पुस्‍तक: मानसिक शक्ति-स्‍वामी शिवानंद

दशम अध्याय

विचार-शक्ति का शास्त्रीय ज्ञान

विचार-शक्ति और व्यावहारिक आदर्शवाद-१

मनुष्य प्रायः जीवन में हीन से हीनतर स्थिति पर ही पहुँचता है; क्योंकि वह किसी समुचित काम में अपनी सारी शक्ति लगाता नहीं, इसलिए उसे ज्ञान का परिपूर्ण प्रतिफल नहीं मिलता। अपूर्णताओं में ही वह लेटता रहता है, कष्ट भोगता रहता है। चूँकि उसकी जीवनधारा शक्ति के साथ प्रवाहित नहीं होती, इसलिए उसमें ईर्ष्या-द्वेष की सड़ाँध पैदा होती रहती है। ‘मैं’ की वृत्ति सदा ही औरों को दोषी ठहराने को ही तैयार रहती है। वैषयिक संसार के समस्त विषय उसके लिए मधुर पीड़ा देने वाले हैं; फिर भी मनुष्य सुदृढ़ व्यक्तिगत भावनाओं के आधार पर खड़ा रहना चाहता है। निजी वासनाओं में जकड़े रहने के कारण वह दूसरों के साथ मेल-जोल का समुपयुक्त तथा मधुर सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाता। वह प्रत्येक परिस्थिति में अपने ही आनन्द की खोज में रहता है।

सत्य की वेदी तो मानसिक संकीर्णता, कठोरता, स्वार्थ, विषमता और अहंभाव का बलिदान माँगती है। हे मानव! तू अपने-आपको उस सत्य के लिए तैयार कर, जिसे पक्षपात मालूम नहीं है। लिंग भेद मालूम नहीं है, जिसे अस्थिर क्षणिक आभा पसन्द नहीं है। मनुष्य के नित्य जीवन में भूलों का बड़ा कलंक लगा रहता है और यही कारण है कि उसका जीवन दूषित और सौन्दर्यहीन बनता है। मनुष्य अपने ही असद्विचारों के कारण एक-दूसरे के आँख की किरकिरी बने हुए हैं। उनकी अपनी असत्कामनाएँ बरफ बन कर उनके सीने को ठिठुराये दे रही हैं।

मनुष्य-मनुष्य के मध्य प्रत्येक प्रकार के सम्बन्ध हैं। सभी सम्बन्धों में वे परस्पर बँधे हुए हैं-रक्त से, गर्व से, भय से, आशा से, आर्थिक लाभ से, वासना से, घृणा से, प्रशंसा से अर्थात् हरेक परिस्थिति से सम्बन्ध है, केवल एक आध्यात्मिक प्रेम से ही नहीं है। इसका एकमात्र कारण है गलत विचार।

बुद्धिमान् मनुष्य अपने लिए एक द्वीप बना लेता है, जिस पर कभी बाढ़ का प्रकोप नहीं हो सकता। पुष्प की सुगन्ध वायु के विपरीत जा नहीं सकती, किन्तु ज्ञानी पुरुष की सुरभि वायु के विपरीत भी जा सकती है। वह अपने विचारों से सभी प्रदेशों में व्याप्त हो जाता है। वह तो हिमाच्छादित गिरि-शिखर के समान है जो दूर-दूर से देखा जा सकता है।

हे मानव! अपने दीपक पानी से भरोगे, तो अँधेरा दूर नहीं कर सकोगे। उसमें सद्विचार-रूपी तेल भरो, सम्यक् विचार-रूपी प्रकाश आपके मार्ग को आलोकित करेगा। अपनी अभिलाषाओं की सम्पूर्ति में और अहंकार की तुष्टि में न लगो।

मनुष्य सत्य के तट पर बुरी तरह मर रहा है। प्रत्येक असद्विचार का अपना बीभत्स रूप होता है; किन्तु इसमें निराशा की कोई बात नहीं है, क्योंकि कोई अन्धकार ऐसा नहीं है जिसको मिटाने वाला कोई प्रकाश न हो। मनुष्य की प्रत्येक आकांक्षा का एक-न-एक उत्कृष्ट उत्तर है ही। जो विश्वास करते हैं कि सब सम्भव है, उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।

हे मानव! ठीक दिशा की ओर दृष्टि रखो और ठीक विधि का उपयोग करो। सद्विचारों की ओर प्रवृत्त रहो।

अपने लक्ष्य का ध्यान रखो। साहसिक यात्रा में पथभ्रष्ट हो जाना बहुत सरल है।

पवित्र विचार एक वाणी है। जब मुँह बन्द होता है तब वह बोलती है। वह बहुत प्रयत्न करती है और समस्त बाधाओं के होते हुए भी वह शान्ति से प्रकट होती है। उसे रोकने की शक्ति इस संसार में किसी में नहीं है। अधिक समय तक उसे कोई दबा कर नहीं रख सकता है। मनुष्य! असत्य का व्यापार मत किया करो।

सहस्रों मार्गों से सुख प्राप्त करने का प्रयत्न न करो। जितना शीघ्र आप उनके पीछे भागोगे, उससे भी अधिक शीघ्रता से वे आगे भाग जायेंगे। आप अपने तथा औरों के मार्ग में काँटा मत बनो।

अपने विचारों की दिशा बदल दो। विचारों का विश्लेषण करो। जहाँ आवश्यकता समाप्त होती है, वहाँ कुतूहल प्रारम्भ होता है। ज्यों-ही आपको सारी आवश्यकताएँ उपलब्ध हो जाती हैं, त्यों-ही आप बैठ कर कृत्रिम आकांक्षाओं के विचारों को प्रश्रय देना आरम्भ कर देते हैं। यही कारण है कि आपने नैसर्गिक नियम का अतिक्रमण कर दिया है।

अपने विचारों के कारण आप अपना संसार बना भी सकते हो, बिगाड़ भी सकते हो। प्रतिक्रिया का नियम इतना अपरिहार्य है। हे मानव! आप अपने हृदय के अन्तस्तल

मैं जिस प्रकार के विचारों को प्रश्श्रय दोगे, आपका बाह्य जीवन उसी रूप का बनेगा। बाहर से ऐसा प्रतीत होता है कि सच्चाई के पीछे संयोग है, परन्तु गहराई में विचार-शक्ति अपना कार्य करती रहती है। इस संसार में तथा नित्य जीवन में कोई भी काम संयोगवश नहीं होता; इसलिए अपनी विचार-शक्ति का विकास करो।

वास्तविक क्रिया तो मौन के क्षणों में होती है। शुद्ध विचार जीवन के सम्पूर्ण स्वरूप का नव-निर्माण करता है। वह मनुष्य से चुपचाप कहता है- “तुमने यह कर दिया, लेकिन ऐसा न करके किसी दूसरे प्रकार से करते तो अच्छा होता।”

मनन के समय मौन चिन्तन में जो विचार आप किया करते हो, उसे नित्य कर्म के समय अनसुना न कर दो। सदा उत्तम विचारों से सन्नध रहो, सजग रहो।

अपने निजी विचार और अपनी अनुभूति के अतिरिक्त सत्य-ज्ञान प्राप्त करने का अन्य कोई अपरोक्ष साधन नहीं है। ईश्वरीय विचार कालमान को घटा देता है, शताब्दियों को क्षण में बदल देता है, सभी युगों को वर्तमान में उपस्थित कर देता है। सर्वदा दिव्य उदात्त विचार ही किया करो।

. विचार-शक्ति और व्यावहारिक आदर्शवाद-२

सद्विचारों की सहायता से असद्विचारों का प्रक्षालन करो और जब वह घुल जायें, तब दोनों का ही परित्याग कर दो। आज की आपकी अनुभूतियाँ अतीत काल के अगणित जीवनों के विचारों, अनुभवों और कृतियों के परिणाम हैं। दीर्घकालीन अभ्यास और विचार के बिना उससे सुगमता से छुटकारा नहीं मिल सकता।

विचार कृति के पूर्वज हैं। अपनी कृति का परिष्कार करना चाहो तो अपने विचारों का परिष्कार करो।

स्वावलम्बन और स्वप्रयत्न में अटल विश्वास रखो। विचार-बल से आप अपना भाग्य निर्धारित कर सकते हो। जिस प्रकार वर्षा का एकमात्र स्रोत मेघ है, उसी प्रकार शाश्वत समृद्धि का एकमात्र स्रोत विचार-नियमन है। आप ही अपने मित्र हो, आप ही अपने शत्रु हो । यदि सद्विचारों के प्रश्श्रय द्वारा आप स्वयं अपनी रक्षा नहीं करते, तो अन्य कोई भी उपाय नहीं है।

एकमात्र मन ही विधाता है। सब-कुछ उस मन से ही बनता है। अपनी इच्छा के अनुसार चाहे जैसी सृष्टि कर लेने को वह पूर्ण स्वतन्त्र है। जब भी कहा जाता है कि मन बाह्य विषयों का सृष्टिकर्ता है, तो समझना चाहिए कि यह वह मन है जो वैश्व मन कहलाता है और ईश्वर-सृष्टि का एक भाग है; और जब प्रेम, घृणा आदि मानसिक वृत्तियों से सम्बन्ध रखने वाले मन का उल्लेख करते हैं, तो समझना चाहिए कि यह व्यष्टि मन है जो व्यक्ति-व्यक्ति में निहित और जीव-सृष्टि का एक भाग है।

हे मानव! वास्तविक ईश्वर तो आपके हृदय में बसता है और अपने शरीर-रूपी मन्दिर में स्थित उस ईश्वर की उपासना का एकमात्र मार्ग यही है कि अपने हृदय में आप उत्तम और सद्विचार ही किया करो। मन की वृत्तियों का निरोध करो और केवल श्रेष्ठ विचारों को ही महत्त्व दो।

आपके चतुर्दिक् जो भी वस्तु है, उसका स्वरूप वही है जैसा आप उसके विषय में सोचते हो। आपका जीवन वही है, जो आप अपने विचारों के द्वारा बनाते हो। अपने व्यक्तित्व का जो प्रासाद आपने खड़ा किया है, उसकी एक-एक ईंट आपका विचार ही तो है। विचार ही भाग्यविधाता है। आशा-पाश का सारा संसार आपके अपने विचारों का प्रतिबिम्ब है।

जैसा सोचोगे, वैसा ही अनुभव करोगे। आपकी अपनी कल्पनाएँ हैं जो आपका विनाश करती हैं। भय का विचार करते-करते आपने स्वयं ही अपने को डरपोक बना लिया; अतएव अपनी कल्पना के प्रति उदार न बनो।

प्रापंचिक विषयों के प्रति आपका जो विचार होगा, उस विचार का ही आप पर प्रभाव होता है। मन की दृष्टि में उसी बात का मूल्य अधिक है जिसके प्रति उसे दृढ़ श्रद्धा है। एक ही वस्तु को सभी देखते हैं, परन्तु प्रत्येक के मन में उसका मूल्य अलग-अलग है। अपने-अपने मन के झुकाव के अनुरूप प्रत्येक व्यक्ति सोचता है।

विचार निर्माण का साधन है। मनुष्य का निर्माण उसके विचारों के अनुरूप होता है। चारित्र्य भी विचार से निर्मित होता है। आपने पहले जो विचार किया होगा, उसी के अनुरूप आपका जन्म हुआ है और आज आपका जो चारित्र्य है, वह उन गत विचारों का परिशेष है। आज के अपने विचारों से आप अपना भविष्य बना रहे हो। यदि आप उत्तम विचार करोगे तो उत्तम बनोगे, सदाचारी बनोगे। हीन विचार करोगे तो कोई भी परिस्थिति आपका अन्यथा निर्माण नहीं कर सकेगी।

इस प्रकार विचार और कृति अन्योन्याश्रित हैं। सजग रहो। मानसिक क्षेत्र में सद्विचारों का ही प्रवेश होने दो।

प्रत्येक मनुष्य की अपनी-अपनी मान्यताएँ होती हैं और उन मान्यताओं के आधार पर कर्तव्य, धर्म, मूल्य, सुख, मुक्ति आदि प्रत्येक बात का अर्थ भी भिन्न-भिन्न होता है; इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आदर्श के अनुसार ही प्रयत्न करना चाहिए।

जो विचार और जो विश्वास आपमें दीर्घ काल से और गहरा घर कर गया है उसी के अनुरूप आप काम करते हैं। अपनी इच्छा के अनुसार आप प्रयत्न करेंगे और वैसा ही फल प्राप्त करेंगे। अपने मन को स्थूल विचारों से भर कर जड़ न बना दीजिए, सद्गुणों से उसे सूक्ष्म और सम्पन्न बनाइए।

वर्तमान जीवन के तीन पहलू हैं: भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक । भौतिक पहलू से आप जोरों से आबद्ध हैं; किन्तु भौतिक संवेदनाओं से और शारीरिक कामनाओं से आप सर्वथा ऊँचे उठें। इसके लिए यह विचार दृढ़ कर लें कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ, यह देह एक मन्दिर है जहाँ कुछ थोड़े समय के लिए रहना है।’ मनःचांचल्य से ऊपर उठिए। विचार-जगत् में व्यक्ति-निष्ठा काम करती है।

अपने चित्त से भूत मात्र के प्रति सद्भावना और सद्विचारों का सतत प्रवाह प्रसारित कीजिए। प्रत्येक विचार के पीछे मैत्री और सेवा की उत्कट भावना का बल रहे।

आप काफी चालाक, चतुर और कुशल हो सकते हैं, किन्तु आपके सभी चातुर्यपूर्ण विचार और बुद्धिमत्ताओं पर पानी फेर सकने वाली भी एक शक्ति है; इसलिए गोमुख-व्याघ्र बनने का प्रयास न कीजिए। यह शक्ति, यह नियम प्रत्येक को विवश करता है कि वह जैसा है वैसा ही प्रकट हो। उसके विचार उसके चारित्र्य से प्रकट होते हैं, वाणी से नहीं। बनावटी व्यक्तित्व धारण करने का प्रयास न कीजिए, निश्छल और शुद्ध विचार अपनाइए।

विचार-प्रवाह दोनों दिशाओं से बहता है। जब वह सुख की ओर बहने लगता है तब मुक्ति और ज्ञान का साधन बनता है और जब वह अस्तित्व के भँवर की ओर तथा अविवेक की ओर निम्नगामी होता है तो अशुभ का कारण बनता है। जब चिन्तन नैतिक नियमों के अनुरूप काम करने लगता है, तब आलोक के शिखरों पर जा पहुँचता है।

व्यक्तिगत चिन्तन, व्यक्तिगत भावना और व्यक्तिगत संकल्प के आप केन्द्र-बिन्दु हैं। देश और काल का इन्द्रजाल आपके सम्मुख अलौकिक सुन्दर दृश्य उपस्थित करता है जो दृष्टि-भ्रान्ति की तरह पल-भर में अदृश्य हो जाने वाला है। आप

प्रत्येक मनुष्य की अपनी-अपनी मान्यताएँ होती हैं और उन मान्यताओं के आधार पर कर्तव्य, धर्म, मूल्य, सुख, मुक्ति आदि प्रत्येक बात का अर्थ भी भिन्न-भिन्न होता है; इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आदर्श के अनुसार ही प्रयत्न करना चाहिए।

जो विचार और जो विश्वास आपमें दीर्घ काल से और गहरा घर कर गया है उसी के अनुरूप आप काम करते हैं। अपनी इच्छा के अनुसार आप प्रयत्न करेंगे और वैसा ही फल प्राप्त करेंगे। अपने मन को स्थूल विचारों से भर कर जड़ न बना दीजिए, सद्गुणों से उसे सूक्ष्म और सम्पन्न बनाइए।

वर्तमान जीवन के तीन पहलू हैं: भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक । भौतिक पहलू से आप जोरों से आबद्ध हैं; किन्तु भौतिक संवेदनाओं से और शारीरिक कामनाओं से आप सर्वथा ऊँचे उठें। इसके लिए यह विचार दृढ़ कर लें कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ, यह देह एक मन्दिर है जहाँ कुछ थोड़े समय के लिए रहना है।’ मनःचांचल्य से ऊपर उठिए। विचार-जगत् में व्यक्ति-निष्ठा काम करती है।

अपने चित्त से भूत मात्र के प्रति सद्भावना और सद्विचारों का सतत प्रवाह प्रसारित कीजिए। प्रत्येक विचार के पीछे मैत्री और सेवा की उत्कट भावना का बल रहे।

आप काफी चालाक, चतुर और कुशल हो सकते हैं, किन्तु आपके सभी चातुर्यपूर्ण विचार और बुद्धिमत्ताओं पर पानी फेर सकने वाली भी एक शक्ति है; इसलिए गोमुख-व्याघ्र बनने का प्रयास न कीजिए। यह शक्ति, यह नियम प्रत्येक को विवश करता है कि वह जैसा है वैसा ही प्रकट हो। उसके विचार उसके चारित्र्य से प्रकट होते हैं, वाणी से नहीं। बनावटी व्यक्तित्व धारण करने का प्रयास न कीजिए, निश्छल और शुद्ध विचार अपनाइए।

विचार-प्रवाह दोनों दिशाओं से बहता है। जब वह सुख की ओर बहने लगता है तब मुक्ति और ज्ञान का साधन बनता है और जब वह अस्तित्व के भँवर की ओर तथा अविवेक की ओर निम्नगामी होता है तो अशुभ का कारण बनता है। जब चिन्तन नैतिक नियमों के अनुरूप काम करने लगता है, तब आलोक के शिखरों पर जा पहुँचता है।

व्यक्तिगत चिन्तन, व्यक्तिगत भावना और व्यक्तिगत संकल्प के आप केन्द्र-बिन्दु हैं। देश और काल का इन्द्रजाल आपके सम्मुख अलौकिक सुन्दर दृश्य उपस्थित करता है जो दृष्टि-भ्रान्ति की तरह पल-भर में अदृश्य हो जाने वाला है। आप बार-बार उससे विडम्बित होते रहते हैं; यही कारण है कि आपका वक्षस्थल आहों से विदीर्ण होता है और आपकी विवेक-शक्ति ज्ञानाग्नि से शुष्क हो चली है। आपके सम्मुख आध्यात्मिक ध्येय प्रस्तुत है। उसकी ओर आप शीघ्र बढ़ते हैं या धीरे-धीरे, यह आपके विचार पर निर्भर करता है।

अपने उच्च विचारों से संलग्न रहिए। कई विफलताओं के मूल्य पर आप अपना

ध्येय अवश्य प्राप्त करेंगे। निजी स्वार्थ और निजी मान-सम्मान के भूखे न बनिए। यदि दुष्ट विचारों का पाश आप अपने गले में नहीं लगा लेते हैं तो मृत्यु आपके निकट सहज आने वाली नहीं है।

मानसिक संस्कार से जो आनन्द प्राप्त होता है, उसकी तुलना में तीनों लोकों का वैभव, सभी प्रकार के रत्न और उच्चतम पद भी अत्यन्त तुच्छ हैं।

आपका मन सर्वसमर्थ है। वह सब-कुछ कर सकता है। अपने मन में आप जैसा विचार करेंगे, बाहर वैसा ही घटित होता है। मन में जिस बात पर अत्यन्त उत्कटता से विचार करते हो, बिलकुल वही साकार होता है, वही फलित होता है।

आपके विचार में निर्माण करने की शक्ति भरी है। वह अपने में ही पदार्थों का निर्माण कर सकता है। वही एकमात्र निर्माता है। मन को छोड़ कर कोई नहीं जो निर्माण या पुनर्निर्माण कर सके। विचार वह सामग्री है जिससे पदार्थों की उत्पत्ति होती है। चैतन्य का भौतिक रूप ही यह भूतसृष्टि है।

चूँकि सब-कुछ आपके विचारों का ही परिणाम है, इसलिए आपको जो-कुछ प्राप्त होता है उसके लिए दूसरा कोई उत्तरदायी नहीं है। जीवन में आप जो-कुछ पायेंगे, उसका मूल कारण आपके ही अन्दर है। जब तक आपके अन्दर पात्रता नहीं है, तब तक कोई दूसरा व्यक्ति आपको कुछ भी नहीं दे सकता। दूसरों से जो कुछ भी मिलता है, वह वस्तुतः आपके अपने ही विचारों और प्रयत्नों का फल है। जब आपके विचार सही दिशा में प्रवाहित हो रहे हों, तब संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसे आप प्राप्त न कर सकें। न आपको निराशावादी बनना चाहिए, न लोकशत्रु ।

निर्माण-शक्ति प्रत्येक मन का विशेष गुण है। अपनी प्रेरणा से आप जो प्रयास किया करते हैं, वही आपके भाग्य का ताना-बाना है। दुर्बल विचार करते हुए आप दुर्बल चित्त न बनिए। जो मन उथला है, बाहर-बाहर ही रह जाने वाला है, वह कभी अन्तर्दृष्टि की गहराइयों में नहीं जा पायेगा। विचार की एक ही धारा को दृढ़ कीजिए. और मन की भटकन को रोकिए। उत्कटता के साथ आप जो भी विचार करेंगे वह आपको अवश्य मिलेगा। देर-सबेर से, यह आपके तदर्थ प्रयत्न पर निर्भर करेगा।

प्रदेश की विशालता और काल की दीर्घता दोनों आपके विचारों और भावनाओं के सापेक्ष हैं। आप जैसा सोचेंगे, वैसा ही अनुभव करेंगे। एक क्षण को ही आप जैसा सोचेंगे, वैसा ही अनुभव करेंगे। एक क्षण को ही आप सुदीर्घ सोच लें तो वह बहुत ही दीर्घ काल बन जायेगा और उसके विपरीत वर्षों का काल क्षणवत् बीत जायेगा। एक ही अवधि यदि आप दुःख में हैं तो बहुत लम्बी प्रतीत होगी और सुख में हैं तो क्षणवत् प्रतीत होगी।

विचार की ऐसी अद्भुत शक्ति है कि दृढ़ विचारों से मीठा कडुवा बन सकता है और कड़वा मीठा बन सकता है। आप विष को अमृत बना सकते हैं। मीरा को देखिए, उसने अपने उत्कट विचारों के बल पर विष को अमृत में बदल दिया।

आपके चारों ओर विरोधों का जाल फैला हुआ है; परन्तु यदि आपके मन में विरोधी विचार नहीं हैं, तो फिर आप अभिशाप को सरलता से आशीर्वाद के रूप में वापस कर सकते हैं। इस प्रकार सभी विरोधी शक्तियों पर आप विजय प्राप्त कर सकते हैं। कड़ा संघर्ष कीजिए और मन की अवांछित सभी दौड़-धूप नियन्त्रित कीजिए।

आपके चतुर्दिक् का सारा संसार वैसा ही है, जैसी आप उसकी अपेक्षा रखते हैं। आप जो भी मन अथवा इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं, उन सब पर आपके ही विचारों का रंग चढ़ा होता है। आपका मन समस्त विषयों को उसी रूप में ग्रहण करता है और आगे भी करता रहेगा, जिस रूप में आप पूर्ण श्रद्धा के साथ उसकी कल्पना करते हैं। समस्त पक्षपातपूर्ण विचारों के लौह-कवच को विदीर्ण कीजिए और वस्तु-मात्र में ईश्वरीय रूप का दर्शन कीजिए।

विचार ही वह मूल कारण है जिससे आप भ्रान्त होते हैं, जन्म-मृत्यु का अनुभव करते हैं, संसार के बन्धन में ग्रसित होते तथा उसी प्रकार उससे मुक्त भी हो सकते हैं।

स्वर्ग में आप जो सुख तथा नरक में जो कष्ट भोगते हैं, वह सब आपके ही विचारों का परिणाम है। शीघ्र या विलम्ब से, इस जीवन में या आगामी जीवनों में आपका प्रत्येक गतिशील विचार फलित हो कर रहने वाला है; इसलिए ठीक से विवेक कीजिए।

आपका आज का जीवन आपके पूर्व-विचारों से संकल्पित था; इसलिए आप अपने निजी विचारों के बल पर आज की स्थिति को दूसरी स्थिति में रूपान्तरित कर सकते हैं, यदि आप सोच लें कि आप ब्रह्म से भिन्न हैं, तो आप भिन्न हैं। यदि आप सोच लें कि आप ब्रह्म हैं, तो आप ब्रह्म ही हैं। आप अपने विचारों से अपनी सीमा निर्धारित करते हैं।

आपका चित्त आपके प्रत्येक दिव्य विचार के द्वारा इस दृश्य ससीम सृष्टि के एक-एक सूक्ष्म आवरण को हटाता जाता है, क्षीण करता जाता है और उस अनन्त शाश्वत तत्त्व से एकरूप होता जाता है, किन्तु आप अपनी इस मनःसृष्टि को अत्यन्त दुर्लक्ष्य कर रहे हैं।

. विचार-शक्ति और व्यावहारिक आदर्शवाद-३

आपके विचार में आपके भाग्य की रूप-रेखा अंकित है। जितनी आपकी कल्पना-शक्ति होगी, उतनी ही आपकी अन्तः-शक्ति होगी। आपके इच्छानुसार ही आपका जगत् होता है।

आप शक्ति और आनन्द के अनन्त सागर में जी रहे हैं, परन्तु आप अपने विचार, श्रद्धा और कल्पना की मात्रा के अनुरूप ही उससे प्राप्त करेंगे। आपकी अपनी कुछ आकांक्षाएँ होती हैं और उन्हीं के अनुरूप आप विचार करते हैं और उन्हीं विचारों को मन में प्रश्रय देते हैं, परन्तु विवेकपूर्वक कार्य करें तो मन की हवाई किले बनाने को प्रवृत्ति सरलता से दूर कर सकते हैं।

आपके विचारों की सीमा ही आपकी सम्भावनाओं की सीमा है। आपकी परिस्थिति तथा आपका वातावरण आपके विचारों का ही मूर्त रूप है। संसार के आपके अनुभव भी आपके विचारों के अनुरूप ही उन्नत अथवा अवनत होते हैं। इस संसार में आप जो भी विचार करेंगे, अन्ततः वह ही फलित होगा।

शुद्ध मन दृढ़ता से जो सोचता है, वह होता ही है। विचारों में शक्ति उसी अनुपात में होती है जितनी निष्ठा, लगन, गहराई और उत्कटता हो। ये सारे गुण तब आते हैं जब उसी विचार का बारम्बार सतत चिन्तन करते हैं। जिस विचार का सतत चिन्तन करते हैं, निरन्तर उसी की कल्पना एवं इच्छा करते हैं, तो ये सब उस विचार के सफल होने में विशेष सहायक होते हैं।

चित्त को शुद्ध कर लीजिए, जिस विषय या लोक की आप कामना करेंगे वही विषय और वही लोक आपको प्राप्त होगा।

यह सच है कि आप जो भी विचार करते हैं, उसका परिणाम समस्त मानव- शरीर-रचना पर अथवा उसके किसी भाग पर अवश्य होता है। निरन्तर ध्यान करते रहने से यह स्थूल शरीर सूक्ष्म बन सकता है और जो सूक्ष्म मनोमय शरीर है, वह स्थूल बन सकता है। सफलता का रहस्य है बारम्बार प्रयत्न करते रहना।

दृढ़ निश्चय की शक्ति विकसित कीजिए। विचारों के फलीभूत होने में यह एक महत्त्वपूर्ण कारण है। आपके दृढ़ निश्चय को अन्यथा करने में इस संसार में कोई भी समर्थ नहीं है। आपको सब-कुछ प्राप्त होगा।

आपका शरीर आपके विचारों का ही मूर्त रूप है। विचार परिवर्तित होने से शरीर भी परिवर्तित हो जाता है। मन आपके विचारों द्वारा इस शरीर की रचना करता है। विचार में वह शक्ति है जो आज के मानव की रचना में परिवर्तन कर सकती है, स्थानान्तरण कर सकती है अथवा कम-से-कम सुधार तो कर ही सकती है।

शरीर में जब अव्यवस्था या असन्तुलन होता है तो उसे व्याधि कहते हैं और मन में जब अन्तर्विरोध उत्पन्न होता है तो उसे आधि करते हैं। दोनों के मूल में अज्ञान है और सत्य के ज्ञान से इन्हें सुधारा जा सकता है।

जब आप प्रापंचिक अनुभवों से दुःखी होते हैं तब आपके मन में इस अव्यवस्था के कारण शरीर का सहज और सरल प्राण-संस्थान बिगड़ जाता है। जब श्वास की गति अनियमित होती है तो नाड़ियाँ विकृत हो जाती हैं। कुछ में प्राण-शक्ति अधिक हो जाती है और कुछ में कम। इस प्रकार सारा ही संस्थान अव्यवस्थित हो जाता है। इस भाँति शारीरिक रोगों का मूल कारण मानसिक असन्तुलन है और इस मूल कारण के निवारण से सम्पूर्ण रोग दूर किये जा सकते हैं।

मस्तिष्क में प्रवेश करने वाले प्रत्येक हीन और दुष्ट विचार से शरीर-कोषों पर बुरा परिणाम होता है, जो आगे चल कर रोग का कारण बनता है। सभी असद्विचार रोग के सन्देशवाहक हैं, मृत्यु के अग्रदूत हैं।

यदि आप दीर्घायुष्य प्राप्त करना चाहते हैं और स्वस्थ एवं ज्ञानमय जीवन चाहते हैं तो सद्विचारों को अपनाइए। आपके शरीर को बनाने और पुनर्निर्माण करने में विचार अत्यन्त शक्तिशाली और सूक्ष्म प्रभाव रखते हैं। सावधान रहें।

वस्तुतः सभी रोगों तथा उनके जितने भी दुःख और कष्ट हैं, उनके मूल में मानसिक तथा भावात्मक विकृतियों का प्रभाव है। आपके लिए मानसिक सामंजस्य, समाधान और मेल अत्यन्त आवश्यक है। सत्कार्यों द्वारा अपने विचारों को शुद्ध कीजिए; इसके लिए सत्संग कीजिए। विचारों के शुद्ध होते ही प्राणवाहिनी नाड़ी ठीक से काम करने लगेगी और सारी शरीर-प्रणाली को शुद्ध कर देगी।

प्रत्येक सद्विचार हृदय को शक्ति प्रदान करता है, पाचन प्रणाली को उद्दीप्त बनाता है और शरीर की प्रत्येक ग्रन्थि को सहज स्थिति में ला देता है।

मन के इस समाधान का दूसरा नाम है सन्तोष। जब आपका विचार इधर-उधर भटकना बन्द कर देगा, जब आप आत्म-सन्तोष का अनुभव करेंगे तब आप अवर्णनीय सुख प्राप्त करेंगे। यदि आप भीतर से प्रसन्न हैं तो सभी आपको आनन्दप्रद और सुहावना लगने लगेगा।

प्रसन्नता का प्रमुख स्रोत विचार ही है। अपने विचारों को शुद्ध कीजिए। सभी कष्ट दूर हो जायेंगे।

यदि आपके विचार शान्तिमय हैं तो सारा संसार शान्त दिखायी देगा। यदि आपके मन में असद्विचारों का ही साम्राज्य है तो सारा संसार आपको जलती भट्टी की तरह दीखेगा। कोई परिस्थिति आपको असद्विचार बनाने के लिए विवश नहीं करती। भाग्य की भ्रान्त धारणा को ले कर अपने-आपको नष्ट न कीजिए। भाग्य का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है ही नहीं।

विचार में सत्य को प्रकट करने की क्षमता है। सही विचारों से पूर्ण ज्ञानी मनुष्य अनेक भयानक परिस्थितियों से बच सकता है। सत्य सदा सर्वत्र समग्र रूप से विराजमान है, जहाँ भी उसके दर्शन की उत्कट अभिलाषा होगी, तीव्र प्रयत्न होगा,

वहाँ उसके दर्शन हो जायेंगे। समस्त विषयों का सारतत्त्व, मूल स्वभाव वैचारिक है। भौतिक निष्ठा गलत धारणा है।

उष्णता से हिमखण्ड पिघल कर पानी बन जाता है, उसी प्रकार सम्यक् दृष्टि के अभ्यास से मन सूक्ष्म बन जाता है और सद्विचार जाग्रत हो जाता है।

वास्तविक क्रिया तो विचार ही है। वह वस्तुतः मानसिक ही है, भौतिक नहीं। भौतिक क्रिया तो मन की स्पन्दन-रूप आन्तरिक क्रिया का बाह्य आविर्भाव मात्र है। हमारे सम्पूर्ण शारीरिक कर्म उस मानसिक कर्म के ही विभिन्न अंग हैं।

वसन्त ऋतु में जिस प्रकार वृक्षों का सौन्दर्य निखर उठता है, उसी प्रकार जिस मात्रा में आपके सद्विचार विकसित होंगे उसी मात्रा में आपकी बुद्धि, शक्ति और कान्ति भी उज्ज्वल हो जायेगी। ज्ञानी के विचार सामान्य मनुष्य के विचारों से सर्वथा भिन्न होते है। संसार से ज्यों-ज्यों आप अलिप्त और अनासक्त होते जायेंगे, त्यों-त्यों आपका मुक्ति से सान्निध्य होता जायेगा।

जब आपके चारों ओर शुद्ध एवं पवित्र विचार फैलने लगेंगे, तब ईश्वरीय शाश्वत नियम भी आपकी सहायता करने लगेगा। आप जानते हैं कि आपके विचार कैसे हैं। आपको क्रमशः जो-जो अनुभव हुए हैं, वे स्वयं आपको ज्ञात हैं। प्रत्येक का प्रापंचिक अनुभव अलग-अलग है जो उसके लिए सर्वथा नया है। आपका मन सीमित है। वह अनेक वृत्तियों और परिस्थितियों का दास हो गया है।

. कुछ विचार-बीज

आत्मज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है। वह मनुष्य का अपने निज-स्वरूप का ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ है-अपना और दूसरों का विशुद्ध भान, सही विवेक, समुचित मूल्यांकन और सूक्ष्म अवलोकन-क्षमता। सम्यक् कृति और सम्यक् जीवन सद्विचार का ही परिणाम है।

सौन्दर्य निश्चित रूप से आध्यात्मिक वस्तु है। वास्तविक सौन्दर्य तो चित्त में होता है। वह चारित्र्य में है। सौन्दर्य पवित्रता में है। सौन्दर्य सद्गुणों में उद्भासित होता है। प्रेम समस्त सृष्टि के साथ एकरूपता के विशुद्ध और आन्तरिक भान का नाम है। आत्म-त्याग और निःस्वार्थता ही प्रेम है।

प्रेम हार्दिक पवित्रता है। अबाध सद्भावना, निरपवाद दया, असीम करुणा और अपार सहिष्णुता ही प्रेम है। प्रेम में काम-वासना का अभाव है।

शरीर ही सब-कुछ नहीं है। महत्त्वपूर्ण वस्तु कुछ और है, जो इसी शरीर में है और वह है मनुष्य की आत्मा। यद्यपि वह विश्वात्मा का ही स्वरूप है, उसी का रूप है, फिर भी कर्मों के कारण जीवात्मा के रूप में उससे भिन्न दिखायी देता है। शरीर नष्ट हो जायेगा। आत्मा बनी रहेगी। जब तक शरीर है तब तक आत्मा का पार्थक्य भी बना रहेगा। जब शरीर छूट जायेगा, तब उसे विश्वात्मा में, अपने निज-रूप में विलीन होना ही है; परन्तु यदि उसके प्रारब्ध-कर्म अवशेष हैं तो उन्हें पूरा भोगने के लिए उसे दूसरा शरीर धारण करना पड़ेगा।

सब-कुछ चला जाता है; शरीर जब गिर जाता है, तब उसके कर्मों के अतिरिक्त शेष सब उसे त्याग देते हैं। अतः मनुष्य जब तक जीवित है तब तक उसे सन्तोष से रहना चाहिए, प्रेम और सद्भावना के साथ जीना चाहिए, किसी को किसी प्रकार का दुःख तथा कष्ट नहीं देना चाहिए; सांसारिक वैभव के लिए लालायित नहीं होना चाहिए; करुणा, औदार्य, क्षमा एवं सहिष्णुता के साथ व्यवहार करना चाहिए; शारीरिक सुख-सुविधा में निर्लिप्त रह कर अपने कार्य के प्रति निरहंकार रहना चाहिए और जब तक प्रारब्ध-कर्म पूरा भोग नहीं लेते तब तक कोई नवीन कर्म न करने में सावधान रहना चाहिए।

थोड़ा-सा सन्तोष करना सीख लें, विवेक अपना लें, भगवान् के प्रति भक्ति रखें, उसकी इच्छा पर अपने को छोड़ दें, थोड़ी-सी निर्लिप्तता बरतें, किसी से कुछ अपेक्षा न रखें, सदा प्रार्थनामय वृत्ति रखें, अपने अन्तःकरण के आदेश के अनुसार चलें, आध्यात्मिक सिद्धान्तों पर पूर्ण श्रद्धा एवं सदाचार में निष्ठा रखें तो जीवन अपेक्षाकृत अत्यधिक सरल, सहज, सुखी और मूल्यवान् हो जायेगा।

यदि आपको कोई कष्ट है तो पहले उसका कारण ढूँढ़े। वास्तविक कष्ट तो उस कारण की उपेक्षा करने में ही है। उन कारणों को दूर कर दें तो सारे कष्ट घट जायेंगे, भले इक्का-दुक्का कभी आ जायें। यह संसार बड़ा विद्यालय है जहाँ व्यक्ति को उत्तम व्यक्ति बनने का पर्याप्त अवसर मिलता है।

कोई जन्म से पूर्ण नहीं है। प्रगति और उन्नति करना प्रत्येक के लिए सम्भव एवं शक्य है। जो भी दुःख तथा कष्ट आते हैं, उनसे मनुष्य को अनुभव प्राप्त करना चाहिए और आज से उत्तम स्थिति पर पहुँचना चाहिए, ऐसा नहीं कि चिन्ता और व्यग्रता में फँस जायें। महान् और उत्कृष्ट विचारों का आश्रय लें और पूर्णता प्राप्त करें।

गुरु महाराज की निःशेष कृपा सर्वदा शिष्यों के लिए ही है। उसमें कोई प्रतिबन्ध नहीं है। यह तो शिष्य के इन्द्रिय-निग्रह, श्रद्धा, पवित्रता और तपस्या पर निर्भर है कि उस कृपा से वह लाभान्वित होता है अथवा नहीं। कुछ ही व्यक्तियों को इसका ज्ञान है कि शिष्यों के हृदय में गुरु का वास है। गुरु की शिष्य के हृदय में विद्यमानता उसका महान् सौभाग्य है।

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