बच्चे लायेंगे बदलाव (बाल साहित्य (नाटक))-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बच्चे लायेंगे बदलाव (बाल साहित्य (नाटक))

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बच्चे लायेंगे बदलाव (बाल साहित्य (नाटक))-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
बच्चे लायेंगे बदलाव (बाल साहित्य (नाटक))-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

पात्र

मोमची : मछली
फुलवारी : कछुआ
हरियाली : मेढक
फोंचू: नदी के किनारे ऊगा एक पुराना पेड़
डॉक्टर नेवला
बच्चे

दृश्य -एक

समय : दोपहर बाद

(अप्रैल का महीना है। शहर के बीच से होते हुए एक नदी बहती है। नदी में पानी थोड़ा कम हो गया है। बहाव कम है , किनारे सूख गये हैं। यह जगह किसी बड़े कारखाने का पिछले भाग है। नदी के किनारे एक बहुत सुन्दर सा पेड़ लगा है। उसका नाम फोंचू है। फोंचू धीमी आवाज़ में कुछ गा रहा है। )

फोंचू : (दर्द भरा गीत गाते हुये ) :
काश हवा कुछ ठंडी चलती
हम भी तो कुछ करते ,
पंखुड़ियों को फैला कर ,
हम गाते सब सुनते।
पर्दा बनकर धूल छा गयी,
हम कुछ भी न कर पाते।
होती बारिश हम खुश होते ,
काश हवा कुछ ठंडी चलती।

मोमची (अचानक पानी से झांकते हुये) : भाई फोंचू क्यों दुखी कर रहे हो। अभी कहाँ बारिश होने वाली ! आपकी बात है तो बहुत ही अच्छी , सोच भी अच्छी है। आवाज़ का क्या , कितनी सुरीली …. लेकिन क्या करें ! बारिश तो अपने हाथ में है नहीं। (सोच में पड़ जाता है। अचाननक किनारे से छप छप करती आवाज़ ! अरे ये क्या , एक कछुआ दिखाई देता है …हांफता हुआ, थका सा , नाम है उसका फुलवारी। मोमची अपनी बात पूरी किये हुये ही रुक जाती है। फुलवारी बोलना शुरू करता है …)

फुलवारी : बहुत सुरीली , बहुत सुरीली , लेकिन दोस्तों जल्द ही यह सुरीली आवाज़ सूखने वाली है !

मोमची : क्यों ? क्या हुआ फुलवारी ? क्या समाचार सुना रहे हो इस गर्मी में !

फुलवारी : (लम्बी साँस भरकर ) बहन , गर्मी के मारे तो मेरा बुरा हाल है। इस कारखाने (कारखाने की ओर संकेत करते हुये ) के रसायनों ने तो मेरा जीना दूभर कर दिया है। ये लो , इसे पहचानो ! (फुलवारी अपनी पीठ से हरियाली मेढक को उतार कर नीचे रखता है। )

हरियाली :( कराहता हुआ ) : हाय -हाय , हाय ! अरे जलमाता , जल देवी गोमती !

मोमची : अरे ये तो हरियाली भाई हैं ! (दुखी और व्याकुल होकर ) क्या हुआ इन्हे ! क्या हुआ !

फोंचू: अरे क्या होगा , वही जो हम सभी को को होना है एक दिन , बहुत जल्द !

फुलवारी (शांत भाव से ) : ये बेहोश मिले थे , वहाँ उस तरफ ! बड़ी मुश्किल से इन्हे पीठ पर लाद कर ले गये डॉक्टर नेवला के पास….

फोंचू : ये खा गये थे कुछ प्लास्टिक , हम चिल्लाते रहे , चिल्लाते रहे (फ्लैशबैक में वह दृश्य )… ये भी वरिष्ठ नागरिक हैं , किन्तु मानते कहाँ हैं , प्लास्टिक में कुछ लिपटा था ।

मोमची : वैसे भी प्लास्टिक कितनी विषैली होती है।

फोंचू : हाँ -हाँ , परिणाम सामने है !

मोमची: (शांत होते हुये ) हरियाली भाई वाकई बहुत चंचल हैं !

फोंचू : हम बोलते रहे , बोलते रहे …. (इशारा करते हुये ) इधर देखिये …यहीं पड़ा था …खा गये ये… फिर थोड़ी देर बाद उलट गये। दुःख हमें बहुत हो रहा था , पर हम क्या करते मोमची !

मोमची : (सोच में पड़ते हुये ): उस स्कूल के बच्चे आये दिन यहाँ पिकनिक मनाने आते हैं और यहीं नदी के किनारे पॉलिथीन के पैक , खली बोतल और बहुत सी चीज़ें छोड़ जाते हैं।

फोंचू : फेंक देते हैं, हमने देखा है।

मोमची : हमें कुछ करना चाहिये !

फुलवारी :(फोन पर किसी से बात करते हुये ) अच्छा , धन्यवाद डॉक्टर नेवला ! (प्रसन्न होकर बताता है ) डॉक्टर नेवला ने कहा है की इन्हे जल्दी ही होश आ जायेगा। चिंता की कोई बात नहीं है।

फोंचू: चलो बहुत अच्छी खबर है।

मोमची : (खुश होते हुये ) : जय प्रकृति की ! ठीक हो जाये सब !

फोंचू : आगे की लिए हमें कुछ करना होगा !

मोमची : जी !

फोंचू : हम बच्चो को बताना शुरू करेंगे। बच्चे तो मान जायेंगे , लेकिन बड़ों को बतायेगा कौन। वो कैसे मानेगें कितनी गन्दगी फैलाते हैं वो !

मोमची : कारखाने से कितनी गन्दगी बहकर आती है इधर।

फोंचू : वही तो हम कहते हैं , कितनी गन्दगी उस गंदे नाले से बहकर इधर आती है !

(अचानक हरियाली को होश आ जाता है। वह उठकर बैठ जाता है। सभी लोग बहुत खुश हो जाता है। )
हरियाली : अरे धन्यवाद दोस्तों ! धन्यवाद भाई फुलवारी ! बहुत- बहुत धन्यवाद।

फुलवारी : हमारा कर्तव्य था यह , हरियाली …हम सब जीव जंतु , मानव , पशु पक्षी सब प्रकृति के भाग हैं , और हाँ सभी में एक रिश्ता है। हम सभी धरती , हवा , पानी के हिस्सेदार हैं। हम सभी प्रकृति की संताने हैं भाई।

फोंचू : हाँ ये तो है ! (हरियाली की तरफ देखते हुये ) हरियाली आप ठीक हो गये बहुत अच्छा लग रहा है।(रुंधे गले से ) दोस्त आप कह रहे थे , लेकिन मैंने अनसुना कर दिया। पॉलिथीन को देखना ही नहीं था मुझे।

फोंचू: कोई बात नहीं। आओ हम लोग मिलकर इसे एक सुन्दर स्थान बनाते हैं। बच्चों को आने दो , मैं गाना गाऊँगा , आप लोग भी गाना।

मोमची : जरूर !

फुलवारी : अच्छा फोंचू भाई अपना हरियाली ठीक हो गया है , चलो कुछ खुशियाँ मानते हैं !

मोमची : जरूर !

फोंचू : तो गाओ गीत :

जल अपना है ,
अपनी धरती,
अपने बादल,
हवा है अपनी।

अपने बादल
अपनी धरती
अपना ही जल
अपना जीवन।
(दोस्तों साथ में गाओ। सभी सामूहिक स्वर में गाने को दोहराते हैं। धीरे – धीरे गाना समाप्त होता है। थोड़ी देर के लिये शांति। )

दृश्य दो

(नदी का वही किनारा। सभी लोग दुबारा दिखाई देते हैं। )

फुलवारी : फोंचू भाई का गीत बहुत अच्छा लगा ,वैसे हम लोग भी कितने दिन के बाद साथ साथ गाये !

मोमची : जी , बिलकुल। लेकिन देखिये नदी का बहाव भी कम हो रहा है। एक गन्दा नाला बनकर रह गयी है यह बहती हुयी सुन्दर नदी !

फोंचू : हम तो सैकड़ों साल से देखते रहे हैं। एक समय था , दूर दूर तक फैले किनारे। मीलों दूर तक दिखता था। साफ पानी , जीव जंतु , चिड़िया कितनी सारी ! दूर से लोग आते से देखने के लिये ! न पॉलिथीन का चलन , न इस कारखाने की गन्दगी।

फुलवारी : भाई फोंचू , तब ये कारखाना ही कहाँ था ! यहाँ तो हरा भरा पार्क हुआ करता था। प्यारे प्यारे बच्चे खेलते थे यहाँ ! ( सोच में डूब जाता है। )

हरियाली : …फिर लग गया ये मनहूस कारखाना।

मोमची : नहीं नहीं ऐसा न बोलो हरियाली… कारखानों से मानव समाज विकास करता है , ऐसा सुना है। मनुष्य जाति के लिये आज का समय विज्ञान और तकनीकी का है। बस बात है की संसाधनों और चीज़ों का लापरवाही भरा प्रयोग न करें।

फुलवारी : हाँ , लोग उद्योग धंधे , कारखाने खड़े कर रहे हैं , बनाते जा रहे हैं लेकिन उनसे निकले हुये प्रदूषण को कम करने की बात नहीं सोचते हैं।

फोंचू : इसीलिये तो कहते हैं की उन्हें जागरूक किया जाये। जागरूकता की जरूरत है , सही मायनों में शिक्षा की जरूरत है।

हरियाली : हाँ प्राकृतिक समाज में रहने की शिक्षा , मेरे दोस्त !

फोंचू : और इसका रहस्य हमें मालूम है।

मोमची : क्या रहस्य फोंचू ?

फोंचू : बच्चे , प्यारे प्यारे बच्चे ! हम उनको बतायेंगे , उनको सिखायेंगे, वो अपने बड़ों को।

(अचानक हरियाली चीखता है। )
हरियाली : वो देखो , वो देखो , वो देखो ! वो आ गये ! (अचानक दस बारह बच्चे स्कूल यूनिफार्म में आते हुये दिखायी पड़ते हैं। )

मोमची : फोंचू जी , आपकी अच्छी सोच का परिणाम , देखो आ गये बच्चे !

फोंचू : चलो गाना शुरू करें ! (सब गाना शुरू करते है। )
फोंचू और सभी का सामूहिक स्वर :

बच्चे लायेंगे बदलाव ,
बच्चे लायेंगे बदलाव !
बच्चे हैं हम सबके प्यारे ,
नन्हे नन्हे दोस्त हमारे।
(बच्चे प्रसन्न होकर हाथ हिलाते हुये उन सब की तरफ आते हुये दिखायी देते हैं। )
(धीरे धीरे गीत समाप्त होता है। सब मुस्कराते हैं। )
समाप्त

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

(प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्किट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें(2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी(2019) , चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हंी , बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017) ,पथिक और प्रवाह(2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑफ़ फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी हिंदी अंग्रेजी कवितायेँ लगभग बीस साझा संकलनों में भी संग्रहीत हैं । लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सोलह पुरस्कार प्राप्त हैं । )

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