चतुर्थ अध्याय
विचार-शक्ति के कार्य
१. विचार स्वास्थ्य-संवर्धक है
शरीर अन्दर से मन से सम्बन्धित है; बल्कि यही कहना ठीक होगा कि शरीर मन का ही प्रतिरूप है, अगोचर सूक्ष्म मन का यह गोचर स्थूल रूप है। दाँत में, पेट में या कान में कहीं जरा-सा कष्ट हुआ कि फौरन मन उससे प्रभावित होता है। वह ठीक से सोच नहीं पाता; चिन्तित, क्षुब्ध और अशान्त हो जाता है।
जब मन उद्विग्न हो जाता है, तब शरीर भी ठीक से काम नहीं कर पाता। शरीर को क्लेशित करने वाली पीड़ाएँ ‘व्याधि’ कहलाती हैं तथा मन को क्लेशित करने वाली वासनाओं को ‘आधि’ नाम से अभिहित किया जाता है।
शारीरिक स्वास्थ्य की अपेक्षा मानसिक स्वास्थ्य अधिक आवश्यक है।
मन स्वस्थ रहा तो शरीर भी अवश्य स्वस्थ रहेगा। मन पवित्र रहा, विचार शुद्ध रहे तो सभी प्रकार की आधि और व्याधि से मुक्त रहोगे। फिर स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहेगा।
२. विचारों से व्यक्तित्व-निर्माण
उदात्त विचारों से मन उन्नत और हृदय विशाल होता है। असद् विचार से मन उत्तेजित होता है तथा भावनाएँ दूषित और स्थूल होती हैं। जिनमें विचार और वाणी का नियमन करने की अल्प-सी भी शक्ति है उनका चेहरा शान्त, गम्भीर, सुन्दर और आकर्षक रहेगा, उनकी वाणी मधुर होगी और उनकी आँखें उज्ज्वल और कान्तियुक्त होंगी।
३. शरीर पर विचारों का प्रभाव
प्रत्येक विचार, प्रत्येक भावना अथवा प्रत्येक शब्द शरीर के कोषों में प्रबल स्पन्दन पैदा करता है और उसका संस्कार गहरा पड़ता है।
विपरीत विचार जगाने की पद्धति आप जान लो तो आपका जीवन सुखी, समाधानपूर्ण, शान्त और शक्तियुक्त होगा। प्रेम का विचार तुरन्त द्वेष के विचार को निष्फल बना देता है। साहस और वीरता का विचार भयग्रस्त विचारों पर तत्काल रामबाण औषध का काम करता है।
४. विचार-शक्ति भाग्य विधाता है
मनुष्य विचार का बीज बोता है और कृति-रूपी फल पाता है। कृति-रूपी बीज बोता है और अभ्यास-रूपी फल पाता है। अभ्यास-रूपी बीज बोता है और चारित्र्य-रूपी फल पाता है। चारित्र्य-रूपी बीज बोता है और भाग्य-रूपी फल पाता है।
मनुष्य अपने विचारों और कृतियों से स्वयं अपना भाग्य निर्माण करता है। वह अपना भाग्य बदल सकता है। इसमें कोई शंका नहीं है कि वह अपने भाग्य का स्वामी है। सद्विचारों और प्रबल पुरुषार्थ से वह अपने भाग्य का स्वामी बन सकता है।
कुछ मूढ़ जन कहते हैं- ‘कर्म ही सब-कुछ है। कर्म ही भाग्य है। यह कर्म-विधान है कि आज मैं इस हालत में पड़ा हूँ। फिर मैं क्यों प्रयत्न के झंझट में पहुँ? यह तो मेरा भाग्य ही है।’
यह भाग्यवाद है। इससे अकर्मण्यता, जड़ता और दुःख बढ़ते हैं। इसमें कर्म-सिद्धान्त का नितान्त अज्ञान है। यह एक भ्रान्तिकारी तर्क है। विवेकी मनुष्य कभी ऐसा प्रश्न नहीं पूछेगा। आप ही ने अपने विचारों और अपनी कृतियों के द्वारा अपना भाग्य बनाया है।
अभी भी चुनने की पूरी छूट आपको है। कृति-स्वातन्त्र्य आपको है। दुर्जन हमेशा के लिए दुर्जन नहीं होता। उसे सन्त जनों की संगति में रहने दो। समय पर वह बदल जायेगा। तब वह दूसरे प्रकार से सोचने और दूसरे ही ढंग से काम करने लगेगा। उसका स्वभाव बदल जायेगा। वह सन्त बन जायेगा।
डाकू रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि बन गया। जगाई और मधाई बदल गये। ये दोनों निम्नतम कोटि के दुष्ट थे। आप चाहें तो ज्ञानी या योगी बन सकते हैं। आप अपना भाग्य बना सकते हैं। आप स्वेच्छा से अपना कर्म चाहे जैसा कर सकते हैं। विचार-शक्ति का उपयोग कीजिए। सम्यक् विचार करें, उदात्त विचार करें। आपको केवल विचार करना है, केवल कृति करनी है। सम्यक् विचार, सम्यक् आकांक्षा और सम्यक् कृति से आप योगी बन सकते हैं, चाहें तो लखपति बन सकते हैं। सद्विचार और सत्कर्म द्वारा आप इन्द्र-पदवी प्राप्त कर सकते हैं, चाहें तो ब्रह्मलोक पा सकते हैं। मनुष्य असहाय प्राणी नहीं है। उसके पास स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति है।
५. मानसिक अव्यवस्था का कारण : विचार
हमारे प्रत्येक विचार-परिवर्तन से मनोदेह में स्पन्दन निर्माण होता है और जब वह भौतिक शरीर में प्रसारित होता है तब दिमाग की विभिन्न नाड़ियों में सक्रियता पैदा होती है। इस सक्रियता के कारण उन कोषों में अनेक वैद्युतिक और रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं। इन सभी परिवर्तनों का मूल कारण विचार-तंरग है।
अत्यन्त उद्वेग, द्वेष, दीर्घकालिक कट्टर मत्सर, संक्षारक चिन्ता, भयंकर क्रोधावेश इन सबसे शरीर के कोष उद्ध्वस्त हो जाते हैं, जिसके परिणाम-स्वरूप हृदय, यकृत, गुर्दे, फुप्फुस और पेट की बीमारियाँ होती हैं।
यह ध्यान रखना बहुत उपयोगी है कि शरीर में स्थिर समस्त कोषों का बनना-बिगड़ना, प्राणवान् बनना या निष्प्राण बनना सब मन में प्रवेश करने वाले विचारों पर निर्भर है और यह निश्चित है कि हम जैसा सोचते हैं, उसी के अनुरूप हम बनते हैं।
जब मन अमुक एक विचार की ओर मुड़ता है और उसी में रमता है, तब उसमें से एक निश्चित स्पन्दन निर्माण होता है और अक्सर जब यह स्पन्दन पुनः पुनः होने लगता है तो उसकी आदत सी पड़ जाती है, फिर अपने-आप चलने लगता है। तब शरीर उसका अनुगामी बनता है और उसमें परिवर्तन होने लगते हैं। यदि हम विचारों पर एकाग्रता साध लें तो हमारी दृष्टि स्थिर हो जाती है।
६. वातावरण-निर्माता : विचार
प्रायः कहा जाता है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का परिणाम है। यह वास्तविक नहीं है। इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि सर्वदा का अनुभव इसके विपरीत है। संसार के अधिकांश महापुरुष दारिद्र्य और प्रतिकूल परिस्थितियों में ही पले हैं।
कई तो ऐसे हैं जिन्होंने गन्दी बस्तियों और घृणित प्रदेशों में जन्म लिया, परन्तु संसार के उच्चतम स्थान में पहुँच गये। वे विश्वविख्यात हुए, उच्चकोटि के राजनीतिज्ञ, साहित्यकार और कवि हुए तथा अत्यन्त प्रतिभावान् और संसार के दीप-स्तम्भ बने । यह सब कैसे हुआ?
सर टी. मुत्तुस्वामि अय्यर ने जो मद्रास के उच्चन्यायालय के प्रथम भारतीय जज थे, उन्होंने एकदम गरीब परिवार में जन्म लिया। रात को उन्हें सड़क की बत्ती के नीचे पढ़ना पड़ा। भरपेट खाने को नहीं मिलता था। तन ढकने के लिए पर्याप्त कपड़ा नहीं था। उन्होंने कठोर संघर्ष किया और महान् बने। उन्होंने अपनी विपरीत परिस्थितियों से जूझते-जूझते अपने मनोबल और लौह संकल्प-शक्ति के द्वारा उन्नति की।
पश्चिम में ऐसे कई मछुआरों और चमारों के बच्चे अत्युन्नत पद पर पहुँच गये। जो बच्चे सड़कों पर बूट पालिश करते थे, होटलों में शराब बेचते थे और खाना पकाते थे, वे ही महान् कवि और योग्य पत्रकार बन गये।
जानसन की परिस्थिति अत्यन्त प्रतिकूल थी। गोल्डस्मिथ ‘साल-भर में ४० पाउण्ड कमाने वाला धनी’ था। सर वाल्टर स्काट जन्मजात दरिद्र था। उसे रहने को स्थान नहीं था। जैम्स रैम्जे मैक्डोनाल्ड का जीवन तो उल्लेखनीय है। वह बड़ा पुरुषार्थी था। नितान्त दारिद्रय से वह अत्युच्च अधिकार पर जा पहुँचा। श्रमिक वर्ग से उन्नति कर वह प्रधानमन्त्री बना। आरम्भ में उसने लिफाफे पर पते लिखने का काम किया था जिससे सप्ताह भर में दश शिलिंग कमायी होती थी।
वह इतना निर्धन था कि चाय नहीं खरीद सकता था, केवल पानी पी कर रहता था। कई महीनों तक दिन-भर में केवल तीन पेन्स का भुना हुआ मांस का टुकड़ा खा कर वह निर्वाह करता रहा। वह छात्राध्यापक था। राजनीति और विज्ञान में उसने विशेष रुचि ली। वह एक पत्रकार था। सम्यक् पुरुषार्थ करते-करते प्रधानमन्त्री के पद तक उसने उन्नति की।
श्री शंकराचार्य, जो कि अद्वैतदर्शन के महान् व्याख्याता हैं, आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रचण्ड पुरुष हैं, अद्वितीय प्रतिभासम्पन्न हैं, एक निपट दरिद्र परिवार में जन्मे, सर्वथा अभावग्रस्त प्रतिकूल परिस्थितियों में पले और विपरीत वातावरण में ही बड़े हुए। इस प्रकार के सहस्रों निदर्शन मिलते हैं।
इससे यह स्पष्ट है कि चाहे जितनी प्रतिकूल परिस्थिति क्यों न हो, वह मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिभा और महत्ता को तथा उसके उज्ज्वल भविष्य को नष्ट नहीं कर सकती, कुण्ठित नहीं कर सकती। प्रत्येक मनुष्य धैर्य से, अध्यवसाय से, सच्चाई और ईमानदारी से, पूर्ण हार्दिकता से अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा रखते हुए प्रबल संकल्प और दृढ़ निश्चय से प्रयत्न करे तो चाहे जैसी परिस्थिति में रह कर भी उन्नति कर सकता है, ऊँचा उठ सकता है।
प्रत्येक मनुष्य अपने संस्कारों के साथ जन्म लेता है। चित्त ‘कोरा कागज’ नहीं है। उस पर विगत जन्म के विचार और कृतियों के संस्कार अंकित रहते हैं। संस्कार अत्यन्त बलवान् होते हैं। सत्संस्कार मनुष्य की अमूल्य सम्पत्ति है। भले ही मनुष्य प्रतिकूल परिस्थितियों में पड़ गया हो, फिर भी ये संस्कार उसे अवांछित और विकृत दुष्प्रभावों से बचाते हैं तथा उसकी उन्नति और विकास में सहायक होते हैं।
कोई भी सुअवसर हाथ से जाने न दो। सभी अवसरों का सदुपयोग करो। प्रत्येक अवसर आपके उत्थान और विकास के लिए आता है। मार्ग में कोई बीमार असहायावस्था में पड़ा मिले तो उसे बाँहों में ले लो, निकटस्थ किसी अस्पताल तक पहुँचा दो। उसकी सेवा करो। दूध पिलाओ, चाय या काफी दो, उसके पैर दबाओ। उसे ईश्वर समझ कर यह सारी सेवा करो।
उसमें बसे हुए सर्वव्यापी सर्वान्तर्वासी, अन्तर्यामी, सर्वानुप्रविष्ट परमेश्वर के दर्शन करो। उसके विभापूर्ण नेत्रों में, उसके क्रन्दन में, उसकी साँस में, उसकी नाड़ी के स्पन्दन में और सीने की धड़कन में दिव्यता के दर्शन करो।
भगवान् ने आपको यह अवसर इसीलिए दिया है कि आप अपनी करुणा और प्रेमभाव बढ़ा सको, अपना चित्त शुद्ध कर सको, घृणा मिटा सको, द्वेष और ईर्ष्या को हटा सको। यदि आप भीरू हो तो कभी-कभी भगवान् आपके आगे ऐसी परिस्थिति रख देगा, जहाँ आपको साहस दिखाना पड़े और अपने प्राणों को खतरे में डाल कर अपनी सूझ का परिचय देना पड़े। जितनी भी विश्व-विभूतियाँ हैं, जागतिक ख्याति के महापुरुष हैं, वे अपने जीवन में प्राप्त प्रत्येक अवसर का सदुपयोग करके ही महान् हुए। भगवान् सुयोग दे कर मनुष्य को आकार दिया करता है, उसके मन को तराशता है।
याद रखो, आपकी दुर्बलता के पीछे बड़ी शक्ति है; क्योंकि आप सदा विपत्ति से बचने के लिए सजग रहते हो। निर्धनता के अपने गुण हैं। निर्धनता से नग्नता, शक्ति, धैर्य, सहिष्णुता आदि गुण बढ़ते हैं और विलास से आलस्य, अहंकार, दौर्बल्य, निष्क्रियता तथा नाना प्रकार की बुरी आदतें पड़ती हैं।
इसलिए प्रतिकूल परिस्थिति देख कर दुःख मत करो। अपने मन से अपना ही विश्व और अपना ही वातावरण रचो । जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों और प्रतिकूल अवस्थाओं में आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है, वह वास्तव में बड़ा बलशाली है। उसे कोई हिला नहीं सकता। वह लौह पुरुष होगा। उसकी रग-रग मजबूत होगी, नस-नस शक्तिशाली होगी।
मनुष्य परिस्थितियों अथवा वातावरण का दास नहीं है। वह अपनी शक्ति, सामर्थ्य, क्षमता, सच्चारित्र्य, सद्विचार, सत्कार्य और सत्पुरुषार्थ से उनका नियमन कर सकता है अथवा उन्हें बदल सकता है। तीव्र पुरुषार्थ तो भाग्य को भी बदल सकता है। यही कारण है कि महर्षि वसिष्ठ और भीष्म ने भाग्य से बड़ा स्थान पुरुषार्थ को दिया; इसलिए भाइयो, पुरुषार्थी बनें, प्रकृति पर विजय प्राप्त करें और सच्चिदानन्द परमात्मा में आनन्द भोगें।
७. विचार : देह का रचयिता
यह शरीर और इसके ये सारे अंग विचार के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। चित्त शरीर का चिन्तन करने लगता है तो शरीर का निर्माण होता है, फिर वह उसी में जा बसता है, उसी से आवृत रहता है।
यह शरीर मन का ही बना हुआ ढाँचा है, जो उसने अपने आनन्द के लिए, अपनी शक्ति को चरितार्थ करने के लिए और शरीरगत पाँचों ज्ञानस्रोतों द्वारा-ज्ञानेन्द्रियों द्वारा-विश्व के विभिन्न अनुभव प्राप्त करने के लिए बनाया है। वस्तुतः यह शरीर तो हमारे विचार, वृत्तियों, धारणाओं और भावनाओं का साकार रूप है, चर्मचक्षु द्वारा ग्राह्य स्वरूप है।
प्रत्येक शरीर का स्थान मन में ही है। क्या जल के बिना उपवन पनप सकता है?
मन ही शरीर का समस्त व्यवहार करने वाला साधन है और वह सबसे बड़ा है। यह स्थूल शरीर एक बार मिट्टी में मिल सकता है, लेकिन मन तुरन्त ही दूसरा एक शरीर अपने लिए गढ़ लेता है। मन यदि स्तब्ध हो जाये, तो यह शरीर हमारी प्रज्ञा को प्रकट नहीं कर पायेगा।
संसार के अधिकांश लोगों का विचार उनके शरीर के अधीन हो गया है। उनका चित्त बहुत अल्प विकसित है। वे बहुधा अन्नमय कोश में जीते हैं। इसलिए आप विज्ञानमय-कोश का विकास करें और विज्ञानमय कोश (बुद्धि) के द्वारा मनोमय-कोश (मन) को नियन्त्रित करें।
आपके मन में ये जो विकृत विचार हैं कि आप शरीर हैं, वे ही सारी बुराइयों के मूल कारण हैं। आप गलत विचारों द्वारा शरीर से आत्मभाव पैदा करते हैं। आपमें देहाध्यास जागता है। शरीर से आप आसक्त हैं। यह ‘अभिमान’ है। इससे ‘ममता’ (मेरापन) पैदा होती है। आप अपना सम्बन्ध पत्नी, पुत्र, गृह आदि से जोड़ते हैं। यह सम्बन्ध और यह आसक्ति ही आपके बन्धन का, दुःख का और कष्टों का मूल कारण है।