पुस्‍तक: मानसिक शक्ति-स्‍वामी शिवानंद

एकादश अध्याय

विचार-शक्ति और ईश्वर-साक्षात्कार

. जीवन तथा विचार पारस्परिक प्रतिक्रिया के परिणाम

आपके चित्त में जो विचार होगा, वही आपके जीवन में अभिव्यक्ति होगा। यदि आप पराक्रमी हैं, प्रसन्न हैं, करुणालु हैं, सहिष्णु और दयावान् हैं तो ये ही गुण आपके भौतिक जीवन में प्रकट होंगे। मन की यदि कोई अशुद्धि है तो वह है हीन विचार और तुच्छ अकांक्षा।

जिस प्रकार सजग प्रहरी कोषागार की रक्षा करता है, उसी प्रकार आप अपने सद्विचारों की रक्षा कीजिए। जब ‘अहं’ का विचार नहीं रहेगा, तब कोई विचार नहीं रहेगा।

जीवन तथा विचार पारस्परिक प्रतिक्रिया के परिणाम हैं। मन जब अपना काम बन्द कर देता है, तब फिर द्वैतभाव समाप्त हो जाता है। विचार तो काल के अधीन है। विचार बन्द होना चाहिए, तभी आप कालातीत अवस्था प्राप्त करेंगे। स्वस्थ और स्तब्ध रहें। निर्विचार बनें।

विचार की सभी तरंगों को समाप्त कीजिए। जब कि मन विगलित हो कर क्षीण हो जाता है, उस स्तब्धता में स्वयं-प्रकाश आत्मा, शुद्ध चैतन्य आत्मा प्रतिभासित होता है। मन का निरीक्षण कीजिए। विचारों का निरीक्षण कीजिए। शान्ति बनाये रखिए। अपने हृदय को परमेश्वर का योग्य अधिष्ठान बनाइए।

. आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में विचारों का परिणाम

पिघला हुआ सोना जिस साँचे में ढालिए, उसी साँचे का रूप ले लेता है। इसी प्रकार मन जिस वस्तु पर छा जाता है, उसी वस्तु का आकार ग्रहण कर लेता है।

जिस किसी भी वस्तु के सम्बन्ध में मन उत्कटता के साथ सोचने लगता है, वह उसी का रूप ले लेता है। वह सन्तरे का विचार करेगा तो सन्तरे के आकार का बन जायेगा। यदि श्री कृष्ण के विषय में चिन्तन करेगा तो स्वयं श्री कृष्ण का आकार धारण कर लेगा।

आपको अपने मन को ठीक से प्रशिक्षित करना चाहिए। परिपाक के लिए उसे सात्विक आहार ही देना चाहिए। सदा सात्त्विक पृष्ठ-भूमि बनाये रखिए, सात्विक विचार और सात्त्विक चित्र ही मन में रखिए।

व्यक्ति दिन-भर जिन विचारों में लीन रहता है, वही विचार रात्रि को स्वप्न-काल में भी आते हैं। यदि आपमें पवित्रता तथा एकाग्रता है तो आप जब चाहें वह भाव अपने मन में ला सकते हैं। यदि आप दया की बात सोचें, तो आपका समूचा अस्तित्व दयानुविद्ध हो उठेगा। शान्ति की बात सोचें तो सारी सत्ता शान्ति से परिव्याप्त हो जायेगी।

मनोभाव ही हमारी कृतियों का स्वरूप निर्धारित करता है और उनका फल निश्चित करता है। आप अपनी माँ, बहन तथा पत्नी-तीनों का आलिंगन कर सकते हैं; क्रिया तो वही है, परन्तु मनोभाव भिन्न-भिन्न हैं।

सदा आप अपनी भावना, अपने विचार और अनुभव का ध्यान रखें। भावना सदा सात्त्विक होनी चाहिए। सदा ब्रह्मभाव रखना चाहिए। ध्यान के समय क्या भावना रहती है, यह देखिए; श्वास-प्रश्वास पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।

आप अपने मन में जैसा विचार करेंगे और नित्य-जीवन में जिस प्रकार का आदर्श अपने सामने रखेंगे, वही आपके आज के स्वरूप को तथा भविष्य के स्वरूप को भी बनाने में सहायक होगा। आप निरन्तर कृष्ण का ही चिन्तन करते रहेंगे तो आप कृष्णमय ही बन जायेंगे; उसमें सदा-सर्वदा के लिए एकरूप हो जायेंगे।

. ईश्वर-सम्बन्धी विचार

आपका मन सभी सांसारिक विचारों से मुक्त होना चाहिए। वह ईश्वर-सम्बन्धी विचारों से ही पूर्ण होना चाहिए, अन्य विषयों से नहीं।

सदा मन को श्रेष्ठ, उदात्त तथा दिव्य विचारों से ही पूर्ण रखिए, जिससे कि कुविचारों के लिए स्थान ही न रहे। एक भी अनावश्यक शब्द न कहिए। मन में कोई अनुपयोगी और व्यर्थ विचार आने न दीजिए।

. रोग-मुक्ति के लिए ईश्वरीय विचार

समस्त रोगों से मुक्त होने का और अपना स्वास्थ्य ठीक रखने का एकमात्र रामबाण औषध है ईश्वर-विषयक विचारों का चिन्तन। कीर्तन, जप और नित्य ध्यान के द्वारा मन में जो ईश्वर-सम्बन्धी विचारों की तरंगें उठती हैं, वे शरीर के कोषों, नाड़ियों और शिराओं में तेज भरती हैं, ताजगी देती हैं तथा शक्ति और स्फूर्ति प्रदान करती हैं।

दूसरा एक अत्यन्त सुलभ, सस्ता और समर्थ औषध है सदा प्रसन्न और सन्तुष्ट रहना। प्रतिदिन अर्थ-सहित गीता के एक-दो अध्याय पढ़िए। सांसारिक विचारों से बचने के लिए मन को सदा व्यस्त रखिए। यह भी एक औषध है।

मन को सत्त्वगुण से भर दीजिए और सुन्दर स्वास्थ्य तथा अपार शान्ति भोगिए। ज्ञानियों का सत्संग कीजिए और श्रद्धा, समाधान, सत्य, साहस, दया, भक्ति, प्रेम, प्रसन्नता, विश्वास, ईश्वर-विषयक विचार तथा दिव्य गुणों का विकास कीजिए।

दिव्य मार्ग पर, अध्यात्म की दिशा में दिव्य पगडण्डी पर मन को दौड़ने दीजिए, तब आपका मन शान्त रहेगा और उसके स्पन्दन समाधान निर्माण करेंगे। आपका मनःस्वास्थ्य बढ़िया रहेगा और कोई शारीरिक रोग नहीं होगा।

. ज्ञान और भक्ति से विचार-संस्कार

किसी एकान्त स्थान में बैठ जाइए और अपने विचारों का सावधानीपूर्वक परीक्षण कीजिए। कुछ समय तक मनमर्कट को स्वेच्छा से उछलने-कूदने दीजिए। कुछ समय पश्चात् वह नीचे उतर आयेगा और शान्त रहेगा। इस आन्तरिक सर्कस में वन्य पशु-रूप विविध विचारों के मात्र साक्षी रहिए। मन के उस सिनेमा के मात्र दर्शक बने रहिए।

विचारों के साथ तादात्म्य स्थापित न कीजिए। उदासीन वृत्ति अपनाइए। एक-एक करके सारे विचार स्वयं नष्ट हो जायेंगे। जैसे युद्ध-क्षेत्र में सैनिक अपने शत्रुओं का एक-एक करके संहार करता जाता है, उसी प्रकार आप भी अपने विचारों को एक-एक करके नष्ट कर सकते हैं।

मन में दोहराते जाइए- ‘ॐ मैं साक्षी हूँ। मैं कौन हूँ? मैं निर्विचार आत्मा हूँ। इस मानसिक मिथ्या चित्र और विचार से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। उन्हें अपना काम करने दो। मुझे उससे कुछ भी लेना-देना नहीं है।’ इससे सभी विचार नष्ट हो जायेंगे। घृतहीन बत्ती की तरह सारे विचार लुप्त हो जायेंगे।

भगवान् हरि, भगवान् शिव, श्री कृष्ण या आपके अपने गुरु, किसी सन्त-जैसे ईसा मसीह या भगवान् बुद्ध-इनमें से किसी के आकार को अपने मन में स्थिर कीजिए। बार-बार उस मानसिक चित्र को मनःपटल पर उभरने दीजिए। सभी विचार नष्ट हो जायेंगे। यह दूसरी पद्धति है भक्तों की पद्धति ।

. विचार और चित्त-समाधान का योगाभ्यास

शान्ति से बैठिए। विवेचन कीजिए। विचार तथा संकल्प-विकल्प करने वाले तत्त्व मन से अपने को पृथक् कीजिए।

अपने को अन्तर्तम आत्मा के रूप में पहचानिए और स्वयं मूक साक्षी बने रहिए। धीरे-धीरे सभी विचार अपने-आप नष्ट हो जायेंगे। आप परब्रह्म के साथ एकाकार हो जायेंगे।

चित्त-समाधान प्राप्त करने का अभ्यास कीजिए। उसके लिए निश्चय ही, मन को समाप्त करने का सीधा प्रयत्न करना आवश्यक है।

पहले वासनाओं का नाश करना होगा। तभी आप तीव्रता के साथ मानसिक साधना करने में समर्थ होंगे। वासना-क्षय के अभाव में मनःसमाधान या मनोनाश सम्भव नहीं है।

. योगाभ्यास से मित्र-लाभ

डेल कार्नेगी का एक सिद्धान्त है- ‘मित्र बनाओ और लोगों को प्रभावित करो’; किन्तु यह सिद्धान्त भारत के चित्त-निरोध-शास्त्र का एक बिन्दु मात्र है। योगाभ्यास कीजिए, सारा संसार आपकी पूजा करेगा। प्रत्येक जीव आपकी ओर अनजाने ही आकृष्ट होगा। देवता तक भी आपके आदेशानुवर्ती रहेंगे। क्रूर और हिंसक जन्तु भी आपके मित्र बनेंगे। सबकी सेवा कीजिए, सबसे प्रेम कीजिए। राजयोग के अभ्यास से, चित्त-निरोध और आत्म-नियमन के द्वारा अपनी अन्तःशक्ति को प्रकट कीजिए।

योगाभ्यास के द्वारा आप सम्पूर्ण मानव-जाति तथा जीवों को अपने परिवार का सदस्य बना सकेंगे। योगाभ्यास से आप सभी कष्टों पर विजय प्राप्त कर सकेंगे और सारी दुर्बलताएँ दूर कर सकेंगे।

योग के बल पर आप दुःख को आनन्द में, मृत्यु को अमरता में, शोक को प्रसन्नता में, पराजय को जय में और रोग को सुन्दर स्वास्थ्य में बदल सकते हैं; इसलिए दृढ़तापूर्वक योगाभ्यास कीजिए।

. योग की निर्विचारावस्था

साधारणतः विद्यार्थियों में सच्ची आध्यात्मिक जाग्रति नहीं है। योग-शक्ति या मनः शक्ति प्राप्त करना मात्र जिज्ञासा है। सिद्धि के प्रति जब तक यों गुप्त आकांक्षा बनी रहेगी, तब तक ईश्वर आपसे कोसों दूर है; इसलिए जो नैतिक नियम हैं, उन्हीं के अनुसार चलो।

प्रापंचिकता का जो स्वभाव है, पहले उसे दूर करो। यदि आप पूर्णतया निष्काम हो जाओ, निर्विचार बन जाओ, वृत्ति-शून्य हो जाओ, तब बिना विशेष प्रयास के, केवल अन्तःशुद्धि के बल पर कुण्डलिनी जाग्रत हो जायेगी। मन के सारे मैल धो डालो। अपने ही अन्दर से आपको सहायता और मार्ग-दर्शन मिलेगा।

. उन्नत विचार-शक्ति से सम्पन्न योगी

जिस योगी ने अपनी विचार-शक्ति का विकास कर लिया है उसका व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक और प्रभावशाली हो जाता है। उसके सम्पर्क में जो भी आयेंगे वे भी उसकी मधुर आवाज से, प्रभावशाली वाणी से, कान्तियुक्त आँखों से, तेजस्वी चेहरे से, स्वस्थ सुन्दर शरीर से, सद्व्यवहार से, सद्‌गुणों और दिव्य स्वभाव से मुग्ध होंगे, आकृष्ट होंगे।

उससे लोगों को सुख-शान्ति और बल मिलेगा। उसकी बातों से उन्हें प्रेरणा मिलेगी। उसके सम्पर्क मात्र से उनका चित्त उन्नत होगा।

विचार संचार करता है। विचार एक महाशक्ति है। सच्चा योगी भले ही हिमालय की गुफा में एकान्त में रहता हो, फिर भी वह अपनी विचार-शक्ति से सारे संसार को पवित्र-शुद्ध कर सकता है।

आवश्यक नहीं कि वह सभाओं में जाये और जनता के हित के लिए भाषण-व्याख्यान आदि ही दे। सत्त्वगुण में प्रचण्ड क्रिया-शक्ति भरी है। जो चक्र बड़ी तेजी से घूमता है, वह ऐसा दिखायी देता है कि वह स्तब्ध है, स्थिर है। सत्त्वगुण ऐसा ही है। सात्त्विक मनुष्य की यही स्थिति है।

१०. अनन्त शक्ति के लिए विचार-नौका

जीवन अशुद्धि से शुद्धि की ओर, घृणा से विश्व-प्रेम की ओर, मृत्यु से अमृतत्व की ओर, अपूर्णता से पूर्णता की ओर, दास्य से स्वातन्त्र्य की ओर, विविधता से एकता की ओर, अज्ञान से परम ज्ञान की ओर, दुःख से परमानन्द की ओर एवं दुर्बलता से अनन्त शक्ति की ओर एक प्रवास है।

आपका प्रत्येक विचार आपको ईश्वर के निकट पहुँचाये, प्रत्येक विचार आगामी विकास में सहायक हो !

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