नवम अध्याय
विचार से विचार-संचरण
१. विचार और जीवन
मनुष्य वैषयिक वस्तुओं का चिन्तन करता है और उनमें आसक्त हो जाता है। सोचता है कि फल खाना शरीर के लिए अच्छा है; तब फल खाने का प्रयास करता है। जब फल प्राप्त कर लेता है तो उसका आस्वाद लेता है; तब वह फल से निबद्ध हो जाता है और फल की लालसा बढ़ने लगती है। नित्य फल खाने की आदत विकसित होती है और बीच में कभी एक दिन फल प्राप्त नहीं होता तो उसे बड़ा कष्ट होने लगता है।
“चिन्तन से आसक्ति पैदा होती है, आसक्ति से कामना का जन्म होता है तथा कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। जब किसी-न-किसी कारण से फल-प्राप्ति में, कामना-पूर्ति में बाधा आती है तो क्रोध आता है। क्रोध से मनुष्य भ्रमित हो जाता है और इसलिए स्मरण-शक्ति समाप्त हो जाती है, वह स्मृति-भ्रष्ट हो जाता है। स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि का नाश हुआ कि सर्वनाश ही हुआ समझो” (गीता : २-६२,६३)। इसलिए यदि स्थायी शान्ति चाहते हो तो विषय-चिन्तन करना त्याग दो। उसके स्थान में अमर और आनन्दमय आत्मा का चिन्तन किया करो।
कामना अपने-आपमें निरुपद्रवी है। चिन्तन के कारण उसमें बिजली-सी शक्ति पैदा होती है और तब वह प्रलय मचा देती है। मनुष्य ऐन्द्रिय सुख देने वाले विषयों में रमता है। वह कल्पना करता है कि उन विषयों में से उसे बहुत बड़ा सुख मिलेगा। कल्पना कामना से सहयोग करती है। तब कामनाओं में प्राण-संचार हो जाता है तथा उसमें गति आ जाती है। मायामुग्ध जीव पर वे दोनों भयंकर आक्रमण करती हैं।
२. विचार और चारित्र्य
मनुष्य परिस्थितियों से सीमित प्राणी नहीं है। उसकी परिस्थिति के निर्माता तो उसके अपने विचार हैं। चरित्रवान् पुरुष चाहे जिस परिस्थिति में हो, अपना जीवन बना लेता है। वह निष्ठा के साथ अध्यवसाय करता है और धीरे-धीरे प्रगति करता है। वह पीछे मुड़ कर नहीं देखता और आगे देख कर साहसपूर्वक अग्रसर होता है।
विघ्न-बाधाओं से वह डरता नहीं है, कभी उत्तेजित या उद्विग्म नहीं होता, कभी निराश या हताश नहीं होता; तेज, बल, उत्साह और साहस से सदा पूर्ण होता है तथा निष्ठा और उत्साह उसमें कभी क्षीण नहीं होते।
विचार चारित्र्य-निर्माण की ईंटें हैं। चारित्र्य जन्मतः आने वाली वस्तु नहीं है, इसका अर्जन किया जाता है। इस जीवन में शुद्ध चारित्र्य-निर्माण करने का दृढ़ संकल्प करने की आवश्यकता है; फिर उस संकल्प की पूर्ति के लिए निश्चित पुरुषार्थ निरन्तर करते जाना चाहिए।
अपना चारित्र्य स्वयं बनाओ। आप अपने जीवन को आकार दे सकते हो। चारित्र्य ही बल है, प्रभाव है। उसी से मित्र बनते हैं; उससे यथेष्ट सहारा और समर्थन मिलता है। धन, जन सब उसके लिए सुलभ हैं। सम्पत्ति, सम्मान, सफलता और सुख का सहज तथा सुलभ मार्ग उससे ही उद्घाटित होता है।
जय-पराजय में, सफलता-विफलता में और जीवन के प्रत्येक विषय में निर्णायक तत्त्व यदि कोई है तो वह चारित्र्य है। शुद्ध चारित्र्यवान् इहलोक तथा परलोक में भी अतीव सुख भोगता है।
आप अपने जीवन में परस्पर के व्यवहार में जो सहज भाव से छोटा-छोटा काम करते हैं, अल्प-सी सज्जनता बरतते हैं, थोड़ी सहानुभूति जताते हैं, सौहार्द प्रकट करते हैं, तो यही आपके चारित्र्य में चार चाँद लगा देते हैं। इतना तो बड़े-बड़े व्याख्यानों से, प्रवचनों से, वक्तृता से और पाण्डित्य-प्रदर्शन से भी नहीं होगा।
श्रेष्ठ चारित्र्य का निर्माण उत्तम और शक्तिशाली चिन्तन से होता है। सच्चारित्र्य निजी पुरुषार्थ का ही परिणाम है; व्यक्ति के अपने प्रयास और उद्यम का ही प्रतिफल है।
आज विश्व का संचालन सम्पत्ति या सत्ता नहीं करती और न ही बुद्धि-शक्ति करती है। नैतिक चारित्र्य ही नैतिक गुण से मिल कर निखिल ब्रह्माण्ड को चलाता है।
यदि चारित्र्य नहीं हो तो कुछ नहीं; नाम, धाम, यश, कीर्ति, धन, विजय सब तिनके के समान हैं। प्रत्येक के पीछे चारित्र्य का पृष्ठबल चाहिए और वह चारित्र्य आपके अपने विचारों से बनता है।
३. विचार और शब्द
हमारी वाणी के प्रत्येक शब्द में शक्ति है। शब्दों की दो प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं-शक्ति-वृत्ति और लक्षणा-वृत्ति।
उपनिषदों में लक्षणा-वृत्ति अपनायी गयी है। ‘वेदस्वरूपोऽहम्’ का यह अर्थ नहीं कि मेरा स्वरूप वेद है; लक्षणा-वृत्ति सूचित करती है कि उसका अर्थ ‘ब्रह्म’ है जो एकमात्र उपनिषदों के अध्ययन से ही जाना जाता तथा मात्र शब्द-प्रमाण से समझा जाता है।
शब्दों की शक्ति पर ध्यान दीजिए। कोई किसी को ‘साला’, ‘बदमाश’ या ‘बेवकूफ’ कहे तो उसका क्रोध तुरन्त भड़क उठेगा और झगड़ा हो जायेगा। किसी को आप ‘भगवन्’ कहिए, ‘प्रभु’ या ‘महाराज’ कहिए तो वह अत्यन्त प्रसन्न हो जायेगा।
४. विचार और कृति
विचार ही सभी कृतियों के प्रसुप्त बीज हैं। मन की कृति वास्तविक कृति है, शारीरिक कृति नहीं। जो मानसिक कर्म हैं, उन्हीं को ‘कर्म’ कहा गया है।
विचार और कृति अन्योन्याश्रित हैं। ऐसा कोई मन नहीं होता जिसमें विचार न हों। मन तो विचारों से निर्मित है।
जो विचार अन्दर अगोचर थे, उनकी ही बाह्य अभिव्यक्ति का नाम वाणी है। कृति का मूल कारण राग-द्वेष है। इस राग-द्वेष के पीछे यह तथ्य निहित है कि आप विषयों में सुख या दुःख मानते हैं। विचार तो नाशवान् है। काल-बाधित प्रक्रियाओं को भी अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य उसमें नहीं है, फिर उस परम सत्ता का जो वाङ्-मनस अगोचर है, कैसे व्यक्त कर सकेगा? इन्द्रियों और अंगोपांगों सहित यह शरीर मन के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
५. विचार, शान्ति और शक्ति
कामनाएँ जितनी कम होंगी, विचार उतने अल्प होंगे। पूर्णतया कामना-रहित हो जाओ, निष्काम बन जाओ। मन का चक्र सर्वथा रुक जायेगा। यदि आवश्यकताएँ घटाओ, कामनाओं की पूर्ति के पीछे न लगो, एक-एक करके कामनाएँ समाप्त करते जाओ तो आपके विचार छोटे होते जायेंगे, घटते जायेंगे।
सदा स्मरण रखो कि विचार जितने कम होंगे, शान्ति उतनी अधिक होगी।
एक धनी व्यक्ति बड़े नगर में सट्टे का काम करता रहता है, उसके मन में असंख्य विचार भरे हैं, इसलिए उस सारे वैभव के होते हुए भी वह नितान्त अशान्त है। क्षण-भर भी उसे शान्ति नहीं है। इसके विपरीत एक साधु हिमालय की कन्दराओं में पड़ा हुआ है और विचार-नियमन का अभ्यास कर रहा है। वह अपनी दरिद्रता तथा अभावों के होते हुए भी अत्यन्त सुखी है।
विचार जितने अल्प होंगे, मनोबल और अवधान उतना ही अधिक होगा। मान लीजिए, आपके मन में एक घण्टे के अन्दर औसतन सौ विचार घूमते हैं और सतत धारणा तथा ध्यान की साधना से यदि आप उस संख्या को घटा कर नब्बे पर लाते हैं तो आपने निश्चित ही दश प्रतिशत विचार-नियमन साध लिया, मन की एकाग्रता सिद्ध कर ली।
इस प्रकार घटने वाला प्रत्येक विचार मानसिक शान्ति और शक्ति में वृद्धि कर जाता है। एक भी विचार घटता है तो पर्याप्त शान्ति और शक्ति बढ़ती है। चूँकि आपके अन्दर सूक्ष्म बुद्धि नहीं है, इसलिए इस अन्तर को आप प्रारम्भ में पहचान नहीं सकेंगे, किन्तु अन्दर एक आध्यात्मिक तापमापक यन्त्र (थर्मामीटर) है जो सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अन्तर को भी ग्रहण कर लेता है; एक भी विचार घटे तो वह अंकित कर लेता है। एक विचार आप घटाते हैं तो उससे दूसरा विचार सरलतापूर्वक घटाने की आपमें मानसिक शक्ति आ जाती है।
६. विचार-शक्ति और पवित्र विचार
विचार प्राणी की शक्ति या ईथर से सूक्ष्मतर अभिव्यक्ति है। आप विचार करते हैं, इसका कारण यह है कि विश्वव्यापक विचार में आपका भी भाग है।
विचार शक्तिऔर गति दोनों है। विचार गतिशील है। विचार चलता है। विचार भविष्य निर्धारित करता है। जैसा विचार करें, वैसा बनें। विचार ही है जो मनुष्य को सन्त या पापी बनाता है। विचार मनुष्य को चाहे जो बना सकता है। आप सोचें कि आप ब्रह्म हैं, आप ब्रह्म बन जायेंगे। पवित्र विचार दिव्य विचारों का निर्माण करते हैं और उन्हें स्थिर रखते हैं। घृणापूर्ण विचार हृदय के सामंजस्य में हस्तक्षेप करते हैं। प्रत्येक अनुपयोगी विचार शक्ति-क्षयकारी है, आध्यात्मिक उन्नति में बाधक है; इसलिए प्रत्येक विचार का अपना सुनिश्चित उद्देश्य होना चाहिए।
असत् और पापपूर्ण विचारों से भय जीता नहीं जा सकता। क्रोध और उद्वेग को धैर्य मिटा सकता है। प्रेम द्वेष को जीत सकता है। पवित्रता वासना को मिटा सकती है। मन का निर्माण प्रतिदिन नहीं होता, वह तो प्रतिक्षण ही अपना रूप और रंग बदलता रहता है।
७. बन्धनकारक विचार
मन अपनी भेद-भाव की शक्ति से यह सारा जगत् बनाता है। जब ऐन्द्रिय विषयों की ओर मानसिक विचारों का विस्तार होता है तब वह बन्धनकारक होता है।
विचारों का त्याग ही मुक्ति है। मन ही शरीर और इन्द्रिय-विषयों में आसक्ति पैदा करता है और इसी आसक्ति से मनुष्य को बन्धन में डालता है। आसक्ति का कारण रजोगुण है।
सत्त्वगुण आसक्ति का नाश करता और विवेक तथा वैराग्य उपजाता है। राजसिक मन के कारण अहंभाव और ममभाव पैदा होता है तथा शरीर, जाति, धर्म, वर्ण, जीवनक्रम आदि-आदि भेद निर्माण होता है।
बहुविध प्रापंचिक सुखों की भूमि में मन की वृत्तियाँ-रूपी बीज पनपते हैं जिनके कारण मायागत भ्रम का विषवृक्ष अधिकाधिक फैलता जाता है।
८. शुद्ध विचारों से परा-अनुभूति
विचार दो प्रकार के हैं: शुद्ध और अशुद्ध। सत्कार्य के प्रति आकर्षण, जप, ध्यान, धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन आदि शुद्ध विचार हैं; सिनेमा देखने की इच्छा, दूसरों को दुःख देना, विषय-वासना की पूर्ति खोजना आदि अशुद्ध विचार हैं।
अशुद्ध विचारों को शुद्ध विचारों के प्रोत्साहन द्वारा मिटाना चाहिए और अन्त में शुद्ध विचारों को भी छोड़ देना चाहिए।
वैषयिक सुख की पुनरावृत्ति से विचार बलवान् होते हैं। विषय-सुख का सूक्ष्म संस्कार मन पर अंकित हो जाता है।
मन का वास्तविक स्वरूप केवल सत्त्व है। रजसू और तमस् तो बीच में संयोगवशात् सत्त्व से आ मिलते हैं। साधना से अथवा तपस्या, निष्काम सेवा, दम, शम, जप, उपासना आदि शुद्धिकरण की क्रियाओं द्वारा उनको मिटाया जा सकता है। दैवी सम्पत्ति के विकास से रज-तमोगुण दूर हो जायेंगे। तब चित्त शुद्ध, सूक्ष्म, स्थिर तथा एकाग्र हो जायेगा और फिर अखण्डैकरस ब्रह्म में लीन हो जायेगा। जैसे जल जल में मिल जाता है, दूध दूध में मिल जाता है, तेल तेल में मिल जाता है, वैसे ही चित्त ब्रह्म में मिल जाता है और तत्परिणाम स्वरूप निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है।
९. विचार-मुक्ति के लिए राजयौगिक पद्धति
कुविचारों के स्थान में सुविचार स्थापित कीजिए। प्रतिस्थापन की इस पद्धति से कुविचार नष्ट हो जायेंगे। यह बहुत सरल है। यह राजयोग की पद्धति है।
आत्म-शक्ति या संकल्प-शक्ति से एकदम कुविचार को मिटा देना, कह देना कि ‘हे पापी विचार, निकल जा’, बड़ा दुस्साध्य है। यह सामान्य लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है। उसके लिए बहुत बड़ी संकल्प-शक्ति तथा आत्म-बल की आवश्यकता होती है।
पहले शुद्ध विचारों की अवस्था से ऊपर उठना चाहिए और अन्त में निर्विचार की उच्च अवस्था में पहुँचना चाहिए, तभी आप अपने निज-स्वरूप में स्थित हो सकते हैं। तब करतलामलकवत् ब्रह्म-साक्षात्कार होगा।
१०. विचार-मुक्ति के लिए वेदान्तिक प्रविधि
जब व्यर्थ विचार और भावनाएँ आपको अधिक सन्तप्त करने लगें तब आप उनके प्रति उदासीन हो जाइए। अपने से कहिए, ‘मैं कौन हूँ?’ यह अनुभव कीजिए कि’मैं मन नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, सर्वव्यापी आत्मा हूँ, शुद्ध सच्चिदानन्द हूँ। यह भावनाएँ मुझे कैसे प्रभावित कर सकती हैं? मैं निर्लिप्त हूँ, अनासक्त हूँ, मैं इन सब वृत्तियों का साक्षी हूँ। मेरा कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।’ जब आप इन वेदान्तिक विचारों का पुनः-पुनः उच्चारण करेंगे, सारे विचार और सारी भावनाएँ स्वयमेव विनष्ट हो जायेंगी।
विचारों और भावनाओं को निष्कासित करने तथा मन से लड़ने की यह ज्ञान-प्रक्रिया है। जब भी मन में कोई विचार उठे तो निरीक्षण करके देखें कि वृत्ति क्यों उठी? किससे इसका सम्बन्ध है? मैं कौन हूँ? अन्त में सभी विचार स्वयं समाप्त हो जायेंगे। मन की सारी क्रियाएँ बन्द हो जायेंगी। मन अन्तर्मुखी हो जायेगा, आत्मा में स्थिर हो जायेगा। यह वेदान्तिक साधना है। आपको अध्यवसायपूर्वक साधना में सतत लगे रहना चाहिए।
जितने भी व्यर्थ विचार उठें, उन सभी सांसारिक विचारों को मिटा देने की शक्ति केवल इस एक विचार में है कि ‘मैं कौन हूँ?’ अन्य विचार स्वयं मिट जायेंगे तथा अहंभाव नष्ट हो जायेगा। जो शेष बचा रहता है वह केवल अस्ति है; चिन्मात्र है, केवल शुद्ध चैतन्य है; नाम-रूप-रहित चिदाकाश मात्र है; व्यवहार-रहित, मल-वासना-रहित, निष्क्रिय, निरवयव तत्त्व है जिसे माण्डूक्योपनिषद् ‘शान्त, शिव, अद्वैत’ कहती है। वह आत्मा है। वही जानना है, ज्ञेय है।