मँहगाई ऊपर छत्‍तीसगढ़ी कविता-रमेश चौहान

मँहगाई ऊपर छत्‍तीसगढ़ी कविता

-रमेश चौहान

मँहगाई ऊपर छत्‍तीसगढ़ी कविता-रमेश चौहान
मँहगाई ऊपर छत्‍तीसगढ़ी कविता-रमेश चौहान

मँहगाई ऊपर छत्‍तीसगढ़ी कविता

1. आगी लगेे पिटरोल मा (मुक्‍तामणी छंद)

आगी लगेे पिटरोल मा, बरत हवय दिन राती ।
मँहगाई भभकत हवय, धधकत हे छाती ।।

कोरोना के मार मा, काम-बुता लेसागे ।
अउ पइसा बाचे-खुचे, अब तो हमर सिरागे ।।

मरत हवन हम अइसने, अउ काबर तैंं मारे ।
डार-डार पिटरोल तैं, मँहगाई ला बारे ।।

सुनव व्‍यपारी सरकार मन, हम कइसे के जीबो ।
मँइगाई के ये मार मा, का हम हवा ल पीबो ।।

जनता मरहा कोतरी, मँहगाई के आगी ।
लेसत हे नेता हमर, बांधत कनिहा पागी ।।

कोंदा भैरा अंधरा, राज्‍य केन्‍द्र के राजा ।
एक दूसर म डार के, हमर बजावत बाजा ।।

दुबर ल दू अषाढ़ कस, डहत हवय मँहगाई ।
हे भगवान गरीब के, तुँही ददा अउ दाई ।।

2. कइसे मनावँव देवारी (त्रिभंगी छंद)-

कहां कहां जावँव, कइसे लावँव, दीया बाती, तेल भरे ।
देख मँहगाई, कइसन भाई, जियरा छाती, मोर जरे ।।
आसो देवारी, मोरे दुवारी, कइसे आही, सोच भरे ।
लइका का जानय, कइसे मानय, मँइगाई मा, ददा मरे ।।

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