शोध आलेख: आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्र भक्ति-तुलसी देवी तिवारी (भाग-4)

शोध आलेख:गतांक से आगे

आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्र भक्ति

इकाई-3 राष्‍ट्र भक्ति के प्रणेता साहित्‍यकार-2

-तुलसी देवी तिवारी

शोध आलेख: आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्र भक्ति-तुलसी देवी तिवारी
शोध आलेख: आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्र भक्ति-तुलसी देवी तिवारी

शोध अरलेख –

पंडित जवाहर लाल नेहरू (14 नवंबर सन् 1889-27 मई सन् 1964)-

मोतीलाल नेहरू और स्वरूपरानी के अंश से जन्में जवाहरलाल नेहरू गांधी जी के बाद तत्कालीन भारत के सर्वमान्य नेता थे। प्रभाव शाली व्यक्तित्व के धनी नेहरू जी आजादी की लड़ाई में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण कई बार जेल गये। कारावास का समय वे पुस्तकें लिख कर व्यतीत करते थे। ऐसे ही कुयोग को सुयोग बनाते हुए उन्होंने ’ डिस्कवरी ऑफ इंडिया’’भारत एक खोज’ की रचना की,यह एक शोध ग्रन्थ है इसके माध्यम से उन्होंने संसार को भारत के स्वर्णीम इतिहास से परिचित करवाया। 

वेदव्यास की कलम का जादू, कौटिल्य की कूटनीति,चंद्रगुप्त की तलवार का पानी और संगठन क्षमता, का दिग्दर्शन कराया साथ ही वाल्मिकी, तुलसीदास, सूरदास, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, जातक कथाएं बोध कथाएं, लिच्छिवी गणराज्य, आर्य भट्ट, नागार्जुन कालीदास, समुद्र गुप्त, विक्रमादित्य राजपुताने की आन-बान और शान का वर्णन करते हुए देश  पर मुगलों की बर्बता और अंगे्रजों की धोखे बाजी की पड़ताल की है। उन्होंने बताया है कि भारत कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था। यहाँ रहने वाले देव तुल्य लोगों के लिए भगवान् भी बार-बार धरती पर जन्म लेते रहे हैं। 

सियाराम शरण गुप्त-(4 सितंबर1895 से 1963)-

राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के अनुज सियाराम शरण गुप्त जी गांधी जी से प्रभावित थे भारतीयों की एक मांग , एक ही जिद्द थी आजादी ! आजादी और पूर्ण आजादी । सेना, संगठन, हथियार , धन, से रहित मात्र जन बल के द्वारा देश की जनता स्वतंत्रता संग्राम  की निरंतरता जारी रखे हुए थी। सियाराम शरण गुप्त जी  देशवासियों को उनके विगत का स्मरण कराते हुए लिखते है-

जग में अब भी गूंज रहे हैं गीत हमारे,
 शौर्य वीर गुण हुए न अब भी हमसे न्यारे।
 रोम, मिश्र चीनादि कांपते,रहते सारे। 
 युनानी तो अभी-अभी हमसे हैं हारे। 
 सब हमें जानते हैं सदा,
 भारतीय हम हैं अभय,
 फिर एक बार हे विश्व तुम,
 गाओ भारत की विजय। 

भारत के प्राचीन गौरव को स्मरण करा कर देश का मनोबल बढ़ाने वाली यह कविता स्वतंत्रता के दीवानों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं थी। इनकी प्रसिद्ध कविता ’हम सैनिक’ विभिन्न पाठ्य क्रमों में पढ़ने को प्राप्त होती रही हैं ।

जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’(सन् 1895 से 1957)-

ये द्विवेदी युगीन कवि थे। गद्य लेखन को भलिभॉंति स्वीकृति मिल चुकी थी। देश में अत्याचारी अंगे्रजों का शासन था। पीछे  विफल प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन था तो आगे भारत माता की मुक्ति की  आशा रगों में पिघला लावा प्रवाहित कर रही थी। अब कविता नरेशों के केलि कक्ष से बाहर आ चुकी थी , उसका  विषय पूरी तरह बदल चुका था, देश की विपन्नता का करुणोत्पादक गायन और इससे बाहर निकलने के लिए  देश का जन-जन जी जान से प्रयत्नशील था। सवइयों के बादशाह हितैषी जी कि जिन पंक्तियों को गाते- गाते देश के सपूत फाँसी के फंदों को जयमाल समझ कर गले में डालने लगे  उन पंक्तियों को बार- बार पढ़ने सुनने की किसकी इच्छा नहीं होगी?-

उरूगे कामयाबी पर,कभी हिन्दोस्ताँ होगा,
 रिहा सैयद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।
 चखायेंगे मजा़ बर्बादिये गुलशन का गुलची को,
 बहार आ जायेगी उसी दम जब अपना बागबाँ होगा ।
 ये आये दिन की छेड़ अच्छी नहीं,ऐ खंजरे कातिल,
 पता कब फैसला उनके हमारे दरम्याँ होगा।

  जुदा मत हो पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज,
 न जाने बाद मुर्दन के मैं कहाँ  और तू कहाँ होगा। 
 वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है?
 सुना है मकतल में आज हमारा इम्तिहाँ होगा।
 शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले ,
 वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशाँ होगा।
 कभी वह दिन भी आयेगा जब वतन पर अपना राज देखेंगे
 , जब अपनी ही जमीं होगी अपना आसमाँ होगा।

हितैषी जी की अभिलाषा उनके जीवन काल में ही पूर्ण हो गई । देश की आजादी का उत्सव मनाया उन्होंने, किंतु माँ के ममता मय आंचल के दो टुकड़े होने की त्रासदी भी झेलनी पड़ी उन्हें।

पद्मश्री श्यामलाल गुप्त ’पार्षद’ (9 सितम्बर 1896-10अगस्त 1977 )-

कानपुर के नरवल के रहने वाले श्याम लाल गुप्त जी  19 वर्ष की उम्र से ही स्वतंत्रता संग्राम के वीर सैनिक रहे।  वे इसी समय फतेहपुर कांगे्रस समिति के अध्यक्ष बनेे। इन्हंे दुर्दान्त क्रान्तिकारी घोषित कर छः वर्ष के लिए आगरा जेल में बंद कर दिया गया। वहीं उनकी मुलाकात आंदोलन के शीर्ष नेताओं – महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरु, महादेव देसाइ,  महान् कवि राम नरेश त्रिपाठी, आदि से हुई । उन पर और भलि-भॉंति चढ़ गया देश भक्ति का रंग।

रामचरित मानस के अध्येता, प्रवचन कर्ता, श्री पार्षद जी की एक कविता से प्रखर देश भक्त श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी इनसे बड़े प्रभावित हुए थे, झंडा गीत का अभाव उन्हें खलता था, एक  दिन उन्होंने पार्षद जी से झंडा गीत लिखने का आग्रह किया।  उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन गीत जम न सका । जब विद्यार्थी जी ने समय दे दिया तब एक रात में ही गीत तैयार हो गया। विद्यार्थी जी सहित नेहरु जी और गांधी जी को गीत बहुत पसंद आया इसे 13 अपे्रल1924 को कानपुर के फूलबाग में पहली बार गाया गया। गांधी जी की सलाह पर इसे कुछ छोटा करके सन्1938 के कांगे्रस अधिवेशन में  सुभाष चंद्र बोस ने इसे झंडा गीत के रूप में राष्ट्रीय गीत स्वीकार कर लिया , तब से अब तक जब भी हम झंडा उठाकर कहीं जाते हैं  समवेत कंठ से स्वमेव गा उठते हैं-

झंडा ऊँचा रहे हमारा, 
 विजयी विश्व तिरंगा प्यारा । 

 सदा शक्ति सरसाने वाला,
  प्रेम सुधा बरसाने वाला।
 वीरों को हरषाने वाला, 
 मातृभूमि का तन-मन सारा, झंडा………

 स्वतंत्रता के भीषण रण में, 
 लखकर जोश बढ़े क्षण- क्षण में।
 कापें शत्रु देखकर मन में,
  मिट जाये भय संकट सारा 
 झंडा ऊँचा रहे हमारा।
 
इस झंडे के नीचे निर्भय, 
 ले स्वराज्य अब अविचल निश्चय।
 बोलो भारत माता की जय।  
  स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा, 
 झंडा ऊँचा रहे हमारा ……..
 
आओ प्यारे वीरों आओ!
  देश धर्म पर बलि-बलि जाओ! 
  एक साथ सब मिल कर गाओ!
  प्यारा भारत देश हमारा ---झंडा ……
 
शान न इसकी जाने पाये ,
  चाहे जान भले ही जाये । 
 विश्व विजय करके दिखलायें,
  तब होवे प्रण पूर्ण हमारा ,
  झंडा ऊँचा रहे हमारा।

यह गीत अपने देशवासियों के लिए पार्षद जी ओर से राष्ट्रभक्ति की अमर सौगात है।

बाल कृष्ण शर्मा ’नवीन’(8 दिसम्बर सन् 1897-19 अप्रैल 1960)-

पद्म श्री बालकृष्ण शर्मा का जन्म ग्वालियर के शाजापुर जिले के भयाना गाँव में हुआ। सारा जीवन भयानक आर्थिक संकट झेलते हुए भी इन्होंने मातृभूमि की आजादी के लिए अथक प्रयास किये।  इनकी अधिकांश रचनाओं का जन्म जेलों में ही हुआ। सन् 1916 में कांग्रेस के लखनउ सम्मेलन में इनकी भेंट लोकमान्य बालगंगाधर तिलक,मैथिलीशरण गुप्त आदि से हुई । इनकी पढ़ने की विकट लालसा देखकर गणेश शंकर विद्यार्थी जी इनके आग्रह पर इन्हें  अपने साथ कानपुर ले गये और क्राइस्ट चर्च कॉलेज में भर्ती करा दिया जहाँ इन्होंने ट्यूशन करके अपनी फीस अदा की और राजनीति, धर्म दर्शन, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी आदि का गंभीर अध्ययन किया।

प्रताप के संपादन में भी सहयोग किया और कवि के रूप में ख्याति प्राप्त की। सन् 1921 में संयुक्त प्रान्त के सत्याग्रहियों के पहले जत्थे में इनका नाम था। इसमें इन्हें डेढ़ साल की सजा हुई और भी नौ वर्ष जेल में लोमहर्षक यातनाओं के बीच बिताने पड़े , ये सारी सजाएं देशभक्ति पूर्ण आलेख और कविताएं लिखने के कारण मिलीं। पत्रकारिता और राष्ट्रीयता के लिए इन्होंने सब कुछ सहा । ये उन सौभाग्यशालियों में से थे जिन्होने देश को स्वतंत्र होते और स्वाभिमान के साथ नवनिर्माण के पथ का पथिक बनते देखा। इन्हें सन् 1960 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।  जिसे सुन कर अंग्रेजों की नानी मर गई थी और देश का बच्चा-बच्चा अपने आप को देश का सिपाही समझकर उन्हें देश से भगाने के लिए जो पास में था उसे ही लेकर मैदान में डट गया था इनकी उस कविता की चंद पंक्तियाँ –

विप्वलव गायन’
 कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ!
 जिससे उथल-पुथल मच जाये।

 एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये,
 प्राणों के लाले पड़ जाये,त्राहि- त्राहि स्वर नभ में छाये ।
 नाश और सत्यानाशों का, धुआँधार जग में छा जाये।
 बरसे आग जलद जल जाये,भस्मसात् भूधर हो जाये।

 पाप पुण्य सद्सद् भावों की धूल उड़ उठे दाएँ -बाएँ
 नभ का वक्षस्थल फट जाए,तारे टूक- टूक हो जाएं,
 कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ! जिससे……………
 विश्वमूर्ति हट जाओ! मेरा भीम प्रहार सहे न सहेगा।
 टुकड़े-टुकड़े हो जाओगी, नाश मात्र अवशेष रहेगा।

 आज देख आया हूँ, जीवन के सब राज समझ आया हूँ, 
 भू विलास में महानाश के पोषक सूत्र   परख आया हूँ। 
 जीवन गीत भुला दो  कंठ मिला दो 
 मृत्यु गीत के स्वर से, रूद्ध गीत की क्रुद्ध तान है ,
 निकली मेरे अन्तरतम से। 

शर्मा जी की अन्य लब्धख्याति रचनाएं–कुंकुम, रश्मिरेखा,आदि हैं।

पंडित  राम प्रसाद बिस्मिल (11जून 1997 से 19 दिसंबर 1927)-

ये न केवल एक महान् क्रांतिकारी बल्कि उच्चकोटि के कवि, शायर , लेखक और अनुवादक भी थे। ब्रिटिश भारत में शाहजहाँपुर में जन्में बिस्मिल की 11 पुस्तकें उनके जीवनकाल में ही प्रकाशित हो गईं थीं जिनमें स्वदेशी रंग, चीनी षड़यंत्र, असफाक की याद में,सोना खान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह,तपोनिष्ठ अरविंदघोष की कहानी , क्रांति गीतांजलि,आदि प्रमुख हैं। इनकी कविताओं में – ’मेरा रंग दे वसंती चोला’ हर भारतीय का चहेता गीत है। इसकी रचना रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने साथियों के आग्रह पर तब की जब वे काकोरी कांड के कई आरोपियों के साथ लखनउ जेल में बंदी थे।

वसंत पंचमी का त्यौहार मनाने के बहाने क्रांतिकारियों ने सरकार को अपना जलवा, अपनी हिम्मत, अपना बलिदानी मन्तव्य जता दिया। उन्होंने तय किया कि वसंत पंचमी के दिन पेशी के लिए कोर्ट जाते समय सभी साथी पीली टोपी पहनेंगे और हाथ में पीला रूमाल लहराते हुए आगे बढ़ेंगे, इस अवसर के उत्साह को दुगना करने के उद्देश्‍य से साथियों ने बिस्मिल जी से एक फड़कता हुआ गीत बनाने की बात कही, और गीत तैयार हो गया-

मेरा रंग दे वसंती चोला, हो मेरा रंग दे वसंती चोला,
 इस रंग में रंग के शिवा ने माँ के बंधन खोला,
  यही रंग हल्दी घाटी में था प्रताप ने घोला,
  नव वसंत में भारत के हित वीरों का यह टोला,
 किस मस्ती से पहन के निकला यह वसंती चोला, --मेरा रंग दे----

भगत सिंह उस समय लाहौर जेल में थे, उन्होंने भी इस गीत में कुछ पंक्तियाँ जोड़ दी-

इसी रंग में बिस्मिल जी  ने वंदेमातरम् बोला,
 इसी रंग को हम मस्तों ने- हम मस्तों ने ऽ…..ऽ.
 दूर फिरंगी को करने - दूर फिरंगी को करने  को ,
 अपने लहू में घोला --मेरा रंग दे वसंती चोलाऽ…..ऽ. माया रंग दे ---

यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन में तो जन- जन का कंठहार था ही  आजादी के बाद तो यह पूजा आरती के गीत की तरह पूज्य हो गया। सन् 1965 में ’शहीद’ नाम की पिक्चर बनी तब संगीतकार गीतकार प्रेम धवन ने भगत सिंह की माता के पावन सानिध्य में इस गीत की आत्मा का परिचय प्राप्त किया और नये कलेवर में यह गीत नई पीढ़ी में भी उतना ही लोकप्रिय हो गया जितना अपने जमाने में था। 

बिस्मिल अजीमाबादी-(1901—1978)-

बिस्मिल अजीमाबादी एक लब्ध ख्याति उर्दू शायर हो गये हैं।  इनकी देश भक्ति के रस में पगी रचनाएं इनके जीवन काल में ही इतनी प्रसिद्ध हो गईं थीं कि हर क्रान्तिकारी की जबान से उन्हें सुना जा सकता था। 1887 में जन्में  क्रान्तिकारी धारा के प्रमुख सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के ’मेरी आत्म कथा’ नामक पुस्तक के आवरण पृष्ट पर गौरवपूर्ण स्थान पाने वाले शेर लिखे-

‘सरफरोसी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
 देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ?

 करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचित,
 देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल में है। 
 शहीदे मुल्क वो मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
 अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है। 
 सरफरोसी की तमन्ना …..

 वक्त आने पर बता देंगे,तुझे ऐ आसमान,
 हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है। 
 खींच कर सबको लाई है कत्ल होने की उम्मीद,
  आशिकों का आज जमघट कूचाए कातिल में है। 
  सरफरोसी की तमन्ना अब …….

अधिकतर लोगों को यह पंक्ति बिस्मिल अजीमाबादी का न लग कर पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का ही लगने लगा। यही नहीं 19 दिसम्बर 1927 में  अपने साथी, राजेन्द्र लाहिड़ी, असफाकउल्ला खाँ, और रोशन सिंह के साथ फाँसी के तख्ते पर चढ़ते हुए भी ये ही शेर उनकी जबान पर थे। जब भी देश पर बलिदान होने की बात आती है वीरों की जबान पर अब भी ये शेर लरजने लगते हैं।

सुभद्रा कुमारी चैहान (16 अगस्त 1904 से 1948)-

प्रयाग के निहाल पुर गाँव में जन्मी सुभद्राकुमारी चैहान की काव्य प्रतिभा का परिचय बाल्य काल में ही मिलने लगा था। विद्रोही, बहादुर और दबंग व्यक्त्वि वाली सुभद्रा जी का विवाह नवलपुर के ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ हुआ। विवाह के डेढ़ वर्ष भी न बीते थे कि सन् 1920 में गांधी जी के आह्वान् पर सत्याग्रह में शामिल हो गईं। उनके पति भी कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे। 1922 के झंडा सत्याग्रह में भी उनकी उल्लेखनीय साझीदारी थी। माखनलाल चतुर्वेदी जी उनके पथप्रर्दशक थे।

यूंं तो उन्होंने सभी विधाओं में रचनाएं की किंतु देश भक्ति पूर्ण कविताओं ने हिन्दी साहित्य में उन्हें विशिष्ट स्थान पर स्थापित कर दिया। 13अप्रैल सन्1919 में बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियाँ वाला बाग में  रोलेटएक्ट का शांति पूर्ण विरोध करने वाले हजारों लेागों को गोलियों से भून दिये जाने से सारी दुनिया स्तब्ध थी,देश वासियों की रगो में जैसे पिघला हुआ लावा बह रहा था जनरल डायर को अंग्रेजों ने देश से बाहर भगा दिया था। ऐसे में कवयित्री सुभद्रा जी की विकलता इन शब्दों का रूप धर कर सामने आई-

जलियाँ वाला बाग में बसंत-

 परिमल हीन पराग दाग सा बन पड़ा है,
 हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है। 

 आओ  प्रिय ऋतुराज! किंतु  धीरे से आना,
 यह शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना ।

 कोमल बालक मरे यहाँ गोली खाकर,
 कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।

देशवासियों के मन में बारूदी विस्फोट करने वाली, तलवारों की टकराहट गूँजाने वाली  कविता ‘झाँसी की रानी’ शायद ही किसी की अश्रूत हो, यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के साथ दुघर्ष वीरता के साथ युद्ध करने वाली वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का परिचय है, साथ ही आह्वान भी है गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ कर फेंक देने का, भारत माता को राजमुकुट पहनाने का। आलस्य त्याग कर अंगड़ाई लेकर उठ खड़े होने का-

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,
 खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

 बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी ,
 गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी। 
 दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
 चमक उठी सन् सनतावन में वह तलवार पुरानी थी।
 बुंदेले हर बोलों के मुँह…………………………………

 इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आये काम,
 नाना धुंधूपंत,तातिया चतुर अजिमुल्ला सरनाम ।
 अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँअर सिंह सैनिक अभिराम। 
 भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम 
 लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुर्बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह…………..

 इनकी गाथा  छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में, 
 जहाँ खड़ी है लक्ष्मी बाई मर्द बनी मर्दानों में ।
 लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा,आगे बढ़ा जवानों में, 
 रानी ने तलवार खींच ली हुआ द्वंद्व असमानों में ,
 जख्मी होकर वाकर भागा उसे गजब हैरानी थी, बुंदेले हर बोलों के………

सुभद्राकुमारी चैहान ने अपने अल्प जीवन का एक- एक पल अपने राष्ट्रको समर्पित कर दिया, साथ ही अपने सामाजिक एवं मानवीय दायित्व का निर्वहन भी बखूबी किया। देश को गर्व है उनके कवित्त और कृतित्व पर।

शोध अरलेख शेष अगले अंक में …….

श्रीमती तुलसी तिवार, जिनकी जन्‍मभूमि उत्‍तरप्रदेश एवं कर्मभूमि छत्‍तीसगढ़ है, एक चिंतनशील लेखिका हैं । आप हिन्‍दी एवं छत्‍तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में समान अधिकार रखती हैं और दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं । आपके पिंजरा, सदर दरवाजा, परत-दर-परत, आखिर कब तक, राज लक्ष्‍मी, भाग गया मधुकर, शाम के पहले की स्‍याह, इंतजार एक औरत का आदि पुस्‍तकें प्रकाशित हैं ।

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