धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ? -आचार्य शेखर प्रसाद शर्मा

धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ?

-आचार्य शेखर प्रसाद शर्मा

धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ?
धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ?

धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ?

धनतेरस पर्व का वास्तविक स्वरूप-

धनतेरस पर्व के वास्तविक स्वरूप और वास्तविक परंपरा को समझने के लिए हमें धन का वास्तविक अर्थ को समझने की आवश्यकता है । धन का एक अर्थ भौतिक संपदा, धन्य-धान्य, रुपया-पैसा तो होता ही है, किंतु दूसरा अर्थ इसका तन और मन का स्वास्थ्य भी होता है । भारतीय परंपरा में स्वास्थ्य धन को भौतिक धन से अधिक महत्व दिया गया है, और यह व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक दोनों रूप से ही सत्य है । जब पैसे को हाथ का मैल कहा जाता है, तो पैसा बड़ा हुआ कि हाथ ? यहां हाथ का प्रतीकात्मक अर्थ स्वास्थ्य ही है । क्योंकि हाथ शरीर का अंग है मस्तिष्क और हाथ दोनों स्वस्थ रहेंगे तभी वह धनार्जन कर सकता है ।

धनतेरस कब मनाया जाता है ?

भारतवर्ष का सबसे बड़ा पर्व दीपावली को माना जाता है । दीपावली पॉंच दिनों तक मनाये जाने वाला पर्व है । इस पर्व का प्रथम दिवस ही धनतेरस कहलाता है । हिन्‍दी मास के कार्तिक कृष्‍ण त्रयोदशी को यह पर्व मनाया जाता है । त्रयोदशी अर्थात तेरस को धन या स्‍वास्‍थ्‍य की कामना से मनाये जाने के कारण ही इस पर्व को धनतेरस कहते हैं ।

दीपावली का प्रथम दिवस ही धनतेरस क्‍यों ?

कहा गया है -‘धन गया तो कुछ नहीं गया, स्‍वास्‍थ्‍य गया तो कुछ गया” अर्थात भौतिक धन की हानि होने से व्‍यक्ति का कुछ भी नुकसान नहीं होता किन्‍तु स्‍वास्‍थ्‍य की हानि पर व्‍यक्ति को कुछ हानि होती है । सीधा सा अर्थ है कि धन की हानि हो किन्‍तु स्‍वास्‍थ्‍य सही हो तो उस धन को पुन: प्राप्‍त किया जा सकता है किन्‍तु स्‍वास्‍थ्‍य की हानि हो जाये तो धनार्जन करना संभव नहीं हो पायेगा । इसी सिद्धांत की महत्‍ता को प्रतिपादिन करने हमारे पूर्वज दीपावली जो मुख्‍य रूप से लक्ष्‍मीपूजन का पर्व माना जाता है में धन-दौलत के पूजन करने के पूर्व स्‍वास्‍थ्‍य की कामना करते स्‍वास्‍थ्‍य के देवता धनवंतरी की पूजा करने का विधान बनाये हैं ।

धनतेरस क्‍यों मनाते हैं ?

आयुर्वेद में स्‍वास्‍थ्‍य को धन कहा गया है । स्‍वास्‍थ्‍य के देव भगवान धनवंतरी को माना गया है । कार्तिक कृष्‍ण त्रयोदशी भगवान धनवंतरी का प्रादुर्भाव दिवस है । इसलिये भगवान धवंतरी के जन्‍मोत्‍सव के रूप में धनतेरस का पर्व मनाये जाते रहा है किन्‍तु भौतिकवाद के बढ़ते प्रचलन से धन का अर्थ भौतिक संपदा समझ कर धनतेरस को धन-धान्‍य की कामना से मनाये जाने वाला पर्व बना दिया गया है । भगवान धनवंतरी के जन्‍मोत्‍सव के साथ-साथ अकालमृत्‍यु से बचने के लिये यमराज को दीपदान किया जाता है । धन-धान्‍य वृद्धि के लिये धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है । धनतेरस पर्व मनाये जाने के पीछे कुछ पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं । इसमें प्रमुख इस प्रकार है-

भगवान धवंतरी जयंती-

श्रीमद्भागवत सहित कई पौराणिक ग्रन्‍थों में समुद्र मंथन का वर्णन आता है । समुद्र मंथन से अनेक बहुमूल्‍य धातुएं प्राप्‍त हुये साथ ही इसी समुद्र मंथन से एक ओर विष निकला तो दूसरी ओर अमृत भी । इसी समुद्र मंथन में धन-धान्‍य की देवी लक्ष्‍मी प्रकट हुई तो इसी समुद्र मंथन में स्‍वास्‍थ्‍य धन के देवता भगवान ‘धनवंतरी’ भी प्रकट हुये । भगवान धनवंतरी, माता लक्ष्‍मी से पहले प्रकट हुये हैं ।

कार्तिक कृष्‍ण तेरस को भगवान धनवंतरी चतुर्भुज रूप में हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुये । भगवान धनवंतरी को स्‍वास्‍थ्‍य का देवता कहते हैं । भगवान धनवंतरी को सर्वशक्तिमान भगवान बिष्‍णु का अंशावतार माना जाता है । मान्‍यता के अनुसार भगवान बिष्‍णु ही स्‍वयं मानव के स्‍वास्‍थ्‍य के रक्षा के लिये धनवंतरी के रूप में प्रकट हुये । पुरातन भारतीय चिकित्‍सा पद्यति आयुर्वेद है । इसी आयुर्वेद के जनक हैं भगवान धनवंतरी ।

अमृतकलश का प्रादुर्भाव-

देव-दानव संयुक्‍त रूप से समुद्र मंथन किये । इस समुद्र मंथन से अनेक रत्‍नों, औषधियों के साथ-साथ अमृत कलश भी प्रकट हुआ । इसी अमृत कलश को भगवान धनवंतरी अपने हाथों में लेकर प्रकट हुये । इसी अमृत की अराधना करने नये पात्र पर अमृत ग्रहण करने के भाव से इस पर्व पर नये पात्र खरीदने का प्रचलन है ।

अकाल मृत्‍यु से छुटकारा की मान्‍यता-

लोककथा के अनुसार हिम नामक एक राजा थे । उनके यहां जब एक पुत्र का जन्‍म हुआ तो उसकी जन्‍मकुण्‍डली बनवाई गई, उस जन्‍म कुण्‍डली के अनुसार उस लड़के की मृत्‍यु उसके विवाह के ठीक चार दिन बाद होना बताया गया ।  इसी भय के कारण राजा हिम अपने राजकुमार के बड़े होने पर शादी करने से बचते रहे । किन्‍तु होनी प्रबल होती है । काल की प्रेरणा से उसकी महारानी ने राजा को राजकुमार के विवाह के लिये मना लिया ।

 विवाह संबंध लेकर आने वाले राजाओं को स्‍पष्‍ट रूप से बता दिया जाता था कि इसकी कुण्‍डली में विवाह के चार दिन बाद मृत्‍यु लिखी है । सब मना कर देते थें किन्‍तु एक राजकुमारी यह जानकर भी विवाह करने के लिये तैयार हो गई । दोनों का विवाह हुआ और सचमुच विवाह के चौथे दिन उस राजकुमार की मृत्‍यु हो गई । 

उसके मृत्‍यु पर राजकुमारी बहुत दुखी होकर क्रंदन करने लगी । उसके क्रंदन से यमदूत का पत्‍थर हृदय भी पसीज गया । लेकिन उसके हाथ में उस राजकुमार को जिंदा रखना संभव नहीं था । जब वह उस जीव को लेकर यमराज के पास पहुँचा तो उसने विनित भाव से यमराज से पूछा महाराज अकाल मृत्‍यु से बचने का क्‍या कोई उपाय नहीं है ?

 इस पर यमराज ने प्रसन्‍न होकर कहा कि यदि कोई व्‍यक्ति कार्तिक कृष्‍ण त्रयोदशी को मेरी पूजा करेगा तो उसकी अकाल मृत्‍यु नहीं होगी । तभी से अकाल मृत्‍यु से बचने के लिये धनतेरस को यमराज की दीपक जला कर पूजा किया जाता है ।

धनतेरस कैसे मनाते हैंं ?

किसी भी पर्व को मनाये जाने की परम्‍पराएं समय अनुसार कुछ न कुछ परिवर्तित हो ही जाते हैं यद्यपि यह पर्व मुख्‍य रूप से स्‍वास्‍थ्‍य की कामना से मनाये जाने वाला पर्व है किन्‍तु समय के अनुसार स्‍वरूप में परिवर्तन देखा जा रहा है अब बहुसंख्‍य लोग इस पर्व को धन-धान्‍य की वृद्धि की कामना धन-दौलत बढ़ाने का पर्व मान रहे हैं । आज की स्थिति में इस पर्व को मनाये जाने की परम्‍पराएं इस प्रकार हैं-

‘राष्‍ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के रूप में-

भारत सरकार द्वारा आज के दिन को ‘राष्‍ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है । इसके अंतर्गत मानव समाज के लिये भारतीय आयुर्वेद के योगदान को याद किया जाता है । इस दिन आयुर्वेद के संरक्षण एवं सवंर्धन का संकल्‍प लिया जाता है । आयुर्वेद अनुयायियों, आयुर्वेद चिकित्‍सक, वैद्यों द्वारा आज भगवान धनवंतरी की विशेष पूजा अर्चना करके मानव कल्‍याण के लिये आयुर्वेद उपयोगी हो इस बात की कामना करते हैं ।

भगवान धनवंतरी की पूजा-

धनतेरस पर्व भगवान धनवंतरी का षोडशोपचार पूजन का विधान है । भगवान धनवंतरी का षोडषोपचार पूजन के साथ विशेष रूप से अपने आस-पास पाये जाने वाले आयुर्वेद संपत औषधी जैसे शंखपुष्‍पी, ब्राह्मी, आवला, तुलसी आदि समर्पित कर जग कल्‍याण एवं रोगनिवाराणार्थ ये मंत्र बोला जाना चाहिये-

ॐ रं रूद्र रोग नाशायधनवंतर्ये फट्

यम की पूजा-

धनतेरस के दिन घर के मुुुख्‍य द्वार पर एक पात्र में अन्‍न रखकर उसके ऊपर यमराज के निमत्‍त दक्षिण की ओर मुख कर दीपदान करना चाहिये और दीपदान करते समय इस मंत्र का जाप किया जाना चाहिये-

मृत्‍युना पाशहस्‍तेन कालेन भार्यया सह ।
 त्रयोदश्‍यां दीपदानात्‍सूर्यज: प्रीतयामिती ।।

धनतेरस पर बर्तन खरीदने का महत्‍व-

भगवान धनवंतरी का प्रादुर्भाव हाथ में अमृत कलश लेकर हुआ था । इसी अमृत से देवताओं को अमरता प्राप्‍त हुआ । अमृत कलश के प्रतीक के रूप में नये पात्र खरीदे जाते हैं इस दिन नये पात्र खरीदकर उस पर दुग्‍ध का सिंचन किया जाता है । ऐसा माना जाता है उस मात्र के प्रयोग से अमृत का प्रभाव पड़ता है । इस मान्‍यता के अनुसार ऐसे पात्र खरीदने चाहिये जिसका उपयोग भोजन बनाने या भोजन परोसना अथवा भोजन ग्रहण करने के लिया किया जाता हो ।

धनतेरस का महत्‍व-

धनतेरस के पर्व चाहे धनवंतरी की पूजा का विधान हो, चाहे यमराज को दीपदान का विधान हो या फिर नये पात्रों के क्रय का विधान हो सभी का संबंध हमारे स्‍वास्‍थ्‍य से ही है । इसलिये इस पर्व का विशेष महत्‍व स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति सचेत रहने का है । आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी के जन्‍मदिन के अवसर पर राष्‍ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जाना इस दिशा में एक सार्थक पहल है । धनतेरस के इस पावन पर्व हमें भौतिक धन-धान्‍य की कामना न करके स्‍वास्‍थ्‍य रूपी धन के कामना करनी चाहिये ।

-आचार्य शेखरप्रसाद शर्मा
मोबाइल- 8770183854

इसे भी देखें- दीपावली का अध्‍यात्मिक एवं सांस्‍कृतिक महत्‍व

नरकचतुदर्श पर दीपश्राद्ध के संपूर्ण विधान को यहॉं देख सकते हैं- दीपश्राद्ध

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4 thoughts on “धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ? -आचार्य शेखर प्रसाद शर्मा

  1. सही समय में बहुत सुंदर जानकारी आचार्य जी को बधाई शुभकामनाएं….

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