द्वादश अध्याय
विचार-शक्ति और नयी सभ्यता
१. शुद्ध विचार : विश्व पर उसका प्रभाव
पाश्चात्य मनोविज्ञानवेत्ता और मानसशास्त्री विचार-शुद्धि पर बहुत बल देते हैं। विचार-संस्कार एक शास्त्रीय विज्ञान है। प्रत्येक को शुद्ध विचार करना सीखना चाहिए और हर प्रकार के व्यर्थ अनुपयोगी सांसारिक विचारों को त्याग देना चाहिए।
जो व्यक्ति पापमय विचारों को प्रश्रय देता है, वह अपना तथा समस्त विश्व का अकल्याण करता है। उसके दुष्ट विचार दूर-दूर तक के लोगों के चित्त को भी प्रभावित करते हैं; क्योंकि उनकी गति विद्युत् की भाँति अति-शीघ्रगामी है।
सभी प्रकार के रोगों का प्रत्यक्ष कारण दुष्ट विचार है। सभी रोग अपवित्र विचारों से आरम्भ होते हैं।
जो व्यक्ति उदात्त और दिव्य विचारों को प्रश्रय देता है, वह अपना तथा जगत् का महान् कल्याण करता है। वह सुख, सन्तोष, शान्ति, आशा, विश्वास आदि को अपने मित्रों में, जो दूर भी हों, विकीर्ण करता है।
२. विचार-शक्ति और विश्व-कल्याण
कर्म क्रिया भी है और कार्य-कारण-भाव का सिद्धान्त भी है। मानवेतर सभी प्राणी ‘मनोविहीन’ हैं; अतः वे विचार नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त वे उचित-अनुचित नहीं जानते, कर्तव्य-अकर्तव्य का भी उन्हें ज्ञान नहीं; अतः वे कर्म नहीं कर सकते। विचार ठोस वस्तु है। वह मिश्री की डली से भी अधिक ठोस है। उसमें अद्भुत शक्ति है। सावधानी के साथ इस शक्ति का उपयोग करें। वह आपकी अनेक प्रकार से रक्षा एवं सेवा करेगी; परन्तु उसका यों ही अपव्यय न करें। यदि आप इसका दुरुपयोग करेंगे, तो आपका शीघ्र ही पतन होगा एवं उसकी बड़ी भयानक प्रतिक्रिया होगी। उसका उपयोग परोपकार में ही करें।
३. प्रेम और पराक्रम की वृद्धि के लिए विचार-शक्ति
भय, स्वार्थ, घृणा, वासना तथा ऐसे ही अन्य घृणित असद्विचारों को निर्ममतापूर्वक नष्ट करें। इन्हीं असद्विचारों के कारण दुर्बलता, रोग, असमाधान, निराशा और निरुत्साह उत्पन्न होते हैं।
दया, साहस, प्रेम, पवित्रता आदि सद्विचारों का विकास करें। असद्विचार स्वयमेव नष्ट हो जायेंगे। इसकी परीक्षा करके देखें कि इससे कितना बल मिलता है। शुद्ध विचारों के कारण आपमें नवजीवन का संचार होगा।
उत्कृष्ट और दिव्य विचार मन पर महान् प्रभाव डालते, असद्विचार को विदूरित करते तथा मनस्तत्त्व को परिवर्तित कर देते हैं। दिव्य विचारों के चिन्तन से मन पूर्णतया आलोकमय हो जाता है।
४. आदर्श जीवन के लिए विचार-शक्ति
उत्कृष्ट विचारों का चिन्तन करें। इससे आपका चारित्र्य उन्नत तथा आपका जीवन आदर्शमय और उत्तम होगा।
परन्तु भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की मनोभूमिका भिन्न-भिन्न होती है। मनुष्यों की क्षमता, मानसिक तथा बौद्धिक शक्ति और मानसिक तथा शारीरिक बल अलग-अलग होता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना आदर्श होना चाहिए जो उसकी मनोवृत्ति के अनुकूल हो, उसकी क्षमता के अनुरूप हो तथा उसको पूर्ण करने में पूरी शक्ति एवं उत्साह से जुट जाना चाहिए।
एक मनुष्य का आदर्श दूसरे के अनुरूप नहीं होता। यदि मनुष्य ऐसा आदर्श रखे कि जिसे वह पूर्ण न कर सके, जो उसकी क्षमता तथा शक्ति से परे हो, तो उसे निराश होना पड़ेगा। वह अपना प्रयत्न छोड़ देगा और तामसी हो जायेगा।
आपका स्वयं अपना आदर्श होना चाहिए। उसे आप तुरन्त प्राप्त कर सकते हैं अथवा लड़खड़ाते पैरों से चल कर दश वर्षों में प्राप्त कर सकते हैं। इसमें कोई विशेष महत्त्व नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने आदर्श के अनुरूप जीने का यथाशक्य प्रयत्न करना चाहिए। उस ध्येय को प्राप्त करने के लिए उसे अपना संकल्प, अपना दैहिक बल एवं सारी शक्ति लगा देनी चाहिए।
आप अपने स्तर के अनुरूप अपना आदर्श रख सकते हैं। यदि आप स्वयं इसे करने में असमर्थ हैं तो गुरु की शरण में जायें, वे आपको आपकी क्षमता तथा मापदण्ड के अनुरूप आदर्श बता देंगे।
जिसका आदर्श नीचा हो, उसके प्रति तुच्छ भाव नहीं रखना चाहिए। यह सम्भव है कि नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग पर घुटनों के बल चलने वाला वह एक शिशु-आत्मा हो। आपका कर्तव्य है कि उसे उसका ध्येय प्राप्त कराने में अपनी ओर से जो भी सहायता सम्भव हो प्रदान करें। उसकी दृष्टि में जो उन्नत आदर्श है, उसके अनुसार अपना जीवन यापन करने में उसे सब प्रकार से प्रोत्साहित करना चाहिए।
यह दुर्भाग्य का विषय है कि अधिकांश मनुष्यों के जीवन में कोई आदर्श ही नहीं है। यहाँ तक कि सुशिक्षित लोगों में भी यह आदर्शहीनता पायी जाती है। वे निरुद्देश्य जीवन यापन करते हैं और इसी कारण तिनके के समान इधर-उधर भटकते रहते हैं।
वे जीवन में प्रगति नहीं करते। क्या यह शोचनीय स्थिति नहीं है? वास्तव में यह बात बहुत ही खेदजनक है। मानव-जन्म पाना बड़ा ही कठिन है, फिर भी मनुष्य जीवन में आदर्श निश्चित करने एवं तदनुसार जीवन यापन करने के महत्त्व को नहीं समझते ।
लोभी एवं धनवान् व्यक्ति प्रायः चार्वाक के ‘खाओ, पीयो, मौज उड़ाओ’ वाले सिद्धान्त का अनुकरण करते हैं। इस विचारधारा के असंख्य अनुयायी हैं और उनकी संख्या में दिन-दूनी रात-चौगुनी वृद्धि हो रही है।
यह ‘विरोचन’ का सिद्धान्त है। राक्षसों और असुरों का यह आदर्श है। इसका अनुकरण करने वाला मनुष्य दुःखी और शोक से भरे हुए अन्धकारमय लोक को प्राप्त होता है।
वह मनुष्य धन्य है जो अपने विचारों को उन्नत करता है, आदर्श सामने रख कर चलता है तथा उस आदर्श के अनुरूप जीवन यापन करने का अथक प्रयास करता है; क्योंकि उसे शीघ्र ही ईश्वर-साक्षात्कार हो जायेगा।
५. सेवा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए विचार-शक्ति
जिस प्रकार अनर्गल बकवास में शक्ति-क्षय होता है, उसी प्रकार अनुपयोगी विचारों का चिन्तन करने से भी शक्ति का हास होता है। इसलिए एक भी विचार का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। व्यर्थ विचारों में रंचमात्र शक्ति का भी अपव्यय न करें।
समस्त मनोबल का संचय करें। उसका उपयोग उच्चतर आध्यात्मिक लक्ष्य, ईश्वर-ध्यान, ब्रह्म-चिन्तन एवं ब्रह्म-विचार में करें। विचार-शक्ति का संग्रह करें एव ध्यान तथा मानव-सेवा में उसका उपयोग करें।
अपने मन से सभी अनावश्यक, निरुपयोगी एवं घृणित विचारों को निकाल दें। अनावश्यक विचार आपकी आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हैं और घृणित विचार तो आपके आध्यात्मिक जीवन के कलंक ही हैं।
जब भी निरुपयोगी विचार आपके मन में आयें, तब समझ लें आप भगवान् से अभी बहुत दूर हैं। इसलिए सदा ही ईश्वर-चिन्तन करें। केवल सहायक तथा उपयोगी विचारों का ही चिन्तन करें।
उपयोगी विचार आध्यात्मिक विकास तथा प्रगति के सोपान हैं। पुरानी लीकों में, जहाँ मन के जाने का स्वभाव है वहाँ, उसे भटकने तथा मनमानी न करने दें। सावधानी से निगरानी करें।
६. सद्विचारों से विश्व-कल्याण
प्रत्येक वस्तु अपने समानधर्मा को आकृष्ट करती है। यदि आपके विचार पापमय होंगे तो वह दूसरे लोगों के पापमय विचारों का ही संकलन करेंगे और दूसरों में भी आपके पापमय विचार संचरित होंगे।
विचार संचार करते हैं। विचार एक जीवन्त गतिशील शक्ति है। विचार एक वस्तु है। अपने मस्तिष्क में यदि आप सद्विचारों का चिन्तन करते हैं तो वह दूसरों से भी सद्विचारों को ही ग्रहण करेंगे।
आप अपने सद्विचारों को औरों में भी वितरित करते हैं। आपके असद्विचार विश्व को दूषित कर देंगे।
विचार-शक्ति और नयी सभ्यता
७. विचार-शक्ति और नयी सभ्यता की स्थिति
विचार व्यक्ति का तथा व्यक्ति सभ्यता का निर्माण करता है। मनुष्य जीवन में तथा विश्व-इतिहास में प्रत्येक महान् घटना के पीछे अत्यन्त शक्तिशाली विचार-शक्ति पड़ी हुई है।
सभी शोध और अन्वेषणों के पीछे, सभी धर्मों और दर्शनों के पीछे, सभी प्राणदायक और प्राणघातक उपायों के पीछे विचार हैं।
विचार वाणी से अभिव्यक्त होता है और कृति से चरितार्थ होता है। शब्द विचार की धात्री है और कृति उसकी निष्पत्ति है। इसलिए कहा जाता है कि जैसा विचार करेंगे, वैसे बनेंगे।
नयी सभ्यता का निर्माण कैसे हो?
नयी विचार-शक्ति के निर्माण से।
ऐसी सभ्यता का विकास कैसे हो जिसमें मानवता को शान्ति का, समाज को समृद्धि का तथा व्यक्ति को मुक्ति का आश्वासन मिले?
ऐसी नयी विचार-शक्ति को जाग्रत करें जो अनिवार्य रूप से मानव-मन को सुख और शान्ति प्रदान करे, हृदय को करुणा, सेवा, शुश्रूषा, ईश्वर-प्रेम एवं उसके दर्शन की उत्कट अभिलाषा आदि दैवी गुणों से आपूरित करे।
आज विध्वंसक प्रयत्नों और विनाशक प्रवृत्तियों में जितना धन और समय व्यय हो रहा है-उस धन तथा उस समय का अल्पांश भी यदि सद्विचारों के निर्माण में लगाया जाये, तो तत्काल नयी सभ्यता का जन्म हो सकता है।
परमाणु तथा उदजन बम, अन्तर महादेशीय क्षेप्यास्त्र (I.C.B.M) तथा ऐसे ही विध्वंसक शस्त्रास्त्रों की जो नित्य नयी खोज हो रही है, ये सब मानव को अनिवार्य रूप से नाश की ओर ले जा रहे हैं।
वे आपकी सम्पत्ति का नाश कर रहे हैं। आपके पड़ोसियों का संहार कर रहे हैं, संसार के वायुमण्डल को विषाक्त कर रहे हैं, भय, घृणा और संशय का बीज आपके हृदय में बो रहे हैं; मन आज सन्तुलन खो रहा है और शरीर रोग से पीड़ित हो रहा है। इस प्रवृत्ति को बन्द करें।
अध्यात्म में, धर्म में और जीवन के सभी के सभी सत्कायों में अन्वेषण का कार्य प्रारम्भ करें। सन्तों और दार्शनिकों का, जो कि मानवता के सच्चे हितैषी और कल्याणकारी हैं, समर्थन करें। उन्हें धर्मों के अध्ययन में, प्राचीन शास्त्र-ग्रन्थों के शोध के लिए कार्य में और विश्व-कल्याण की नयी विचार-शक्ति के निर्माण में प्रोत्साहित करें।
युवकों के मानस को विकृत करने वाले समूचे साहित्य पर प्रतिबन्ध लगायें। युवक-मन को स्वस्थ विचारों, आदर्शों एवं ज्ञान से भर दें।
जो व्यक्ति हत्या करता है, धन चुराता है या दूसरे को धोखा देता है, उसे न्याय दण्ड देता है; परन्तु युवकों के मन में आज विकारमय असद्विचारों को प्रवेश कराने वाले दुष्ट बौद्धिक मनुष्य जो अपराध कर रहे हैं, उसकी तुलना में ये अपराध कुछ नहीं हैं।
वह इस धरती पर होने वाली अनेक हत्याओं का हत्यारा है, वह आपके सर्वोत्तम धर्म, ज्ञान तथा बुद्धि की चोरी करने वाला चोर है; वह अमृत के नाम पर विष दे कर आपको ठग रहा है। नयी सभ्यता के विधान ऐसे आसुरी वृत्ति वाले मनुष्यों को बहुत कड़ा दण्ड देंगे।
नयी सभ्यता उन सभी लोगों को भरपूर प्रोत्साहन देगी जो दर्शन, धर्म और आध्यात्मिक विचारों का अध्ययन करना चाहते हैं। इतना ही नहीं, वह इन विषयों का अध्ययन विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में अनिवार्य कर देगी।
दर्शन के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति मिलेगी। धर्म और दर्शन के शोध-कार्य करने वाले विद्यार्थी को विशेष रूप से पद तथा पुरस्कार प्रदान किये जायेंगे। सबसे महत्त्वपूर्ण मानव की माँग-आध्यात्मिक माँग-की पूर्ति के लिए हर सम्भव अवसर मिलेगा।
नयी सभ्यता के फल बहुमूल्य होंगे; क्योंकि उसके निर्माण में प्रत्येक मनुष्य का योगदान रहेगा। उस सभ्यता में मनुष्य न्याययुक्त जीवन जीना चाहेगा, अपने साथियों की सेवा करने को उत्सुक रहेगा। अपने पास जो है उसे सबको बाँट कर उपभोग करना चाहेगा। वह सबसे प्रेम करेगा, समझेगा कि वही सबमें वास करता है। वह भूत मात्र के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देगा।
जिस समाज में मनुष्य अपनी वस्तु दूसरे के साथ बाँट कर उपभोग करते हों, परस्पर एक-दूसरे की सेवा में रत हों, वह समाज कितना भव्य होगा; कैसा आदर्श समाज होगा! जब सब-के-सब स्वेच्छा से कार्य करेंगे, वहाँ करों और शुल्कों की आवश्यकता ही कहाँ रहेगी ? जब लोग सदाचार-सम्पन्न हो जायेंगे, फिर पुलिस और सेना की क्या आवश्यकता रहेगी ?
तो, यह है वह आदर्श! इस ध्येय के प्रति बढ़ने में सहायक हो, ऐसी विचार-शक्ति का निर्माण सब करें।
ईश्वर सबका कल्याण करे!