प्रकाशकीय
मानव-जीवन में विचारों, बुद्धि तथा संकल्प-शक्ति की भूमिका मूल्यवान् है। यह पुस्तक विचार-शक्ति के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालती है तथा मानव-बुद्धि और संकल्प-शक्ति को एक सम्यक् दिशा प्रदान करती है। इस दृष्टि से यह पुस्तक भी मूल्यवान् है।
छात्रों, प्रौढ़ों, व्यापारियों और सत्यान्वेषी साधकों-सभी के लिए इस पुस्तक में विचार-संस्कृति का एक ऐसा चित्र प्रस्तुत किया गया है जो उनके लिए अपने-अपने व्यक्तित्वों को शक्तिशाली बनाने, आत्म-सुधार एवं आत्मोन्नति करने तथा जीवन को एक सुदृढ़ आधार पर अवस्थित करने हेतु एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
लघु आकार की इस पुस्तक की महत्ता निःसन्देह लघु नहीं है।
–द डिवाइन लाइफ सोसायटी
आमुख
इस शिक्षाप्रद पुस्तक में जीवन के रूपान्तरकारी मूल्य समाहित हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति न होगा जो इस पुस्तक को पढ़ कर अपनी वैयक्तिक प्रकृति में परिवर्तन तथा आचार और शील में रूपान्तरण लाना न चाहे। पर्याप्त विचारपूर्ण निर्णय तथा विश्वास के आधार पर हम यह बलपूर्वक कह सकते हैं कि इस पुस्तक का परिशीलन करने वाला ऐसा कोई भी व्यक्ति न होगा जो अपने संकल्प को एक ऐसी शक्ति के रूप में निर्माण करने की अपनी उत्सुकता का प्रतिरोध करने में असफल हो, जो कि उसके निजी जीवन तथा नियति में परिवर्तन लाती तथा उसे उन्नत बनाती है। यह पुस्तक ऐसे गर्भित मार्गदर्शनों से पूर्ण है जिनसे हम अपने व्यक्तित्व को अप्रतिहत प्रभावकारी तथा मोहक शक्ति में रूपान्तर कर सकते तथा जीवन को, अपने में प्रतिष्ठित दिव्य सत्य के, अपने पोषित दिव्य उल्लास के तथा अपनी सत्ता में सन्धृत दिव्य पूर्णता के महाकाव्य-प्रस्फुटन की अनेक भव्य कथाओं का रूप दे सकते हैं।
यह इस भाँति एक सरल, खरी तथा प्रेरणादायी पुस्तक है जो विचार-शक्ति के संवर्धन तथा परिपोषण के लिए अनेक विधियाँ प्रसारित करती है। यह ऐसी भी पुस्तक है जो हमें अनेक ऐसे उपयोगी सुझाव प्रस्तुत करती है जिनसे हम विचार तथा उसकी शक्ति के साम्राज्य से परे, मनसातीत अनुभव तथा भागवतीय चेतना के जगत् में पहुँचने में समक्ष बनते हैं।
सम्पूर्ण मानवता के प्रति अपने प्रेम से सहायता तथा प्रत्येक मनुष्य की सेवा के लिए अपनी अथक शक्ति के विवेक से आदेश प्राप्त कर शिवानन्द जी ने अपने को सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए, जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध कर दिखाया तथा अपनी निजी बोधप्रद और आध्यात्मिक शैली में प्रचुर वैविध्यपूर्ण विषयों पर पुस्तकों का प्रणयन किया। समस्त भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की भावना को अपने में समावेश कर शिवानन्द जी ने जीवन-बोधमयी पुस्तकों की शत-शत भेंटों की मानवता पर वृष्टि की। प्रस्तुत पुस्तक अपनी संस्तुति स्वयं करेगी तथा सामान्य जन एवं आध्यात्मिक व्यक्तियों के समुदाय-दोनों को ही अनेक प्रतिफल प्रदान करेगी। यह पुस्तक विशेषकर उन लोगों के लिए अत्यधिक मूल्यवान् सिद्ध होगी जो कि किसी धर्म-विशेष में विश्वास नहीं करते, जिन्होंने किसी ईश्वर के प्रेम से अपना मुँह नहीं मोड़ रखा है, जो किसी मत-मतान्तर की बातों को
अंगीकार नहीं करते, फिर भी अपने कार्यशील जगत् के परिसर में रहते हुए अधिकार, शुद्धता, शान्ति, समृद्धि, प्रगति, सुख तथा पूर्णता का जीवन यापन करने के लिए उत्सुक रहते हैं।
शिवानन्द जी ने इस पुस्तक में विचार-शक्ति के प्रगतिशील ज्ञान को असन्दिग्ध रूप से इन तीन भिन्न क्षेत्रों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है :
१. उच्चतर विशिष्ट मनोविज्ञान का क्षेत्र : शिवानन्द जी यहाँ विचार की उस शक्ति के रूप में चर्चा करते हैं जो मुखाकृति को गढ़ती, चरित्र को सँवारती, भाग्य को बदलती तथा जीवन को सर्वतोमुखी सफल बनाती है।
२. पूर्ण विकसित परा–मनोविज्ञान : यह क्षेत्र इस पुस्तक में दूर-दूर तक विकीर्ण उन अनुच्छेदों तथा अध्यायों के अन्तर्गत है, जो इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि मानव-मन अनेक अधिसामान्य शक्तियों तथा कारकों का अधिष्ठान तथा केन्द्र है। शिवानन्द जी ने अपने पाठकों से उन शक्तियों के उन्मोचन के लिए तथा अपने समादेशाधिकार में रहने वाली विविध उच्चतर क्षमताओं को अपने बाह्य जीवन में प्रवर्ती करने का आग्रह करते हैं।
३. परा–अनुभूति का क्षेत्र: शिवानन्द जी जहाँ-कहीं भी विचार-मुक्ति के लिए कोई विधि निर्धारित करते हैं अथवा उस विषय की चर्चा करते हैं, वहाँ वह हमें दिव्यानुभूति के उस साम्राज्य में ले जाने का प्रयास कर रहे होते हैं जहाँ विचार विचार न रह कर असीम चेतना में विभाषित हो उठता है।
अस्तु, यह पुस्तक विचार के दृश्य जगत् में शिवानन्द जी को एक प्रकार से एक व्यावहारिक मानस-शास्त्री, भौतिकीयविद् तथा रसायनज्ञ और परा-मनोवैज्ञानिक तथा योगी के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है और इस भाँति अपने भविष्य के निर्माण में, जीवन में अपनी सफलता की उपलब्धि में तथा विचारों के दक्ष-प्रयोग तथा उनमें सँजोयी अलौकिक शक्तियों को बलात् हस्तगत करने की शक्ति के अधिगमन में उनको साहाय्य प्रदान करती है। यह पुस्तक विचार-नियमन द्वारा शिष्टता एवं संस्कृति की प्राप्ति में स्वास्थ्यकर, रचनात्मक तथा प्रेरणादायी विचार-स्पन्दनों के उन्मोचन की अपनी क्षमता के उपयोग में, किसी महान् और भव्य कार्य-निष्पादन द्वारा सुख और शान्ति की उपलब्धि में तथा इस पार्थिव जगत् के सभी मानवों की चरम परिणति-रूप भगवत्साक्षात्कार की प्राप्ति में उनकी सहायक होगी।
विश्व-प्रार्थना
हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!
तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।
तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो।
तुम सच्चिदानन्दघन हो।
तुम सबके अन्तर्वासी हो।
हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।
श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो।
हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,
जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।
हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों। ह
हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो।
हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।
तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।
सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।
सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।
तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।
सदा हम तुममें ही निवास करें।
–स्वामी शिवानन्द