पुस्‍तक: मानसिक शक्ति-स्‍वामी शिवानंद

अष्टम अध्याय

विचार-संस्कार के आदर्श

. विचार और अन्तःसंस्कार

मन में इच्छा के उदय होते ही उसकी पूर्ति का प्रयत्न न कीजिए। विवेक, सम्यक् विश्लेषण और तटस्थता के साथ उसको अस्वीकार कर दीजिए। इससे मन का समाधान प्राप्त होता है और सतत अभ्यास से मानसिक शक्ति-संचय होता है। मन क्षीण होता जाता है। मन के भटकने पर सीधी रोक लगती है। बाहर भागने की उसकी वृत्ति अवरुद्ध होती है।

इच्छाओं के दूर होते ही विचार भी स्वयं समाप्त हो जाते हैं। विषय-सेवन के दोषों का पुनः पुनः विचार करते रहने से नानाविध भोग-विषयों की ओर से मन परावृत होता है और ब्रह्म में स्थिर होता है।

शम के अभ्यास से चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना और त्वक्-इन पंच ज्ञानेन्द्रियों को नियन्त्रित करना होता है। शम शान्ति का नाम है जो वासनाओं के सतत निरोध से उत्पन्न होता है।

. अस्वस्थ विचार और सजगता

दुष्ट विचारों के गम्भीर घातक परिणामों पर मन में विचार करते रहें। इससे आप उन दुष्ट विचारों के आक्रमण से सावधान रह सकेंगे। जिस क्षण में वे आयें, आप ईश्वर-सम्बन्धी विचारों, प्रार्थना अथवा जप की ओर मन की दिशा परिवर्तित करने का प्रयत्न कीजिए। यदि दुष्ट विचारों को दूर करने की आपकी अत्यन्त प्रबल इच्छा रही तो वह इतनी सजग रहेगी कि स्वप्न में यदि कुविचार आयें तो आपकी निद्रा तुरन्त जाती रहेगी। आप जाग उठेंगे। ऐसी स्थिति में जाग्रति में यदि शत्रु आये तो उसका सामना करना कठिन न होगा, यदि आप केवल पर्याप्त सजग रहें।

आपको अपने मन को कुनिर्माण और गर्भस्राव से बचाये रखना चाहिए। वह तो खेलने वाले बच्चे के समान है। उसकी उद्दाम शक्तियों को ऐसा मोड़ दें कि वह सत्य के प्रसारण की अविरोधी प्रणालिका बन जाये। सत्त्वगुण से मन को भर देना चाहिए। उसे सत्य अथवा ईश्वर के विषय में चिन्तन करने का सतत अभ्यास कराना चाहिए।

अध्यात्म-मार्ग में यदि शीघ्र प्रगति करना चाहें तो अपने प्रत्येक विचार पर निगाह रखें। खाली मन खिन्न रहता है। वह तो भूत का डेरा है। विचारवान् बनिए। मन पर चौकसी रखिए। प्रत्येक भावना और प्रत्येक विचार की जाँच करते रहिए।

नैसर्गिक वृत्तियों का अध्यात्मीकरण कीजिए, उन्नत कीजिए। दुष्ट वृत्तियाँ बहुत ही भयानक तस्कर हैं। इस तस्कर का ज्ञान-खड्ग से संहार कीजिए। प्रतिदिन अपने चित्त में ईश्वरीय स्पन्दन और दिव्य विचारों को उत्पन्न कीजिए। अपने विचारों को शुद्ध, शक्तिशाली, उदात्त और सुनिश्चित बनाइए। अपार आत्म-शक्ति और आत्म-शान्ति मिलेगी।

प्रत्येक विचार विधायक और श्रेष्ठ ही हों। विचार मानस-रश्मियों के वक्र प्रत्यावर्तन मात्र हैं। विचार मात्र का विनाश कीजिए। उस ज्योतियों की ज्योति परमात्मा में प्रवेश कीजिए। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की यदि वांछा है तो कल्पनाओं और ऊहापोहों का त्याग कीजिए। अपनी भावनाओं को शुद्ध तथा नियन्त्रित कीजिए। इस चेतन जीवन के नीचे एक अत्यन्त विशाल अवचेतन जीवन है।

प्रत्येक आदत का मूल-स्रोत वह अवचेतन मन है। इस विषयनिष्ठ चेतना के सामान्य जीवन की अपेक्षा वह अवचेतन जीवन अधिक प्रबल है। अवचेतन मन की गहराई को भी योगाभ्यास के द्वारा प्रभावित, नियन्त्रित और शुद्ध किया जा सकता है।

कोई एक दुर्गुण लीजिए। उसके विपरीत गुण का प्रतिदिन प्रातः चिन्तन कीजिए। दिन में भी उस पर विचार करते रहिए। दुर्गुण शीघ्र ही दूर हो जायेगा। प्रातः और दिन में दया पर ध्यान कीजिए। आप दयालु बन जायेंगे।

मान लीजिए आपको सप्ताह में तीन के स्थान में माह में एक बार ही दुर्विचार आने लगा है, कोई भी दुर्गुण सप्ताह में एक बार के स्थान में महीने में एक बार आता है तो यह आपकी प्रगति का लक्षण है, बढ़ते हुए मनोबल का चिह्न है तथा विकसित आध्यात्मिक शक्ति का द्योतक है। खूब प्रसन्न रहो। आध्यात्मिक प्रगति को दैनन्दिनी में लिखो।

. यौगिक विचार-संस्कार से आत्म-विकास

योगाभ्यास-काल में जो अलौकिक सिद्धियाँ दृष्टिगोचर होती हैं और योगाभ्यासी जिस सूक्ष्मतर धरातल का अनुभव करता है, वह सब सामान्यतया एक चमत्कार माना जाता है और सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है। योग कोई काल्पनिक नहीं है, न वह असाधारण ही है। उसका उद्देश्य तो मनुष्य की क्षमताओं का समग्र विकास करना है। वह परिपूर्ण और सम्पन्न जीवन का चिरपरीक्षित और युक्तियुक्त मार्ग है और यह स्वाभाविक ही है कि भावी जगत् का प्रत्येक मानव उसका अनुसरण करेगा।

योग की सभी पद्धतियों के आधार में नैतिक शिक्षा और सदाचार है। दुर्गुणों का निरसन तथा गुण-विशेष का विकास योग-सोपान की प्रथम सीढ़ी है। दूसरी सीढ़ी है नित्यव्रताचरण और सद्वर्तन के द्वारा चारित्र्य को शुद्ध और सुदृढ़ बना कर स्वभाव को अनुशासित बनाना।

इस प्रकार व्यवस्थित तथा पवित्र नैतिक चारित्र्य के ठोस आधार पर योग का सारा ऊपरी भवन निर्मित होता है।

. प्रतिस्थापन की पद्धति से विचार-संस्कार

कुविचारों के नाश के लिए प्रतिस्थापन का उपाय बहुत ही सरल और प्रभावकर है। अपने चित्त-रूपी उपवन में दया, प्रेम, पवित्रता, क्षमा, सहनशीलता, उदारता, नम्रता आदि सद्गुणों का अर्जन कीजिए, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, वासना, क्रोध, लोभ, गर्व आदि दुर्गुण स्वयं विनष्ट हो जायेंगे।

दुर्गुणों का सीधा सामना करके उनका नाश करना कठिन है। संकल्प-शक्ति पर अनावश्यक जोर पड़ेगा और शक्ति का अपव्यय होगा।

. विचार-संस्कार के आध्यात्मिक उपाय

दुर्विचार पर बार-बार चिन्तन करते हैं, तो उसे नव-शक्ति प्राप्त होती है। उसमें गति आ जाती है। इसलिए उसे एकदम हटा देना चाहिए। यदि यह कठिन लगता हो तो ईश्वर-सम्बन्धी प्रतिलोम विचारों का चिन्तन आरम्भ करें। उदात्त और उन्नायक विचारों का अर्जन करें। दुर्विचार के प्रतिकार के लिए सद्विचारों का चिन्तन एक अमोघ प्रतिविष है।

यह पूर्वोक्त पद्धति से सरल है। सहस्रों बार भगवान् के नाम का पुनः पुनः प्रतिदिन जप करते रहने पर सद्विचार को नव-शक्ति प्राप्त होती है। प्रतिदिन सहस्र बार अंह ब्रह्माऽस्मि का जप करें तो आपका यह विचार सुदृढ़ होगा कि आप आत्मा हैं। यह जो आज मानते हैं कि ‘शरीर ही मैं हूँ’, यह धारणा क्षीण से क्षीणतर होती जायेगी।

दुर्विचारों के प्रवेश करने पर उन्हें हटाने के लिए अपने संकल्प-बल का प्रयोग न कीजिए। इससे आपकी शक्ति का ही अपक्षय होगा। संकल्प पर जोर पड़ेगा। आप थक जायेंगे। उन्हें भगाने का जितना जितना आप प्रयत्न करते जायेंगे, उतना ही उतना वे नव-द्विगुणित शक्ति से वापस आयेंगे और अधिक शीघ्र आयेंगे। विचार अधिक शक्तिशाली बन जायेंगे।

अतः उनके प्रति उदासीन रहिए। शान्त रहिए। वे शीघ्र ही चले जायेंगे। अथवा उनके स्थान में उनके विपरीत सद्गुण या सद्विचार स्थापित कीजिए। इसे प्रतिपक्ष-भावना-पद्धति कहते हैं। अथवा ईश्वर के चित्र का दर्शन कीजिए, या पूरी शक्ति से मन्त्र-पाठ किये जाइए अथवा ईश्वर-प्रार्थना कीजिए।

. विचार-संस्कार का महत्त्व

विचार-संस्कार बहुत महत्त्वपूर्ण विषय है। इस कला या विद्या को बहुत ही कम लोग जानते हैं। यहाँ तक कि तथाकथित सुशिक्षित लोग भी इस आधारभूत विषय से सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं।

सभी विचार-विक्षेप के शिकार हैं। सभी प्रकार के नाना विचार उनकी मानसिक निर्माणशाला में बनते-बिगड़ते रहते हैं, आते-जाते रहते हैं। न उनमें कोई संगति रहती है, न विवेक। न कोई तालमेल ही होता है, न नियम ही। सभी एक प्रकार की अव्यवस्था और उलझन में फंसे हुए हैं। विचारों में स्पष्टता नहीं होती।

आप किसी विषय पर व्यवस्थित तथा क्रमबद्ध रूप से दो मिनट भी चिन्तन नहीं कर पाते हैं। विचारों से सम्बन्धित नियम या सिद्धान्त आप जानते ही नहीं। मनोजगत् के तत्त्व आपको विदित नहीं हैं।

हमारे अन्दर एक पूर्ण वन्यपशु-पंजर है। सभी प्रकार के वैषयिक विचार विषयी मन में प्रवेश करके तथा विजयी होने के लिए सदा संघर्षरत रहते हैं। चक्षुरिन्द्रिय अपने ही विषयों को आगे लाना चाहती है। सुन्दर नैसर्गिक दृश्य देखने को वह उत्सुक है। श्रोत्रेन्द्रिय अपने विषय के लिए लालायित रहती है। इन्द्रियाँ सर्वदा हीन, निम्नस्तरीय,

वासनात्मक तथा ईर्ष्या, द्वेष, भय आदि विकारयुक्त विषयों को ही मन में प्रवेश कराना चाहती हैं। कई लोग तो ऐसे हैं जो एक मिनट भी उदात्त और दिव्य विचार ला नहीं पाते। उनके मन का गठन कुछ ऐसा हुआ है कि उनकी मानसिक शक्ति वैषयिक पगडण्डी पर ही दौड़ती है।

. विचारों का युद्ध

विचार-संस्कार का प्रारम्भ शुद्ध और अशुद्ध विचारों के आन्तरिक युद्ध से होता है। अपवित्र विचार मन की निर्माणशाला में प्रवेश करने का बार-बार प्रयत्न करता है और बलपूर्वक कहता है, ‘अरे नादान! प्रारम्भ में तुमने मुझे शरण दी। तुम मेरा स्वागत करते रहे। मेरा हार्दिक सत्कार किया। तुम्हारे मन की अवर-भूमि में मुझे बने रहने का पूरा-पूरा अधिकार है। अब मुझ पर क्यों इतने क्रूर हो गये? तुम्हें रेस्टोराँ, होटल, सिनेमा, थियेटर, नाचघर, शराब की दुकान आदि में जाने के लिए एक धक्का ही तो मैं देता था। मेरे कारण से तुम्हारा मन विभिन्न मनोरंजन प्राप्त करता रहा। अब इतने कृतघ्न क्यों हो गये? मैं तुम्हारा प्रतिरोध करूँगा, डटा रहूँगा और बार-बार आता रहूँगा। चाहे जो कर लो। पुरानी आदत से तुम विवश हो, दुर्बल हो। मुझे रोकने की तुममें शक्ति कहाँ?’

अन्ततोगत्वा शुद्ध विचार ही विजयी होता है। रज और तम गुणों से सत्त्वगुण बलशाली है। भावात्मक वृत्ति अभावात्मक वृत्ति पर विजयी होती है।

. सद्विचार : पहली पूर्णता

विचार एक अच्छा सेवक है। वह एक साधन है, उपकरण है। उसका युक्तिपूर्वक ठीक से उपयोग करना चाहिए। सुख-सन्तोष के लिए प्रथम आवश्यक गुण है विचारों का नियन्त्रण।

आपके विचार आपके मुख पर मुद्रित होते हैं। मानव और देव को जोड़ने वाला सेतु यह विचार है। आपका शरीर, आपका धन्धा, आपका घर-सभी तो आपके अपने मन के विचार हैं। विचार गतिशील शक्ति है। सद्विचार पहली पूर्णता है। विचार वास्तविक शक्ति है।

. विचारों को सुधारें और शुद्ध बनें

अपने मन से समस्त अनावश्यक, अनुपयोगी और घृणित विचारों को निकाल दीजिए। अनुपयोगी विचार आपकी आध्यात्मिक उन्नति को अवरुद्ध करते हैं, घृणित विचार आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग के रोड़े हैं। आपके मन में जब अनुपयोगी विचार हैं, तब आप ईश्वर से बहुत दूर हैं। अतएव ईश्वरीय विचार प्रतिस्थापित करें।

जो विचार उपयोगी और सहायक हों, उन्हीं का चिन्तन करें। आध्यात्मिक विकास और प्रगति में उपयोगी विचार उन्नति का पथ है। मन को अपनी पुरानी लकीर पर आदतों की ओर भागने न दें। सावधानी से देखते रहें।

आत्मनिरीक्षण के द्वारा हीन विचार, अनुपयोगी विचार, व्यर्थ विचार, अशुद्ध विचार, वैषयिक विचार तथा ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ आदि के सभी विचार दूर करें। असंगत और बेसुरे घातक विचारों का नाश करना चाहिए। सर्वदा शुद्ध, प्रेममय, उदात्त और ईश्वरीय विचार का स्वरूप रचनात्मक होना चाहिए। वह बलवान्, विधायक और सुनिश्चित होना चाहिए।

जो विचार करें, उसका चित्र मनस्पटल पर स्पष्ट होना चाहिए, समझ-बूझ का होना चाहिए। उससे दूसरों को शान्ति और समाधान मिलना चाहिए। उससे किसी एक को भी लेशमात्र दुःख और पीड़ा नहीं होनी चाहिए। तब आप इस धरती पर एक सद्भाग्यसम्पन्न पुरुष होंगे, समर्थ व्यक्ति होंगे। ईसामसीह और भगवान् बुद्ध की भाँति आप सैकड़ों की सहायता कर सकेंगे, हजारों का उपचार कर सकेंगे, अनेकानेक लोगों का उद्धार कर सकेंगे।

जिस प्रकार आप अपने उद्यान में मालती, गुलाब, नलिनी, केतकी आदि-आदि फूल के पौधे लगाते हैं उसी तरह अन्तःकरण रूप इस विशाल उपवन में प्रेम, दया, करुणा, पवित्रता आदि शान्तिमय पुष्पों वाले विचारवर्तन अपनाइए। इस उपवन को आत्मनिरीक्षण-रूपी जल से सींचना होगा। ध्यान और श्रेष्ठ विचारों द्वारा व्यर्थ, अनुपयोगी और असंगत विचारों के काँटे और घास-फूस हटानी होगी।

१०. पर-दोष-दर्शन छोड़ें

मन का स्वभाव बड़ा विचित्र है। वह जिस विषय पर गम्भीरता से चिन्तन करता है, उसी में तद्रूप हो जाता है; इसीलिए यदि आप दूसरों के दोष और कमियों को देखने लगें तो आपका मन कम-से-कम उतने समय के लिए उन्हीं दोषों और कमियों का रूप ले लेता है।

जो इस मनोवैज्ञानिक नियम से परिचित हैं, वे कभी दूसरों की भूलें और चारित्र्य-दोष देखने नहीं जायेंगे; अपितु दूसरों के गुण ही देखेंगे और सदा उन्हीं की प्रशंसा करेंगे। इस गुण के अभ्यास से एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है और योग तथा अध्यात्म में मनुष्य आगे बढ़ सकता है।

११. अन्तिम विचार के अनुरूप अगला जन्म

मनुष्य के अन्तिम क्षण में जो विचार रहेगा, उसी के अनुसार उसका भविष्य बनेगा। अन्तिम विचार के अनुसार ही उसको आगामी जन्म मिलेगा।

भगवद्गीता (८-६) में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं:

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।।

-मनुष्य अन्त काल में जो भाव रखते हुए शरीर-त्याग करता है, हे कौन्तेय! वह उसी भाव को प्राप्त करता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।

अजामिल ने अपना सच्चारित्र्य छोड़ कर गर्हणीय जीवन यापन करना आरम्भ किया। वह पापमय प्रवृत्तियों में गहरा रंग गया और चोरी-डकैती भी करने लगा। एक वेश्या का गुलाम बन गया। दश बच्चों का पिता बना। उसने अपने अन्तिम लड़के का नाम ‘नारायण’ रखा।

जब मृत्यु-काल आया तो वह अपने अन्तिम पुत्र की बात सोचने लगा। अजामिल के सम्मुख तीन भयानक यमदूत आ खड़े हुए। भयभीत हो कर अजामिल अपने अन्तिम पुत्र को आवाज देने लगा-“ओ नारायण!”

केवल नारायण के नामोच्चारण मात्र से ही हरिदूत दौड़े आये और यमदूतों को हटा कर अजामिल को वैकुण्ठ ले गये।

शिशुपाल की आत्मा भी उज्ज्वल ज्योति के रूप में प्रभु में जा समायी। यह निन्दक शिशुपाल आजीवन भगवान् कृष्ण की निन्दा ही करता रहा और अन्त में प्रभु में ही लीन हुआ।

भृंग जिस कीड़े को ले जा कर अपने घर में रखता है, वह कीड़ा कुछ समय में स्वयं श्रृंग बन जाता है; उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवान् की निन्दा में अपना सारा ध्यान केन्द्रित करता है, वह भी अपने सारे पाप धो डालता है और भगवान् को उसी प्रकार प्राप्त करता है जिस प्रकार अन्य भक्त जन नियमित भक्ति के द्वारा प्राप्त करते हैं जैसे गोपियों ने काम-भावना से, कंस ने भय से, शिशुपाल ने द्वेष और घृणा से तथा नारद ने प्रेम से पाया।

श्री कृष्ण गीता (८-१४,१५ और १६) में कहते हैं :

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ।।

-जो व्यक्ति अनन्य चित्त हो कर सर्वदा मेरा स्मरण करता है, उस नित्य युक्त योगी के लिए, हे पार्थ! मैं सुलभ हूँ।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ।।

-इस प्रकार मुझे प्राप्त करने पर वह दुःखमय अनित्य संसार में पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, वह महात्मा परम सिद्धि पा चुका है।

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म विद्यते ।।

– हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक अनित्य हैं, उनमें जा कर पुनः लौटना होता है; परन्तु मुझे प्राप्त होने के बाद पुनर्जन्म नहीं है।

इसीलिए :

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ।।

-सदा-सर्वदा मेरा ही स्मरण करो और प्रयत्न करते रहो। इस प्रकार मन और बुद्धि मुझमें लीन किये रहने से निश्चित ही मुझको प्राप्त होओगे (गीता : ८-७)।

सामान्य गृहस्थ पुरुष भी सांसारिक कृत्य करते हुए सदा हरि-स्मरण बनाये रखता है तो यह उसे अन्त समय में ईश्वर-स्मरण करने की सहज प्रेरणा देगा।

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं:

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।।

-जो व्यक्ति अभ्यास करते-करते अचंचल मन से परम पुरुष का अनुचिन्तन करता है, हे पार्थ! वह उस दिव्य परम पुरुष को ही प्राप्त होता है (गीता : ८-८)।

भगवान् श्री कृष्ण आगे कहते हैं :

अन्तकाले मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्

यः प्रयाति मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ।।

-जो व्यक्ति अन्त काल में मेरी परम सत्ता का ही विचार करते हुए, श्री कृष्ण या नारायण के रूप में मेरा ध्यान करते हुए शरीर का त्याग करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं, मेरे भाव को पा लेते हैं, इसमें शंका नहीं (गीता : ८-५)।

गीता में अन्यत्र कहा है :

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।।

-जो अन्त समय में भी अपना मन मुझमें स्थिर कर देता है, सर्वसंन्यास की उस ब्राह्मी-स्थिति को प्राप्त करने पर फिर वह मोहित नहीं होता (गीता: २-७२)।

जो व्यक्ति अपने जीवन-काल में सुँघनी का सेवन करने का आदी होता है, उसकी मृत्यु से पहले अचेतनावस्था में भी उसकी अँगुलियाँ सुँघनी सूँघने-जैसी हलचल करती हैं। इसका अर्थ यह है कि उसमें सुँघनी के सेवन की बहुत पक्की आदत पड़ी हुई है।

कामुक व्यक्ति के मन में अन्तिम क्षण में अपनी प्रिया का ही विचार आयेगा। पुराने शराबी का अन्तिम विचार शराब का एक घूँट पीने का होगा। लोभी साहूकार का अन्तिम विचार धन से सम्बन्धित होगा। अपने पुत्र के प्रति अत्यन्त आसक्त माता का अन्तिम विचार पुत्र-सम्बन्धी होगा और योद्धा का अन्तिम विचार शत्रु पर गोली चलाना ही होगा।

राजा भरत ने दया से प्रेरित हो कर हिरन का एक बच्चा पाल लिया था; किन्तु उसके प्रति मन में आसक्ति पैदा हो गयी और अन्त काल में उसके मन में उसी हिरन काविचार आया, इसलिए उसे अगला जन्म हिरन की योनि में लेना पड़ा; लेकिन चूंकि वह अत्यन्त सिद्ध व्यक्ति था, इसलिए पूर्व-जन्म का स्मरण उसे रहा।

निरन्तर अभ्यास के द्वारा जीवन-भर जिसने हरि-स्मरण की आदत डाली होगी, मन को हरिमय बनाया होगा, उसी का अन्तिम विचार हरिमय हो सकेगा। एक दिन, दो दिन या महीने, दो महीने के अभ्यास से सधने वाली यह बात नहीं है। यह तो जीवन-भर के सुदीर्घ अभ्यास तथा प्रयास का फल है।

अन्तिम विचार जैसा होगा, वैसा ही अगला जन्म होगा। जीवन-भर जो विचार प्रमुख रहा होगा, वही विचार अन्तिम समय में आयेगा। अन्तिम समय में जो विचार प्रमुख रूप से रहता है, उसने सामान्य जीवन में बहुत प्रमुख भाग लिया होगा, सबके अधिक ध्यान खींचा होगा। उस अन्तिम विचार के अनुरूप ही अगला जन्म मिलने वाला है। मनुष्य जो सोचता है, वही बनता है।

१२. सात्त्विक विचार की पृष्ठभूमि

अधिकांश लोग कोई-न-कोई स्थूल, ठोस पदार्थ चाहते हैं, जिसका वे सहारा ले सकें, जो उनके ऊपर अभिभूत हो सके, अर्थात् जिसमें वे अपना विचार-चिन्तन स्थिर कर सकें, जीवन-भर जिसे चिन्तन का केन्द्र बना सकें। यह मन का अपना स्वभाव ही है। मन को स्थिर करने के लिए विचार की कोई एक पृष्ठभूमि होनी चाहिए।

इसके लिए किसी सात्त्विक मनोभाव का आधार अपनाइए। आप जिस पर भी पूरे मन से विचार करने लगते हैं, आपका मन वही रूप ले लेता है। सन्तरे का चिन्तन चला, तो मन सन्तरे का रूप ले लेता है। मुरलीधर श्री कृष्ण का चिन्तन चला, तो मन तद्रूप होता है; इसलिए मन को सही अभ्यास कराना चाहिए और उसे तदाकार होने के लिए कोई सात्त्विक आधार ही देना चाहिए।

अपने अन्तिम ध्येय (मुक्ति) की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि मन को सात्त्विक अधिष्ठान दें। यदि आप भगवान् श्री कृष्ण के भक्त हैं, तो श्री कृष्ण के चित्र की पृष्ठभूमि का आधार रखिए और उनके नाम के प्रसिद्ध मन्त्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप कीजिए और उनका गुणगान कीजिए। यदि आप निर्गुण उपासक (वेदान्ती) हैं, तो ॐ का विचार करना चाहिए और उसके अर्थ-अनन्त आलोक-निधि, सच्चिदानन्द, व्यापक, परिपूर्ण आत्मा का चिन्तन करना चाहिए। सांसारिक कर्तव्य अवश्य कीजिए; पर ज्यों- ही मन खाली हो, तुरन्त अपने आधारभूत

विचार पर चले आइए-सगुण, निर्गुण जो भी आपको रुचिकर हो, आपके अनुकूल हो, आपकी साधना की क्षमता के अनुरूप हो। निरन्तर अभ्यास से मन उस वस्तु का आदी हो जाता है; फिर अनायाश मन उस पर स्वयं चला जायेगा।

यह बड़ा शोचनीय विषय है कि अधिकांश लोगों के जीवन में न कोई आदर्श होता है और न कोई कार्यक्रम ही; फिर सात्त्विक विचार के आधार की बात कहाँ से आये? निश्चय ही वे अपने जीवन में असफल रहेंगे। एक नवयुवती की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या होगी? निश्चित ही विषय-प्रधान होगी। बूढ़ी माँ की वैचारिक पृष्ठभूमि अपने बच्चों और पोते-नातियों के प्रेम की रहेगी। अधिकांश लोगों की मनोभूमि घृणा और ईर्ष्या की रहती है।

तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों के पास विद्यालयों के और अन्य कई प्रकार के प्रमाणपत्रों की ढेरी होगी, जो वास्तव में आध्यात्मिक ज्ञान की तुलना में खाक के बराबर होगी; किन्तु उनके जीवन में न तो कोई लक्ष्य होता है, न कार्यक्रम और न वैचारिक पृष्ठभूमि ही होती है। बड़ा अधिकारी है, सेवा से निवृत्त होता है तो तीसरा विवाह करके किसी दूसरे काम की खोज में निकलता है।

वैषयिक वृत्ति वाले व्यक्ति का मन सर्वदा वासनामय विचारों और ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, प्रतिहिंसा आदि से ही भरा होता है। ये दो प्रकार के विचार सदा उसके मन में घर किये रहते हैं। इन द्विविध विचारों का वह दास हो जाता है। वह नहीं जानता है कि मन को कैसे मोड़ा जाये और उसे किसी उच्च तथा श्रेष्ठ विचार में कैसे लगाया जाये। उसे विचारों की रीति-नीति ही विदित नहीं। वह मन का स्वभाव और उसके कार्य करने की पद्धति से सर्वथा अनभिज्ञ होता है। यद्यपि उसकी भौतिक सम्पदा और विश्वविद्यालय में अर्जित उसका ज्ञान अपार है, फिर भी उसकी स्थिति बड़ी दयनीय होती है। उसमें विवेक जगा ही नहीं है। उसे साधु-सन्त, शास्त्र और ईश्वर पर श्रद्धा नहीं है। चूंकि उसका संकल्प-बल अत्यन्त क्षुद्र है; इसीलिए किसी दुष्ट विचार, कामना या प्रलोभन को वह रोक नहीं पाता। उसकी इस सांसारिक प्रमत्तता को, वैषयिक लालसा को तथा प्रापंचिक भ्रम को दूर करने का एकमात्र सर्वोत्तम उपाय है सतत सत्संग- साधु-संन्यासी, महात्माओं का सहवास।

कार्य-निवृत्त होने के पश्चात् प्रत्येक मनुष्य को अपनी एक वैचारिक पृष्ठभूमि बना लेनी चाहिए और ईश्वरीय चिन्तन तथा वेदान्त-विचार में मन लगाना चाहिए। बिखरे और हलके विचारों की प्राचीन आदत के स्थान में अच्छे और व्यवस्थित विचारों की नयी आदत डालनी चाहिए।

प्रारम्भ में अच्छे विचारों का चिन्तन करने की वृत्ति निर्मित होगी। सतत अभ्यास से उपयोगी तथा सहायक विचारों के विधायक और निश्चित चिन्तन की आदत विकसित होगी। इसके लिए कठोर प्रयास करना होगा।

पुरानी आदतें पुनः पुनः आती रहेंगी। जब तक एकमात्र सद्विचारों का नित्य चिन्तन दृढ़मूल नहीं हो जाता, तब तक सात्त्विक विचारों को, ईश्वर-सम्बन्धी विचारों को, गीता, श्री कृष्ण, प्रभु रामचन्द्र, उपनिषदों आदि के श्रेष्ठ विचारों को अपने मन में बार-बार भरते रहना होगा; तब नयी लकीर पड़ेगी, नये विचारों का संस्कार पक्का हो जायेगा। जिस प्रकार ग्रामोफोन की सूई रेकार्ड पर ध्वनि की सूक्ष्म रेखाएँ बना देती है, उसी प्रकार नये स्वस्थ विचार मन और मस्तिष्क में नयी रेखाएँ बना देंगे, नये संस्कार बनेंगे।

निर्विकल्प समाधि अथवा शुद्ध ज्ञान और आनन्दमय अवस्था ही है जो जन्म-मृत्यु के कारणीभूत समस्त विचारों को भस्म कर देती है। आसक्ति ही मृत्यु है। आपको ऐहिक सुख देने वाले शरीर, काम, पत्नी, बच्चे, सम्पत्ति, घर, स्थान, सामान आदि सब पर आपकी बड़ी आसक्ति है। जहाँ आसक्ति हैं वहाँ क्रोध, भय और वासना अवश्य रहती है। आसक्ति से बन्धन होता है। ईश्वर-दर्शन चाहते हैं तो सभी प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होना पड़ेगा।

अनासक्ति का पहला कदम यह है कि हमें अपने शरीर से आसक्ति छोड़नी होगी, जिसके साथ आज इतने एकरूप हो बैठे हैं। ‘आत्मा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘अत्’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है ‘सतत गमन’। इससे आत्मा शब्द का यह अर्थ हुआ कि वह सर्वदा अपने मूल रूप को-सत्-चित्-आनन्द रूप को-पाने के लिए विश्व के नाना रूपों और नामों के रूप में संचार करता रहता है।

१३. शुद्ध ज्ञान और विचार-मुक्ति

योग और ध्यान की दृढ़ साधना से, सतत अभ्यास से आप विकल्प-रहित और विचार-मुक्त हो सकते हैं। इस प्रकार का अचंचल चित्त वाला योगी सभाएँ करते फिरने वाले मनुष्य की अपेक्षा अधिक विश्व-कल्याण करता है। सामान्य लोगों को यह बात समझ में आनी कठिन है। जब आप विकल्प-रहित हो जायेंगे, तब संसार के कण-कण में आप व्याप्त हो जायेंगे और संसार को पवित्र तथा समृद्ध करेंगे।

जड़भरत और वामदेव आदि इस प्रकार के निर्विकल्प ज्ञानियों का नाम आज भी स्मरण किया जाता है। उन्होंने कभी पुस्तकें नहीं लिखीं तथा शिष्य-मण्डली नहीं बनायी; फिर भी संसार के लोगों के चित्त पर इन विकल्प-रहित ज्ञानियों ने कितना भव्य और अद्भुत प्रभाव डाला है।

आप तभी ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे जब आप वैषयिक कामनाओं और अनैतिक मनःस्थितियों से मुक्त होंगे। ज्ञान-प्राप्ति के लिए वैषयिक आकांक्षाओं और अनीतिमय मनोदशाओं से अनासक्त होना, अलग हो जाना आवश्यक है; तभी दिव्य अवतरित होगा।

जिस प्रकार राष्ट्रपति का स्वागत करना होता है, तो बंगले की ठीक से सफाई करते हैं झाड़-झंखाड़ हटा कर बगीचे की सफाई करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रपतियों के राष्ट्रपति परब्रह्म के स्वागत में भी चित्त-भवन की खूब सफाई करनी चाहिए, उसमें से अनैतिक विचार-रूपी घास-फूस निकाल बाहर करनी चाहिए।

चित्त में जब कोई कामना उठती है तो सांसारिक मनुष्य उसका स्वागत करता है और उसकी पूर्ति की चेष्टा करता है, लेकिन साधक उसे विवेक के द्वारा तत्काल त्याग कर देता है। ज्ञानी जन कामना के बिन्दु मात्र को भी भयानक शत्रु मानते हैं; इसलिए किसी प्रकार की कामना को वे प्रश्श्रय नहीं देते। वे सर्वदा एकमात्र आत्मा में ही सन्तुष्ट रहते हैं।

चिन्तन का अर्थ ही कृति का प्रारम्भ है-चिन्तन अर्थात् बहिर्मुख होना, विषय-प्रवृत्त होना। चिन्तन का अर्थ है-भेदभाव करना, गुण-स्मरण करना, द्विगुणित करते जाना। चिन्तन ही संसार है। चिन्तन ही के कारण शरीर के साथ अपनापन दृढ़ हुआ करता है। चिन्तन से ही ‘अहन्ता’ और ‘ममता’ का विकास होता है।

चिन्तन काल-देश-सापेक्ष है। वैराग्य और अभ्यास के सहारे चिन्तन-प्रक्रिया को समाप्त कीजिए। शुद्ध चैतन्य में विलीन होइए। जहाँ चिन्तन नहीं है, वहाँ संकल्प नहीं है। वह परम पद की प्राप्ति है, जीवन्मुक्ति है।

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