पुस्‍तक: मानसिक शक्ति-स्‍वामी शिवानंद

सप्तम अध्याय

विचार-नियमन के विधायक उपाय

. एकाग्रता के अभ्यास से विचार-नियमन

उफनते हुए विचारों को निस्तब्ध करो। भावनाओं के आवेगों को शान्त करो। प्रारम्भ में किसी मूर्त रूप पर एकाग्रता का अभ्यास करो। पुष्प, भगवान् बुद्ध की मूर्ति, कोई काल्पनिक चित्र, हृदय का कोई उज्ज्वल प्रकाश, किसी सन्त या अपने इष्टदेव का चित्र-इनमें से किसी एक पर चित्त एकाग्र करो।

दिन-भर में तीन या चार बार- उषाकाल में, प्रातः आठ बजे, तीसरे पहर चार बजे और सायंकाल को आठ बजे-अभ्यास के लिए बैठो। भक्त जन हृदय पर, राजयोगी त्रिकुटी पर (चित्त के अधिष्ठान पर) तथा वेदान्ती ब्रह्म पर एकाग्रता साधते हैं। यह त्रिकुटी दोनों भौंहों के मध्य में है।

आप नासाग्र, नाभि या मूलाधार (रीढ़ के निचले भाग) पर भी एकाग्रता का अभ्यास कर सकते हैं।

मन में जब असंगत विचार उठते हैं, तब उदासीन रहो। वे स्वयं जाते रहेंगे। बलपूर्वक भगाने का प्रयत्न न करो, अन्यथा वे भी जोर करेंगे तथा बने रहने को आपका प्रतिरोध करेंगे। वे आपके संकल्प-बल को क्लान्त बनायेंगे और द्विगुणित वेग से प्रवेश करेंगे। इनके स्थान में सद्विचार को प्रश्रय दो। असंगत विचार शनैः शनैः क्षीण पड़ जायेंगे। एकाग्रता के अभ्यास में धीरे-धीरे, किन्तु दृढ़तापूर्वक बढ़ो।

यह एकाग्रता मनोवृत्तियों के निरोध के लिए है। एकाग्रता का अर्थ है-मन को एक ही रूप में दीर्घ काल तक टिकाये रखना। मन की चंचलता को रोकने और उसकी स्थिरता में आड़े आने वाली समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए किसी एक वस्तु पर एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए।

एकाग्रता वैषयिक विचारों और कामनाओं की विरोधी है; चिन्ता और घबराहट का विरोधी आनन्द रूप है, व्यग्रता का विरोधी स्थिर चिन्तन रूप है, आलस्य तथा शिथिलता का विरोधी व्यावहारिक चिन्तन रूप है तथा कुविचारों का विरोधी भावातिरेक है।

बाह्य विषयों पर एकाग्रता साधना सरल है। बाहर की ओर दौड़ना मन का स्वभाव है। अपने सम्मुख श्री कृष्ण, राम, नारायण, देवी या प्रभु ईसा का कोई चित्र रख लो। पलक न झपकते हुए उसकी ओर निरन्तर एकटक देखो। बदन देखो, देखते-देखते चरण पर आओ। यही क्रम पुनः पुनः दोहराओ। जब मन का भटकना बन्द हो जाये, तब किसी एक विशेष स्थान पर रुको। फिर आँखें बन्द करो और मन से चित्र का स्मरण करो।

चित्र न रहने पर भी स्पष्ट चित्र देखने की क्षमता पैदा होनी चाहिए। क्षण मात्र में वह चित्र आँखों के सामने आ जाये, ऐसा अभ्यास होना चाहिए। फिर मन को वहीं कुछ समय स्थिर रखो। यही एकाग्रता है। इसका अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए।

अपनी एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाना चाहो तो सांसारिक कामनाओं और प्रवृत्तियों को घटाना होगा तथा प्रतिदिन कुछ घण्टे मौन रखना होगा। तभी मन बड़ी सुगमता से अनायास एकाग्र हो सकेगा।

एकाग्रता के समय में मानस में केवल एक ही तरंग उठने देनी होती है। मन केवल एक ही वस्तु में तन्मय होता है। मन के शेष सभी कार्य स्थगित हो जाते हैं।

. सद्वृत्तियों से विचार-नियमन

अपने चित्त में विशेष सवृत्तियों का विकास करते हुए जितने भी घातक, अवांछित विचार और प्रभाव हैं, उनसे अपने को बचाने का बल एकत्र करने का प्रयत्न कीजिए। यह सम्भव है कि आप उस प्रयत्न में अन्दर से आत्मा की समस्त उन्नत प्रेरणाओं को और बाहर से श्रेष्ठ शक्तियों और प्रभावों को ग्रहण करने योग्य बन जायें। अपने को यह सुझाव दें: ‘मैं अपने को आवृत रखता हूँ। मैं सभी असवृत्तियों और हीन विचारों से अपने को बचा लेता हूँ और सभी सवृत्तियों और उच्च विचारों के लिए अपने को खुला और ग्रहणशील रखता हूँ।’ पूर्ण अवधानपूर्वक इस प्रकार की भावभंगिमा यदा-कदा अपनाने से इसकी आदत हो जाती है।

जिस अनुपात में सद्वृत्तियों को प्रवेश करने देते हैं, उस सीमा तक जीवन के दृश्य-अदृश्य दोनों पक्षों से अवांछित हीन वृत्तियों का आक्रमण कुण्ठित हो जाता है। वस्तुतः हम उन्हें जितना आने दें, वे उतना ही आते हैं।

मन में शंका रहती है, सच्चाई भी रहती है। शंका यह उठती है कि ईश्वर है या नहीं। इसका नाम ‘संशय-भावना’ है। दूसरी शंका यह उठती है कि मैं उस ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकूँगा या नहीं। फिर दूसरी वाणी कहती है कि ब्रह्म सत्य है। वह हस्तामलकवत् ठोस और स्पष्ट सत्य है। वह प्रज्ञानघन है, चिद्धन है तथा आनन्दघन है। मैं उसके दर्शन कर सकता हूँ।

हमें कुछ बातें स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं और वे विचार हममें दृढ़ता से रूढ़ और बद्धमूल हो गये हैं। कुछ विचार अस्पष्ट हैं, स्थिर नहीं हो पाते हैं। वे आते-जाते रहते हैं। जब तक वे हममें दृढ़ता से टिक न जायें, हममें आत्मसात् न हो जायें, तब तक उनके लिए हमें सबल भूमिका निर्माण करनी होगी।

विचारों के स्पष्टीकरण से चित्त की आकुलता और उलझनें दूर हो जाती हैं। जब यह शंका पैदा हो कि ईश्वर है अथवा नहीं, अथवा मैं आत्म-साक्षात्कार कर सकूँगा या नहीं तब सुनिश्चित और विवेकपूर्ण विचारों से उस शंका का निरसन करना चाहिए कि ‘ईश्वर सत्य है, मैं सफल हो सकता हूँ, इसमें लेशमात्र भी शंका नहीं है।’ ‘मेरे शब्दकोश में अशक्य, असम्भव, कठिन आदि शब्दों का स्थान ही नहीं है। इस संसार में सब-कुछ सम्भव है।’

जब आप निश्चय कर लें तो कुछ भी कठिन नहीं है। दृढ़ निश्चय और पक्के निर्णय से जीवन के हर कार्य अथवा प्रत्येक अध्यवसाय में विशेषतया मनोजय के विचारों में सफलता सुनिश्चित है।

. असहकार से विचार-नियमन

जब मन व्यर्थ भटकने लगे, तब उसके साथ असहकार करो। फिर धीरे-धीरे मन वश में आ जायेगा। मन से असहकार करने का व्यावहारिक उपाय देता हूँ: मन जब कहता है कि ‘आज मैं मिठाई खाऊँगा’, तो आप कहो, ‘मैं तुम्हारा साथ नहीं दूँगा। मैं मिठाई नहीं खाऊँगा। मैं केवल रोटी-दाल खाऊँगा।’ यदि मन कहे कि ‘मुझे सिनेमा देखना ही है’ तो आप कहना कि ‘मैं तो रामानन्द जी के सत्संग में जाऊँगा, उपनिषदों का प्रवचन सुनूँगा।’ जब मन कहे कि ‘मैं रेशमी कुरता पहनूंगा’ तब आप कहना, ‘आगे कभी रेशमी वस्त्र नहीं लूँगा। खादी ही पहनूंगा।’ यह है असहकार का स्वरूप।

मन के साथ असहकार करना मानो प्रवाह के विपरीत तैरना है; क्योंकि इसमें इन्द्रियों के आकर्षण के विरुद्ध चलना होता है। इससे मन क्रमशः क्षीण होता जाता है और एक समय वह आपका आज्ञाकारी अनुचर बन जायेगा। आप मन के स्वामी बनोगे।

निग्रही पुरुष संयम के साथ विषय-वस्तुओं के बीच विचरण करते हुए भी अनेक आकर्षण और विकर्षण से अलग रह कर शान्ति प्राप्त करता है। इन्द्रियाँ और मन दोनों में ये दो गुण-आकर्षक और विकर्षण-अवश्य होते हैं। इसलिए इन्द्रियों और मन को कुछ पदार्थ प्रिय लगते हैं और कुछ अप्रिय; परन्तु निग्रही व्यक्ति समस्त सांसारिक विषयों के बीच रहते हुए भी आकर्षण और विकर्षण से प्रभावित नहीं होता। उसका स्वामी आत्मा होता है और इस कारण परम शान्ति प्राप्त करता है।

जिस व्यक्ति ने चित्तवृत्तियों का नियमन किया होता है, उसकी संकल्प-शक्ति बड़ी बलवती होती है; अतः मन और इन्द्रियाँ उसकी संकल्प-शक्ति की अनुगामिनी होती हैं। निग्रही व्यक्ति वही आहार ग्रहण करता है जो उसके शरीर धारण के लिए आवश्यक होता है और उसमें किसी प्रकार का प्रिय अप्रिय का भाव नहीं रहता। वह शास्त्र-निषिद्ध वस्तुओं को कभी ग्रहण नहीं करेगा।

. विचारों के विरलीकरण की कला

रबड़ के उद्यान में काम करने वाले माली रबड़ के वृक्षों के विरलीकरण के लिए बड़े वृक्षों के आस-पास उगने वाले छोटे-छोटे फालतू वृक्षों को काट कर फेंक देते हैं। इससे उनको बड़े वृक्षों से अधिक मात्रा में दूध (रबड़ का रस) प्राप्त होता है। इसी प्रकार आप भी अमरता का अमृत पान करना चाहें तो छोटे-मोटे फालतू विचारों को एक-एक कर नष्ट करते हुए विचार-वन को विरल बनाइए।

जिस प्रकार अच्छे-अच्छे फल टोकरी में चुन कर रख लेते हैं और सड़े-गले फलों को फेंक देते हैं, उसी प्रकार अपने मन में अच्छे विचारों को रख लें और बुरे विचारों को उत्सर्जित कर दें।

जिस प्रकार योद्धा कूट-द्वार से प्रवेश करने वाले शत्रु-सैनिकों का एक-एक करके शिर काट देता है, उसी प्रकार चित्त के कूट-द्वार से मनःपटल पर प्रविष्ट होने वाले असद्विचारों को एक-एक करके नष्ट करते जाइए।

जब छिपकली की पूँछ कट जाती है तो कुछ समय तक वह पूँछ का टुकड़ा नाचता रहता है; क्योंकि उसमें अल्प-मात्रा में प्राण विद्यमान है। एक-दो क्षण में सभी गति रुक जाती है। इसी प्रकार विचारों को काट फेंकने के अनन्तर भी कुछ विचार, कटी पूँछ की तरह, थोड़ी-बहुत हलचल करेंगे, परन्तु वे दुर्बल हो चुके होते हैं। उनसे विशेष हानि होने वाली नहीं है; क्योंकि उनमें कोई बल नहीं है।

डूबता हुआ मनुष्य अपने प्राणों के रक्षार्थ तिनकों तक का आश्रय खोजता है, उसी प्रकार ये निष्प्राण विचार पुनः अपनी पूर्व-प्राणमयता तथा ओजपूर्ण स्थिति में मन में अधिष्ठित होने के लिए यथाशक्य प्रयास करेंगे। यदि आप अपनी एकाग्रता और ध्यान-साधना का अभ्यास नियमित रूप से करते रहेंगे तो वे तैल-रहित दीपक की तरह स्वयं समाप्त हो जायेंगे।

काम, क्रोध, ईर्ष्या, अहंभाव, घृणा आदि विकार बहुत गहरे जमे होते हैं। डालियाँ काटने से वृक्ष निर्मूल नहीं होता, वरन् और घने रूप से कॉपलें फूट निकलती हैं। इसी प्रकार ये विचार एक बार कटने पर भी, क्षीण कर दिये जाने पर भी कुछ समय पश्चात् फिर प्रकट होने लगते हैं। अतः विवेक, विचार, ध्यान आदि प्रबल साधनों से उन्हें निर्मूल ही कर देना चाहिए।

. विचार-नियमन की नेपोलियन की पद्धति

जिस समय एक विचार कर रहे हों तो दूसरे विचारों को प्रवेश न करने दीजिए। गुलाब का विचार कर रहे हों तो केवल विविध गुलाबों का ही विचार करें; दूसरे विचारों को आने न दें।

दया का विचार कर हों तो केवल दया का ही विचार करें; क्षमा, सहिष्णुता आदि का विचार न करें। गीता का अध्ययन करने बैठें तो चाय या क्रिकेट की बात न सोचें। प्रस्तुत एक ही विषय पर पूर्णतया लीन रहें।

नेपोलियन ने अपने विचारों को इस तरह वश में किया था “जब मैं अधिक सुख का अनुभव करना चाहता हूँ, तब दुःखकर और असुखकर विचारों के आलयों को बन्द करके मात्र सुख के ही आलय खोल लेता हूँ। सोना चाहूँ, तो मन के सभी आलय बन्द कर देता हूँ।”

. दुष्ट विचारों के पुनरावर्तन को रोकें

मान लीजिए, आपके मस्तिष्क में कोई एक दुष्ट विचार है, वह बारह घण्टे रहता है और प्रति तीसरे दिन आया करता है। ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास करते हुए आप यदि उसे बारह के स्थान में दश घण्टे ही रहने दें, प्रति तृतीय दिन के स्थान में सप्ताह में एक बार आने दें तो निश्चित ही आपने बड़ी सफलता प्राप्त की। इसी प्रकार अभ्यास चालू रखने से उसके रहने की अवधि और लौट आने का दिन दोनों शनैः शनैः घटाये जा सकते हैं।

अन्ततः वे सर्वथा नष्ट हो जायेंगे। एक या दो वर्ष पूर्व के मन की स्थिति के साथ आज के मन की स्थिति की तुलना कीजिए, तब आपको प्रगति का पता चल जायेगा।

प्रारम्भ में प्रगति बहुत धीमी रहेगी। उस समय प्रगति को नापना कठिन होगा।

. दुष्ट विचारों से नरमी न बरतें

प्रारम्भ में एक दुष्ट विचार मन में प्रवेश करता है। तब आप उस पर प्रबल कल्पना कीजिए। उसमें थोड़ी देर रमिए।

उसे कुछ समय मन में बने रहने की अनुमति दीजिए। जब आप उसका प्रतिरोध नहीं करते, तब वह धीर-धीरे आपके मन में गहरी जड़ जमाने लगेगा।

तब उसको दूर करना बड़ा कठिन होगा। कहावत है: ‘ऊँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ने लगे’; यह बात दुष्ट विचारों पर अक्षरशः सही है।

. दुष्ट विचारों को अंकुरित होते ही नष्ट कर दो

घर में कोई कुत्ता या गधा प्रविष्ट होना चाहे तो जिस प्रकार आप द्वार बन्द कर देते हैं, उसी प्रकार किसी दुष्ट विचार को चित्त में प्रवेश करने और अन्दर जा कर मस्तिष्क-तन्तुओं पर प्रभाव डालने देने से पूर्व ही मन के द्वार बन्द कर दीजिए। इससे आप बुद्धिमान् बनेंगे और शीघ्र ही परम शान्ति तथा परमानन्द का उपभोग करेंगे।

वासना, लोभ और अहन्ता को पूर्णतः नष्ट कर डालिए। केवल पवित्र विचार को ही प्रश्रय दीजिए। यह कार्य पर्वतारोहण जैसा ही कठिन है; परन्तु इसका अभ्यास करना होगा। कुछ समय में आपको अपने प्रयास में सफलता मिल सकती है।

एक दुर्वृत्ति का नाश कर दें तो उससे आपका विश्वास बढ़ेगा, दूसरी वृत्तियों को भी नष्ट करने का बल प्राप्त होगा और आपके मनोबल या आत्म-शक्ति में वृद्धि होगी।

दुर्गुण का नाश करने में विफलता हाथ लगे तो हताश न हों। श्रम बिना सुख कहाँ? धीरे-धीरे आपकी आन्तरिक शक्ति प्रकट होने लगेगी, आप इसका अनुभव करेंगे।

. कुविचारों के नाश के लिए आध्यात्मिक उपाय

जब कुविचार आपके मन में प्रवेश करेंगे, तब आपके मन में कभी-कभी थरथराहट होगी। यह इस बात का लक्षण है कि आपकी आध्यात्मिक प्रगति हो रही है, आप आध्यात्मिक विकास कर रहे हैं। विगत दिनों के दुष्कर्मों से आपके मन में पश्चात्ताप होगा। यह भी आपके आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण का ही लक्षण है।

अब आप वैसे कार्य की पुनरावृत्ति नहीं करेंगे। सोचने पर ही आपका मन काँप उठेगा। पूर्वाभ्यासवश कोई गलत काम करने की प्रेरणा हुई तो आपके शरीर में सिहरन होगी। पूरी शक्ति लगा कर, लगन के साथ अपना ध्यानाभ्यास चालू रखिए। सभी दुष्कर्मों का स्मरण, दुर्विचार और शैतान की सारी दुष्प्रेरणाएँ अपने-आप मिट जायेंगी। आप शुद्ध और पवित्र हो जायेंगे।

प्रारम्भ में ज्यों-ही आप ध्यान लगाने लगेंगे, अविलम्ब ही सारे दुष्ट विचार आप पर आक्रमण करेंगे। जब आप सद्विचारों का चिन्तन करने बैठते हैं, तभी ऐसा क्यों होता है?

इसी के कारण कई साधक अपनी साधना बीच में ही छोड़ बैठते हैं। आप बन्दर भगाने का प्रयत्न करते हैं तो वह प्रतिकार के लिए बड़े वेग के साथ आप पर झपटता है। इसी प्रकार जब भी आप सद्विचारों को जाग्रत करने का प्रयत्न करते हैं, तब ये पुराने दुष्ट विचार भी प्रतीकार लेने की भावना से आप पर दूने वेग से आक्रमण करते हैं। जब भी आप शत्रु को घर से निष्कासित करने का प्रयत्न करते हैं, तब वे बड़ी उग्रता से आपका प्रतिरोध करते हैं।

प्रतिकार निसर्ग का ही एक गुण है। पुराने दुष्ट विचार अपना अधिकार जताते हैं और कहते हैं, ‘भय्या! इतने क्रूर क्यों बनते हो! आपने अविस्मरणीय काल से हमें अपने मन-रूपी कार्यालय में रहने दिया है। हमें यहाँ बने रहने का पूर्ण अधिकार है। आपके प्रत्येक दुष्कृत्य में आज तक हमने सहायता की है। आज ही हमें अपने निवास-स्थान से क्यों धकेलना चाहते हैं? हम अपना स्थान नहीं छोड़ेंगे।’ किन्तु आप इससे निराश न होइए। अपने ध्यानाभ्यास में निरन्तर लगे रहिए। समय पर ये दुष्ट विचार स्वयं क्षीण हो जायेंगे। अन्ततः वे सब नष्ट हो जायेंगे।

यह प्रकृति का नियम है कि सवृत्ति सर्वदा दुर्वृत्ति पर विजय पाती है। असद्विचार कभी भी सद्विचार के आगे टिक नहीं सकते। साहस भय पर विजयी होता है। सहिष्णुता क्रोध और चिड़चिड़ेपन पर विजयी होती है। प्रेम द्वेष पर विजय पाता है। पवित्रता वासना को पराजित करती है।

ध्यान के लिए बैठते ही जब बुरे विचार आते हैं, तब आप व्याकुल होते हैं। यही इस बात का प्रमाण है कि आप अध्यात्म-मार्ग में प्रगति कर रहे हैं। इससे पूर्व तो आप प्रत्येक प्रकार के दुष्ट विचार को जानते-बूझते हुए भी अपने चित्त में सुखपूर्वक बसने देते थे, उनका स्वागत करते थे, उनको पोसते थे।

अपनी आध्यात्मिक साधना में दृढ़ रहिए। श्रम और अध्यवसाय कीजिए। आप अवश्य ही सफल होंगे। दो-तीन वर्ष तक सतत जप और ध्यान का साधारण अभ्यास रखने पर सर्वथा जड़ और मन्द साधक भी अपने में अद्भुत परिवर्तन अनुभव करता है। अब वह अपनी साधना छोड़ नहीं सकता। एक दिन के लिए भी ध्यान की साधना छूटने पर उसको ऐसा लगता है कि मानो आज उसका कुछ खो गया है। उसका मन उद्विग्न रहेगा।

१०. कुविचारों के निग्रह का सर्वोत्तम उपाय

जब मन रिक्त होता है, तभी कुविचार उसमें प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। दुष्ट विचार का आना व्यभिचार का प्रारम्भ-बिन्दु है। भले ही आपने केवल वासनामयी दृष्टि से देखा भर है, किन्तु आपने मानसिक व्यभिचार कर लिया। मानसिक क्रिया ही वास्तविक क्रिया है। स्मरण रहे कि ईश्वर हमारी भावना के आधार पर ही न्याय करता है। संसार में मनुष्य तो स्थूल क्रिया को देख कर न्याय करते हैं। इसलिए व्यक्ति की भावना का ध्यान रखना चाहिए। तब आप कोई भूल नहीं करेंगे।

मन को सर्वदा व्यस्त रखिए। तब बुरे विचार प्रवेश नहीं करेंगे। खाली मन भूत का कारखाना होता है। प्रतिक्षण मन का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करें।

सीना-पिरोना, झाडू लगाना, बरतन मलना, पानी भरना, पढ़ना-लिखना, ध्यान करना, माला फेरना, भजन गाना, प्रार्थना करना, बड़ों की या रोगियों की सेवा करना आदि किसी-न-किसी कार्य में अपने मन को सदा व्यस्त रखें। गपशप और व्यर्थ के विवाद से बच कर रहें। गीता, उपनिषद्, योगवासिष्ठ-जैसे ग्रन्थों में सन्निहित उत्तम विचार ही मन में रखें।

११. विचार के दैनिक अनुशासन

मन बड़ा नटखट होता है। वह चंचल बन्दर की तरह है। उसे प्रतिदिन अनुशासन में रखना आवश्यक है। तभी वह धीरे-धीरे हमारे वश में आता है।

मन को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने से हम उसमें असद्विचारों और असत्कार्यों को उठने से रोक सकते हैं तथा जो असद्विचार और असत्कर्म पुनरावृत्ति के कारण उठे हैं, उन्हें टाल सकते हैं।

मानसिक विश्रान्ति का यहाँ एक सुन्दर दैनिक कार्यक्रम दे रहा हूँ, उससे आपके अन्दर भरपूर शक्ति और उत्साह भर जायेगा।

आँखें बन्द करें। जो विषय आपको अत्यन्त रुचिकर हो, उस पर सोचें। इतने से ही मन को आश्चर्यजनक रूप से आराम मिलेगा। महान् हिमालय, पावनी गंगा, कश्मीर का मोहक प्राकृतिक सौन्दर्य, ताजमहल, कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल हाल, सूर्योदय, सूर्यास्त, विशाल सागर या अनन्त नीला आकाश- इनमें से किसी का भी चिन्तन करें।

कल्पना करें कि इस विशाल आत्मसागर में यह सारा संसार और आप तैर रहे हैं। अनुभव करें कि आपको उस परम सत्ता का स्पर्श मिल रहा है। अनुभव कीजिए कि विश्व का प्राण आपके द्वारा श्वास ले रहा है, धड़क रहा है और स्पन्दित हो रहा है। अनुभव कीजिए कि भगवान् हिरण्यगर्भ आपको अपने विशाल वक्षस्थल पर झुला रहे हैं। तब आँखें खोलिए। परम मानसिक शान्ति, स्फूर्ति और शक्ति प्रतीत होगी। इनका अभ्यास और अनुभव कीजिए।

१२. विचार और सर्प का दृष्टान्त

जिस प्रकार फल बीज से उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक कृति विचार से पैदा होती है। सद्विचार सत्कृति को और असद्विचार असत्कृति को जन्म देते हैं।

सद्विचार को ही चित्त में बसाइए। असद्विचारों को भगाइए। सत्संग, धर्मग्रन्थों का वाचन, प्रार्थना आदि के द्वारा यदि सद्विचारों को विकसित करेंगे तो असद्विचार स्वयं नष्ट हो जायेंगे।

जिस प्रकार जूते में चुभने वाले कंकड़ को आप तुरन्त झाड़ देते हैं, उसी प्रकार किसी भी असद्विचार को अपने चित्त में सुगमता से निकाल फेंकने की आपमें क्षमता होनी चाहिए। तभी समझें कि आपने विचार-नियमन की पर्याप्त शक्ति संचित कर ली है और तभी यह कहा जा सकेगा कि अध्यात्म-मार्ग में आपने थोड़ी-बहुत सच्ची प्रगति की है।

जब आप साँप के फन पर लाठी से प्रहार करेंगे तो वह कुछ काल तक निश्चेष्ट पड़ा रहेगा। आप समझेंगे कि वह मर गया, पर अकस्मात् वह शिर उठा कर भाग जायेगा। इसी प्रकार जिन विचारों को आपने दबा दिया था, कुचल दिया था, वे कुछ समय में शक्ति संचित करके फिर शिर उठाते हैं। इसलिए उन्हें बार-बार मार कर सर्वथा नष्ट कर देना चाहिए, जिससे कि वे पुनः उठ न सकें।

१३. विचार-जय से विश्व-विजय

विचार या संकल्पों को वश में कीजिए। कल्पनाएँ या दिवास्वप्न छोड़िए। मनोनाश हो जायेगा। संकल्पों से निवृत्ति ही मोक्ष है। मन तब नष्ट होगा, जब कल्पनाएँ समाप्त होंगी।

कल्पना के ही कारण इस भ्रमात्मक संसार का हमें अनुभव हो रहा है। कल्पनाएँ ज्यों-ही सर्वथा नष्ट हो जायेंगी, त्यों-ही वह अनुभव भी मिट जायेगा।

विचारों पर विजय पाने का अर्थ है कि सभी सीमाओं, दुर्बलताओं, अज्ञान और मृत्यु पर विजय पाना। मशीनगन, बन्दूक आदि के द्वारा किये जाने वाले बाहरी युद्ध से मन के साथ यह आन्तरिक युद्ध बहुत भयानक है। शस्त्र के बल पर विश्व को जीतने से भी विचारों को जीतना अधिक कठिन है। विचारों पर विजय प्राप्त कीजिए, विश्व पर विजय अपने-आप प्राप्त हो जायेगी।

१४. विचार-शक्ति के लिए अध्यात्म-मार्ग

विचारों का बाह्य विषयों की ओर बहना स्वाभाविक है। मन बड़ी सरलता से सांसारिक विषयों का चिन्तन कर सकता है। यह उसका स्वभाव ही है।

मानसिक शक्तियाँ बड़ी सहजता से शरीरगत चिन्ताओं में और पुरानी अभ्यस्त लकीरों पर दौड़ने लगती हैं। ईश्वर के विषय में सोचना उन्हें बड़ा कठिन प्रतीत होता है। व्यावहारिकता में फंसे हुए सांसारिक चित्त के लिए यह बहुत ही दुःसाध्य है।

मन को प्रापंचिक विषयों से विमुख करना, बाह्य विषयों की ओर दौड़ने से उसे रोकना और ईश्वर में लगाना उतना ही कठिन है जितना गंगा नदी को गंगासागर की ओर

बहने से रोक कर उल्टे गंगोत्तरी की ओर प्रवाहित करना। यह यमुना के प्रवाह के विरुद्ध तैरने जैसा है।

फिर भी यदि जन्म-मृत्यु के चक्र से बचना चाहें तो कठोर परिश्रम और त्याग करके मन को, उसकी इच्छा के विरुद्ध, ईश्वर के प्रति मोड़ने का अभ्यास करना ही होगा।

१५. विचार-नियमन में जागृति का स्थान

प्रारम्भ में चित्त को किसी एक विचार में स्थिर करना बहुत कठिन होता है। विचारों की संख्या घटाइए। किसी एक विषय पर सोचने का प्रयत्न कीजिए।

गुलाब के विषय में सोचना है तो सभी विचार मात्र गुलाब के सम्बन्ध में आने दें। विश्व के विभिन्न भागों में उगने वाले गुलाबों के विभिन्न भेदों का विचार करें। गुलाब के उपयोग की बात सोचें। उससे क्या-क्या बनता है, विचार करें। हाँ, कुछ दूसरे पुष्पों की बात भी आने दे सकते हैं; परन्तु फल, शाक-जैसे दूसरे पदार्थों का विचार कदापि न आने दें।

मन की निरुद्देश्य भटकने कि स्थिति को रोकें। गुलाब का विचार करने बैठें तो मन को उसे छोड़ कर इधर-उधर भ्रमण न करने दें। ऐसा करते-करते एक ही विषय में मन को स्थिर करना सीख जायेंगे। हाँ, प्रतिदिन इसका अभ्यास करते रहना चाहिए। विचार-नियमन में अत्यन्त सजगता की आवश्यकता है।

१६. विचारों का निरीक्षण करें, उनका अध्यात्मीकरण करें

विचारों का सदा निरीक्षण करें। उनका नियमन करें। विचारों के साक्षी बने रहें। विचारों से ऊपर उठें और निर्विचार शुद्ध चैतन्य की स्थिति में निवास करें।

अचेतन मन में छिपे हुए सूक्ष्म संस्कार, वृत्तियाँ, कामनाएँ और भावनाएँ सचेतन और जाग्रत जीवन में बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

उन्हें शुद्ध और उत्कृष्ट बनाना चाहिए। उन्हें आध्यात्मिक मोड़ देना चाहिए। शुभ विचारों को ही सुनिए। भले और नेक विचारों को ही देखिए। शुभ विचार का ही चिन्तन कीजिए। शुभ ही बोलिए। शुभ का ही ध्यान कीजिए। शुभ को समझिए। शुभ को जानिए।

भय, तीव्र अनिच्छा, दबा हुआ द्वेष, पूर्वाग्रह, असहिष्णुता, क्रोध, वासनाये सब हमारे अवचेतन मन की क्रिया को विचलित करते हैं। सद्गुणों का अर्जन करो। अवचेतन मन को शुद्ध करो, उन्नत बनाओ, शक्तिशाली बनाओ। लोभ, मोह आदि वृत्तियाँ मन को दास बना लेती हैं। उसे (मन को) उनसे मुक्त करके मूल शुद्ध रूप में पुनः बदल देना चाहिए जिससे वह सत्य का विचार और ध्यानाभ्यास कर सके। सारी निम्न वृत्तियाँ भौतिक शरीर और मानसिक स्तर की ही होती हैं।

वासनाओं के अभाव में जब मन का कार्य-व्यापार बन्द हो जाता है, तब मनोनाश की स्थिति का उदय होता है।

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