पुस्‍तक: मानसिक शक्ति-स्‍वामी शिवानंद

द्वितीय अध्याय

विचार-शक्ति : सिद्धान्त और गति-शक्ति

. विचार : भाग्य-निर्माता

यदि मन निरन्तर किसी एक ही विचारसरणी पर स्थिर रहता है, तो उसकी एक प्रसीता बन जाती है जिस पर विचार स्वतः दौड़ने लगता है। यह जो विचार का स्वभाव बन जाता है, मरणोपरान्त भी बना रहता है तथा ‘अहंकार’ से सम्बन्धित होने के कारण विचार-क्षमता और विचार प्रवृत्ति के रूप में पश्चाद्वर्ती ऐहिक जीवन में अग्रनीत होता रहता है।

स्मरण रहे, प्रत्येक विचार के साथ उसका अपना एक मानस-चित्र होता है। किसी भौतिक जीवन-विशेष में ऐसे जितने भी मानस-चित्र बनते हैं, उनके कुल सार का व्यक्ति के मानसिक क्षेत्र में लेखा-जोखा निकाला जाता रहता है। वही उसके दूसरे भौतिक जीवन की भूमिका तैयार करता है।

प्रत्येक नये जन्म के साथ जिस प्रकार नये शरीर की रचना होती है, उसी प्रकार प्रत्येक नये जन्म में नया मन और नयी बुद्धि भी बनती है।

विचार और भाग्य की सारी प्रक्रियाओं का क्रमिक रूप से वर्णन करना सरल नहीं है। प्रत्येक क्रम द्विविध परिणाम उत्पन्न करता है- एक व्यक्ति के चित्त पर और दूसरा विश्व पर। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा दूसरों पर जो प्रभाव डालता है, उसी से वह अपने भावी जीवन का वातावरण तैयार करता है।

प्रत्येक कर्म का अपना एक पूर्व-भाव होता है यहाँ से कर्म उत्पन्न होता है और उसका अपना एक भविष्य होता है जो उस (कर्म) से उदय होता है। प्रत्येक क्रिया के पीछे एक इच्छा रहती है जिससे वह क्रिया प्रेरित होती है और एक विचार रहता है जिससे वह साकार होती है।

प्रत्येक विचार कार्य-कारण-भाव की अनन्त श्रृंखला की एक कड़ी होता है, प्रत्येक कार्य दूसरे कार्य का कारण बनता है और प्रत्येक कारण दूसरे कारण का कार्य बनता है। इस अखण्ड श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी तीन अवयवों-इच्छा, विचार और क्रिया की संघटक है। इच्छा विचार को उद्दीप्त करती है। विचार क्रिया का रूप धारण करता है। क्रिया भाग्य का ताना-बाना बुनती है।

कोई मनुष्य यद्यपि इस जीवन में प्रत्यक्ष रूप से कभी भी ठगी नहीं करता; किन्तु मन-ही-मन दूसरे की वस्तु का स्वार्थपूर्ण लोभ करता है, तो वही आगामी जन्म में उसके चोर बनने का कारण होता है। बैठे-बैठे किसी से द्वेष तथा प्रतीकार की भावना रखें, तो वही आगे चल कर हत्यारा बनने में बीज का कार्य करती है।

इसके विपरीत निःस्वार्थ प्रेम का चिन्तन करने पर बड़ा दानी और सन्त बनता है। प्रत्येक करुणापूर्ण विचार कोमल और दयालु प्रकृति के निर्माण में सहायक होता है जिससे मनुष्य प्राणिमात्र का मित्र बनता है।

महर्षि वसिष्ठ राम से पुरुषार्थ करने को कहते हैं। वह कहते हैं “भाग्य पर निर्भर मत रहो। उससे अकर्मण्यता और आलस्य की वृद्धि होती है। विचार की महान् शक्ति पर ध्यान दो। पुरुषार्थ करो। सम्यक् विचार द्वारा अपने लिए सद्भाग्य का निर्माण करो।”

प्रारब्ध पूर्व-जन्म का पुरुषार्थ ही तो है। हम क्रिया का बीज बोते हैं और उसके फल-स्वरूप स्वभाव बनता है; फिर स्वभाव के बीज से चारित्र्य फलता है। हम चारित्र्य-रूपी बीज बो कर भाग्य-रूपी फल प्राप्त करते हैं।

मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। हम अपनी विचार-शक्ति के द्वारा अपना भाग्य निर्माण करते हैं। भाग्य को हम चाहें तो मिटा सकते हैं। सभी क्षमताएँ, सारी शक्तियाँ और सारे सामर्थ्य हमारे अन्दर पड़े हैं। उन्हें प्रकट करें तो महान् बन जायें, मुक्त हो जायें।

. विचार हमें आकार देता है

हमारी मुखाकृति ग्रामोफोन के रिकार्ड की तरह है। अन्दर हम जो कुछ भी विचार करते हैं, वह तत्काल उस पर प्रतिबिम्बित हो जाता है।

प्रत्येक असद् विचार एक सूई या छेनी की तरह हमारी मुखाकृति पर हमारे विचारों को अंकित कर देता है। मन में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, वासना, प्रतिहिंसा आदि दुर्भावनाओं के कारण ही हमारे मुख पर व्रण आदि के चिह्न होते हैं।

मुख पर के चिह्नों को देखते ही पहचान सकते हैं कि आपकी मनःस्थिति क्या है। तुरन्त आपके मनोरोग का निदान कर सकते हैं।

जो सोचता है कि अपने मन के भावों को वह छिपा सकता है, यह उसका केवल भ्रम है। उसकी स्थिति बिलकुल उस शुतुरमुर्ग (ostrich) की तरह है, जो शिकारी जब पीछा करता है, तब वह रेत में अपना शिर छिपा लेता है और सोचता है कि अब मुझे कोई नहीं देख रहा है।

मुख मन का दर्पण है। चेहरा मन का साँचा है। प्रत्येक विचार मुख पर अपनी छाप छोड़ जाता है। दिव्य विचार मुख को उज्ज्वल बनाता है। दुष्ट विचार मुख पर कालिमा पोत देता है। निरन्तर दिव्य विचार करते रहने से मुख की कान्ति एवं तेज निखरता जाता है।

निरन्तर असद् विचार करते रहने से मुख पर कुत्सित चिह्न गहरे होते जाते हैं जैसे कुएँ से पानी खींचते समय यदि घड़ा कुएँ के किनारे से बराबर टकराता रहे, तो वह (किनारा) दिन-प्रति-दिन दबता ही जाता है। मुख के भाव निश्चित ही अन्तःस्थिति का, मनोगत भावों का प्रत्यक्ष विज्ञापन करने वाले होते हैं।

मुख उस विज्ञापन-पट्ट के समान है जिस पर मन के भीतर की सारी बातों का विज्ञापन हो जाता है। हमारे विचार, विकार, वासना, उद्वेग आदि के उस (मुख) पर स्पष्ट चिह्न अंकित होते रहते हैं।

हम अपने मनोभावों को कदाचित् ही अपने मुख पर छिपा पाते हैं। भले ही हम मान लें कि हमने अपने विचारों को गुप्त रख लिया है, लेकिन यह हमारी भूल है। कामना, वासना, लोभ, मत्सर, क्रोध, द्वेष आदि सभी वृत्तियाँ हमारे मुख पर तत्काल गहरा प्रभाव डालती हैं।

मुखाकृति एक निष्ठावान् अभिलेखक तथा संवेदनशील पंजीयक यन्त्रकलाप है जो हमारे मनोजात सभी विचारों को पंजीकृत तथा लेखबद्ध करती है।

मुखाकृति परिमार्जित दर्पण है जिसमें हर समय मन की वृत्तियों और आशयों का प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकता है।

. विचार का आकार और स्थूल भाव

मन स्थूल शरीर का सूक्ष्म रूप है। यह स्थूल शरीर विचारों की बाह्य अभिव्यक्ति है; अतः जब मन कलुषित होता है, तब शरीर भी कलुषित हो जाता है।

जिस व्यक्ति की आकृति क्रूर दिखायी देती हो, वह सामान्यतया दूसरों के प्रति प्रेम एवं करुणा जाग्रत नहीं कर सकता। उसी प्रकार जिसका मन कठोर होगा, वह औरों में भी प्रेम और करुणा जाग्रत नहीं कर सकेगा।

मन बड़ी कुशलतापूर्वक अपनी विभिन्न अवस्थाओं को मुख पर प्रतिबिम्बित कर देता है, जिसे बुद्धिमान् व्यक्ति बड़ी सरलता से पढ़ अर्थात् समझ सकता है।

शरीर मन का अनुगामी है। यदि मन ऊँचाई से नीचे गिरने का विचार करता है, तो शरीर अपने को उसके लिए तुरन्त तैयार कर लेता है और बाह्य लक्ष्ण प्रकट हो जाते हैं। भय, उद्वेग, शोक, प्रसन्नता, आह्लाद, क्रोध-सभी मुख पर भिन्न-भिन्न भाव उत्पन्न करते हैं।

. तुम्हारे नेत्र तुम्हारे विचारों को प्रकट कर देते हैं

नेत्र आत्मा के वातायन माने जाते हैं, जो आपके मन की दशा एवं स्थिति बता देते हैं। विश्वासघात, दुःख, निराशा, द्वेष, प्रसन्नता, शान्ति, समाधान, स्वास्थ्य, शक्ति, सौन्दर्य आदि से सम्बन्धित समाचार और विचार प्रसारित करने के लिए नेत्र मानो दूरभाष यन्त्र हैं।

यदि आपमें दूसरों के नेत्रों को समझने का गुण है तो आप दूसरे के हृद्गत भावों को तुरन्त जान जायेंगे। यदि आप किसी मनुष्य के मुख-लक्षण, संलाप तथा व्यवहार पर ध्यान दें तो आप उसके प्रमुख अथवा प्रभावशाली विचार को जान सकते हैं। इसमें किंचित् चतुरता, साहस, अभ्यास, बुद्धि और अनुभव की आवश्यकता है।

. कुत्सित विचार विष के समान है

चिन्ता तथा भय के विचार हमारे लिए बड़े भयानक होते हैं। जीवन के मूल-स्रोत को ही वे सुखा देते हैं, विषाक्त कर देते हैं, जीवन को डाँवाडोल कर देते हैं, कार्यदक्षता, प्राणवत्ता और तेजस्विता को मिटा देते हैं।

इसके विपरीत प्रसन्नता, सुख, सन्तोष तथा साहस के विचार मनुष्य को स्वस्थ बनाते हैं, सरल और सौम्य बना कर उत्तेजित करने के स्थान में शान्ति और समाधान प्रदान करते हैं, कार्यक्षमता की अत्यधिक वृद्धि करते तथा मनोबल को बहुगुणित बनाते हैं।

सदा प्रसन्न रहें, हँसते रहें, मुस्कराते रहें।

. मानसिक तथा शारीरिक असन्तुलन

विचारों का प्रभाव शरीर पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। मन में यदि दुःख है, तो शरीर दुर्बल होता है। उलटे शरीर का भी प्रभाव मन पर पड़ता है। शरीर स्वस्थ रहा तो मन स्वस्थ रहता है। शरीर रोगी हुआ तो मन भी रोगी होता है। शरीर यदि हृष्ट-पुष्ट है तो मन भी हृष्ट-पुष्ट होता है।

दिमाग जब भयंकर उद्वेग से अभिभूत हो जाता है तब उससे मस्तिष्क के कोष क्षत-विक्षत हो जाते हैं, रक्त में विषमय रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं, व्यक्ति को आघात लगते तथा अवसाद उत्पन्न होता है एवं उसके जठर-रस, पित्त तथा अन्य पाचक रसों का उदासर्जन अवरुद्ध हो जाता है। मनुष्य की सारी शक्ति तथा सामर्थ्य सब बह जाते हैं, वह असमय में ही जराग्रस्त हो जाता है और उसकी आयु क्षीण हो जाती है।

आप देखें, जब भी क्रोध आता है तब मन विक्षिप्त हो उठता है। इसी प्रकार जब भी मन विक्षुब्ध होता है तब शरीर भी विक्षुब्ध हो जाता है। समूचा नाड़ी-संस्थान ही क्षुब्ध हो जाता है। आप दुर्बल हो जाते हैं।

इसलिए क्रोध को प्रेम से जीतो। क्रोध इतनी प्रबल शक्ति है कि सामान्य व्यावहारिक बुद्धि से उसे नियन्त्रित करना सम्भव नहीं है। उसके नियन्त्रण के लिए शुद्ध, सात्त्विक बुद्धि या विवेक-विचार आवश्यक है।

. विचार की विधायक शक्तियाँ

विश्व का विधाता विचार है। विचार ही पदार्थों को अस्तित्व प्रदान करता है। विचार ही इच्छाओं को बढ़ाता और वासना को प्रेरित करता है। इसीलिए जब मनुष्य इच्छाओं और वासनाओं को मिटा देने का विरोधी विचार करने लगता है तो वह इच्छा और वासना की पूर्ति के पूर्व-कल्पित विचार को निष्फल बना देता है। इसलिए यदि कभी किसी इच्छा और आकांक्षा या वासना को वश में करना हो तो उसके विपरीत विचार हमें सहायक हो सकते हैं।

किसी व्यक्ति को आप अपना सच्चा मित्र मान कर विचार कीजिए, तो ऐसा लगेगा कि वह बिलकुल ठीक है। उसी को आप अपना शत्रु मान कर विचार कीजिए, तो मन आपको यही प्रमाणित करेगा कि वह वास्तव में आपका शत्रु है।

इसलिए जो मनुष्य मन की गति-विधि को ठीक से जानता है और अभ्यासपूर्वक उसको अपने अधीन रखता है, वही सुखी है।

. समान विचारों का परस्पर आकर्षण

विचार-जगत् में भी यह महान् सिद्धान्त लागू होता है कि ‘दो समान वस्तुएँ परस्पर आकर्षित होती हैं।’ जिन दो व्यक्तियों के विचार समान हों, वे एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं; इसीलिए लोग प्रायः कहा करते हैं कि ‘दोस्तों को देख कर व्यक्ति को समझा जा सकता है।’

डाक्टर की ओर डाक्टर खिंचता है। कवि का आकर्षण कवि की ओर होता है। गायक गायक से प्रेम करता है। दार्शनिक दार्शनिक को चाहता है। दुर्जन दुर्जन से प्यार करता है। मन में खींच लेने की शक्ति है।

आपके विचारों और भावनाओं से मेल खाने वाले लोगों की व्यक्त अथवा अव्यक्त प्राण-शक्ति, विचार-शक्ति, प्रभाव-शक्ति तथा परिस्थितियों से आप निरन्तर आकर्षित होते रहते हैं।

हम जानते हों या नहीं जानते हों, परन्तु जीवन-भर यह सार्वभौम सिद्धान्त काम करता रहता है कि विचार-जगत् में समान विचार के लोग परस्पर आकृष्ट हुआ करते हैं।

आप अपने साथ चाहे जैसा विचार ले कर चलिए, जब तक आप उसे दृढ़ता से अपने पास रखे रहेंगे, तब तक आप भूमि पर, जल में, चाहे जहाँ कितना ही घूमते-फिरते रहें, कोई हर्ज नहीं, आप जाने-अनजाने उस अपने प्रमुख विचार के अनुकूल व्यक्तियों को अपनी ओर अनवरत खींचते रहेंगे। विचार आपकी निजी सम्पत्ति है। यदि आप अपने विचारों को अपनी रुचि के अनुकूल बना सकने की अपनी क्षमता को भली-भाँति समझ लें तो आप उनका नियमन कर सकते हैं।

यह पूरी-पूरी आप ही के वश की बात है कि आप किस प्रकार का विचार किया करें और उसके परिणाम स्वरूप विश्व को अपनी ओर खींचने की किस प्रकार की शक्ति प्राप्त करें। यह कोई आवश्यक नहीं कि आप परिस्थिति के थपेड़े खाने वाले प्राणी ही बने रहें; लेकिन हाँ, शर्त यह है कि आप सचमुच वैसा शक्तिशाली बनना चाहें।

. विचारों की संक्रामकता

मानसिक क्रिया ही वास्तविक क्रिया है। विचार ही यथार्थ क्रिया है। वह एक प्रावैगिक शक्ति है। यह स्मरणीय बात है कि विचार संक्रामक होता है; बल्कि किसी भी संक्रामक रोग से बढ़ कर संक्रामक है।

आपका एक संवेदनापूर्ण विचार आपके सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के हृदय में भी संवेदना के विचार निर्माण करता है। जिसमें क्रीधमय विचार है, वह अपने चतुर्दिक् के लोगों में क्रोध का ही स्पन्दन पैदा करता है। विचार एक व्यक्ति के मस्तिष्क से दूर स्थित दूसरे व्यक्तियों के मस्तिष्क में संक्रमण करता है और वहाँ जा कर उनमें उत्तेजना पैदा करता है।

आपका एक प्रसन्नतापूर्ण विचार दूसरों में भी प्रसन्नता पैदा करता है। जब हम उल्लास से हँसते, खेलते, फुदकते शिशुओं को देखते हैं तो हमारा मन भी प्रसन्नता और आनन्द से भर जाता है।

हमारा सद्विचार दूसरों में भी समान रूप से सद्विचार जगाता है। उन्नत और उदात्त विचार भी इसी भाँति स्वानुरूप विचार पैदा करते हैं।

किसी भले और ईमानदार व्यक्ति को किसी चोर की संगति में रख दीजिए; कुछ समय में वह भी चोरी करने लगेगा। किसी सदाचारशील व्यक्ति को किसी शराबी के साथ रख दीजिए; वह भी पीने लग जायेगा। विचार बड़ा संक्रामक होता है।

१०. मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रयोग

चित्त को सदा तरुण बनाये रखो। यह न सोचो- ‘मैं बूढ़ा हो गया।’ यह सोचना कि मैं बूढ़ा हो गया, बड़ी बुरी आदत है। ऐसा विचार मत करना। साठ वर्ष के हो जाओ तो समझना कि सोलह वर्ष के ही हो। जैसा सोचोगे वैसा ही बनोगे। यह एक महान् मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त है।

‘यद् भावं तद् भवति’ – यह एक बड़ा सत्य है। सोचो- ‘मैं बलवान् हूँ, तो बलवान् बन जाओगे। सोचो- ‘मैं दुर्बल हूँ’, तो दुर्बल बन जाओगे। सोचो – मैं मूर्ख हूँ’, तो मूर्ख ही बनोगे और सोचो- ‘मैं योगी हूँ’ या ‘ईश्वर हूँ’, तो योगी और ईश्वर ही बनोगे।

एक विचार ही है जो मनुष्य को आकार देता है, उसे ढालता है। मनुष्य सदा विचारों के जगत् में जीता है। प्रत्येक मनुष्य का अपना-अपना विचार-जगत् होता है।

कल्पना-शक्ति आश्चर्यजनक काम करती है। विचार में बहुत बड़ी शक्ति है। जैसे पहले कहा जा चुका है, विचार एक स्थूल द्रव्य है। आज का हमारा वर्तमान जीवन हमारे भूतकालीन विचारों का परिणाम है और आज के विचारों के अनुरूप हमारा भविष्य बनने वाला है। आपका विचार यदि सही है तो आपकी वाणी सही होगी, आपकी कृति सही होगी। वाणी और कृति दोनों बिलकुल विचार के ही अनुगामी हैं।

११. विचार-सिद्धान्त को समझो

प्रत्येक मनुष्य को इस बात की पूरी जानकारी कर लेनी चाहिए कि विचार के सिद्धान्त क्या हैं और वे कैसे काम करते हैं। तभी वह इस संसार में सरल सुखी जीवन यापन कर सकेगा और अपने ध्येय की सिद्धि में अनुकूल शक्तियों का पूर्ण उपयोग कर सकेगा।

विचार-शक्ति के नियमों और कार्य-पद्धतियों को जानने से मनुष्य अपनी विरोधी शक्तियों और प्रतिकूल धाराओं को कुण्ठित कर सकता है। मछली जिस प्रकार प्रवाह के विपरीत तैर लेती है, उसी प्रकार वह मनुष्य अपना सामंजस्य सँभाले हुए और अपनी सुरक्षा के सुयोग्य प्रबन्ध के साथ विरोध और प्रतिकूल धाराओं के विपरीत तैर सकता है।

अन्यथा वह दास बन जायेगा, कई धाराओं में थपेड़े खाते हुए असहाय हो कर इधर-उधर भटकता रह जायेगा। नदी में पड़े काष्ठफलक की भाँति वह बहता चला जायेगा। उसके पास पर्याप्त सम्पत्ति हो और सारी सुख-सुविधाएँ हों, तो भी वह सदा दुःखी और असन्तुष्ट ही रहेगा।

जलपोत का कप्तान यदि जानता हो कि मार्ग कहाँ है, कैसा है, समुद्र की अन्तर्धाराएँ किस-किस दिशा में बह रही हैं और उसके पास यदि दिशा सूचक यन्त्र हो, तभी पोत को ठीक से, सुगमतापूर्वक चला सकता है, अन्यथा उसका पोत इधर-उधर भटक जायेगा और कहीं जा कर किसी चट्टान से या हिम-खण्ड से टकरा कर चकनाचूर हो जायेगा। इसी प्रकार इस भवसागर का नाविक भी यदि विचार-शक्ति के नियमों और सिद्धान्तों को ठीक से जानता हो तो बड़ी सहजता से सागर को पार करेगा और अपनी मंजिल पर निश्चय ही पहुँच जायेगा।

विचार-शक्ति के नियमों को जान लेने से हम अपने चारित्र्य का गठन यथेष्ट रूप से कर सकते हैं। यह लोकोक्ति प्रचलित है कि ‘यद् भावं तद् भवति’, यह विचार- नियमों में एक बहुत प्रमुख नियम है। सोच लीजिए कि आप पवित्र हैं, आप पवित्र बन जायेंगे। सोच लीजिए कि आप श्रेष्ठ हैं, आप श्रेष्ठ बन जायेंगे।

सत् स्वभाव की साकार मूर्ति बनो। सबका भला सोचो। सदा सत्कार्य करो। सेवा करो। प्रेम करो। दान करो। दूसरों को प्रसन्न करो। दूसरों की सेवा करने में अनुराग रखो; तब तुम सुख-ही-सुख पाओगे, सारी परिस्थिति अनुकूल बन जायेगी, सुयोग प्राप्त होते जायेंगे तथा वातावरण सुखकर बनेगा।

यदि दूसरों को कष्ट दोगे, धोखा दोगे, ठगोगे, चुगली करोगे, अनबन पैदा करोगे, दूसरों का शोषण करोगे, अन्याय-मार्ग से औरों की सम्पत्ति हथिया लोगे, दूसरों को दुःख पहुँचाने का कोई भी असत्कार्य करोगे तो दुःख ही पाओगे, परिस्थिति प्रतिकूल बन जायेगी, दुर्योग प्राप्त होते जायेंगे तथा वातावरण दुःखदायी बनेगा।

यह विचार का नियम है, प्रकृति का सिद्धान्त है। जिस प्रकार सद्विचार से चारित्र्य शुद्ध होता है और असद्विचार से चारित्र्य अशुद्ध होता है, उसी प्रकार सत्कार्य से परिस्थिति अनुकूल बनती है और असत्कार्य से प्रतिकूल ।

विवेकी मनुष्य सदा सतर्क रहेगा, सजग रहेगा, सावधान रहेगा, अपने विचारों का परीक्षण बराबर करता रहेगा, आत्मनिरीक्षण करता रहेगा।

वह जानता है कि उसके मन के कारखाने में क्या हो रहा है, कौन-सी वृत्ति बन रही है, किस समय, कौन-सा गुण ढल रहा है। वह अपने मन के कारखाने के द्वार पर किसी दुष्ट या पाप-विचार को कभी फटकने नहीं देगा। अंकुरित होते ही उसे वह तोड़ फेंकेगा।

विवेकी पुरुष अपने विचारों के गुण-धर्मों के परीक्षण से, आत्मनिरीक्षण से और सक्रिय उदात्त विचारों से अपने चारित्र्य को अति-उत्कृष्ट बना लेता है, भाग्य को उन्नत कर लेता है। वह अपनी बातचीत में बड़ा सतर्क रहता है, कम बोलता है और जब भी बोलता है, प्रिय और मधुर शब्द ही बोलता है। कभी ऐसा कटु शब्द उच्चारण नहीं करता जिससे किसी की भावनाओं को आघात पहुँचे।

वह धैर्य, सहिष्णुता, दया और विश्व-प्रेम का विकास करता है, सत्य ही बोलने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार अपनी वागिन्द्रिय पर नियन्त्रण रखता है। वह नपे-तुले शब्द बोलता है, नपा-तुला लिखता है। इसका प्रभाव लोगों के मानस पर बड़ा अनुकूल और गहरा पड़ता है।

कृति, वाणी और विचार तीनों में वह अहिंसा और ब्रह्मचर्य का पालन करता है, शौच और आर्जव का पालन करता है, सर्वदा चित्त को सन्तुलित रखने और प्रसन्न रखने का प्रयत्न करता है, शुद्ध भाव रखता है तथा कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों तपों का आचरण करता है। अपनी कृतियों का नियमन करता है। वह कोई पाप नहीं सोच सकता, कोई दुष्कृत्य नहीं कर सकता।

वह सर्वदा परिस्थितियों को अनुकूल बना लेने का प्रयत्न करता है और उसके लिए अपने को तैयार रखता है। जो सुख-सन्तोष फैलाता है, वह सर्वदा अनुकूल परिस्थिति ही प्राप्त करेगा जिससे स्वयं सुखी और सन्तोषी रहेगा। जो दूसरों के मन को दुःख देगा, वह अवश्य ही विचार-नियम के अनुसार ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति निर्माण करेगा जिससे स्वयं भी दुःखी और परेशान रहेगा; इसलिए मनुष्य अपनी ही विचार-पद्धति के कारण अपना स्वभाव और अपनी परिस्थिति स्वयं बनाने वाला होता है।

स‌द्विचारों के बल पर दुःस्वभाव को सत्स्वभाव में रूपान्तरित किया जा सकता है और सत्कृतियों के बल पर प्रतिकूल परिस्थिति को अनुकूल बनाया जा सकता है।

१२. उच्च विचारों के नियम

जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे। आपके विचार जैसे होंगे, वैसा आपका जीवन होगा। अपने विचारों को उन्नत बनाओ। उन्नत विचारों से उन्नत कार्य निष्पन्न होते हैं।

केवल सांसारिक विषयों का चिन्तन करना दुःखमय है। वह विचार-मात्र ही बन्धनकारक होता है। शुद्ध विचार विद्युत्-शक्ति से भी अधिक शक्तिशाली शक्ति है।

जो मन ऐन्द्रिय विषयों से आकृष्ट होता है, वह बन्धन का कारण बनता है और जो उनसे अलिप्त रहता है, वह मुक्ति का कारण बनता है। मन लुटेरा है। इस लुटेरे मन का ही अन्त करो। इससे तुम सदा सुखी और प्रसन्न रहोगे। मन को जीतने के इस प्रयत्न में अपनी सारी शक्ति लगा दो। यही सच्चा पुरुषार्थ है।

अहन्ता-नाश चित्त की शुद्धि तथा संस्कृति का एक साधन है। मन आहार के अनुरूप बनता है। आहार के सूक्ष्म तत्त्वों से मन बनता है। आहार का अर्थ केवल वह भोजन ही नहीं है जिसे हम खाते हैं, बल्कि वह सब है जो हम अपनी समस्त इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं।

भगवान् के सर्वत्र दर्शन करने की कला सीखिए। यही नेत्रों का वास्तविक आहार है। विचार की शुद्धता आहार की शुद्धता पर निर्भर करती है। आप उदात्त दिव्य विचारों को प्रश्रय दे कर सम्यक् दर्शन, सम्यक् श्रवण, सम्यक् आस्वादन तथा सम्यक् चिन्तन कर सकते हैं।

लाल या हरा उपनेत्र (चश्मा) लगा कर किसी वस्तु को देखें, तो वह वस्तु लाल या हरी दिखायी देगी। इसी प्रकार हमारी वासनाएँ मनोदर्पण के द्वारा विषयों को अपना रंग देती हैं। सभी मनोविचार विनाशी हैं, परिवर्तनशील हैं; अतः दुःख और सन्ताप ही देने वाले हैं।

विचार मात्र से मुक्त हो जाओ। पूर्वाग्रहों और धारणाओं की गुलामी को तोड़ दो, जो बुद्धि को कुण्ठित करते और विचारों को निस्तेज बनाते हैं। अमर आत्मा का चिन्तन करो। यह प्रत्यक्ष और मौलिक चिन्तन की ठीक पद्धति है। विचारों के शुद्ध होते ही आत्मा स्वयं प्रकट होने लगती है। जब मन कामना से सर्वथा मुक्त और शान्त होता है, जब उसमें कोई आकांक्षा, कोई इच्छा या कोई विचार नहीं रहता, किसी प्रकार का दबाव, आशा और अपेक्षा नहीं रहती, तब परमात्मा विभासित होने लगता है। तब आनन्द का अनुभव होगा। सन्तों के चरण-चिह्नों पर चलो, उनका-सा जीवन जियो। यह विचार-जय का एकमात्र उपाय है, मनोजय का एकमात्र साधन है, निम्न प्रकृति पर विजय का एक सम्बल है। जब तक मन को जीत नहीं लोगे, तब तक स्थायी और निश्चित विजय असम्भव है।

१३. विचार : एक प्रत्यावर्ती अस्त्र

अपने विचारों के प्रति सावधान रहो। अपने मन से जो कुछ भी आप बाहर भेजते हैं, वही लौट कर आने वाला है। जो भी सोचते हैं, वही प्रत्यावर्ती अस्त्र है।

किसी से घृणा करोगे, तो घृणा ही आपके पास लौट आयेगी। औरों से प्रेम करोगे, तो प्रेम ही वापस आपको मिलेगा।

कोई भी दुष्ट विचार मनुष्य को त्रिधा आघात पहुँचाता है: पहला, विचार करने वाले पर आघात आता है; क्योंकि उसके मानस को दूषित करता है; दूसरा, उस पर आघात करता है जिसे उस विचार का शिकार या विषय बनाया जाता है और तीसरा, समस्त मानव-जाति पर आघात करता है; क्योंकि उससे विश्व-व्यापी जो मानस-क्षेत्र है वही कलुषित होता है।

प्रत्येक दुष्ट विचार एक तलवार के समान सामने वाले पर असर करता है। यदि आपने किसी के प्रति द्वेषयुक्त विचार किया तो वास्तव में आपने उसकी हत्या ही की। फिर आप भी आत्महत्या करते हैं; क्योंकि वही विचार लौट कर वापस आप पर ही आ पड़ता है।

कुविचारों से अधिकृत मन बिलकुल लौह चुम्बक के समान दूसरों से वैसे विचारों को आकर्षित कर लेता है और इस तरह से मूलभूत दोष या पाप को तीव्र बनाता है।

जो कुविचार मानस-वातावरण में फैलाया जाता है, वह ग्रहणशील मन को विषाक्त करता है। दुष्ट विचार से अभिभूत रहने का परिणाम यह होता है कि मन की अपकर्षण-शक्ति क्रमशः कुण्ठित हो जाती है और वह मन उस मनुष्य को तदनुरूप दुष्कृत्य करने के लिए बाध्य करता है।

१४. विचार और सागर-तरंग

विचार सागर की तरंगों के समान हैं। वे असंख्य हैं। उनको जीतने का प्रयत्न करते समय प्रारम्भ में निराशा ही पल्ले पड़ती है। कुछ विचार तो प्रशमित हो जाते हैं; किन्तु कुछ विचार वेगवान् प्रवाह की तरह उमड़-घुमड़ कर बह निकलते हैं। जो पुराने विचार नीचे दबे पड़े हुए थे, वे कुछ समय के बाद पुनः ऊपर आ सकते हैं और अपना जोर दिखा सकते हैं।

अभ्यास की किसी भी स्थिति में निराश न होना। अन्दर से अवश्य ही आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होगी। अन्ततः आपकी जीत निश्चित है। आज आपको जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, हमारे पूर्वज महायोगियों को भी इन सब कठिनाइयों से हो कर गुजरना पड़ा था।

मनोवृत्तियों को नियन्त्रित करने की प्रक्रिया कष्टसाध्य और लम्बी है। एक-आध दिन में ही सभी विचारों को समाप्त करना सम्भव नहीं है। जब बाधाएँ आयें या कठिनाइयाँ उपस्थित हों तो बीच में ही अभ्यास छोड़ न देना, विचार-नाशन का प्रयत्न बराबर जारी रखना।

आपका पहला काम यही होना चाहिए कि आशाओं और आकांक्षाओं को घटाया जाये। पहले अपनी आशाएँ और आकांक्षाएँ कम करो, फिर विचार अपने- आप कम होने लगेंगे। फिर धीरे-धीरे सभी विचार आमूल नष्ट किये जा सकेंगे।

१५. सद्विचारों का रंग और प्रभाव

भगवान् बुद्ध ने कहा- “हम अपने विचारों से ही बने हैं।” विचारों के ही कारण जन्म-जन्मान्तरों का चक्कर चलता है। हमें सदा अपने विचारों को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए।

जब किसी महात्मा के सान्निध्य में हम जा कर बैठते हैं तो अन्यादृश शान्ति का अनुभव करते हैं; किन्तु जब किसी स्वार्थी और दुर्जन की संगति में बैठते हैं तो हमें अशान्ति प्रतीत होती है। इसका कारण यही है कि एक महात्मा के प्रभामण्डल से शान्ति और समाधान के स्पन्दन निस्सृत होते हैं जब कि स्वार्थी व्यक्ति से स्वार्थमय दुष्ट विचारों का निस्सरण होता है।

विचारों का दूसरा परिणाम यह है कि उनका एक निश्चित आकार बनता है। विचार के गुण-धर्म पर उस वैचारिक आकार का रंग और स्वच्छता निर्भर है। विचार-स्वरूप एक जीवन-तत्त्व है और उसमें विचारकर्ता के आशयों के निष्पादन की बहुत बलवती प्रवृत्ति होती है।

विचार का नीला स्वरूप भक्ति का द्योतक है। अहं-शून्यता के विचार का स्वरूप अति-मनोहर पाण्डुर आकाश-नील होता है जिसके चारों ओर शुभ्र प्रकाश चमकता रहता है। स्वार्थ, अहंकार और क्रोधमय विचारों का स्वरूप क्रमशः धूसर बच्नु, नारंग और रक्त वर्ण होता है।

हमारे चारों ओर सदा ये विचार-रूप घिरे रहते हैं और हमारा मन उनसे बहुत ही प्रभावित होता रहता है। जिसे हम अपना विचार कहते हैं, वस्तुतः उसका चौथाई भी हमारा नहीं होता है, यह सब वातावरण से संचित किया हुआ होता है। प्रायः वे अधिकतर दुष्ट विचार होते हैं; इसलिए सदा मन-ही-मन हमें भगवान् का नाम लेते रहना चाहिए। वह उन विचारों के दुष्प्रभाव से हमारी रक्षा करेगा।

१६. समुन्नत चित्त का प्रभामण्डल और गति-शक्ति

जिनकी चित्त-शक्ति विशेष रूप से प्रबुद्ध और समुन्नत होती है, उनसे हम अत्यन्त तेजस्वी प्रभामण्डल अनुभव करते हैं।

समुन्नत चित्त का प्रत्यक्ष प्रभाव जो अनुन्नत चित्त पर पड़ता है, वह विशेष ध्यान देने योग्य है। पहुँचे हुए महापुरुष के सान्निध्य में प्राप्त होने वाले उस अनुभव का कोई दृष्टान्त दे कर वर्णन करना सम्भव नहीं है।

महापुरुष अपने मुँह से एक शब्द भले ही न बोले, फिर भी उसके पास बैठने मात्र से हमारे मन पर प्रभाव पड़ता है, उससे हम विलक्षण चेतना स्पष्ट अनुभव कर सकते हैं।

मानसिक अथवा मानस-तेज मन के द्वारा प्रस्तुत होता है। तेज वह शुभ्रता या प्रभामण्डल है जो मानस-तत्त्व से निस्सृत होता है। जिन्होंने अपने चित्त का परिपूर्ण विकास साध लिया है, उनमें वह तेज हम अत्यधिक देदीप्यमान देख सकते हैं। उसमें तीव्र गति से संचार करने की अद्भुत शक्ति होती है और जिन लोगों को उसके प्रभाव में आने का सद्भाग्य प्राप्त है, उन पर कल्याणकारी प्रभाव डालने की भी सामर्थ्य है, भले ही वे कितनी भी दूर हों और कितनी ही संख्या में हों। यह ध्यान में रखने की बात है कि आध्यात्मिक तेज चैतसिक, प्राणिक अथवा मानसिक तेज से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।

१७. विचारों और वृत्तियों की गति-शक्ति

जो उदास और मन्द वृत्ति के लोग हैं, वे अपने ही जैसे उदास और मन्द वृत्ति वाली वस्तुओं और विचारों को दूसरों से तथा स्थूल ईथर में संचित आकाशीय रेकाडाँ से आकर्षित करते रहते हैं।

जो मनुष्य आशा, विश्वास और प्रसन्नता से भरे होते हैं, वे दूसरों के इन्हीं गुणों को आकर्षित करते हैं। ऐसे लोग सर्वदा अपने प्रयास में सफल हुआ करते हैं।

निराशा, क्रोध, द्वेष आदि हीन वृत्ति वाले लोग निश्चित रूप से दूसरों का अकल्याण करते हैं। उनकी दुष्ट वृत्तियों की छूत औरों को भी लगती है और उनकी वृत्तियाँ भी दूषित हो जाती हैं। ये लोग दण्डनीय हैं। विचार-जगत् में इनसे बड़ी हानि होती है।

समाधान और प्रसन्न वृत्ति वाले मनुष्य समाज के लिए वरदान-स्वरूप हैं। वे औरों में भी प्रसन्नता फैलाते हैं।

जैसे किसी सुन्दर युवती के कपोलों पर या नाक पर एक-आध भद्दा घाव हो जाये तो वह समाज में अपना चेहरा ढक कर ही निकला करती है और समाज के अन्य लोगों से मिलना-जुलना नहीं चाहती है। इसी प्रकार आप भी, जब आपके अन्दर उदासी, द्वेष या मात्सर्य-जैसी, दुर्वृत्ति जगी हुई हो, तब मित्रों और समाज के बीच जाना छोड़ दीजिए; क्योंकि आपकी इन वृत्तियों का प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा। आप समाज के लिए अभिशाप सिद्ध होंगे।

१८. व्यापक वातावरण से विचार-शक्ति

विचार मनुष्य के मस्तिष्क से बाहर निकल कर उभ्रमण करते रहते हैं। भला हो या बुरा, जब विचार मन से बाहर निकलता है, तब मनोभूमि में स्पन्दन निर्माण करता है।

वे दूसरों के मस्तिष्क में भी प्रवेश करते हैं। हिमालय की कन्दरा में बैठा हुआ एक योगी अपने शक्तिशाली विचारों को अमरीका के कोने तक प्रसारित करता रहता है। जो व्यक्ति कन्दरा में बैठ कर अपना चित्त शुद्ध करता है और व्यापक रूप से विश्व की सेवा करता है, उससे जो सद्विचारों का प्रवाह आता है वह उसे ग्रहण करना चाहने वालों के हृदय में प्रवेश करता रहता है, उसे कोई रोक नहीं सकता।

जिस प्रकार सूर्य की किरणें धरती पर बूंद-बूंद पानी को भाप के रूप में बदलती रहती हैं और वह सारी भाप आकाश में पुंजीभूत हो कर मेघ का रूप धारण करती है; उसी प्रकार आप एकान्त में बैठ कर जो सद्विचार की तरंगें उत्पन्न करते हैं, वह आकाश में एकत्रित होती रहती हैं। और भी जो-जो लोग इसी तरह सद्विचार प्रसारित करते हैं, सबके सभी सद्विचार आकाश में एकत्रित होते रहते हैं और समय पर वे अवांछनीय विचारों का दमन करने के लिए अतुल शक्ति के साथ नीचे उतर आते हैं।

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