आलेख महोत्‍सव: 12. भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत -चोवा राम वर्मा ‘बादल’

-आलेख महोत्‍सव-

भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत

आजादी के अमृत महोत्‍सव के अवसर पर ‘सुरता: साहित्‍य की धरोहर’, आलेख महोत्‍सव का आयोजन कर रही है, जिसके अंतर्गत यहां राष्‍ट्रप्रेम, राष्ट्रियहित, राष्‍ट्र की संस्‍कृति संबंधी 75 आलेख प्रकाशित किए जाएंगे । आयोजन के इस कड़ी में प्रस्‍तुत है-श्री चोवा राम वर्मा ‘बादल’ द्वारा लिखित आलेख ” भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत’।

गतांक- आलेख महोत्‍सव: 11. भारत की एकता में बाधक तत्व

भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत

-चोवा राम वर्मा ‘बादल’

आलेख महोत्‍सव: 12. भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत -चोवा राम वर्मा 'बादल'
आलेख महोत्‍सव: 12. भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत -चोवा राम वर्मा ‘बादल’

भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत

सांस्‍कृतिक विरासत राष्‍ट्रीय एकता का पोषक-

हमारा प्यरा देश भारत उच्चतम सांस्कृतिक मापदंडों वाला देश है। यहाँ की सांस्कृतिक विरासत सदैव ही राष्ट्रीय एकता के पोषक रहे हैं। यही कारण है कि अनेकानेक कठिन परिस्थितियों से गुजर कर, गुलामी की जंजीरों में जकड़कर भी यह अपने अदम्य साहस के बलबूते आजाद होकर, आज भी अक्षुण्ण बना हुआ है। हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति आज विश्व में पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा रहा है।

संस्‍कृति का अर्थ-

संस्कृति का अर्थ होता है उत्तम या सुधरी हुई अवस्था। मानव स्वभाविक रूप से प्रगतिशील प्राणी है । वह अपने बुद्धि बल के सहारे परिस्थितियों को निरंतर सुधारता और उन्नत करता रहता है। इसी कारण वह पशुओं और जंगलियों के दर्जा से ऊपर उठकर सभ्यता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपने जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है।

सभ्यता और संस्कृति में अंतर-

सभ्यता और संस्कृति में महीन अंतर होता है। मनुष्य की भौतिक प्रगति, धन से प्राप्त सुविधा आदि सभ्यता से प्रकट होती है जबकि मानसिक क्षेत्र, आचार-विचार, रीति रिवाज, खान-पान ,रहन-सहन आदि में व्याप्त मानवोचित उत्तम गुण संस्कृति के तत्व होते हैं। मनुष्य केवल भौतिक स्थिति में सुधार करके सुखी, शांत और संतुष्ट नहीं होता अपितु सांस्कृतिक विकास के द्वारा आत्म शोधन से तृप्त होकर आत्मिक, अलौकिक सुख -शांति का अनुभव करता है। मानव की जिज्ञासा का परिणाम धर्म और दर्शन होता है । सौंदर्य की खोज करते हुए वह संगीत ,साहित्य, मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तु कला आदि कलाओं को उन्नत करता है। समाज में सुख पूर्वक निवास करने के लिए विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का निर्माण करता है। इस प्रकार मानसिक क्षेत्र में उन्नति की प्रत्येक रेखा उसकी संस्कृति का अंग बनती है।

संस्‍कृति का प्राण सामूहीकरण की भावना-

किसी देश की संस्कृति में प्रधान रूप से वहाँ की धर्म, दर्शन, सभी ज्ञान विज्ञान कला, सामाजिक व राजनीतिक संस्था, आचार- विचार, रीति-रिवाज, खान-पान, वेशभूषा व शिक्षा आदि का समावेश होता है। संस्कृति में ही सामूहीकरण की भावना छिपी होती है। संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रीय एकता कायम करने में शिक्षा का विशेष योगदान होता है। शिक्षा राष्ट्रीय एकता को बढ़ाती है। भेदभाव को मिटाकर, समानता लाने में इसका विशिष्ट योगदान होता है । संस्कृति का विकास राष्ट्रीयता की शिक्षा देने से होती है। शिक्षा के द्वारा जो एक विशेष प्रकार की संस्कृति विकसित होती है उससे एकजुटता की भावना बलवती होती है। शिक्षा के द्वारा भेदभाव को मिटाकर समतामूलक समाज का निर्माण कर राष्ट्रीय एकता को बढ़ाया जा सकता है। शिक्षा देकर समझाया जाता है कि “व्यक्ति राष्ट्र के लिए है, राष्ट्र व्यक्ति के लिए नहीं।” यह संदेश देश के लिए बलिदान पथ पर कदम बढ़ाने को प्रेरित करता है।

अनेकता में एकता का मूल भारतीय संस्‍कृति-

हमारे देश के बारे में यह सर्वविदित तथ्य है कि यहाँ विभिन्न धर्म ,संप्रदाय ,जाति बोली- भाषा, वेषभूषा, खानपान व अचार विचार वाले लोग निवास करते हैं फिर भी यहाँ अनेकता में एकता है। इस एकता को संचारित व सुगठित करने का मूल कारण भारतीय संस्कृति ही है। हमारी संस्कृति जनतांत्रिक नागरिकता के उत्तरदायित्वों का बोध कराती है।

आचार: प्रथमो धर्म:-

हमारे देश की संस्कृति में धर्म-दर्शन और साहित्य का अमिट स्थान है । भारतीय संस्कृति के माध्यम से धर्म को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि –“धर्म: इति धारयति:। अर्थात धर्म वही है जो धारण करने योग्य हो या धर्म वह है जो मनुष्य को ऊँचा उठाए, उसका जीवनचर्या का सुखद आधार बने, उसे संबल प्रदान करे। इसे ही असली धर्म कहा गया है। यह धर्म ही सही अर्थों में मनुष्‍य को मनुष्‍य बनाता है। लोगों को संकीर्ण विचार धारा से बाहर निकालता है। यह सभी को स्वीकार्य होता है जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, दान, सुकर्म आदि को भी धर्म के अंग कहे गए हैं। सदाचार के बारे में कहा जाता है कि- ”आचार: प्रथमो धर्म:।”

वेदों, शास्त्रों और साहित्यों की शिक्षा से राष्ट्रीय एकता-

भारतीय सनातन संस्कृति में वेदों की शिक्षा का राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में सदैव अमूल्य योगदान रहा हैं। महापोनिषद का सुक्त लोगों में भाईचारा व समानता का उद्घोष करता है जब वह कहता है कि –

“अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।

उदार जनों के लिए तो सम्पूर्ण वसुधा के निवासी कुटुम्ब हैं। यह विश्व बंधुत्व व एकता का परम मंत्र है जिससे भाईचारे की भावना का जन्म होता है। इसे भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में उत्कीर्ण किया गया है। उसी तरह से अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में धरती माता की स्तुति करते हुए कहा गया है कि –

“माता: भूमि: पुत्रो अहम् पृथिव्या:

अर्थात भूमि माता है और मैं उसका पुत्र हूंँ । यह सूक्त राष्ट्रवाद व राष्ट्रीय एकता के उद्दाम स्वरूप का दिग्दर्शन है। यह हमें बताता है कि हम सभी चाहे किसी जाति, धर्म में जन्म लिए हों,मूलतः एक कुटुम्बी ही हैं।

विष्णु पुराण के अंतर्गत राष्ट्र के प्रति श्रद्धा भाव चरम में व्यक्त होता है। भारत का यशोगान करते हुए उसे पृथ्वी पर स्वर्ग कहा गया है –

“अत्रापि भारत श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महागने।
यतोहि धर्म भूरेषा हृयतोअन्या भोग भूमय:।

भागवत पुराण में भारत को सम्पूर्ण विश्व मे सबसे पवित्र भूमि कहा गया है जहाँ देवता भी जन्म लेने की इच्छा रखते हैं। रामायण में रावण वध के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं कि-

अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि वेदों ,शास्त्रों, पुराणों में ऐसे आप्त वचन कहे गए हैं जिससे राष्ट्रीय एकता बढ़ती है । राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में साहित्य सदैव सहयोगी रहा है।

राष्ट्रीय एकता बढ़ाने में तीर्थों का विशिष्ट योगदान –

भारत में अनेक तीर्थ स्थल हैं जहाँ पूरे देश से तीर्थयात्री आते-जाते रहते हैं । उनमें मेलजोल होता है । विचारों का आदान-प्रदान होता है। सांस्कृतिक मेल मिलाप बढ़ता है जिसे राष्ट्रीय एकता बलवती होती है।

राष्ट्रीय एकता बढ़ाने में संतों का योगदान-

हमारी भारतीय सनातन संस्कृति में संतों का विशिष्ठ स्थान है। उनका उपदेश सदैव राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में सहायक रहा है । महात्मा गौतम बुद्ध महावीर स्वामी, आदि गुरु शंकराचार्य, नानक देव वल्लभाचार्य, संत रैदास तुकाराम, तुलसीदास, कबीर दास, सूरदास मीरा बाई , संत गुरु घासीदास आदि संतों की वाणी में राष्ट्रीय एकता का मूल स्वर है। गुरु नानक ने तो यहांँ तक कहा है कि -“न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है। अनेक संतों ने यह प्रतिपादित किया है ईश्वर एक है भले वह अनेक नामों से पुकारा जाता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति का एक आदर्शवादी स्वरूप है जो राष्ट्र के लिए हितकर होने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में सर्वोच्च सहायक है।

-चोवा राम वर्मा ‘बादल’
हथबंद, छत्तीसगढ़

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-संपादक
सुरता: साहित्‍य की धरोहर

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