बाल साहित्य (नाटक):
एक था बच्चा चिड़िया का
-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
बाल साहित्य (नाटक)

पात्र
बाल साहित्य (नाटक): एक था बच्चा चिड़िया का
ओबो : एक पहाड़ी कौआ -सूत्रधार
डोना : पहाड़ी कुत्ता
शबनम : टर्की चिड़िया
वीबा : कौआ
यकू : भोली भाली चिड़िया
युरेशियम कोयल पक्षी
स्थान
बाल साहित्य (नाटक): एक था बच्चा चिड़िया का
उज़्बेकिस्तान में नमनगान क्षेत्र
ओबो :
(कहानी सुनाने की आवाज़ में सूत्रधार की तरह बोलता है ) उज़्बेकिस्तान में नमनगान क्षेत्र में एक में एक पहाड़ी जंगल है , बर्फीला जंगल … बहुत बर्फ है । ठण्ड इतनी है की पानी तुरंत बर्फ बन जाये। रास्ते बर्फीले हैं। बड़े बड़े बालों वाला पहाड़ी दौड़ते दौड़ते पहाड़ पर एक सुरक्षित स्थान पर लगभग पहुंच गया है। पहाड़ी किसानों की कुछ झोपड़ियां और चाय और सेब की कुछ दुकानें दिख रही हैं। कुत्ते का नाम डोना है। अरे ये क्या , डोना तो ठिठककर रुक गया ! ओह अच्छा , ये तो कहीं पीछे से किसी चिड़िया के दर्द भरे गाने , और फिर रोने की आवाज़ आ रही है !
डोना :
(गर्दन ऊपर करके देखता है ) : अरे दिखाई तो कोई नहीं देता , क्या सुन रहे हैं हम भाई !चिड़िया का रोना या चिड़िया का गाना !
(चिड़िया के दर्दभरे गीत की आवाज़ आती है )
एक था बच्चा चिड़िया का
प्यारा प्यारा नन्हा सा
मैं भी क्या भोली अलबेली….
(फिर अचानक रोने की आवाज़ आने लगती है। डोना इधर उधर कूद कूद कर छलांग लगाता है। उसे गाने -रोने वली चिड़िया कहीं दिखाई नहीं देती अचानक पास में टर्की चिड़िया शबनम दिखाई देती है। )
शबनम :
( डोना को घूरते हुये) अरे डोना , क्यों उछाल कूद कर रहा है , बन्दर जैसा ! क्या हुआ तुझको ?
डोना :
(हड़बड़ाते हुये ) अरे कुछ नहीं शबनम बहन , इधर से निकल रहा था … अरे देखिये ठण्ड कितनी बढ़ गयी है इधर पहाड़ियों की ओट में ये पेड़ देखिये , इसमें कुछ पत्तियां हैं , और तो हर जगह पत्तियां गिर गयीं !
शबनम :
अरे बातें न बना डोना ! क्या परेशानी है भाई , क्यों उछल -कूद कर रहा !
डोना :
(धीरे से ) बहन , मुझे एक चिड़िया के दर्द भरे गाने सुनाई दे रहे हैं। मैं बहुत चिंतित हूँ, किसी को कोई कष्ट है … आप जानती हैं .. आप भी तो स्कूल में बच्चों को अच्छा बनने की बातें बताती हैं !
शबनम :
हाँ वो तो है डोना भाई , अच्छा लगा तुमने भी मेरी बातों पर ध्यान दिया।
डोना :
(मुस्कराते हुये ) आप जब अपने क्लास में होते हैं , मैं अपनी दुकान की तरफ जाते हुये , रुक कर कुछ देर तक आपकी बातें , सुनता हूँ।
शबनम :
(आश्चर्य से ) अरे मेरे भाई डोना ,मुझे बहुत अच्छा लगा ! तुम्हे बचपन से ऐसी बातें पसंद आती होंगी ! है , न ?
डोना :
(रुंधे गले से ) अरे क्या बतायें बहन ! काम करने भेज दिए गए बचपन से ही ! स्कूल कहाँ जा पाये ! पढाई रह गयी बहन… बचपन से ही दुकान पर बैठ गये …
(अचानक फिर पीछे से चिड़िया के गीत सुनाई देते हैं। दोनों उधर देखते हैं । )
चिड़िया की आवाज़ : (दर्द भरी )
एक था अंडा गोल मटोल
मैंने जाना ,मेरा ही
उसको सात दिन सेया
अरे अचानक दिन वह आया
बच्चा बाहर निकला भागा।
(थोड़ी देर तक शांति …सुबकने रोने की आवाज़, फिर गाने की आवाज़। डोना और शबनम दोनों सुन रहे हैं। )
मैंने जाना मेरा अपना
बच्चा होगा मेरा ,
उसके कारण आस लगाया
साँझ ढली या रहा सवेरा।
(थोड़ी देर के लिए फिर शांति। शबनम और डोना दोनों आश्चर्यपूर्वक आवाज़ की तरफ ध्यान देते हैं। अचानक कौआ वीबा आकर बैठ जाता है। सभी उसकी ओर देखते हैं। )
शबनम :
अरे वीबा , बहुत दिन बाद दिखे , आजकल कहाँ हो?
वीबा :
हम तो अपनी डॉक्यूमेंट्री बनाते रहते हैं , थोड़ा रिसर्च की जरूरत रहती है। इसी में लिखते पढ़ते रहते हैं बहन।
वैसे आपलोग बड़ी गंभीर बातें कर रहे हैं , डोना भी बड़े परेशान से दिख रहे हैं।
डोना :
अरे बात ही कुछ ऐसी है। (अचानक पीछे से चिड़िया के गाने की आवाज़ )
चिड़िया की आवाज़ : (दर्दभरी )
मैंने सोचा बच्चे मेरे
वो तो निकल गये बिन बोले
मैंने उनको पाला पोसा
आधी रात , सवेरे दोपहर !
डोना :
सुना वीबा , इसी पर चर्चा कर रहे थे हम लोग। सुना आपने ?
शबनम :
हाँ वीबा , हाँ भाई , क्या बात है , जानते हो कुछ क्या ?
वीबा :
हाँ , हाँ , पहले मुझको भी बहुत आश्चर्यजनक लगा , फिर जाकर पता लगाया। ये चिड़िया जो है , आपलोग भी जानते हैं उसे।।।
डोना :
(बीच में बोल पड़ता है ) कौन है , कौन है वो !
वीबा :
अरे , अपनी यकू है
शबनम :
यकू , वह तो बहुत भोली भली प्यारी सी है , क्या हुआ उसे वीबा ?
वीबा :
धोखा !
डोना :
किसने दिया धोखा उसे , बताओ … नोच दूंगा उसे ! हमारा जंगल , हमारे लोग !
वीबा :
अरे सुनो तो डोना , बात किसी एक धोखे की नहीं है दोस्त , ये एक परंपरा है , आदत है। युरेशियम कोयल पक्षी जानते ही हो आप लोग , युरेशियम कुकू बर्ड। वो बेचारी इतनी ज्यादा ठण्ड सहन नहीं कर पाती प्रकृति ने ऐसे ही बनाया है उन्हें। जब यहाँ हमारे यहाँ कड़ाके की ठण्ड पड़ती है , उड़ जाती है वो बेचारी दूर देश … हज़ारों हज़ार , चार पांच हज़ार किलोमीटर दूर गर्म जगहों पर और अपनी अंडे यहाँ किसी चिड़िया के घोंसले में रख जाती हैं।
शबनम :
ओह , तो यह है बात … सब समझ में आ गया !
वीबा :
हाँ तो वो चिड़िया अपनी अण्डों को किसी चिड़िया के घोंसले में छोड़ जाती है। और फिर बच्चे जैसे अण्डों से निकलते हैं , उड़ जाते हैं बहुत दूर अपने समुदाय के पास।
डोना :
ये तो धोखा हुआ , उस बेचारी चिड़िया के साथ। मोह में पड़कर पाले कोई , बड़े होकर घोंसला खाली।
वीबा :
मज़बूरी दोनों तरफ से है दोस्त , वह बच्चे यहाँ रह भी तो नहीं सकते , उन्हें भी तो गर्म प्रदेशों में जाना पड़ता है।
शबनम :
अच्छा ! हमने तो ये कुछ सुना है। सुना है उन बच्चो को रास्ता पता होता है , वो रास्ता जिधर उनकी माँ गयी होती है।
वीबा :
वैसे ये बच्चे लौट कर फिर आएंगे कुछ महीने बाद और मिलेंगे यकू से भी।
शबनम :
तो फिर क्या , चलो चलते हैं अपनी यकू के पास , उसे पूरी कहानी बताने।
डोना :
आखिर उसने अण्डों से बच्चे निकलते तो देखे ही हैं !
वीबा :
भाई बच्चे आयेंगें लौट कर और यकू से भी मिलेंगे !
डोना :
हाँ ता होगी पार्टी !
शबनम :
चाओ चलते हैं यकू के पास
(सभी निकल पड़ते हैं। )
-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
(प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्किट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें(2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी(2019) , चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हंी , बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017) ,पथिक और प्रवाह(2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑफ़ फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी हिंदी अंग्रेजी कवितायेँ लगभग बीस साझा संकलनों में भी संग्रहीत हैं । लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सोलह पुरस्कार प्राप्त हैं । )
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