“महल के दरवाजे का स्वर्णिम संकल नहीं बनूंगा” के लोकप्रिय गीतकार हरि ठाकुर
-डुमन लाल ध्रुव

लोकप्रिय गीतकार हरि ठाकुर
लोकप्रिय गीतकार हरि ठाकुर-
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ गीतकार, कवि, इतिहासकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व छत्तीसगढ़ की अस्मिता जागरण के लिए कृत संकल्पित साहित्यकार स्व. श्री हरिठाकुर जी की अब तक बाईस किताब प्रकाशित हो चुकी है और उनका बाईसवां गीत संग्रह ‘‘हंसी एक नाव सी’’ अग्रज चेतन भारती जी के संपादन में प्रकाशित हुआ है। संयोग से स्व. हरि ठाकुर जी उस समय अपने कवि जीवन के पचहत्तर वर्ष पूरे कर रहे थे, पचहत्तर वर्ष जीने के और संघर्ष करने के। पचहत्तर वर्ष साहित्य में जीने और साहित्य के लिए जीने के। वैसे हरि ठाकुर जी की कविता की एक-एक पंक्ति उनके जीवंत अनुभवों की पहचान कराती है। हरि ठाकुर जी अपनी कविता में साहित्य के प्रति सजगता, व्यक्तिगत जीवन की सुघड़, सुन्दरता, और अपार निष्ठा के रूप में लेते थे। कवि का यह चुनाव मामूली नहीं बल्कि उसकी पूरी निजता की अभिव्यक्ति मिलती है। निजी जीवन में कवि जिस प्रकार जीता है समाज को जिस प्रकार बनते देखने का सपना पालता है वही सब तो कविता में आता है। कविता जीवन दर्शन और जीवन स्थापनाओं की अभिव्यक्ति हैं। कविता संसार का कल्पित सृजन नहीं है, बल्कि वास्तविक संसार को रचने की दिशा में उठाये सार्थक कदम की प्रतिध्वनि है, वरना एक कवि अपने संसार को रचने के लिए संघर्ष क्यों करता है ? इसलिए न कि वह समस्त विपरीत स्थितियों के बावजूद सीधे तन कर खड़ा होता है और छद्म को पर्दे की डोर खींचकर वास्तविकता को सामने लाता है। कवि का आत्मविश्वास दृष्टव्य है- कविता जीवंत वाणी में ढलकर एक सम्पूर्ण और संश्लिष्ट संसार का रागात्मक रथ बनती है। हरि ठाकुर जी की कविता की याद एक विशेषता पूछी जाये तो मैं यही कहूंगा कि वे प्रकृति और मानव जीवन संवेदन के सहज जागरूक कवि हैं। उनके कवि जीवन में किसी प्रकार का छद्म नहीं है तो कविता में प्रमाणिकता आयेगी ही, ये कविताएं इसका प्रमाण हैं।
छल-दल में फंस जाये भले रथ कांटों से घिर जाये हर पथ किन्तु महल के दरवाजे का स्वर्णिम संकल नहीं बनूंगा।
अपनी धरती और उसके विविध रंगो-रूपों में सूक्ष्म पहचान से जुड़े कवि की भाषा उस धरती की है जिसका वे अच्छी प्रकार जानते-पहचानते हैं। यही कारण है कि वह भाषा स्वतः ही असरदार बन गई है। कवि के अपने बड़े इरादे हैं जिन्हें वे कठिनता द्वारा पूरा करना चाहते हैं। उनके लिए कविता महत्ववूर्ण है और जीवन की सार्थकता सिद्ध करने का सशक्त माध्यम इस कविता में दिखाई देती है:-
मन कितना बड़ा मरूस्थल है रेतीला उसका हर कोना सपनों के मंजर दिखते हैं सुधियां खंडहर सी लगती है।
लोकप्रिय गीतकार हरि ठाकुर जी के लिए कवि कर्म का एक रचनात्मक दायित्व-
हरि ठाकुर जी के लिए कवि कर्म का एक रचनात्मक दायित्व है इसलिए उनकी प्रत्येक कविता में कविता का कलाकृति की तरह संश्लिष्ट और उत्कृष्ट बनाने का उसका संघर्ष देखा जा सकता है। वे भावों, अनुभवों, तथ्यों या स्मृतियों को सूक्ष्म गहन रूपांतरण द्वारा किसी बड़े दार्शनिक विचार तक विकसित करते हैं। उनकी रचनाशीलता के ये आयाम इतने आंतरिक और गूढ़ होते हैं कि कविता एक स्तर पर बाह्य परिदृश्य के भराव या जनरव से अलग भाषा के बौद्धिक और अभिजात पैटर्न में लगभग अकेली पड़ती हुई सी लगती है।
हरि ठाकुर जी की कविताओं में सर्वत्र एक संवेदनशील वाचक की मौजूदगी देखी जा सकती है। कभी-कभी यह वाचक अपने निजी उदास या पीड़ा भरे अनुभवों की ओर देखता है किन्तु इसके इन अनुभवों में वस्तुगत यथार्थ की विडम्बनाओं या चुनौतियों के साथ व्यापक होने की खूबी मौजूद है। कविताओं का ऐसा ही असर होता है। इन कविताओं की रंगो में एक गहरी और काफी दूर तक बोलती हुई निःशब्दता है। यह निःशब्दता अक्सर एक सपने की चिंता में है। कहीं यह सपना बहुत साफ है तो कहीं गहरे व्यंजित, किन्तु सन्नाटे और स्वप्न का इस तरह एक दूसरे के लिए साधना अनोखी बात है और इन कविताओं में अनोखी बात कई बार दिखाई देती है।
सांस में तूफान लेकर गीत के हर शब्द में स्वर का नया अभियान लेकर चल रहा हूं नव सृजन का राग है मेरे हृदय में आग है मेरे हृदय में
लेकिन इस तरह की कविता जब कवि के दिलो दिमाग से निकल बाहर के पाठक के लिए पठनीय हो जाये तो पाठक की प्रश्नात्मक प्रतिक्रिया जानने की इच्छा कवि के मन में उठना स्वाभाविक हो जाता है। जैसेः-
आग में, सैलाब में, तूफान में, बढ़ रहा है देख लो छत्तीसगढ़। शोषकों के दिल में कांटे की तरह, गड़ रहा है देख लो छत्तीसगढ़।
लोकप्रिय गीतकार हरि ठाकुर जी की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति-
हरि ठाकुर जी की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति की यह दिशा सर्जक को व्यक्तिगत स्तर के अनुभव को सार्विक संवेदन में ढालकर या सामाजिक अनुभव को व्यक्तिग्राह्य संवेदना से सप्राण बनाकर कलात्मक अधिसंसार की रचना करने को प्रेरित करता है। यह रचना यथार्थ को जिजीविषा की लय में ढालने के लिए व्यापक संघर्ष का ही एक अंग बनती दिखाई देती थी छत्तीसगढ़ में। हरि ठाकुर जी का यही संघर्ष शोषकों के दिल में कांटों की तरह चुभता था और एक रचनाकार के नाते इसका संबंध छत्तीसगढ़ की यथार्थ संवेदना में उभरकर आया है।
अमरित कलश तुम्हें सौंपा था तुमने उसे गरल कर डाला। चंदन को काजल कर डाला कंचन को पीतल कर डाला।।
यहां हरि ठाकुर जी की पीड़ाएं देशकालगत संदर्भ से कट कर व्यक्तिकता में सिमट जाती है, आत्मनिष्ठ सर्जनात्मक संकल्प और सकर्मकता का जन्म होता है। किन्तु यथार्थ आम तौर पर जिजीविषा के बीच की अंतर्विधात्मक द्वंद्वात्मकता के कारण। ऐसी हालत में व्यक्तिगत और व्यापक धरातलों पर प्रतिकूलता और टकराव की स्थितियां इष्ट-अनिष्ट के मूल्य बोध को विक्षत करती है, आशाओं-आकांक्षाओं को स्पूर्ति करती है, तरह-तरह के संवेगों को उद्वेलित विस्फोटक संकल्प और सकर्मकता का उन्मेष करती हैं। जाहिर है हरि ठाकुर की काव्य यात्रा की समीक्षा कविता
नदी वही है, नाव वही है लेकिन वह मल्लाह नहीं है। धन बटोरने की चिंता में जनहित की परवाह नहीं है।।
जीवन का सच केवल कविता ही बयान कर सकती है-हरि ठाकुर जी
वास्तव में कवि हरि ठाकुर जी इस बात को स्वीकारते थे कि जीवन का सच केवल कविता ही बयान कर सकती है क्योंकि कविता ही जीवन के सबसे करीब होती है। और जो चिरंतन है वह उस उत्तर की तलाश में उनके इर्द-गिर्द ही भटकते रहते हैं। मतलब यह है कि हरि ठाकुर जी की अनेक कविताएं धारदार तेवर के साथ इस युग से सवाल करती है। क्योंकि इनमें कवि का जीवनानुभव सत्य की चट्टान पर खड़ा है जिसकी ओर कोई देखता तक नहीं क्योंकि झूठ की चट्टाने बड़ी भी है और ऊंची भी।
जीवन के पचहत्तर बसंत में प्रकाशित कृति ’हंसी एक नाव सी’ के साथ अपनी श्रेष्ठ रचना का वैशिष्ट्य रेखांकित करने वाला व्यक्तित्व कवि साहित्यकार हरि ठाकुर जी को अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।
-डुमन लाल ध्रुव मुजगहन, धमतरी (छ.ग.) मो. नं. 9424210208