छत्तीसगढ़ी व्यंग्य :भगत के गत -धर्मेन्द्र निर्मल

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य :भगत के गत

-धर्मेन्द्र निर्मल

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य :भगत के गत -धर्मेन्द्र निर्मल
छत्तीसगढ़ी व्यंग्य :भगत के गत -धर्मेन्द्र निर्मल

जगतराम के टीारपी बाढ़े ले वोह भगत के नाम से जगप्रसिद्व होगे। ओकर भरोसा मीडिया ल अपन टीआरपी बढ़ाए के चस्का चढ़गे। भगत के गत, सत, लत, मत अउ रत ल जाने खातिर मीडियावाले ओकर घर जाए के सोचिस। भगत जी परछी म पलथियाए जेवन करे के तियारी म रहय। आचमन करके पहिली कौंर भगवान के भोग बर थारी के खाल्हे भूइयाँ म मड़ाए भर रिहिसे। ओतके बेरा मीडियावाले मन धमक दीन। भगतजी देखिस। बइठे के इसारा करके गपागप सपेड़े लगिस। भक्तिन ओकर चहा-पानी के बेवस्था करे लगिस। ओतके बेरा बारी कोति ले गाय आइस। अँगना में सुखावत धान म अभर गे।

‘उँ….उँ… उँ….उँ… उँ….उँ.. भगत जी नरियाइस।
हे हे हे हे….. भक्तिन पानी देवत चिचियाइस।

भगतजी कुपित होगे। खाते-खावत रूकगे। कोंटा कोति इसारा करत भक्तिन ल गुर्री-गुर्री देखे लेगिस – उँ….उँ… उँ….उँ…
भक्तिन देखथे कोंटा म डण्डा परे हे। पानी ल छोड़ डण्डा म सोंटियावत गइया ल खेदारिस।

भक्तिन के आवत ले भगत जम्मो साग ल गफेल डारे रहय। भक्तिन धकर-लकर कटोरी म भाजी साग ले के आइस अउ देहे लागिसं।
हूँ…। भगतजी नागराज कस फुसकारिस अउ दूसर कटोरी कोति इसारा करिस।

भक्तिन लहुटिस अउ तुरते दूसर कटोरी धर के फेर आगे अउ परोस दिस।
कोंदा हे तइसे लागथे यार-एक अखबारी दूसर ले शंका जताइस। सक चलय चाहे झन चलय फेर पुलुस अउ पत्रकार के शंका दू कदम आगू बजूर चलथे।
नहीं, बोलथे गोठियाथे।
त ये सब नैन-मटक्का, इसाराबाजी का हरे ?
ले न खाके उठन दे पूछबो।
पूछे -जाने बर तो आएच हन का। – दूनो नैन मटक्का करिस अउ दूनो एक दूसर ल अपन -अपन बत्तीसी के चमक देखाइन।
बोयंअ…
अखबारीमन चमक गे । अचानक भँइस कहां ले आ गे। उन अबक-तबक उठके भगइयच् रिहिने हे कि देख परथे- अरे ! अलकरहा डकारथौ भगतजी।

भगतजी डकारत कहिस – बोंयंअं…. ये पेट भरे के पहिचान हरे। एकर ले उपरहा खाए माने हदरहा कहाए। कहां ले पधारे हौ साहेब ?
हमन जिला के ‘‘अपना सपना छपना’’ समाचार वाले अन। तुंहार लोकप्रियता सुनके थोक -बहुत जानकारी लेहे बर आए हवन।
सपना छपना के नाम सुनते साठ भगतजी के मन हिरना होगे। सपना के जंगल म छपाक-छपाक उछले लगिस। खुसी के मारे मुँह ले हाँसी छलांग मारे परय। होंठ तनाय लेवय अउ दाँत बाहिर कूदे परय। भगतजी खुसी ल खाँसे-खखारे के बहाना खखौरी म चपक के राखिस। तेकर पाछू गंभीरता के कथरी ल ओढ़के कहिस- पूछौ न का जानकारी ?

पत्रकार महोदय सद्भावना मैच के सुरूवात करिस- भगतजी ! खावत-खानी जउन घटिस हे तेला हमन समझ नइ पाएन, थोरिक बताहू का ?
भगतजी नेवरिया बहू कस लजागे- छोड़व ओला साहेब।
ओला नइ लिखन-देखावन भई। अइसेनेहे झोलाछाप सवाल हरे।

भगत जी एक मन सोचिंस – तुंहर बर भले झोलाछाप हे। मोर बर तो कई तोला के हे रे भइया। फेर कहिथे – काहे…..पहिली मैं चिचियाएवं कि गाय आ गे हे भगावव। दूसरइया पइत खिसियाएवं कि ‘हे हे’ म नइ मानय, ओदे कोंटा म डण्डा परे हे, मार के भगा।
अउ जेवन परोसे के बेरा तको तो कुछू कहे हौ का ?

पहिली खेप म भाजी ल लाए रिहिसे, ओला मना करेवं। गोभी-आलू के चिखना ल मंगाए हौं।
भक्तिन दाई संग कुछू अनबन-वनबन होगेे हे तइसे लागथे ? दूसरइया जेवन लावत नइ देखेन ?
नहीं…बने -बने हे गा। मैं एके परोसा खाथंव। खावत-खानी बोलवं नहीं, मौन धारण करके खाथौ।
काबर ?

एके परोसा माने जतका हे ओतके संतोष। मौन ले अन्न के मान होथे। अउ जइसन करबे अन्न वइसन होथे मन। ए मौन ह मन के छन्न-छन्न ल थाम्हे के साधन हरे।
त चिखना ल ?

चिखना के का दीखना अउ का लिखना साहेब। वोह चल जथे। अउ मने मन अपवित्र मंत्र उच्चारथे – ये अनदेखना मन मोर खवई ल तको नइ देख सकिस।
तुंहर प्रमुख देव कोन हरे ?

अइसे तो हमर जात-गोत के देवता ‘दूल्हा देव’ हरे। फेर मैं सबो देवता ल मानथौं-पूजथौं। समेे अउ परिस्थिति के मुुताबिक। पढ़ई जीवन म सरस्वती माँ के पूजा करेंव। बर-बिहाव के पीछू धन के देवी लक्ष्मी के पाछू पर गेंव। अभीन-अभी शिव पार्वती ल मनाए के चक्कर म परे हौ।
काबर, माने कोनो एक ठिन म पूर्ण आस्था नइ हे ?

ज्ञान के देवी सरस्वती, धन के देवी लक्ष्मी, पारिवारिक मया-जुराव बर शिव-पार्वती जी। बस जस जस जइसन समे, परिस्थिति अउ जरूरत तब-तब तइसेे साधना। साधना काए ?- अपन साध ल साधना ही तो साधना हरे।
कहाँ तक पढे -लिखे हौ ?
गाँवे तक भर रहे – पढ़े हौं।
मतलब ?
गाँव म पाँचवी तक स्कूल हे, बस ओतके ल जान। अउ सबले बड़े बात छोटे-छोटे लइका मन ल संभालना तको जरूरी राहय।
छोटे-छोटे लइका माने…….?

स्कूल म सबले बड़े महीं रहेंवं, त गुरूजी मोला कप्तान बनाके एके कक्षा म दू-दू तीन -तीन साल ले रखैं। अब आप मन तो जानते हौ स्कूल के हाल -चाल ल। सौ -दू सौ लइका म एक झिन गुरूजी। उप्पर ले दुनियाभर के चोचला। कभू ए बइठक, कभू वो बइठक, कभू वो ड्यूटी त कभू वो ड्यूटी। एकर ले ए फायदा होइस कि मैं दुनिया भरके पढ़ई ल गांवे म कर डारेंव। उही किताब उही करिया अक्षर ल पढ़े बर फोकट बाहिर का घूमई। फालतू खर्चा करे के का काम ? संगम के पानी पी लिए ताहेन बारा घाट जाए के का जरूरत ?
कतको झन कहिथे तुमन कोनो ल राम नइ भजौ ?

काबर भजौं ? मैं राम -रहीम नइ जानौं। एक आसाराम ल जानथौं। भगत होए के नाते मोर दर्जा सबले उप्पर हे। जब मोर दर्जा उंच हे त नाक – माथ ल काबर नवावव। उंच होके नीच काबर सोचै। जोन मोला जयराम करही. तेकर जुवाब मैं देहू जी। अउ कतको जलन तको मरथे तेकर सेति बदनाम करथे। गाँव के जोगी जोगड़ा आन के सिध। ज्ञान ल शान से तान के रखे बर परथे गा. तब मान होथे।

झाड़-फूंक घलो करथे सुने हवन, का का के करथौ ?
सबके।ए सब ल कहाँ ले सीखे हौ ?
मंतर -संतर नइ सीखे हौ भई ! मैं झूठ लबारी वाले नोहव। लोगन ल मोर उपर घातेच विश्वास हे तेकर मजा मारके फायदा उठा लेथवं।
बैदई घलो करथौं ?
अंगना कोति अंगरी देखावत भगतजी कहिस- देखौ ए सब पेड़-झाड़ उही तो आय।
एदे ह का पेड़ हरे ?
पेड के नाम तो महूॅं नइ जानवं फेर दवई के काम आथे तेला जानथौ।
का के दवई हरे ? पत्रकार एक ठो पेड़ कोति अंगरी देखाइस।

भगतजी के छट्ठी इंद्री जाग गे। ओतेक बेर खुशम खुश खुस्स-खुस्स जुवाब देवत रिहिसे तउन फुस्स होगे। चुप रहिगे। सोचे लगिस- तुम्हला आमा खाए से मतलब पेड़ गिने से का मतलब ? कहिस – का तकलीफ हे तेला बता, मैं दवई देहू । उप्पर वाले के कृपा होही त बजुर बने हो जबे, अतका कहि सकथौं भई ! बाकी तीन -पाॅच ल मैं नइ जानौ।

कम से कम हमू एकात ठिन जान लेतेन कहिथौ साहेब।
भगतजी के जी चुरगे। अंतस के भूकंप ले आनी-बानी के गारी के लावा निकले लगिस। सोच म परगे। अरे मैं तुम्हला दवई बता देहू त काली मोर तीरन कोन कुकुर आहीं। अइसनेहे सब जान डारही ताहेन मैं तो चुकुम ले हो जाहवं। फेर पाछू भगत कहिथे- जान के काएच करहू साहेब भलकुन मोला तुमन कुछू जानत होहू तेला बतावव। मोर हाथ ककरो भलई हो जही।

हमन कहाँ ले जानबो महराज।
जानत होहू गा बताना नइ चाहव। मोर ले कोनो आगू झन बाढ़ै कहिके कतकोन झन मन जानथे तेहू ल नइ जानन कहि देथे। जिहां मन म कपट आइस ताहेन आदमी छपटे -लुकाए लगथे। जिंहा कपट तिंहा छपट। ताहेन जेन सुनय छपट के तेन मरय अपट के …हे हे हे – काहत भगत जी अपन जम्मो कपट ल लपेट के मने म राख लिस – का बताववं रे बइमान हो। मोरे दिमाक चाँटे बर तुमन दीमक के अवतार धरे हौ रे। सब दवई -गोंटी ल तुमन ल बता देववं। मोर बताए दवई म तुमन नाम अउ पइसा कमावव। मै माँछी हाँकत बइठे राहवं। तुंही भर मन हावव हुसियार।

आप मन के भविस्य के का योजना हे ?
योजना का ? अतके म खुस हौं ? गांव, घर- परिवार, खेत-खार, रिस्तादार, नता-सैना अउ का ? भभूत ले भूत भागे। पंडा के डंडा चलय। घर बइठे अंडा हे हंडा हे। तुंहर बर अँधियार मुँधियार हे, उहां मोर सरग दुवार हे। अउ का चाही, बतावव ?
बइगा के भभूत ले पत्रकार मन के जम्मो टीआरपी भूत उतर गे। उन उहां ले रेंगते बनिन। फेर खोजी पत्रकार हरे। गुनते हे- एकर भभूत ल छूत कइसे करे जाय ? ए काला काला मिलाके गोली बनाथे ? काकर रसा निकालथे ?
ए सबके निचोर कइसे निकाले जाय ?


धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *