
दोहा छंद विधान (Doha chhan vidhan) Doha in Hindi
(छंद और रमेश – रमेश चौहान का छंद)
दोहा छंद-
भारत में तीन भाषाओं से तीन काव्य शब्द सर्वाधिक प्रचलित हैं संस्कृत से श्लोक, हिन्दी से दोहा और उर्दू से शायरी । इन तीनों काव्य शिल्पों का अपना विशेष महत्व है किन्तु दोहा भारतीय जीवन के शिराओं में प्रवाहित है । दोहा हिन्दी भाषा के साथ-साथ लगभग सभी भारतीय भाषाओं में प्रचलित हैं । कबीर के दोहे, तुलसी के दोहे, रहिम के दोहे भारतीय जन मानस में रच बस गये हैं । दोहा छंद कहीं मुहावरों की भांति प्रयोग हो रहे हैं तो कहीं लोकगीत के रूप में ।
दोहा क्या है ?
दोहा छंद हिन्दी छंद शास्त्र के अनुसार एक विषम मात्रिक छंद है । इसके नियम आदि को हम निगमन विधि से समझने का प्रयास करेंगे अर्थात कुछ दोहे लेकर, उन दोहों की सहायता से दोहा छंद के शिल्प विधान को समझने का प्रयास करेंगे-
दोहा छंद के उदाहरण –
श्री गुरू चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि । बरनउ रघुबर विमल जस, जो दायक फल चारि ।। -संत तुलसी दासजी आवत गारी एक है, उलटत होत अनेक । कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक के एक ।। संत कबीर दासजी मुहमद बाजी पैम के, ज्यौं भावै त्यों खेल ।। तिल फूलहिं के संग ज्यौं, होइ फुलायल तेल ।। मलिक मोहम्मद जायसी जान विषम राखैं सरन, अन्त सु सम है 'जात' । संकट तेरो शिव हरैं, सुनि दोहा अवदात ।। -आचार्य जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' चार चरण दो पद लिये, होते दोहा छंद । तेरह ग्यारा यति लिये, रच लो हे मतिमंद ।। विषम चरण के अंत में, रगण नगण तो होय । तुक रखिये समचरण में, अंत दीर्घ लघु होय ।। -रमेश चौहान
दोहा छंद में मात्रा गणना-
इन दोहों को पढ़ने के बाद हम किसी एक दोहे का मात्रा गणना करके देखते हैं-
श्री गुरू चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि । बरनउ रघुबर विमल जस, जो दायक फल चारि ।। प्रथम चरण में- श्री-2, गुरू-11 (2) चरन-111 (3) सरोज-121 (4) रज-11 (2) कुल मात्रा 13, मात्रा क्रम 2,2,3,4,2 द्वितीयचरण में- निज-11 (2) मनु-11 (2) मुकुर-111 (3) सुधारि-121 (4) कुल मात्रा 11, मात्रा क्रम 2,2,3,4 तृतीय चरण में- बरनउ-1111 (4) रघुबर-1111 (4) विमल-111 (3) जस-11 (2) कुल मात्रा 13, मात्रा क्रम 4,4,3,2 चतुर्थ चरण में- जो-2 दायक-211 (4) फल-2 चारि-21 (3) कुल मात्रा 11, मात्रा क्रम 2,4,2,3
दोहा छंद में मात्राएं-
उपरोक्त मात्रा गणना से हम पाते हैं कि –
दोहा छंद के सम एवं विषम चरण में मात्राएं-
उपरोक्त मात्रा गणना से स्पष्ट है कि-
- विषम चरण अर्थाात प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्रायें हैं ।
- समचरण अर्थात द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्रायें हैं ।
दोहा छंद के विषम चरण का प्रारंभ-
इस प्रकार स्पष्ट है कि दोहा छंद के विषम चरणों 13-13 मात्राएं एवं सम चरणों में 11-11 मात्राएं होती है ।
दोहा में 13,11 के क्रम में कुल 24 मात्राएं होती हैं ।
अब हम सभी दोहों के विषम चरणों के प्रथम तृतीय चरणों में प्रथम शब्दों (प्रथम तीन वर्ण) पर मात्रा देखते हैं-
- श्री गुरू चरन सरोज रज (ऽं।।) / बरनउ रघुबर विमल जस (।।।।)
- आवत गारी एक है (ऽं।।) /कह कबीर नहिं उलटिए (।।)
- मुहमद बाजी पैम के (।।।।), / तिल फूलहिं के संग ज्यौं (।।)
- .जान विषम राखैं सरन (ऽं।।)/संकट तेरो शिव हरैं (ऽं।।)
- चार चरण दो पद लिये (ऽं।)/ तेरह ग्यारा यति लिये (ऽं।।)
- विषम चरण के अंत में (।।।)/ तुक रखिये समचरण में (।।)
इसप्रकार हम पाते हैं इन किन्ही भी दोहों के विषम चरण का प्रारंभ ।ऽं। (जगण) से नहीं होता ।
जगण से दोहा प्रारंभ नहीं होता ।
दोहा छंद के विषम चरण का अंत-
अब लिये गये उदाहरण के दोहों के विषम चरणों के अंत की मात्राओं को देखते हैं-
- श्री गुरू चरन सरोज रज (।।।) / बरनउ रघुबर विमल जस (।।।)
- आवत गारी एक है, (ऽं।ऽ) / कह कबीर नहिं उलटिए (।।ऽं)
- मुहमद बाजी पैम के (ऽ।ऽं), / तिल फूलहिं के संग ज्यौं (ऽ।ऽं)
- जान विषम राखैं सरन (।।।)/संकट तेरो शिव हरैं (।।ऽं)
- चार चरण दो पद लिये (।।ऽं)/ तेरह ग्यारा यति लिये (।।ऽं)
- विषम चरण के अंत में (ऽ।ऽ)/ तुक रखिये सम चरण में (।।ऽ)
किसी भी चरण का अंत गुरू लघु (ऽ।) से नहीं हुआ है । विषम चरण की 11वीं मात्रा लघु है । ।।। और ऽ।ऽं का अधिक प्रयोग हुआ है ।
विषम चरण की ग्यारहवीं मात्रा निश्चित रूप से लघु हो । िविषम चरण के अंत रगण (ऽ।ऽं) या नगण (।।।) ज्यादा उपयुक्त है ।
दोहा छंद के सम चरण का अंत-
अब इन्ही दोहों में सम चरण के अंत के दो वर्णो को देखते हैं-
- ‘निज मनु मुकुर सुधारि’ (ऽ।), और ‘जो दायक फल चारि’ (ऽ।),
- ‘उलटत होत अनेक’ ((ऽ।),), और ‘वही एक के एक’ ((ऽ।),
- ‘ज्यौं भावै त्यों खेल’ ((ऽ।),) और ‘होइ फुलायल तेल’ (ऽ।),
- अन्त सु सम है ‘जात’ ((ऽ।),और सुनि दोहा अवदात ((ऽ।),
- ‘होते दोहा छंद’ (ऽ।), और ‘रच लो हे मतिमंद’ (ऽ।),
- ‘रगण नगण तो होय’ (ऽ।), और ‘अंत दीर्घ लघु होय’(ऽ।),
इस अवलोकर से हम पाते हैं कि इन दोहो के सम चरण कााअंत गुरू-लघु (ऽ।), से हो रहा है और ये शब्द समतुकांत है ।
दोहा के सम चरणों के अंत में समतुकांतता होता है, अंत में गुरू-लघु (ऽ।), होता है ।
दोहा छंद के विषम चरण में कल विन्यास-
इन दोहों के कुछ विषम चरण पर मात्रा विन्यास और कल विन्यास करके देखते हैं –
- श्री ऽं/गुरू ।।/चरन ।।।/सरोज ।ऽं। /रज ।। / अर्थात कल विन्यास हैैै- -ऽं।। (चौकल) ।।। (त्रिकल) ।ऽं। ( जगण) ।। (द्विकल)
- बरनउ ।।।।/ रघुबर ।।।।/ विमल ।।।/ जस ।। अर्थात कल विन्यास हैैै– ।।।। (चौकल) ।।।। (चौकल) ।।। (त्रिकल) ।। (द्विकल)
- आवत ऽ।।/ गारी ऽऽ /एक ऽ।/है ऽ, अर्थात कल विन्यास हैैै- –ऽं।। (चौकल) ऽऽ (चौकल) ऽ। (त्रिकल) ऽ (द्विकल)
- कह ।।/ कबीर ।ऽ।/ नहिं।।/ उलटिए ।।।ऽं अर्थात कल विन्यास हैैै– ।। (द्विकल) ।ऽं। ( जगण) ।। (द्विकल) ।।। (त्रिकल) ऽ (द्विकल)
- मुहमद ।।।।/ बाजी ऽऽ /पैम ऽ। /के ऽं अर्थात कल विन्यास हैैै-।।।। (चौकल) ऽऽ (चौकल) ऽ। (त्रिकल) ऽ (द्विकल)
- तिल ।।/ फूलहिं ऽ।।/के ऽ/ संग ऽ।/ ज्यौं ऽं अर्थात कल विन्यास हैैै-।। (द्विकल) ऽं।। (चौकल) ऽ (द्विकल) ऽ। (त्रिकल) ऽ (द्विकल)
कल विन्यास “अष्टकल+त्रिकल+ द्विकल” है जहाँ त्रिकल का अंत लघु से है अर्थात ।।। या ऽ। है
अष्टकल =”चौकल+चौकल” या “त्रिकल+त्रिकल+द्विकल” या “द्विकल+चौकल+द्विकल” है
दोहा छंद के सम चरण मेंं कल विन्यास –
उपरोक्त दोहों से कुछ के सम चरण का मात्रा विन्यास और कल विन्यास करके देखेते हैं-
- निज ।।/मनु।।/ मुकुर।।/ सुधारि’ ।ऽ। अर्थात कल विन्यास हैैै- ।। (द्विकल) ।। (द्विकल) ।।। (त्रिकल) ।ऽं। ( जगण) अंत में गुरूूलघु है ।
- जो ऽ /दायक ऽ।।/फल ।।/ चारि’ (ऽ।), अर्थात कल विन्यास हैैै– ऽ (द्विकल) ऽं।। (चौकल) ।। (द्विकल) ऽ। (त्रिकल) अंत में गुरूूलघु है ।
- ‘उलटत ।।।।/ होत ऽ।/अनेक’ ।ऽ। अर्थात कल विन्यास हैैै- ।।।। (चौकल) ऽ। (त्रिकल) ।ऽं। ( जगण) अंत में गुरूूलघु है ।
- वही ।ऽ/ एक ऽ। /के ऽ/ एक ऽ। अर्थात कल विन्यास हैैै- । ऽ (त्रिकल) ऽ। (त्रिकल) ऽ (द्विकल) ऽ। (त्रिकल) अंत में गुरूूलघु है ।
- ‘ज्यौं ऽ/ भावै ऽऽ/त्यों ऽ/ खेल’ ऽ। अर्थात कल विन्यास हैैै– ऽ (द्विकल) ऽऽ (चौकल) ऽ (द्विकल) ऽ। (त्रिकल) अंत में गुरूूलघु है ।
- ‘होइ ऽ। /फुलायल ऽ।।।/ तेल ऽ। अर्थात कल विन्यास हैैै– ऽ। (त्रिकल ऽ। (त्रिकल) ।। (द्विकल) ऽ। (त्रिकल) अंत में गुरूूलघु है ।
कल विन्यास “अष्टकल+त्रिकल’, जहां त्रिकल केवल गुरू लघु होगा
अष्टकल =”चौकल+चौकल” या “त्रिकल+त्रिकल+द्विकल” या “द्विकल+चौकल+द्विकल” है । अंत में जगण आने पर उससे पहले चौकल + त्रिकल होगा ।
दोहा छंद में मात्रा विन्यास या कल विन्यास-
कल नियम से हम जानते हैं कि समकल के ठीक पीछे समकल और विष्ामकल के पीछे विषम कल होनी चाहिये । विषम चरण के अंत में रगण (ऽ।ऽ) या नगण (।।।) होना चाहिये, सम चरण के अंत में गुरू-लघु (ऽ।) होना चाहिये, इन सभी नियमों को संयोजित करने पर हम दोहा के कलविन्यास/मात्रा विन्यास को इस प्रकार लिख सकते हैं-
- विषम चरण में मात्रा का विन्यास 4,4,3,2 या 3,3,2,3,2 होना चाहिये ।
- समचरण में मात्रा विन्यास 4,4,3 या 3,3,2,3 होना चाहिये ।
दोहा छंद का शिल्प विधान-
उपरोक्त अवलोकनों विश्लेषणों के आधार पर हम कह सकते हैं-दोहा छंद में दो पद होते हैं ।
- दाेहा छंद में दो पद होते हैं ।
- प्रत्येक पद में दो चरण होते हैं । कुल चारण 4 होते हैं ।
- पहले और तीसरे चरण को विषम चरण कहते हैं ।
- दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहते हैं ।
- विषम चरण कभी भी जगण (।ऽ।) से प्रारंभ नहीं होता ।
- विषम चरण के अंत में रगण (ऽ।ऽ) या नगण (।।।) होना चाहिये
- सम चरण के अंत में गुरू-लघु (ऽ।) होना चाहिये और दोंनों सम चरण के अंत में समान तुक होना चाहिये ।
- विषम चरण में मात्रा का विन्यास 4,4,3,2 या 3,3,2,3,2 होना चाहिये ।
- सम चरण में मात्रा का विन्यास 4,4,3, या 3,3,2,3, होना चाहिये । यदि अंत जगण ।ऽ। से हो तो विन्यास 4, 3, 4 होता है ।
- सबसे बड़ी बात दोहा के चारो चरणों कके ग्यारहवीं मात्रा निश्चित रूप से लघु होना चाहिये ।
दोहा छंद का भाव शिल्प-
संस्कृत वांग्मय के अनुसार ‘दोग्धि चित्तमिति दोग्धकम्‘ अर्थात जो श्रोता/पाठक के चित्त का दोहन करे वह दोग्धक (दोहा) है । दोहे की दों पंक्ति में ‘गागर में सागर’ जैसे भाव भरा होता हैं । दोहा एक मुक्तक छंद है इसलिये दोहा में बिना पूर्ववर्ती अथवा परवर्ती प्रसंग के एक ही दोहा में पूर्ण अर्थ और चमत्कार को प्रकट किया जाता है । दोहे में भाव को इस प्रकार पिरोया जाता है कि उसका कथ्य इने दो ही पंक्तियों में पूर्ण अर्थ देता हो, इनके अर्थ की सार्थकता के लिये और पंक्ति की आवश्यकता न हो । दोहे में शब्दों का चयन इस प्रकार होना चाहिये के वह जिस अर्थ के लिये लिखा जा रहा हो वही अर्थ दे । इसमें भटकाव कदापि न हो ।
दोहे के हर भाव में, चलते तीखे तीर । देखन में छोटे लगे, घाव करे गंगीर ।
दोहा छंद के साथ प्रयोग-
ऐसे दोहा अपने आप में शिल्प से, भाव से, रस से, अलंकार से पूर्ण है, किन्तु समय के अनुरूप कुछ नये करने की मानव मन की अभिलाषा होती है, इसी अभिलाषा को फलिभूत करने कुछ दोहोकारों ने दोहाशिल्प के पालन करते हुये दोहों की पुनरावृत्ती करके गीत की रचना किये हैं, साथ ही सिंहावलोकनी दोहा और दोहा मुक्तक दोहा के नये प्रयोग किये गये हैं ।
दोहा-गीत-
नाम से ही स्पष्ट है कि दोहा-दोहा के पुनरावृत्ती से बने गीत को दोहा गीत कहा जाता है जिसमें दोहा एवं गीत दोनों के गुण विद्यमान होते हैं । एक दोहा के आधे पद अथवा पूरे पद को गीत का मुखड़ा निश्चित कर दो या तीन दोहों को मिलाकर गीत के अंतरों की रचना की जाती है । अंतरों के अंतिम दोहे के तुक का मुखड़े के तुक से मिला दिया जाता है ।दोहा में स्वयं गेयता होती है, इसलिये गीत के रूप में गाये जाने में कोई बाधा नहीं होती ।
दोहा-गीत का उदाहरण-
मुखड़ा- रेशम की इक डोर से, बांधे अमुवा डार । सावन झूला झूलती, संग सहेली चार ।। अंतरा 1- सरर सरर झूला चले, उड़ती ऑचल कोर । अंग अंग में छाय है, पुरवाही चितचोर ।। रोम रोम में है भरे, खुषियां लाख हजार । सावन झूला झूलती, संग सहेली चार ।। अंतरा 2- नव नवेली बेटियां, फिर आई हैं गांव । बाबुल का वह द्वार है, वही आम का छांव ।। छोरी सब इस गांव की, बांट रहीं हैं प्यार । सावन झूला झूलती, संग सहेली चार ।। अंतरा 3- सावन पावन मास है, धरती दिये सजाय । हरियाली चहुॅ ओर है, सबके मन को भाय ।। सावन झूला देखने, लोगों की भरमार । सावन झूला झूलती, संग सहेली चार ।।
सिंहावलोकनी दोहा-मुक्तक-
छंद शास्त्र के अनुसार जिस एक ही छंद में पर्ण भाव समेट दिये जाये जो किसी पूर्ववर्ती अथवा परवर्ती कथ्यों पर निर्भर न हो उसे ही मुक्तक कहते हैं । दोहा स्वयं एक मुक्तक छंद है । मुक्तक किसी भी छंद में हो सकता है । मुक्तक यह अर्थ कदापि नहीं होता कि छंद बंधन से मुक्त हो । यह किसी न किसी छंद शिल्प में बंध होता है मुक्त होता है तो केवल भाव संप्रेषिता से ।
प्रचलित मुक्तक-
प्रचलन में जिसे मुक्तक कहा जाता है वह उर्दू साहित्य के गजल विधा से हिन्दी साहित्य में आया । गजल स्वयं उर्दू साहित्य का एक छंद है जिसमें मात्रा वर्ण का बंधन होता है इसलिये मुक्तक छंद शिल्प से मुक्त नहीं होता ।मुक्तक में एक मतला के साथ एक शेऱ जोड़ दिया जाता है, ये चारों मिसरें एक भाव, एक कथ्य, एक कहन को पूर्ण करते हैं । इसी कारण इसे मुक्तक कहा जाता है ।
दोहा मुक्तक-
चूँकि मुक्तक गजल विधा से आया है इसलिये दोहा मुक्तक में दोहा एवं मुक्तक दोनों के शिल्पको आत्मसात किया जाता है ।
सिंहवलोकनी-
छंद शास्त्र के अनुसार सिंहावलोकनी उसे कहते हैं जिसमें किसी एक पद का अंतिम शब्द अगले पद का प्रथम शब्द हो ।
इस प्रकार जब सिंहावलोकनी, मुक्तक और दोहा तीनों के गुण जब एक साथ आये तो इसे ही सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक कहते हैं ।
सिंहावलोकनी दोहा-मुक्तक के उदाहरण-
कर्म ज्ञान है बाटती, विद्यालय की धूल । धूल माथ रखना सदा, जाना मत तुम भूल । भूल सुधारो आप अब, मानवता हो लक्ष्य । लक्ष्य एक है आपका, है जो जग का मूल ।।
आलेख-रमेश चौहान
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घनाक्षरी छंद का संपूर्ण परिचय, घनाक्षरी छंद लिखना सीखें
बहुत ही सुंदर दोहा छंद का शिल्प विधान प्रणम्य भइया जी शानदार सम्पूर्ण जानकारी सहित अद्वितीय संकलन एवं संग्रहण भइया बधाइयाँ
सादर धन्यवाद मोहन भाई