छत्‍तीसगढ़ी नवगीत: नवा जमाना के नवा समस्‍या-रमेश चौहान

छत्‍तीसगढ़ी नवगीत: नवा जमाना के नवा समस्‍या

-रमेश चौहान

छत्‍तीसगढ़ी नवगीत: नवा जमाना के नवा समस्‍या-रमेश चौहान
छत्‍तीसगढ़ी नवगीत: नवा जमाना के नवा समस्‍या-रमेश चौहान

1.लइकापन लेसागे

चना होरा कस,
लइकापन लेसागे

पेट भीतर लइका के संचरे
ओखर बर कोठा खोजत हे,
पढ़ई-लिखई के चोचला धर
स्कूल-हास्टल म बोजत हे

देखा-देखी के चलन
दाई-ददा बउरागे

सुत उठ के बड़े बिहनिया
स्कूल मोटर म बइठे
बेरा बुड़ती घर पहुॅचे लइका
भूख-पियास म अइठे

अंग्रेजी चलन के दौरी म
लइका मन मिंजागे

बारो महिना चौबीस घंटा
लइका के पाछू परे हे
खाना-पीना खेल-कूद सब
अंग्रेजी पुस्तक म भरे हे

पीठ म लदका के परे
बछवा ह बइला कहागे

चिरई-चिरगुन, नदिया-नरवा
अउ गाँव के मनखे
लइका केवल फोटू म देखे
सउहे देखे न तनके

अपने गाँव के जनमे लइका
सगा-पहुना कस लागे

साहेब-सुहबा, डॉक्टर-मास्टर
हो जाही मोर लइका
जइसने बड़का नौकरी होही
तइसने रौबदारी के फइका

पुस्तक के किरा बिलबिलावत
देश-राज म समागे

बंद कमरा म बइठे-बइठे साहब
योजना अपने गढ़थे
घाम-पसीना जीयत भर न जाने
पसीना के रंग भरथे

भुईंया के चिखला जाने न जेन
सहेब बन के आगे

2. मिलय न लइका अइसे

दुख के हाथी मुड़ मा बइठे
कइसे बिताववं रात

टुकुर-टुकुर बादर ला देखत
ढलगे हवं चुपचाप
न रोग-राई हे न प्रेम रोग हे
मैं तो बेटी के बाप

कोन सुनही काला सुनावंव
अपन मन के बात

जतका मोरे चद्दर रहिस हे
ततका पांव मारेंव
चिरई कस चुन-चुन दाना
ओखर मुह मा डारेंव

बेटी-बेटा एक मान के
पढाय लिखाय हंव घात

कइसे कहंव अपन पीरा ल
मिलय न लइका अइसे
पढ़े-लिखे गुणवान होय
मोरे नोनी हे जइसे

पढ़ई-लिखई छोड़-छोड़ के
टुरा दारू म गे मात

जांवर-जीयर बिन बिरथा हे
नोनी के बुता काम
दूनो चक्का एक होय म
चलथे गाड़ी तमाम

आंगा-भारू कइसे फांदवं
लाके कोनो बरात

टूरा अउ टूरा के ददा
थोकिन गुनव सोचव
पढ़ई लिखई पूरा करके
काम बुता सरीखव

नोनी बाबू एक बरोबर
बाढ़त रहल दिन रात

3.गाँव के हवा म

रूसे धतुरा के रस
गाँव के हवा म घुरे हे

ओखर माथा फूट गे
बेजाकब्जा के चक्कर मा
येखर खेत-खार बेचागे
दूसर के टक्कर मा

एक-दूसर ल देख-देख
अपने अपन म चुरे हे

एको रेंगान पैठा मा
कुकुर तक नई बइठय
बिलई ल देख-देख
मुसवा कइसन अइठय

पैठा रेंगान सबके
अपने कुरिया म बुड़े हे

गाँव के पंच परमेश्वर
कोंदा-बवुरा भैरा होगे
राजनीति के रंग चढ़े ले
रूख-राई ह घला भोगे

न्याय हे कथा-कहिनी
हकिकत म कहां फुरे हे

4.गाय गरूवा अब पोषय कोन

जुन्ना नागर बुढ़वा बइला
पटपर भुईंया जोतय कोन

खेत खार के पक्की सड़क म
टेक्टर दउड़य खदबद-खदबद
बारह नाशी नागर के जोते
काबर कोंटा बाचे रदबद

बटकी के बासी पानी के घइला
संगी के ददरिया होगे मोन

पैरा-भूसा दाना-पानी
छेना खरसी गोबर कचरा
घुरवा के दिन हा बहुरे हे
कोन परे अब येखर पचरा

फोकट म घला होगे महंगा
गाय गरूवा अब पोषय कोन

5.नाचत हे परिया गावत तरिया

नाचत हे परिया
गावत तरिया
घर कुरिया ला, देख बड़े ।

सुन्ना गोदी अब भरे
दिखे आदमी पोठ
अब सब झंझट टूट गे
सुन के गुरतुर गोठ

सब नरवा सगरी
अउ पयडगरी
सड़क शहर के, माथ जड़े ।

सोन मितानी हे बदे,
करिया लोहा संग
कांदी कचरा घाट हा
देखत हे हो दंग

चौरा नंदागे,
पार हरागे
बइला गाड़ी, टूट खड़े ।

छितका कोठा गाय के
पथरा कस भगवान
पैरा भूसा ले उचक
खाय खेत के धान

नाचे हे मनखे
बहुते तनके
खटिया डारे, पाँव खड़े ।।

-रमेश चौहान

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One thought on “छत्‍तीसगढ़ी नवगीत: नवा जमाना के नवा समस्‍या-रमेश चौहान

  1. बहुत बढ़िया आज के हाल ल अपन कविता म देखाय हव भैय्या ।

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