बाल नाटक: मेरा सागर -प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (जल जीवन पर आधारित बाल नाटक)

मेरा सागर

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल नाटक: मेरा सागर -प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
बाल नाटक: मेरा सागर -प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

पात्र

इन : मछली
बिन : मछली
फिन : मछली
लिन : मछली
केनू : केकड़ा

स्थान

समुद्र का किनारा

समय

दोपहर

(समुद्र की लहरें। एक स्थान पर मछलियों का एक समूह लहराता हुआ खुशियां मना रहा है। अचानक केनू केकड़ा आता है। )


केनू : अरे दोस्तों , जल नमस्ते !

मछलियां (सामूहिक स्वर में ) : जल नमस्ते , केनू भाई !

केनू : कैसी हो बहनों , आप लोग !

इन : क्या आप भी ! कैसी हो , कैसी हो …क्या भाई , कैसा प्रश्न पूछ रहे हो !

फिन : भाई देख रहे हो , किरणें फैली हैं लहरों पर !

लिन : मस्ती छायी मेरे मन पर !

बिन : केनू भाई आये इस पर

केनू : (प्रसन्न होकर )वाह कहें बहनो ! वाह- वाह ! आज तो सभी कवि बन गयीं ! कवि!

इन : ये लो , केनू भाई ने रही सही बात भी पूरी कर दी।

केनू :(अकड़ते हुये) हाँ हाँ , मैं भी किसका भाई हूँ !(गर्व से ) इन ,बिन , फिन और लिन का !

बिन : तो आओ भाई आप भी कुछ कहो सुनाओ !

केनू : जरूर ! (गाता है )

चार मछलियों का मैं भाई ,
केनू कहते लोग।
समुद्र हमारा घर है पूरा,
हम रहते मिलकर उसमें
सारे के सारे लोग !

इन : वाह वाह !

बिन : तो चलो हम लोग अंत्याक्षरी खेलते हैं !

मछलियों और केनू का सामूहिक स्वर : हाँ हाँ , बिलकुल !

केनू : सबसे पहले लिन गायेगी , सबसे छोटी है न !

लिन : हाँ भैया !

केनू : इन का गीत हम लोगों का सामूहिक गीत होगा। इन जहाँ रुकेगी , उस अक्षर से अंत्याक्षरी शुरू !

मछलियों और केनू का सामूहिक स्वर : हाँ हाँ , बिलकुल !

लिन : (गाती है , और सभी दोहराते हैं ):

जल की लहरें
हम बनाते
तैरते , मुड़ते
फिसलते , लहर पर
मछलियां हम
चपल चंचल
चल रहीं हैं
हर तरफ हम
हर किनारे।
हर लहर हम !

केनू : क्या बात है! अंत का अक्षर है ‘म ‘। अब ‘म’ से मैं सुनाऊँगा।

बिन : ठीक है ,अंत का अक्षर है ‘म ‘। अब आपका प्रारम्भ ‘म ‘ से !

केनू : सुनिये :

मेरा सागर
मेरा जीवन
मैं मस्ती में मेरे अंदर।
जीवन इससे
इससे जीवन।
हम फूल हैं इसके
ये मेरा उपवन।

सामूहिक स्वर : ओहो ! हो हो क्या बात है !

केनू : हाँ -हाँ बहनों , अच्छा था , अच्छा ही होगा। अंत्याक्षरी है , अच्छा कार्यक्रम होना चाहिये। ठीक है अंत का अक्षर है ‘न ‘। अब कौन बोलेगा ? अच्छा फिन !

फिन : हाँ , हाँ ,सुनिये –

नीला नीला पानी मेरा
मैं सागर की नन्ही मछली
गोद में इसके रोज़ खेलती।

खुश होकर विद्यालय जाती
मेरे कितने दोस्त वहाँ पर ,
मेरी नई किताबें।
नीला नीला मेरा पानी
मैं सागर की नन्ही मछली।

इन : दोस्त तुमने तो स्कूल की याद दिला दी। अपनी लाइब्रेरी की।

बिन : तो क्या हुआ , छुट्टियां बीतने ही वाली हैं। अब तो चलना ही है। अभी तो अंत्याक्षरी खेलते हैं।

केनू : हाँ हाँ बहनों , आप लोग टिप्पणियां न करो। वो तो बाद में कर लेंगे। फिन का गीत क्या था , हाँ , “नीला ने मेरा पानी … मैं सागर की नन्ही मछली” … इसका मतलब अंत अक्षर ‘ल ‘। अब अगला गीत होगा ‘ल ‘ अक्षर से।

इन : हाँ- हाँ !

केनू : ‘ल ‘ ध्वनि से। तुम लोग ध्वनि पढ़े हो , या अक्षर ? क्या पढ़ाया गया है स्कूल में ?

इन : केनू भाई ये सब बात में बतायेंगे , क्या पढ़ाया गया ! (सभी मछलियां हंसती हैं। ) अंत्याक्षरी का आनंद लीजिये !

केनू : (मुस्कराते हुये ) हाँ -हाँ ,क्यों नहीं ! अब किसका नंबर है ? कौन कौन हुआ ? हाँ , लिन और फिन का हो गया गीत ! अब बची बिन और इन ! है बात की नहीं ?

मछलियों का सामूहिक स्वर : बिलकुल।

केनू : बिन , आपकी बारी , और अक्षर है , ‘ल ।

बिन : (मुस्कराते हुये ) मेरी बारी , धन्यवाद केनू भाई। (सोचते हुये ) ‘ल’ अक्षर ! ‘ल ‘ से मैं कुछ अलग सुनाऊँगी (सोचती है। ) ।

लाल खून निकला था उस दिन
कई शिकारी आये ।
बड़े – बड़े से यंत्र लिए थे ,
हम भी देखो समझे बूझे ,
फिन्स बचाकर ,
टेल्स बचाकर ,
घूमे भागे , भागे घूमे ,
लाल खून निकला था उस दिन !

केनू : बड़ी चिंताजनक बात कही है बहन आपने ! शिकारी आजकल इधर भी आ रहे हैं , गहरे समुद्र में भी। और हाँ , प्रदूषण भी फैलाते हैं उनके पुराने जहाज़।

इन : हमें भी लड़ना आता है , जीना आता है भाई। हम इस पर भी चर्चा करेंगे।

केनू : (जैसे नींद से जागते हुये ) : हाँ बहन , ‘न ‘ , ‘न’ अक्षर से पढ़ो अपनी कविता।

इन : मैं अपना लिखा गीत पढूंगी।

अन्य मछलियां (सामूहिक स्वर में ) : हमने भी अपने गीत पढ़े हैं। अपने लिखे !

केनू : (अपने हाथों से सबको शान्त रहने का संकेत करता है। इन को सम्बोधित करता है। ) आप ‘न ‘ से सुनाईये !

इन : हाँ , हाँ , सबने अपने गीत पढ़े हैं। अपने लिखे ! छोड़िये , लीजिये मेरा गीत सुनिये सभी लोग !

नया समय है,
जल में नये- नये बदलाव।
कभी यहाँ पर प्रदूषण है,
कभी शिकारियों की भरमार।
हम भी लेकिन हैं ताकतवर,
दुश्मन को धूल चटायेंगे ,
खींच तलहटी में समुद्र के
उनको सबक सिखायेंगे।

सभी मछलियां : वाह -वाह , वाह -वाह। बहुत सुन्दर गीत इन , बहुत सुन्दर गीत।

केनू : बहुत सुन्दर ! बहुत अच्छा रहा अपना कार्यक्रम। अब आगे ?

सभी मछलियों का सामूहिक स्वर : धन्यवाद केनू भाई। आपके कारण ही हो पाया यह सब।

केनू : (मुस्कराता हुआ ) हाँ तो !

फिन : कुछ नहीं भाई , चला जाये अपने घर बहुत देर हो गयी। दोस्तों , जल नमस्ते !

(केनू मुस्कराता है। सभी लोग हँसते हैं। धीरे धीरे गीत सुनाई देता है …। )

मेरा सागर
मेरा जीवन
मैं मस्ती में मेरे अंदर।
जीवन इससे
इससे जीवन।
हम फूल हैं इसके
ये मेरा उपवन।

—–समाप्त —–


-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
(प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्किट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें(2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी(2019) , चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हैं । बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017) ,पथिक और प्रवाह(2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑफ़ फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया माध्यमों के लिये सैकड़ों नाटक , कवितायेँ , समीक्षा एवं लेख लिखे हैं। लगभग दो दर्जन संकलनों में भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित हुयी हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सोलह पुरस्कार प्राप्त हैं ।)

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