तृतीय अध्याय
विचार-शक्ति का मूल्य और उपयोग
१. विचार-स्पन्दन से पर-सेवा
सच्चा संन्यासी या योगी अपने विचार-स्पन्दन के बल पर कुछ भी कर सकता है। उसे किसी संस्था का अध्यक्ष या किसी सामाजिक अथवा राजनैतिक आन्दोलन का नेता बनने की आवश्यकता नहीं है। यह तो नासमझी और बचकाना है।
भारत के लोगों पर आजकल पाश्चात्यों का प्रभाव छाया हुआ है, उनकी मिशनरी भावनाओं से ये प्रभावित हो चले हैं और इसीलिए कहने लगे हैं कि संन्यासियों को बाहर निकलना चाहिए, सामाजिक और राजनैतिक कामों में भाग लेना चाहिए आदि-आदि; परन्तु यह बहुत ही दुःखद भूल है।
संसार का उपकार करने तथा लोक-मानस का उत्थान करने और शिक्षा देने के लिए संन्यासियों को सभामंच पर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
कई संन्यासी ऐसे हैं जो अपने निज के उदाहरण से संसार को शिक्षा देते हैं। उनका अपना जीवन ही उनकी शिक्षा और उपदेशों का मूर्त रूप होता है। उनका मात्र एक दृष्टिपात सहस्रों व्यक्तियों के मानस का उत्थान करता है।
एक संन्यासी दूसरों के लिए ईश्वर-साक्षात्कार का जीता-जागता आश्वासन है। पावन यात्रियों के दर्शन मात्र से असंख्य लोग स्फूर्ति और प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
संन्यासी के विचार-स्पन्दनों को कोई अवरुद्ध नहीं कर सकता। उनके परिशुद्ध तथा प्रबल विचार-स्पन्दन बहुत दूर तक संचार करते, संसार को पावन करते और सहस्रों लोगों के चित्त में प्रवेश करते हैं। इसमें संशय नहीं है।
२. डाक्टर सुझाव दे कर उपचार कर सकते हैं
डाक्टरों को सुझाव देने की विद्या में पारंगत होना आवश्यक है। निष्ठावान्, सहानुभूतिपूर्ण डाक्टर बहुत दुर्लभ हैं। जो डाक्टर सुझाव देने की विद्या नहीं जानते, वे लाभ पहुँचाने की अपेक्षा हानि ही अधिक करते हैं। वे रोगियों को अनावश्यक भय दिखा कर कभी-कभी उन्हें मार भी देते हैं।
किसी को साधारण-सी खाँसी आने लगी तो वे भले आदमी कह देंगे कि तुम्हें तो यक्ष्मा (टी.बी.) हो गया है; तुम्हें भुवाली, वियना या स्विट्जरलैण्ड जाना पड़ेगा; बहुत-सी सूइयाँ (इंजेक्शन) लेनी होंगी आदि। बेचारा रोगी घबड़ा जाता है। वस्तुतः वहाँ यक्ष्मा-जैसी कोई बात नहीं है। रोग अत्यन्त साधारण है। ठण्ढ लगने से जरा खाँसने लगा है। वास्तव में तो डाक्टर के हानिकर सुझाव से भय और चिन्ताग्रस्त होने के कारण ही उसे यक्ष्मा रोग लग जाता है।
डाक्टर को तो कहना चाहिए था कि ‘अरे, यह तो कुछ नहीं है। मामूली ठण्ढ लगी है। कल तक अच्छे हो जाओगे। रेचक औषधि ले लो और नीलगिरि का का तेल छाती पर मल लो। भोजन सुधार लो। यदि एक दिन उपवास कर लो तो और अच्छा है।’ ऐसा डाक्टर भगवान् के समान होता है, वन्दनीय होता है।
इस पर कोई डाक्टर कह सकता है- “यदि मैं ऐसा करने लगूँ तो मेरा धन्धा कैसे चलेगा? संसार में कैसे निर्वाह होगा?” यह भूल है। सत्य की सदा विजय होती है। यदि आप दयावान् होगे और सहानुभूति दिखाओगे, तो लोग आपके पास दौड़े आयेंगे। आपका धन्धा जोरों से चल निकलेगा।
सुझाव में ही उपचार है। यह औषधि-रहित उपचार है। यह सुझावोपचार है। अच्छे और प्रभावकारी सुझाव से कोई भी रोग दूर किया जा सकता है। इस विज्ञान को आपको सीखना चाहिए और इसका उपयोग भी करना चाहिए। सभी डाक्टरों को, चाहे वे होमियोपैथी के हों या एलोपैथी के, आयुर्वेद के हों या यूनानी के, यह विद्या सीख लेनी चाहिए। वे अपनी उपचार पद्धति के साथ इसे मिला सकते हैं। इसके कारण उनका काम निरन्तर बढ़ता जायेगा, उन्नति करता जायेगा।
३. योगियों की विचार-संक्रमण की उपदेश-पद्धति
जो योगी आज सभामंचों पर जा कर जनता का जितना कल्याण-साधन करते हैं, उससे कहीं अधिक कल्याण वे अज्ञात सच्चे योगी करते हैं जो एकान्त में रह कर अपनी आध्यात्मिक और तेजस्वी विचार-तंरगों और तेज को प्रसारित करते हैं। सभाएँ करते फिरने वाले और सभामंच पर से उपदेश देने वाले योगी वस्तुतः द्वितीय श्रेणी के लोग हैं जिन्हें न तो अपने अन्दर निहित अलौकिक शक्तियों और तेज का ज्ञान है और न उनका वे कभी उपयोग ही करते हैं।
बड़े-बड़े सिद्ध पुरुष और महात्मा लोग अपनी विचार-संचरण-शक्ति के द्वारा संसार के कोने-कोने तक योग्य व्यक्तियों तक अपना सन्देश पहुँचाते हैं। सन्देशवाहन के जो अलौकिक साधन हमारी दृष्टि में अत्यन्त दुर्लभ और असाधारण हैं, वे योगियों के लिए बहुत ही सुलभ और साधारण हैं।
४. विचार का औरों पर प्रभाव
किसी प्रकार की श्रव्य वाणी के बिना ही आप दूसरों पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं। इसके लिए संकल्पपूर्वक विचार पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। इसे टेलीपैथी (Telepathy) (विचार-संचरण-शक्ति) कहते हैं।
टेलीपैथी के अभ्यास की एक विधि यहाँ दे रहा हूँ। दूर देश में रहने वाले अपने किसी मित्र या बन्धु के विषय में सोचिए। अपने मनःपटल पर उसके चेहरे का स्पष्ट चित्र अंकित कीजिए। यदि आपके पास उसका कोई चित्र हो, फोटो हो, तो उसके साथ बात कीजिए। श्रव्य शब्दों में बोलिए। जब सोने जाइए, तब पूर्ण एकाग्रता से उस चित्र के विषय में सोचिए। अगले दिन या निकट भविष्य में ही उसका पत्र आपके पास पहुँच जायेगा। वह आपको आकांक्षित पत्र लिखेगा। यह परीक्षा कर देखिए। सन्देह मत कीजिए। इसे देख कर आपको आश्चर्य होगा।
टेलीपैथी का शास्त्र सीख लेने पर जीवन में सफलता ही सफलता है और इस विद्या में विश्वास सुदृढ़ हो जाता है। प्रायः ऐसा होता है कि आप कुछ लिख रहे हैं अथवा कोई समाचार-पत्र या कुछ पढ़ रहे हैं तो तुरन्त आपके मन में किसी की बात याद आ जाती है, किसी घनिष्ठ मित्र या बन्धु के विषय में आप सोचने लग जाते हैं। इसका कारण यही है कि उसने आपके विषय में गम्भीरता से सोचा है, अपना सन्देश आपके पास भेजा है।
विचार-तरंगें प्रकाश और विद्युत् से भी तेज गति से दौड़ती हैं। इस तरह से उन सन्देशों को हमारा अवचेतन मन ग्रहण कर लेता है और चेतन मन तक पहुँचा देता है।
५. विचार-शक्ति के विविध उपयोग
विचार-शक्ति का शास्त्र बड़ा रोचक है, बड़ा सूक्ष्म है। भौतिक सृष्टि की तुलना में यह विचार-सृष्टि अधिक वास्तविक है।
विचार की शक्ति अत्यन्त महान् है। आपका प्रत्येक विचार किसी-न-किसी रूप में आपके लिए अक्षरशः मूल्य रखता है। आपके शरीर का बल, आपका मनोबल, जीवन में आपकी सफलता, आपका आनन्द और आपकी संगति में दूसरों को प्राप्त होने वाला आनन्द-यह सब-का-सब आपके विचारों के स्वरूप और गुणों पर निर्भर है। विचार-संस्कार की विधि आपको जान लेनी चाहिए और अपनी विचार-शक्ति का संवर्धन करना चाहिए।
६. विचार-शक्ति का मूल्य
यदि आप ठीक से जान लें कि विचार-स्पन्दन किस प्रकार काम करता है, यदि आप समझ लें कि विचारों के नियमन की पद्धति क्या है, यदि आप सीख लें कि विचारों को स्पष्ट सुनिश्चित शक्तिशाली विचार-तरंगों के रूप में दूरस्थ व्यक्तियों तक कैसे प्रेषित किया जाता है, तो सहस्रगुना अधिक सफलता के साथ विचार-शक्ति का उपयोग आप कर सकेंगे। विचार-शक्ति चमत्कारी है।
गलत विचार बन्धनकारक है। यही विचार मोक्षकारी है। अतः सही विचार करो और मुक्ति प्राप्त करो। चित्त-शक्ति को जान लो तथा अनुभव कर लो और अपने अन्दर छिपी हुई रहस्यमयी शक्ति को उद्घाटित करो।
आँखें बन्द कर लो। धीरे-धीरे धारणा करो। दूर-दूर के पदार्थों को देख सकोगे, दूर-दूर का शब्द सुन सकोगे। संसार के ही नहीं वरंच दूसरे ग्रहों के भी किसी भी भाग में अपना सन्देश भेज सकोगे। दूर बैठे सहस्रों मील दूर रहने वाले रोगी का उपचार कर सकोगे और दूर-दूर तक तत्क्षण पहुँच जाओगे।
चित्त-शक्ति पर विश्वास करो। रुचि हो, अवधान हो, इच्छा हो, श्रद्धा हो और एकाग्रता हो तो वांछित फल अवश्य मिलेगा। स्मरण रहे कि यह चित्त तो माया के द्वारा आत्मा से ही उत्पन्न हुआ है।
७. विचार महान् कार्य-साधक हैं
आप जहाँ हैं वहीं से अपने मित्र के संकट के समय अपने सान्त्वनादायक विचारों के द्वारा उसकी सहायता कर सकते हैं। मित्र को उसके सत्यशोधन में आप अपने विचारों से और अपने ज्ञात स्पष्ट और निश्चित सत्य से सहायता दे सकते हैं।
आप अपने विचार अनन्त मनोजगत् में प्रेषित कर सकते हैं, जो सभी संवेद्य व्यक्तियों तक पहुँच कर उनका उत्थान कर सकते हैं, उन्हें पावन कर सकते हैं और प्रेरणा दे सकते हैं।
यदि आप अपने स्थान से किसी दूसरे स्थान को प्रेमपूर्ण और सहायक विचार किसी अन्य व्यक्ति के पास भेजते हैं तो वह आपके मस्तिष्क से निकल कर सीधे उस व्यक्ति के पास पहुँचता है, उसके मन में भी वैसे ही विचार जाग्रत करता है और द्विगुणित शक्ति के साथ आपके पास लौट आता है।
यदि आप दूसरे के पास घृणा और द्वेष के विचार भेजते हैं तो वे उसे दुःखी करेंगे और द्विगुणित शक्ति के साथ लौट कर आपको भी दुःख देंगे।
इसलिए विचार के नियमों को जान लीजिए और अपने में दया, प्रेम तथा करुणा के सद्विचारों को जगाइए और सर्वदा प्रसन्न रहिए।
यदि किसी के पास उसकी सहायता के लिए आप कोई उपयोगी विचार भेजते हैं तो वह निश्चित, विधायक और सोद्देश्य होना चाहिए। तभी वह अभीष्ट परिणाम लायेगा, सफल होगा।
८. प्रेरक विचार
सुझाव की तथा मन पर होने वाले उसके प्रभावों की सही-सही जानकारी कर लीजिए। किसी को परामर्श देते समय पूरे सावधान रहिए। किसी को ऐसा परामर्श न दीजिए जिससे किसी की भी हानि होती हो, ऐसा परामर्श देने से आप उसका बहुत बड़ा अकल्याण तथा अहित करेंगे। सर्वदा मुँह से कुछ बोलने से पहले सोच-विचार कर लीजिए।
शिक्षकों और अध्यापकों को परामर्श तथा आत्म-संकेत-विज्ञान को भली-भाँति समझ लेना चाहिए। तभी वे अपने छात्रों को दक्षतापूर्वक शिक्षण दे सकेंगे और उनकी उन्नति कर सकेंगे।
दक्षिण में रोते बच्चों को चुप करने के लिए अक्सर माता-पिता यही कहा करते हैं कि ‘देखो, हाबू आया (दो आँखों वाला आ गया)। चुप हो जा, नहीं तो तुम्हें उसके हाथों पकड़ा दूँगा’, ‘भूत आ गया’ आदि। ऐसी सब बातें बड़ी आपत्तिजनक होती हैं। इससे बच्चे कायर हो जाते हैं।
बच्चों का मन बड़ा कोमल, ग्रहणशील और संस्कारक्षम होता है। उस आयु में पड़ने वाले संस्कार अमिट होते हैं। बड़े हो जाने के बाद इन बाल्यकाल के संस्कारों को बदलना या मिटाना सरल नहीं होता। इस भाँति भय के वातावरण में पले शिशु बड़े होने पर बहुत ही डरपोक और कायर बनते हैं।
बच्चों के मन में सदा साहस और उत्साह भरना चाहिए। उनसे कहना चाहिए, ‘यह शेर देखो। चित्र में कैसे खड़ा है। तुझे भी उसकी तरह बहादुर बनना चाहिए, उसी की तरह दहाड़ना चाहिए। शिवाजी, अर्जुन तथा क्लाइव का चित्र देखो। तुझे भी वैसा ही पराक्रमी और शूर बनना चाहिए।’
पाश्चात्य देशों में शिक्षक छात्रों को युद्ध के चित्र दिखाया करते हैं और कहते हैं- ‘यह देख जेम्स! नेपोलियन का यह चित्र देख ! देख, कैसा बहादुर है! तू भी बड़ा हो कर बड़ा सेनापति बनना।’ इससे बच्चों के मन में बचपन से ही वीरता की वृत्ति पनपने लगती है। बड़े होने पर उनके ये संस्कार बाह्य प्रोत्साहन पा कर और भी अधिक बलवान् होते हैं।
९. विचार संचारित करना सीखें
टेलीपैथी का अभ्यास आरम्भ में निकट से करो। प्रारम्भ करने की दृष्टि से रात्रि के समय अभ्यास करना अधिक उपयुक्त रहेगा।
अपने मित्र से कहो कि ठीक दश बजे एकाग्र हो कर विचार-ग्रहण करने की मनोभूमिका बनाये। उससे कहो कि अँधेरे कमरे में वज्रासन या पद्मासन लगा कर आँखें बन्द करके बैठ जाये।
ठीक निर्धारित समय पर आप अपने यहाँ से उसे सन्देश भेजने का प्रयत्न करो। जो सन्देश भेजना चाहो, उस पर मन को केन्द्रित करो। अब जोरों से उसका संकल्प करो। विचार आपके मस्तिष्क से निकल कर आपके मित्र के मस्तिष्क में प्रवेश करेंगे।
आरम्भ में कहीं-कहीं कोई भूल रह सकती है। ज्यों-ज्यों अभ्यास बढ़ाओगे और उसकी प्रक्रिया को ठीक से समझ लोगे, फिर सदा सन्देश ठीक से भेज सकोगे और ग्रहण भी कर सकोगे।
कालान्तर में आप संसार के किसी भी भाग में अपना सन्देश भेजने में सक्षम हो जाओगे। विचार-तरंगों की शक्ति और दृढ़ता भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। भेजने वाले और ग्रहण करने वाले दोनों को बड़ी दृढ़ता के साथ एकाग्रता का अभ्यास करना होता है। तब पूरी शक्ति से सन्देश भेज सकोगे और स्पष्टता के साथ यथातथ रूप से सन्देश ग्रहण भी कर सकोगे। प्रारम्भ में घर के अन्दर ही एक कमरे से दूसरे कमरे तक टेलीपैथी का अभ्यास करें।
यह विद्या बड़ी मनोरंजक है। इसके लिए धैर्य के साथ अभ्यास करने की आवश्यकता है। ब्रह्मचर्य बहुत आवश्यक है।
१०. परामनोविज्ञान और अवचेतन मन
पावन गंगा हिमालय की गंगोत्तरी से आविर्भूत होती है और अविराम गति से गंगासागर की ओर प्रवाहित होती रहती है, उसी प्रकार विचार प्रवाह भी संस्कारों के नितल में जन्म लेते हैं जो मन के आन्तर स्तरों में सुप्त हैं, जहाँ सूक्ष्म वासनाएँ दबी पड़ी हैं और जागृति तथा स्वप्न दोनों अवस्थाओं में अविश्रान्त रूप से विषयों की ओर दौड़ते रहते हैं। रेल का इंजन जब सीमा से अधिक गरम हो जाता है, तब ठण्ढा होने के लिए छादक (Shed) में भेज दिया जाता है, जहाँ वह आराम से रह कर पूर्व-स्थिति प्राप्त करता है, किन्तु मन का यह रहस्यमय इंजन पल-भर भी आराम किये बिना निरन्तर विचार में संलग्न रहता है।
टेलीपैथी का अभ्यास, विचार-वाचन, इन्द्रजाल, सम्मोहन और चैतसिक उपचार इन सबसे सिद्ध होता है कि मन का अस्तित्व है और एक उन्नत मन निचले मन पर अपना प्रभाव डाल सकता है और उसे अपने अधीन कर सकता है। स्वयंचालित लेखन तथा सम्मोहन से प्रभावित मनुष्य को देखने से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य में एक अवचेतन मन भी है जो चौबीसों घण्टे अविश्रान्त काम करता रहता है। आध्यात्मिक साधना द्वारा उस अवचेतन मन के विचार को रूपान्तरित कर डालो और मन को मोड़ दो और नया मानव बनो।
११. तेजस्वी दिव्य विचारों की शक्ति
विचार ही जीवन है। जैसा सोचेगे, वैसा ही आपके व्यक्तित्व का गठन होगा। आपके विचार ही आपका वातावरण बनाते हैं। आपके विचार ही आपके संसार की रचना करते हैं। स्वस्थ विचार किया करोगे तो स्वस्थ रहोगे। यदि मन में रुग्णता के विचार, रुग्ण स्नायु-जाल के विचार, दुर्बल चेता का विचार, अन्तस्त्य अंगों के सुचारु रूप से संचालन न करने का विचार बनाये रखोगे तो आप अच्छे स्वास्थ्य, सौन्दर्य और समाधान की कभी अपेक्षा नहीं रख सकते हो।
याद रखो कि यह शरीर मन से बना है और मन के ही अधीन है।
यदि तेजस्वी विचार करते रहोगे तो शरीर भी तेजस्वी होगा। प्रेम, शान्ति, सन्तोष, पवित्रता, पूर्णता और दिव्यता के विचार आपको तथा आपके आस-पास के लोगों को भी पूर्ण और दिव्य बना देंगे। इसलिए दिव्य विचारों का अर्जन करो।