छत्तीसगढ़ी हाना छत्तीसगढ़िया लोकजीवन की गाथा
-रमेश चौहान

छत्तीसगढ़ी हाना छत्तीसगढ़िया लोकजीवन की गाथा
प्रस्तावना-
‘छत्तीसगढिया सबले बढिया’ अर्थात छत्तीसगढ़ के निवासी सबसे अच्छे । सबसे अच्छे तो किन संदर्भों में भौतिक संपदा में, व्यापारिक उन्नति में, शिक्षा के क्षेत्र में, या फिर तकनीकी के क्षेत्र में । ऐसा तो नहीं ‘छत्तीसगढिया सबले बढि़या’ कहना छत्तीसगढ़ के लोगों का दंभ है? नहीं-नहीं ऐसा कहना दंभ नहीं है । न केवल छत्तीसगढ़ के लोग अपितु गैर छत्तीसगढ़िया भी छत्तीसगढ़ के लोगों को लोक व्यवहार में सबसे बढ़िया मानते हैं । लोक व्यवहार, लोक जीवन और लोकसंस्कृती के गंगोत्री से निसृत गंगा है, जो कल कल करती हुई छत्तीसगढ़ के रगों में प्रवाहित है । इसी लोक व्यवहार का साक्ष्य है छत्तीसगढ़ी हाना ।
हाना किसे कहते हैं ?
हिन्दी भाषा में जिसे कहावत कहते हैं, उसे ही छत्तीसगढ़ी भाषा में हाना कहा जाता है । हाना में लोकोक्ति और कहावत अंतर हिन प्रतीत होते हैं । वास्तव में हाना में लोकोक्ति और कहावतों का मिश्रण देखने को मिलता है । हाना छत्तीसगढ़ के लोक जीवन के प्रतिबिंब के रूप में अवलंबित है । छत्तीसगढ़ी हाना के माध्यम से छत्तीसगढ़ के लोकजीवन को सहज ही झांका जा सकता है । डॉं. रमाकांत सोनी अपने हाना संग्रह का शीर्षक ‘हाना: जिनगी के गाना’ रखा है । यह शीर्षक ही स्पष्ट कर देता है कि हाना जीवन की एक गाथा ही है ।
डॉ. सुधीर शर्मा के शब्दों में -”ये (हाना) मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों को लोकायित करते हैं ।”
श्री महेन्द्र वर्मा के शब्दों में हाना लोकोक्ति मात्र लोक उक्ति नहीं है बल्कि यह सु-उक्ति अर्थात सूक्ति या सुभाषित भी है।
हाना की परिभाषा-
हाना को प्रयोग और व्यवहार की दृष्टिकोण से निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-
”हाना छत्तीसगढ के लोक-जीवन अनुभव से नि:सृत वह युक्ति संगत वाक्य है जो बोलचाल में प्रयुक्त होने पर भाषा की शोभा में अभिवृद्धि करता है, और स्रोता को उससे जीवन मूल्य ग्रहण करने को प्रेरित करता है ।”
”हाना लोक संस्कृति, लोकव्यवहार से उत्पन्न वाचिक परम्परा से पुष्पित पल्लवित युक्ति संगत कथन है जो भाषा को समद्ध करने के साथ-साथ जीवन अनुभव का संदेश भी देता है ।”
”जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह हाना बन जाता है । हाना एक प्रकार से “गागर में सागर” होता है।”
सोना तपने पर कुंदन बनता है, जीवन तपने पर हाना-
जिस प्रकार सोना तपने पर कुंदन बनता है, उसी प्रकार लोगों का जीवन तपने पर ही हाना प्राप्त होता है । हाना जीवन अनुभव का सत्व है जो, एक पथ प्रदर्शक के रूप में हमारे आगे-आगे चलता है । लोक जीवन के अनुभव के बल पर ही हाना बनता है । हाना यूँ ही कहे जाने वाला कथन नहीं है अपितु हाना एक ऐसा कथन है जिसमें एक जीवन दर्शन अवश्य होता है ।
जैसे-
1. ‘‘चलनी म दूध दुहै, करम ल दोस दै‘‘
शाब्दिक अर्थ- छलनी, छिद्र युक्त पात्र में दूध दूह कर अपने भाग्य को दोष देना ।
संकेतार्थ-भाग्य को दोष देने के बजाये अपने काम पर ध्यान दीजिये । किसी काम को केवल करना है यह मानकर न करें अपितु उस कार्य में सफलता प्राप्त करने के अनुकूल परिस्थियों का आकलन करके योजनापूर्वक काम करें ।
विशेष अर्थ- यह हाना कर्मवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है जिसका उद्घोष श्रीमद्भागवत गीता ‘कर्मण्येवाधिकारस्तु’ कहके करती हैं वहीं जिसे रामचरित मानस-‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ कह कर यशगान करती है ।
2. “अपन मरे बिन सरग नइ दिखय”
शाब्दिक अर्थ– स्वयं के मृत्यु के पूर्व स्वर्ग को नहीं देखा जा सकता ।
संकेतार्थ-जब तक आप स्वयं किसी कार्य को नहीं करेंगे तबतक उसकी सफलता संदिग्ध रहेगी । अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मृत्यु तुल्य कष्ट सहकर भी उस कार्य को पूरा करना चाहिए ।
विशेष अर्थ- यह हाना कर्मवाद को प्रतिपादित करने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता के महत्व को भी प्रतिपादित करता है ।
इस प्रकार हाना एक कथन मात्र न होकर एक जीवन दर्शन है । निश्चित ही हाने का जन्म जीवन के सफलताओं और असफलताओं के कारणों के सूक्ष्म विश्लेषण से ही हुआ होगा ।
हाना मस्तिष्क में एक घटना का दृश्य खींच देता है-
जब हम कोई हाना सुनते हैं तो ऐसा लगता है हां इस प्रकार की कोई घटना कभी न कभी, कहीं न कहीं घटित हुई हैं क्या ? यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि किसी हाने का जन्म किसी घटना विशेष के कारण ही हुआ है किन्तु वह हाना स्रोता को इसी प्रकार एक घटना की कल्पना करने को विवश जरुर कर देता है ।
जैसे-
छानही म होरा भुंजना
शाब्दिक अर्थ- छप्पपर पर होरा (अनाज के पौधे) जलाना
संकेतार्थ- अपने मद घमंड में कुछ ऐसा अतिसय काम करना जिससे खुद को, परिवार को और समाज को नुकसान होने की आशांका हो ।
विशेष अर्थ- अपना काम मर्यादा में रहकर करना चाहिए । मर्यादा की सीमा उल्लंघन करने से नुकसान होने की आशंका होती है ।
दृश्य कल्पना- इस हाना को सुनकर एक दृश्य अनायास उभर आता कि कोई व्याक्ति अपने छप्पर पर होरा भुंज रहा है ।
हाना छत्तीसगढ़िया लोकजीवन की गाथा
हाना छत्तीसगढि़या लोकजीवन की गाथा है । छत्तीसगढ़ के लोग पारम्परिक रूप से क्या सोचते हैं ? किस बात को महत्व देते हैं ? उनके जीवन में क्या मायने रखता इसे हाना सहज रूप से ही दिखा देता है ।
जैसे –
खेती रहिके परदेस मां खाय, तेखर जनम अकारथ जाय।
(यदि कोई स्वयं के पास खेती होने के बावजूद भी पैसों के लिए परदेश जाता है तो उसका जन्म ही निरर्थक है।) यह हाना छत्तीसगढि़या लोगों के खेती के प्रति समर्पण को प्रदर्शित करता है । अपनी खेती कार्य को छोड़ने को जीवन निर्थक कहना खेती के प्रति आस्था को प्रकट करता है । इस हाना से स्पष्ट है छत्तीसगढ़ के लोग खेत और खेती को बहुत अधिक बहुत देते हैं । इसी का परिणाम है कि छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा गया ।
आषाढ़ करै गाँव-गौतरी, कातिक खेलय जुआ।
पास-परोसी पूछै लागिन, धान कतका लुआ।
(आषाढ़ के महीने में गाँव-गाँव घूमते रहने तथा कार्तिक के महीन में जुआ खेलते रहने वाले किसान को उसके पड़ोसी व्यंगपूर्वक पूछते हैं कि कितनी फसल हुई?)
यह हाना भी कृषि के महत्व को रेखांकित कर रहा है । आषाढ़ का महिना कृषि कार्य के लिए बहुत महत्व का होता है जिस प्रकार मकान बनाते समय नींव का महत्व होता है वही महत्व कृषि में बुवाई का होता है जो आषाढ़ महिने में होता है और इस समय यदि किसान घूमने-फिरने चला जाये तो वह क्या बोयेगा और क्या काटेगा ?
इस हाने में ‘कातिक खेलय जुआ’ (कातिक महिना में दीपावली पर जुआ खेलना), छत्तीसगढ़ के एक कुसंस्कृति को इंगित कर रहा है जिसके अनुसार यह मान्यता है दीपावली त्यौहार के अवसर जुआ खेलने की परम्परा है ।
“आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!”
(आज का बासी भोजन, कल की बासी सब्जी अपने घर में खाने, अपना पेट भरने में शर्म नहीं करना चाहिए याने कि अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म)
यह हाना अपने आप में छत्तीसगढि़या परम्परा की तीन बातों को एक साथ समेटे हुए है, एक बासी खाने की परम्परा, दूसरा संतोषी जीवन जीने की परम्परा और तीसरा आत्मनिर्भर होने की परम्परा ।
बासी खाने की परम्परा-
छत्तीसगढ़ बासी खाने की प्राचीन परम्परा है । रात को बनाये गये भात (चावल) जो बच जाये उसे पानी से भिगो दिया जाये तो इसे बासी कहते हैं । इस बासी को छत्तीसगढि़या चटनी के साथ बड़ चाव से खाते हैं ।
संतोषी जीवन जीने की परम्परा-
छत्तीसगढि़या लोग स्वभाव से परम संतोषी हैं । अपने पास जितना है उसी में गुजरा कर लेने कि अदम्य आत्मिक बल है, इन लोगों के पास । छत्तीसगढि़या लोग “रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जी”। इस कथन को जीवंत में रूप जीने का प्रयास करते हैं ।
आत्मनिर्भर होने की परम्परा –
छत्तीसगढि़या लोग अपने निजि न्यूनतम आवश्यकता के लिए आत्मनिर्भर होते हैं । अपनी आवश्यकता की हर चीज स्वयं विकसित करने का प्रयास करते हैं । भोजन के लिए खेतों में अन्न उगाना, दाल के लिए दलहन, तेल के लिए तिलहन, सब्जी के लिए बारी-बखरी में सब्जी उगाना यहां तक वस्त्र के लिए कपास उगना एक किसान के जीवन का पारम्परिक रूप देखा जा सकता है । यह अलग बात है कि समय के अनुरूप इसमें कुछ गिरावट हुआ है किन्तु आत्मनिर्भरता का संदेश अपने अंतस पर पाले बैठे हैं ।
बरसा पानी बहे न पावे, तब खेती के मजा आवे
(खेती का मजा तो तब है जब बरसात का पानी बहने ना पावे, खेत में ही रहे।)
यह हाना खेती और पानी के सहज संबंध को दिखाते हुए जलसंरक्षण के महत्व को प्रतिपादित कर रहा है । यह हाना किसानों को ऐसे उपाय करने को प्ररित कर रहा है जिससे वर्षा का जल उनके खेत में रूके अनावश्यक रूप से बह कर खेत से बाहर न जाये । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसान हर चार-पांच साल के अंतराल में अपने खेत के मेढ़-पार को ऊँचा बनाते हैं, खेत को गहरा करते हैं जिससे वर्षा का जल खेत में रूके । इससे स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में वाटर हार्वेस्टिंग की धारणा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है।
“करनी दिखय मरनी के बेर”
(किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।)
यह हाना छत्तीसगढिया लोगों के अध्यात्म के प्रति श्रद्धा और कर्मफल सिद्धांत के महत्व को प्रतिपादित करता है । ‘जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा’ जीवन में जो अच्छे-बुरे कर्म किए जाते उनका फल जीवन के उत्तरार्ध में देखने को अवश्य मिलता है इसलिए जीवन में सतकर्म करना चाहिए । यह हाना लोगो को अच्छे कर्म करने की प्रेरणा दे रहा है ।
उपसंहार-
छत्तीसगढ़ी हाना न केवल छत्तीसगढी भाषा को समृद्ध करता है अपितु छत्तीसगढि़या संस्कृति को भी जीवंत रखता है । छत्तीसगढ़ी बोली भाषा में असंख्य हाना मिलते हैं । हर हानों का भाषायिक और सांस्किृतिक महत्व है । हाना कम शब्दों में ही बहुत कुछ कह देता है । प्रत्येक हाना में जीवन का कुछ न कुछ संदेश अवश्य छुपा होता है । गहरे भावों को हल्के में कहने का साधन है हाना । जिस बात को किसी व्यक्ति को किसी अख्यान से नहीं समझाया जा सकता उसे हाना के माध्यम से वह संदेश दिया जा सकता है । इस प्रकार छत्तीसगढ़ी हाना छत्तीसगढि़या संस्कृति का जीवन दर्शन है । छत्तीसगढि़या लोकजीवन की गाथा है ।
-रमेश चौहान
अब्बड़ सुग्घर लेख बधाई
सादर धन्यवाद तिवारीजी