है
 अब तो जीवन का
 समीकरण भी टूट रहा है
 जर्जर तन-मन का
 तार-तार हो रही चदरिया
 और उसे हम सीते
 यौवन के दिन बीते
 यौवन के दिन बीते

रंग बोलते हैं-

जीवन को जीवन संघर्षो के वेग में अनमना ही बहना होता है । एक आम आदमी दुख-पीड़ा को मन में छुपाये, श्‍रीरिक-मानसिक कष्‍टों के उपरांत भी दो वक्त की रोटी के लिये जूझता रहता है । इस झंझावात को कवि ‘रंग बोलते हैं’ में प्राकृतिक रूप से चित्रित करते हैं-

तौर-तरीके अपने
 अपने ढंग बोलते हैं

 कभी-कभी सूखे पत्तों के
 रंग बोलते हैं
 एकाकीपन और साथ में
 लंबी गहन उदासी
 पत्रहीन हो, या फूलों से
 गायब रंग पलासी

 पेड़ दुखी हो किन्तु 
 हवा के संग डोलते हैं

मन बेगाना है-

इसी भावाभिव्यक्ति में एक दूसरा मनोहारी चित्रण है ‘मन बेगाना है’ यहां गागर में सागर को समटते हुये कवि का कथ्य अपने आप में विलक्ष्ण है-

धन दुर्लभ है, तन गिरवी है
 मन बेगाना है
 शेष बचा ही क्या है जिसका
 सोग मनाना है 

घबरा गये-

भौतिकता के आलम में स्वार्थपरकता के वर्चस्व के तिलिस्म को ‘घबरा गये‘ संज्ञा देकर कवि मानव के उच्चश्रृंखलता एवं विवषता को एक साथ खड़ा कर देते हैं-

क्या बतायें
 कौन से हालात से
 घबरा गये

 यह जमीं वैसी नहीं है
 आसमां वेसा नहीं
 आदमी के बीच कोई
 आदमी जैसा नहीं

पिता-

वहीं ‘पिता’ शीर्षक में जीवन में पिता के महत्व स्थापित करते हुये लिखते हैं-

यह सारा ब्रम्हाण्ड छिपा
 था जिसके अंदर
 तुम नीला आकाश पिता
 थे तुम्ही समंदर
 तुम वटवृक्ष तुम्हारी छाया
 में पलते हम
 तुमको खोकर जैसे अपना 
 जीवन खोया
 पिता तुम्हारे साथ चिता पर
 मैं भी सोया

पैसा-

‘पैसा’ शीर्षक में जहाँ कवि पैसों के नाम पर संबंधों को छिन्न-भिन्न होते देख कहते हैं कि-

‘‘संबंधों के बीच कभी जो
 पैसा अड़ जाता है ’’

आज कबीरा-

‘फेसबुकी बकवास’ में छद्म आच्छादित दुनिया, ‘गली-गली में आग’ में प्रपंचवादी दुनिया कहने के बाद ‘आज कबीरा’ में कवि कहते हैं-

‘‘आज कबीरा
 जी भरा रोया
 भरे हाट-बाजार’’

फोकट का राश्‍न-

‘फोकट का राश्‍न’ में ‘‘जाँगरचोरी पैठ गई है, लोगों के व्यवहार में’’ व्यंग्य की तीक्ष्णता तिरोहित करने के बाद ‘काम दे’ में उम्मीद लिये कहते हैं-‘भूखे को दोटी दे मौला, सब हाथों को काम दे’’ इन दोनों कविताओं में आज के विष्‍ामता को उदृधत करते हुये कहते हैं- एक ओर जहाँ छद्म निर्धन, राशन के कतार में खड़ा है तो दूसरी ओर यथार्थ निर्धन कूड़े के ढेरों को चुन कर अपने लिये रोटी तलाश करने के लिये विवश हैं-

‘कूड़े के ढेरों से मौला
 बच्चे रोटी चुनते हैं
 आज मिला तो, खाया वरना
 कल के सपने बुनते हैं’’

तुम हँस दो तो-

‘भीड़’ में लोगों अंधा दौड़ को रेखांकित करने के बाद, ‘दर्द’ में इसके परिणाम कहने के बाद ‘तुम हँस दो तो’ पीर विसर कर उन्मुत जीवन जीने की प्रेरणा देते हुये लिखते हैं-

‘तुम हँस दो तो
 केशर के रंगों के जैसा
 धरती का आँचल हो जाये’’

रचनाकार की रचना कौशल-

छप्पन भोग में षडरस की जो आनंद प्राप्ति होती है, वही रसास्वाद इस कृति को पढ़ते हुये होती है । काव्य प्रेमी पाठक मन की तृष्‍णा एक-एक निवाले से और-और की कामना से बढ़ती है । पाठक के अंतकरण में पढ़ने की प्‍यास जगना कवि के रचना कौशल, लेखन कौशल को सत्‍यापित करती है ।

काव्य की भाषा विशुद्ध साहित्यिक है-

इस काव्‍य कृति में काव्य की भाष विशुद्ध साहित्यिक है, कहीं-कहीं सतही पाठक सतह से ही फिसल जाता है । वहीं साहित्यक पाठक भौरे जैसे रसपान करने लगता है । भाष सौष्‍ठव साहित्यिक हाने के पश्‍चात भी भावों के अनुरूप आँचलिकता की ग्राहृता हिन्दी साहित्य को सबल ही कर रहा है । अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्‍द शक्ति से अपने लक्ष्य भेदन में यह काव्य श्‍तप्रतिशत सफल है ।

‘नवगीत’ के शिल्‍प को समझने के लिय यह कृति सर्वाधिक उपयोगी है-

नव साहित्यकारों के लिये काव्य की नई विधा ‘नवगीत’ के शिल्‍प को समझने के लिय यह कृति सर्वाधिक उपयोगी है । इसकृति में नवगीत शिल्‍प के बारिकियों का बखूबी प्रतिपादन किया गया है । डॉ अजय पाठक नवगीत के उद्यमी रचनाकार हैं । नवगीत के शिल्‍प को नवगीतकारों को प्रत्‍यक्ष और प्रत्‍यक्ष परोसते ही रहते हैं ।

समीक्षक-रमेश चौहान

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