पुस्तक समीक्षा: महापरसाद
समीक्षक-अजय अमृतांशु

कृति (पुस्तक) का नाम | महापरसाद |
कृतिकार | श्री मनी राम साहू ‘मितान’ |
विधा | छंदात्मक प्रबंध काव्य |
भाषा | छत्तीसगढ़ी |
मूल्य | 200/- |
समीक्षक | श्री अजय अमृतांशु |
पुस्तक समीक्षा : महापरसाद
मनीराम साहू”मितान” जी के “महापरसाद” पढ़े बर मिलिस। ये कृति भक्तिन दाई “करमा” के जीवन उपर लिखे सशक्त प्रबन्ध काव्य आय जेमा करमा दाई के कथा ल पाँच भाग म विभाजित करके लिखे गे हवय। प्रमुख छन्द चौपाई हवय जेकर संख्या 541 हवय। हर 5 चौपाई के पाछू 1 दोहा हे जेकर संख्या 108 हवय। येकर अलावा बीच बीच म अन्य छन्द के सफल प्रयोग भी कवि करे हवय जेकर ले रस परिवर्तन के सुखद अनुभुति पाठक ल होही।
करमा दाई के कथानक ल कवि हा छत्तीसगढ़ के पृष्ठभूमि म लिखे हवय ये कारण से छत्तीसगढ़ के रीति रिवाज, बर बिहाव, छठी बरही, लोक खेल आदि के सुन्दर चित्रण मिलथे। मितान जी नव प्रयोग मा माहिर हवय तभे तो आधार छन्द के अलावा उन- त्रिभंगी, हरिगीतिका, छन्न पकैया, कुण्डलिया, सरसी, सवैया, रूपमाला, ताटक, उल्लाला, घनाक्षरी, शोभन, जयकारी, अमृतध्वनि, सोरठा, रोला, गीतिका, बरवै, विष्णुपद, वीर छन्द, विधाता, छप्पय कुल 36 प्रकार के छन्द के प्रयोग महाप्रसाद म करे हवय। डमरू घनाक्षरी जो कि बिना मात्रा के लिखे जाथे वोकर प्रयोग भी कवि सफलतापूर्वक करे हे।
छत्तीसगढ़ी के कठिन शब्द के अर्थ पुस्तक के पाछु म दे हवय जेकर ले पाठक ल शब्दार्थ ग्रहण करे म कोनो परेशानी नइ होवय। मनीराम जी हा छत्तीसगढ़ के लोक जीवन,रीति रिवाज अउ परम्परा के सुन्दर चित्रण करके सराहनीय काम करे हवय। प्रसव के पहिली के तैयारी, प्रसव के उपरांत नँदावत सोहर गीत के प्रयोग कवि हा करमा माता के जन्म के बेरा म करे हवय। करमा दाई के बालपन के खेल अउ उँकर बिहाव के सुन्दर वर्णन कवि के काव्य म हवय।
बिहाव बर वर के वधु के घर जाना, मंगनी-जँचनी उपरांत तेल, हरदी, हरदाही, बरात सुवागत अउ महिला मन के द्वारा भड़ौनी विहंगम दृश्य ला पाठक अनुभव करही। भड़ौनी के विलुप्त होवत परंपरा ल कवि सहेजे के काम करे हवय उल्लाला छन्द मा भड़ौनी देखव-
लउहे लउहे खात हें, लगथे हवँय भुखाय जी।
बइठ बरतिया ऊखरू,बइला कस पगुराय जी ।।
सुन्दरी सवैया म बेटी बिदा के मार्मिक चित्रण पढ़ के पाठक भाव विहल होय बिना नइ रहि सकय। अनुप्रास अलंकार के सुग्घर प्रयोग करत छत्तीसगढ़ के ग्राम्य जीवन म बइला गाड़ी के अद्भुत चित्रण –
रेंगय बइला जझरँग जझरँग। दउँड़य लउहे लुँहगी छतरँग।
बाजय घँघड़ा घल्लर घल्लर। कबरा धँवरा नइ हे अल्लर।
तुलसीदास जी सरिक अपन काव्य मा कवि एक ही “स” के प्रयोग करे हवय। शायद येकर वजह तुकांत के उपलब्धता हो सकत हे फेर एक ही “स”के प्रयोग के बावजूद अर्थ कहीं भी बाधित नइ हे। कवि के काव्य मा ध्वन्यात्मकता हवय जेकर ले पाठक ला अद्भुत आनन्द के अनुभूति होथे-
तुनुन तुनुन तुन बजय तमुरा। चिकनिक चइया करय मँजीरा।
ढुबुक ढुबुक निक लगय खँझेरी। ताल परय जब घेरी भेरी।
उपमा अलंकार के सुग्घर प्रयोग कवि द्वारा –
कतका बरनव मैं सुघराई। सउँहे देवी लागय दाई।
करमा माता के रूप सौंदर्य के वर्णन रूपमाला छन्द मा देखव-
लाम बेनी महमहावय,मोंगरा के फूल।
सोनहा खिनवा फबय बड़,कान जावय झूल।
नाक फुल्ली नग जड़ाये, लौक अइसे जाय।
जस बिजुरिया माह भादो, बाट ले भटकाय।।
कोनो भी काव्य मा यदि संदेश नइ हो ता लेखन अधूरा ही माने जाही। मितान जी समाज ल सुग्घर संदेश देहे के काम घलो अपन काव्य मा करे हवय। नशा मुक्ति, बेटी बचाव,लोभ, मोह माया से दूर रहना, परहित, सामाजिक सदभाव अउ समरसता बनाय रखे के आह्वान ये प्रबंध काव्य म हवय।
कवि के द्वारा प्रकृति के सुग्घर मानवीकरण उँकर काव्य कौशल के परिचायक हवय-
कोंवर कोंवर डारा पाना। मूँड़ी डोलावय गावँय गाना।
कुलकय अबड़े धरती दाई।दसों दिशा मिल देंय बधाई।
करँय सुवागत सेमर परसा। लाली हरियर भांठा धरसा।
छत्तीसगढ़ के गहना, जेवर के सुघ्घर चित्रण ये कृति म पढ़े बर मिलिस-
चुटकी पैजन बिछिया साँटी। पाँव सजावय जम्मो खाँटी।
ककनी अँइठी बाँह बनुरिया। कनिहा मा करधन नवलरिया।
मनहरण घनाक्षरी के पद –
घर घर घानी चलै, नित आनी बानी चलै।
रहँय सबन साहू, घाना घनियाय जी।
(ये मेर “साहू” के जघा जघा “तेली” के प्रयोग करे ले घनाक्षरी के सौंदर्य अउ बाढ़तिस, काबर तेल के व्यापार ले ही करमा माता के जीवन चरित जुड़े हवय)
विगत 5 बछर म छत्तीसगढ़ मा युवा छंदकार मन के एक नवा पीढ़ी तैयार होय हवय। ये कृति ल पढ़े के बाद आप ल विश्वास हो जाही कि मनीराम जी ये पीढ़ी के अग्रिम पंक्ति के छन्दकार आय। अनुस्वार अउ अनुनासिक के बारीकी ले प्रयोग ये किताब के उत्कृष्टता ला दर्शाथे। रस, छन्द अउ अलंकार ले सजे ये कृति छत्तीसगढ़ी भाखा ल पोठ करही। मोर मानना हवय कि येमा प्रयुक्त शब्द मन अवइया बेरा म मानकीकरण के बेरा मा काम आही। ये अनमोल कृति खातिर कवि ल हार्दिक बधाई अउ शुभकामना।
समीक्षक- अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)
वाह बहुत सुन्दर समीक्षा अमृतांशु जी