गताँक (कर्मण्येवाधिकारस्ते भाग 26 एवं 27) से आगे

कर्मण्येवाधिकारस्ते भाग 28
……..।।ःः वाधिकारस्ते ःः।।…….
साँख्ययोग
पलपल परिवर्तित नियति है
तुझे बीते पलों का शोक रहा
मन का अर्जुन लड़ना चाहे
तू उसकी बाहें रोक रहा
उस महारथी को देख जिसे
इच्छामृत्यु का वरदान मिला
माया का यह खेल तू देख
उसके हाथों में शस्त्र खिला
एक एक आयुध पर उसके
तेरी मृत्यु पैगाम लिखा है
उठ जाग ना बन कायर अर्जुन
रण भूमि में कौन सगा है
शत्रु दल में देख तू अर्जुन
शस्त्र उठाये कौन खड़ा है
शस्त्रों की परिभाषा जिससे
जीवन पथ में तूने पढ़ा है
निरासक्त हो लड़ तू अर्जुन
गाँडीव में ज्वाला भर दे
एक एक बैरी के तन में
अचूक मृत्यु हाला भर दे
दावानल कर देता जैसे
वन को क्षण में भस्मीभूत
उठ जाग सखा तू बन जा
इस रण में यम का दूत
बैरी व्यूह में चल तू ऐसे
नाहर वन में चलता जैसे
गहन यामिनी के आँगन में
चपल दामिनी चलती जैसे
क्रोध की चिंगारीयों से
आसक्ति का तम आज हर
मृत्यु की किलकारीयों से
समर शाँन्ति आज कर
सरिता बहा दे लहू का
शत्रु को भव पार कर
बचने ना पाये शत्रु कोई
रुद्राग्नि का संधान कर
संघर्ष ना समझो भारत तुम
यह निश्चय है यह होनी है
कर्मों का सब लेखा जोखा
पुरखों की यह बोनी है
कर्मण्येवाधिकारस्ते भाग 29
……..।।ःः वाधिकारस्ते ःः।।…….
साँख्ययोग
कुछ करनी कुछ कर्मगति
कुछ पूर्वज के भाग
इतना में भी ना समझे
वह मूढ़मति हतभाग
यह महासमर मन के भीतर
हर पल हर क्षण चलता है
पल में सपना जीता है
पल में सपना मरता है
बनो ना कायर बनो ना कातर
जग उसका जो जग जीते
मानवता के खातिर लड़ जा
तू जीते या जग जीते
बढ़ जाता है मान वीर का
रण में बलि होने से
मूल्यवती होती सोने की
भस्म यथा सोने से
शह सवार ही गिरता है
मैदाने जंग में यार मेरे
रण में जिसने लड़ना सीखा
जय का उसको संधान मिला
होनी को होना है आखिर
करनी तो मिल ही जायेगा
मुँह ना मोड़े संघर्षों से
उसको ही अनुदान मिला
वो तेरे अपने हैं जिन पर
तेरा तीर बरसने वाला है
अफसोस ना कर इस बात का
यह राजनीति का हाला है
पीना होगा गरल उसी को
जो बीज जहर का बोयेगा
काँटों का सेज सजाकर कोई
कहाँ चैन से सोयेगा
यह तो होना ही था मितवा
प्रारब्ध इसे कहते हैं
संग संग चलती साँसो के
प्रायश्चित से टलते हैं
है धन्य धन्य इंसान जिसे
प्रायश्चित का वरदान मिला
स्वविवेक निज पथ गढ़ने
नियति का अनुदान मिला
-बुद्धिसागर सोनी "प्यासा" रतनपुर,7470993869