षष्ठ अध्याय
विचार : उनके प्रकार तथा उन पर विजय
१. धूमिल विचारों से ऊपर उठो
अपने सभी विचारों का सावधानी के साथ ध्यान रखो। मान लो आपके विचार धूमिल हो गये हैं, आप उदासी अनुभव करते हो तो प्याला-भर दूध या चाय लो। शान्ति से बैठो। अपनी आँखें मूँद लो। उदासी का कारण खोजो और उसे दूर करने का प्रयत्न करो।
धूमिल विचारों और उदासी पर विजय पाने का सर्वोत्तम उपाय है कि स्फूर्तिदायी विचारों तथा स्फूर्तिदायी वस्तुओं का विचार किया जाये। पुनः याद रखो, दुर्वृत्ति को दूर करने का उपाय सवृत्ति है। यह निसर्ग का बड़ा प्रभावशाली उदात्त नियम है।
अब जोरों से विपरीत विचार करना आरम्भ करो, उदासी के विरोधी गुणों का चिन्तन करो। अपने मन को ऊँचा उठाने वाली बातें सोचो, प्रसन्नता की बातों पर विचार करो। प्रसन्नता के परिणामों पर सोचो। यह अनुभव करो कि आप वस्तुतः उस गुण से युक्त हो।
बार-बार मन में यह सूत्र दोहराओ : ‘ॐ प्रसन्नता।’ अनुभव करो- ‘मैं प्रसन्न हूँ।’ मुस्कराना प्रारम्भ करो। हँसो, बार-बार हँसो।
गाओ। कभी-कभी इससे आपकी उदासी दूर होगी। गायन उदासी दूर करने का बड़ा लाभदायी उपाय है। जोर-जोर से कई बार ॐ का जप करो। खुली हवा में दौड़ो। उदासी मिट जायेगी। यह राजयोगियों की ‘प्रतिपक्ष-भावना’ की पद्धति है। यह सरलतम उपाय है।
अधिकार से, संकल्प से, निश्चय से तथा आज्ञा से उदासी को दूर करने में इच्छा-शक्ति पर बहुत जोर पड़ता है, यद्यपि यह बड़ा शक्तिशाली उपाय है। इसके लिए बहुत बड़ी संकल्प-शक्ति की आवश्यकता होती है। साधारण मनुष्य इसमें सफल नहीं होंगे। प्रतिपक्ष-भावना के उपाय, गलत विचारों की जगह सही विचार ला कर उन्हें दूर करने का उपाय बहुत सरल है। अत्यन्त शीघ्र अवांछित विचार दूर हो जाते हैं। इसका अभ्यास और अनुभव करो। कई बार विफल होने पर भी चलते रहो। कई बार बैठने से, कुछ अभ्यास करने से सफल हो जाओगे।
इसी प्रकार अन्यान्य विरोधी भावनाओं और विचारों को भी हटा सकते हो। क्रोध की भावना आती है तो प्रेम की बात सोचो। यदि ईर्ष्या की भावना है तो उदारता और दयालुता की बात सोचो। यदि उदासी है तो कोई स्फूर्तिदायी दृश्य याद करो जिसे कभी देखा हो या प्रेरणादायी कोई घटना पुनः स्मरण करो।
यदि हृदय में कठोरता जागे तो दया की बात सोचो। काम-वासना यदि आये तो ब्रह्मचर्य का गुण-स्मरण करो। यदि कहीं कोई बेईमानी है तो ईमानदारी तथा पवित्रता की बात सोचो। यदि कृपणता आये तो उदारता और उदार व्यक्तियों के बारे में सोचो।
यदि चित्त पर मोह छा रहा है तो विवेक और आत्म-विचार करो; गर्व यदि हो तो नम्रता की बात सोचो। ढोंग का विचार आता है तो स्पष्टता तथा उसके अल्प लाभों की बात सोचो। यदि ईर्ष्या होती हो तो उदारता और सहृदयता का विचार करो। कायरता या भीरुता यदि आती हो तो हिम्मत और पराक्रम का विचार करो।
इस प्रकार असद्विचार निर्मूल हो जायेंगे और सद्विचार और सद्भावना रूढ़ होगी। सातत्य बहुत आवश्यक है। साथियों का चुनाव भी सतर्कता के साथ करो। बहुत कम बोलो और वह भी जितना आवश्यक हो, उतना ही।
२. फालतू विचारों पर विजय
विचारों पर वश प्राप्त करने में आप प्रारम्भ में बहुत कठिनाई अनुभव करोगे। आपको उनसे संघर्ष करना पड़ेगा। वे भी अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए बहुत प्रयत्न करेंगे। वे कहेंगे- “इस चित्त में बने रहने का हमको भी अधिकार है। बहुत पहले से हमारा यहाँ एकाधिकार रहा है। यह साम्राज्य अब हम क्यों छोड़ें? हम अपने जन्मसिद्ध अधिकार के लिए अन्त तक लड़ेंगे।”
वे आपको बड़े संकट में डाल देंगे। जब आप ध्यान के लिए बैठेंगे तब हर प्रकार के पाप-विचार ही उठ खड़े होंगे। जैसे ही आप उन्हें दबाने का प्रयत्न करेंगे, वे दूने जोर तथा शक्ति से आप पर प्रत्याक्रमण करेंगे; किन्तु सद्वृत्तियाँ हमेशा असवृत्तियों पर विजय प्राप्त करती हैं।
जिस प्रकार सूर्य के आगे अन्धकार टिक नहीं सकता, जिस प्रकार सिंह के आगे तेन्दुआ ठहर नहीं सकता, उसी प्रकार ये सब घनी असद्वृत्तियाँ- अगोचर, घुसपैठिये, शान्ति के शत्रु-उदात्त और ईश्वरीय विचारों के आगे खड़ी नहीं रह सकतीं। वे अपनी मौत मरेंगी।
३. घृणित विचारों को हटाओ
अपने मन से समस्त अनावश्यक, अवांछित और घृणित विचारों को हटाओ। अनावश्यक विचार आध्यात्मिक उन्नति में बड़े बाधक हैं। घृणित विचार आध्यात्मिक प्रगति में अवरोध पैदा करने वाले हैं।
जब भी आप अनुपयोगी विचारों का सत्कार करते हैं तब आप परमेश्वर से बहुत दूर होते हैं। उनके बदले ईश्वर का चिन्तन कीजिए। जो सहायक और उपयोगी हों, ऐसे ही विचार मन में लायें। आध्यात्मिक उन्नति और प्रगति में उपयोगी विचार प्राथमिक सीढ़ी के समान हैं।
मन को पुरानी लकीर पर भागने न दीजिए और अपना स्वयं का मार्ग तथा आदतें निर्धारित कीजिए। उन पर कड़ा पहरा रखिए।
जूते में अगर एक भी कंकड़ गड़ने लगे तो हम उसे निकाल देते हैं। जूता खोल कर हिलाते हैं। जब एक बार बात स्पष्ट हो गयी, तब ऐसे अनावश्यक दुष्ट विचारों को मन से निकाल बाहर करना आसान हो जाता है। इसमें संशय या मतभेद नहीं हो सकता। बात स्पष्ट है, अचूक और अनिवार्य है।
मन से दुष्ट विचारों को झाड़ कर निकाल फेंकना उतना ही सरल है, जितना जूते से कंकड़ झाड़ देना और मनुष्य जब तक यह नहीं कर लेता, तब तक आत्मोन्नति की बात करना या प्रकृति पर विजय पाने की बात करना प्रलाप मात्र है। वह तो उस शैतान का बुरी तरह दास तथा शिकार है जो उसी के मस्तिष्क में प्रवेश किये बैठा है।
४. सांसारिक विचारों पर विजय पाओ
विचार-संस्कार का नया जीवन प्रारम्भ करते हैं आप पर सांसारिक विचार आक्रमण करेंगे और बहुत कष्ट देंगे। जब भी आप ध्यान के लिए बैठेंगे और आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़ेंगे, वे तुरन्त आपको उद्विग्न बनायेंगे; किन्तु आप यदि अपने ध्यान और आध्यात्मिक साधना में दृढ़ रहेंगे तो वे सारे विचार शनैः शनैः अपनी मौत मरने लगेंगे।
ध्यान इन विचारों को भस्म करने की अग्नि है। समस्त सांसारिक विचारों को निकाल देने का प्रयत्न न कीजिए। ध्येय के अनुकूल जितने भी सद्विचार हैं, उनका स्वागत कीजिए। उत्तम विषयों पर विचार कीजिए।
अपने चित्त का सर्वदा बड़ी सावधानीपूर्वक निरीक्षण कीजिए। सजग रहिए। सावधान रहिए। मन में उत्तेजना, ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष, घृणा, वासना आदि असद्वृत्तियों की तरंगें उठने न दीजिए। ये सब दुष्ट तरंगें और तथाविध सांसारिक विचार ध्यान, शान्ति और ज्ञान के शत्रु हैं।
ईश्वरीय सद्विचारों के प्रश्रय द्वारा उन्हें तुरन्त दबाइए। मन में उत्पन्न दुष्ट सांसारिक विचारों को जीतने के लिए व्यवस्थित सद्विचार कीजिए या भगवान् के किसी नाम या मन्त्र का जप कीजिए। ईश्वर के किसी रूप का चिन्तन कीजिए। प्राणायाम कीजिए। भगवान् का गुणगान कीजिए। सत्कार्य कीजिए या सांसारिक विचारों से होने वाले दुष्परिणामों पर विचार कीजिए।
जब आप परिशुद्ध हो जायेंगे, तब आपके चित्त में कोई सांसारिक विचार नहीं उठेगा। जिस प्रकार शत्रु या अनधिकार प्रवेश करने वाले व्यक्ति को द्वार पर रोक देना ही सरल होता है, उसी प्रकार सांसारिक विचारों को उनके उठते ही रोक देने में आसानी होती है। अंकुरित होते ही उन्हें नष्ट कर दीजिए। उन्हें मूलबद्ध न होने दीजिए।
५. अपवित्र विचारों पर विजय
अपने दैनिक कार्य में अति-व्यस्त रहने पर आपके मन में अपवित्र विचार नहीं उठते, लेकिन ज्यों-ही आप आराम करने लगते और मन को रिक्त छोड़ देते हैं, त्यों-ही आपके मन में पाप-विचार छद्मवेश में प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए मन को विश्राम देते समय बहुत सावधान रहें।
विचारों की पुनरावृत्ति से उनकी शक्ति बढ़ती है। जब कोई अच्छा या बुरा विचार एक बार मन में उठा तो उसका यह स्वभाव ही है कि वह फिर दोबारा आये।
‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की भाँति विचार एक समूह में रहते हैं। इसी भाँति आप यदि एक असद्विचार को प्रश्रय देते हैं तो सारे असद्विचार एकत्रित हो जायेंगे और आप पर आक्रमण करेंगे। यदि आप एक सद्विचार को प्रश्रय देते हैं तो सारे सद्विचार एक-साथ मिल जायेंगे और आपकी सहायता करेंगे।
६. ऋणात्मक विचारों का दमन
अपने सब विचारों को व्यवस्थित करना, शुद्ध करना और दमन करना सीखिए। पहले जितने दुष्ट विचार और संशय हैं, उनसे संग्राम कीजिए। दिव्य और ईश्वरीय विचारों को चारों ओर से अपने अन्दर प्रवेश करने दीजिए।
निराशा, पराजय, दुर्बलता, मोह, संशय, भय आदि के विचार ऋणात्मक विचार हैं, असद्विचार हैं। इनके विपरीत शक्ति, विश्वास, पराक्रम, प्रसन्नता आदि धनात्मक विचारों का विकास कीजिए। असद्विचार अपने-आप नष्ट हो जायेंगे।
मन को जप, प्रार्थना, ध्यान, पवित्र ग्रन्थों का स्वाध्याय आदि से भर दीजिए। समस्त असद् और वैषयिक विचारों के प्रति उदासीन रहिए। वे अपने-आप ही दूर हो जायेंगे। उनसे संघर्ष न कीजिए। ईश्वर से बल की याचना कीजिए। सन्तों का चरित्र पढ़िए। भागवत और रामायण का पाठ कीजिए। सभी भक्तों को इस अग्नि-परीक्षा से हो कर गुजरना पड़ा था; इसलिए धैर्य रखिए।
७. अभ्यस्त विचारों को वश में करें
अपने शरीर, वेशभूषा, खान-पान आदि बातों पर विचार करने के हम आदी हो गये हैं। उन्हें आत्म-चिन्तन अथवा अपने हृदय में परमात्म-स्वरूप के विचार द्वारा वश में करना चाहिए। यह दुष्कर कार्य है। इसके लिए धैर्य, समस्त अभ्यास और आन्तरिक आत्मिक शक्ति की आवश्यकता होती है।
श्रुतियाँ उद्घोष करती हैं: “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” (यह आत्मा दुर्बल को प्राप्त होने वाला नहीं है)। जो निष्ठावान् साधक होते हैं, वे समस्त प्रापंचिक विषयों से निवृत्त हो कर इसके लिए अपना सारा ध्यान केन्द्रित कर देते हैं।
जो सारी वासनाओं का नाश और आदत पड़े हुए विचार-समूह को समाप्त कर देते हैं, वे ब्राह्मी-स्थिति का अनुभव करते हैं तथा श्रद्धा, समता और शान्ति का उपभोग करते हैं। उनमें सबके प्रति समदृष्टि होती है। दुष्ट और प्रबल मन हर प्रकार का दुःख, भय, विषमता, विभिन्नता, उच्च-नीच भाव तथा भेदभाव पैदा करता है और उच्च दैवी गुणों का नाश कर देता है। इस दुःखदायी मन को समाप्त करो।
जब दृश्य और दर्शन दोनों द्रष्टा में विलीन हो जायेंगे, तभी आनन्दानुभव होगा। इसका ही नाम तुरीयावस्था है। तब असीम ज्ञान और एकमात्र आत्मा ही सर्वत्र दिखायी देता है। सभी प्रकार के भेद तथा द्वैतभाव पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं।
आकर्षण और विकर्षण, राग और द्वेष, प्रिय और अप्रिय-इन सब द्वन्द्वों का सम्पूर्ण नाश होना चाहिए। तब योगी को शरीर का भान नहीं रहेगा, भले ही वह उसमें काम करता रहेगा। जिस प्रकार कोई कुलटा स्त्री दूरस्थ विटू के ध्यान में सदा तल्लीन रहते हुए भी घर के सभी काम-काज ठीक से करती रहती है, उसी प्रकार वह योगी भी समस्त सांसारिक कृत्यों में लगे रहने पर भी, हर प्रकार की भ्रान्तियों और प्रलोभनों के बीच रहते हुए भी अपना संयम नहीं खोयेगा। वह सर्वदा अपना ध्यान ब्रह्म में केन्द्रित करेगा।
आप सब केवल वही सत्कार्य किया करें जो आपको ज्ञान प्राप्ति में सहायक हो, जिससे भविष्य में सांसारिक सुख-समृद्धि का विचार न हो। समस्त, द्वैतभाव, भेदभाव और निज-पर-भाव का उन्मूलन करके ब्रह्मानन्द में, पूर्ण प्रकाश की अवस्था में आप निमग्न रहें।
८. अनावश्यक विचारों का पराभव
अनावश्यक और असंगत विचारों को भगाने के लिए संघर्ष मत छेड़िए। उन्हें भगाने के लिए आप जितना भी प्रयत्न करेंगे, वे उतने ही जोर से लौट आयेंगे, दूनी शक्ति प्राप्त करेंगे। आप अपनी शक्ति और संकल्प को क्यों कष्ट देते हो?
उनकी उपेक्षा कीजिए। मन में सदा सद्विचार भरिए। वे धीरे-धीरे अस्त हो जायेंगे। तैलधारावत् ध्यान के द्वारा निर्विकल्प समाधि प्राप्त कीजिए।
शरीरगत तनावों को दूर करने से मन स्वस्थ और शान्त हो जायेगा। शिथिलीकरण की प्रक्रिया से मन, थके हुए अंगों और शिथिल नाड़ियों को विश्राम दीजिए। आप उससे अपरिमित मानसिक शान्ति, शक्ति और ताजगी अनुभव करेंगे। जब आप मन और शरीर का शिथिलीकरण करें, तब मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का अव्यवस्थित या असंगत विचार न आने दें; क्रोध, हताशा, असफलता, अस्वस्थता, दुःख, शोक, झगड़ा आदि से मन का आन्तरिक तनाव बढ़ता है। उन्हें निष्कासित कर दीजिए।
९. नैसर्गिक विचारों का रूपान्तरण
चिन्तन चार प्रकार का है: प्रतीक चिन्तन, नैसर्गिक चिन्तन, उत्तेजक चिन्तन और अभ्यासगत चिन्तन ।
शब्दों के द्वारा चिन्तन प्रतीक चिन्तन या सांकेतिक चिन्तन है। नैसर्गिक चिन्तन उत्तेजक चिन्तन से अधिक बलशाली होता है। शरीर, खान-पान, स्नान आदि बातों का चिन्तन अभ्यासगत चिन्तन है।
सांकेतिक चिन्तन को आसानी से रोका जा सकता है, पर नैसर्गिक और उत्तेजक चिन्तन को रोकना कठिन है। चिन्ता और क्रोध को दूर करने से मानसिक समता और शान्ति प्राप्त की जा सकती है। भय वस्तुतः चिन्ता और क्रोध इन दोनों में सन्निहित रहता है। सजग और सतर्क रहें। प्रत्येक अनावश्यक चिन्ता को हटा दीजिए। उत्साह, पराक्रम, सन्तोष, शान्ति और प्रसन्नता की बात सोचिए। प्रतिदिन किसी अभ्यस्त सुखासन में कुछ समय के लिए शान्ति से बैठिए।
आप आराम-कुरसी पर बैठ जाइए। आँखें मूँद लीजिए। बाह्य विषयों से मन को समेट लीजिए। मन को स्थिर कीजिए। उफनते हुए विचारों को शान्त कीजिए।
१०. अभ्यागत विचारों की संख्या घटायें
सामान्यतया अभ्यासहीन व्यक्तियों के मन में चार-पाँच प्रकार के विचार एक-साथ हावी हो जाते हैं। घरेलू बातें, काम-धन्धे की बातें, कार्यालय की बातें, शरीर की बातें, खाने-पीने की बातें, आशा, आकांक्षा, धन कमाने की कोई योजना, किसी से प्रतीकार लेने की बात, शरीर की आदतों से सम्बन्धित कुछ अभ्यासगत विचार तथा स्नान इत्यादि की बातें एक-साथ उनके मन में उठा करती हैं।
सायं ३-३० बजे बड़ी रुचि से कोई पुस्तक पढ़ने बैठें कि ४-०० बजे खेले जाने वाले क्रिकेट को देखने के आनन्द की भावना उसके मन में बार-बार बाधा उपस्थित करती है। एकमात्र एकाग्रचित्त योगी ही एक समय में एक ही विचार कर सकता है; मन की यह अवस्था दीर्घकाल तक बनाये रख सकता है।
आप अपने मन का सूक्ष्मता से निरीक्षण करें तो विदित होगा कि कई विचार तो असंगत ही हैं। मन व्यर्थ ही इधर-उधर भटकता रहता है। एक विचार अपनी देह और
उसकी आवश्यकताओं को उठाता है तो दूसरा मित्रों के बारे में होता है; कुछ विचार धन कमाने के आते हैं तो कुछ खाने-पीने के आते हैं, कुछ तो बचपन के स्मरण-सम्बन्धी विचार होते हैं।
यदि आप अपने मन का अध्ययन करें, एक समय में एक ही विचार करें और दूसरे विचारों को अलग कर दें तो यह अपने-आपमें एक बड़ी उपलब्धि मानी जायेगी; क्योंकि विचार-नियमन की दिशा में प्रगति की यह एक महत्त्वपूर्ण स्थिति है। निरुत्साहित मत हों।
११. स्फूर्तिदायी विचार एकत्र करें
जीवन का ध्येय भगवद्भाव प्राप्त करना है। वह इस प्रकार की अनुभूति करता है कि ‘मैं न तो यह नश्वर शरीर हूँ, न परिवर्तनशील सीमित मन हूँ। मैं तो परिशुद्ध नित्य मुक्त आत्मा हूँ।’
इस स्फूर्तिदायी विचार का सदा स्मरण रखें: “अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः“ यह जन्मरहित है, नित्य है, स्थायी है और सनातन है। यही आपका वास्तविक स्वरूप है। यह नाम-रूपात्मक अस्थायी शरीर आप नहीं हैं। न तो आप रामस्वामी हैं, न तो मेहता हैं, न मुखर्जी हैं; मैथ्यू, गर्दे, आप्टे कुछ भी नहीं हैं। अज्ञान के कुछ उड़ते बादलों के कारण आप इस छोटे से अस्तित्व के भ्रम में पड़ गये हैं। जागें और अनुभव करें कि आप शुद्ध आत्मा हैं।
एक और महान् स्फूर्तिदायी औपनिषदिक वचन है : “ईशावास्यमिदं सर्वम्“-यह जो कुछ भी जीवनवान् इस जग में है, सब परमेश्वर से आवासित है। फूलों और हरी दूवों के साथ मुस्करायें। पौधों, अंकुरों और डालियों के साथ खिलखिलायें। अपने सभी पड़ोसियों से; कुत्ते, बिल्ली, गाय, मानव, पशु, पक्षी और वृक्ष से तात्पर्य यह है कि समस्त सृष्टि से मैत्री जोड़ें। आपका जीवन पूर्ण होगा, समृद्ध होगा।
१२. आलोकमय विचारों का मनन करो
यदि आप अपनी विचार-शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं, अपना व्यक्तित्व विकसित करना चाहते हैं और महान् बनना चाहते हैं तो हमेशा अपने पास कोई ऐसी दो-एक पुस्तकें रखें जिनमें तेजस्वी और आलोक प्रदान करने वाली बातें हों। बार-बार उन्हें पढ़ते रहें और तब तक पढ़ते रहें जब तक वे आपके जीवन में एकरस न हो जायें और जीवन में तथा नित्य-क्रियाओं में प्रतिफलित होने न लगें।
मननार्थ यहाँ कुछ स्फूर्तिदायी विचार दे रहा हूँ :
१. विशुद्ध चेतना से हृदय सुदृढ़ और चित्त शक्तिशाली होता है।
२. दारिद्र्य आलस्य का बड़ा भाई है।
३. आत्मज्ञान सर्वोत्तम निधि है। ध्यान उसकी कुंजी है।
१३. गलत विचार बनाम सही विचार
वासना और कामनामय विचारों को ब्रह्मचर्य के गम्भीरतापूर्ण अभ्यास से, सत्य के साक्षात्कार की गहरी निष्ठा से, ईश्वर-दर्शन की उत्कण्ठा से तथा पवित्रता के लाभों के चिन्तन से जीतना चाहिए।
घृणा और क्रोध के विचारों को प्रेम, क्षमा, दया, मैत्री, शान्ति, सहिष्णुता और अहिंसा के विकास से जीतना चाहिए।
गर्व और उससे जुड़े हुए विचारों को नम्रता विकसित करने वाले मूल्यों के व्यवस्थित मानसिक परीक्षण द्वारा नियन्त्रित करना चाहिए।
लोभ, परिग्रह और लालसा के विचारों को प्रामाणिक व्यवहार, अनासक्ति, उदारता, सन्तोष, अलिप्सा आदि विचारों से समाप्त करना चाहिए।
संकीर्णता, ईर्ष्या और हीनता पर विजय पाने में उदात्तता, महत्ता, सन्तोष और हृदयवैशाल्य उपयोगी होते हैं।
भ्रान्ति और मोह को जीतने के लिए विवेक-बुद्धि का विकास उत्तम उपाय है।
मिथ्याभिमान दूर करने के लिए सर्वतोमुखी सादगी और अहंकार को मिटाने के लिए सज्जनता का विकास करना चाहिए।
१४. विचार का सरगम
विचार अनेकविध हैं-नैसर्गिक विचार, दृश्य विचार (दर्शन-सम्बन्धी शब्दों से किया जाने वाला विचार), श्राव्य विचार (श्रवण-सम्बन्धी शब्दों से किया जाने वाला विचार), सांकेतिक विचार (संकेतों की भाषा से किया जाने वाला विचार) और आदत के अनुसार किया जाने वाला विचार।
कुछ संचारी विचार होते हैं जो हलचल, खेल-कूद और भाग-दौड़ की भाषा में किये जाते हैं। कुछ भावनात्मक विचार हैं।
विचार दृश्य से श्राव्य बन सकते हैं और श्राव्य से संचारी में बदल सकते हैं।
सोचने का और साँस का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है, क्योंकि मन और प्राण का निकट सम्बन्ध है। जब मन को एकाग्र करते हैं, तब साँस धीमी हो जाती है। अगर विचार जोरों से चलने लगे तो साँस भी तेज चलेगी। साइकोग्राफ (Psychograph) एक यन्त्र है जो विचारों का अध्ययन प्रस्तुत कर देता है कि मन में किस प्रकार का विचार चल रहा है।
१५. हीन विचार और नैतिक विकास
अनियन्त्रित विचार ही सभी प्रापों का मूल है। प्रत्येक विचार अपने-आपमें नितान्त दुर्बल होता है; क्योंकि असंख्य और नानाविध विचार मन को बराबर विभाजित करते रहते हैं।
विचारों को जितना-जितना नियन्त्रित करते जायें मन की एकाग्रता उतनी- उतनी बढ़ती जाती है और परिणामस्वरूप मनोबल और विचार-शक्ति अधिक होती जाती है।
हीन और दुष्ट विचारों को मिटाने में पर्याप्त धैर्य की आवश्यकता पड़ती है; परन्तु उच्च विचारों का चिन्तन उन्हें बड़ी आसानी से और शीघ्रता से नष्ट करने का उत्तम उपाय है। जो मूढ़ जन विचार के सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं तथा प्रापंचिक विषयों में निमग्न रहते हैं, वे बहुत शीघ्र घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, प्रतीकार, वासना आदि दुष्ट विचारों के शिकार बन जाते हैं, स्वयं दुर्बल संकल्प वाले बनते हैं, विवेकहीन होते हैं और मन की सूक्ष्म विपरीत वृत्तियों के दास बन जाते हैं।
मनोबल प्राप्त करने का सर्वोत्कृष्ट उपाय यही है कि उन्नत, उदात्त और सद्विचारों का चिन्तन किया जाये और उनकी सहायता से क्षरणशील, विक्षेपकारी, चंचल वैषयिक तथा प्रापंचिक विचारों को नियन्त्रित किया जाये।
जब भी कोई असद्विचार मन में आये तो उसे जीतने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि उसकी उपेक्षा की जाये। पाप-विचार की उपेक्षा कैसे करें? उसे भूल जायें। भूलें कैसे? उसमें रमण न करें और उसका लगातार चिन्तन न करें।
उनमें हम रमें कैसे नहीं और निरन्तर चिन्तन कैसे न करें? अत्यन्त रुचिकर, उन्नत, स्फूर्तिदायी किसी दूसरे विचार की ओर ध्यान दें। उन्हें भूल जायें, ठुकरा दें, प्रेरणाप्रद कोई दूसरी बात सोचें। इन तीनों बातों का अभ्यास करना पाप-विचारों पर वश प्राप्त करने की उत्तम साधना है।