सांध्य दीप भाग-23
-डॉ. अशोक आकाश

/102/
कहीं अति वृष्टि कहीं जले सृष्टि,
कहीं ऑधी प्रलय मचा देता |
भूचाल से हाहाकार कहीं,
महामारी गदर मता देता ||
पर्वत ढहता कटता जंगल,
सरिता मैली सूखता झरना |
कटती मिट्टी बंजर धरती,
धिक अंधप्रगति जगसुख मरना ||
महाभट वसनहीन नर्तन |
क्यों मर्दन करे सखा गर्दन ||
धरती प्रलय कालगति बढ़ती,
सम्हलो बदलो डर यम को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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/103/
मन ही मानवता दिखलाता,
मन से बढ़कर दानव कौन |
कहॉ नहीं उड़ती मन मक्खी,
मन से तूफॉ मन से मौन ||
मन से दोस्त बना दुश्मन को,
मन से बढ़कर दुश्मन कौन |
मन ही प्रस्तर मन हीरा,
मानव को बनाता मन ही गौंण ||
मन की माने वो गिरता |
मन ही मानव की निर्बलता ||
मन घोड़ा काबू रख दौड़ा,
नित रत रह मन मज्जन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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/104/
चिंता किसको क्या सुख देती,
चिंतन ही चितवन चितचोर |
चिंता भरमित कर देती चित्त,
चिंता श्वाति चिता चकोर ||
चिंता से मन को घुन खाता |
चिंतन आत्मशक्ति प्रदाता ||
आत्महीनता देती चिंता,
चिंतन चुस्त करे मन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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/105/
घुटने तक जल में ध्यान करे,
बगुले से सीखो धैर्यशक्ति |
जल से जुदा हो तड़प मरे,
मछली से सीखो देशभक्ति ||
मॉ बाप के सर का ताज रखे,
निज कन्या से सीखो विरक्ति |
मरते दम तक सम्मान करे,
कुत्ते से सीखो स्वामिभक्ति ||
कौवे से सीखो नित प्रयास |
चीटी से मेहनत कर विकास ||
मधुमक्खी मन मकरंद भरे,
और गैया से सीधापन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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-डॉ. अशोक आकाश
चौहान जी आपका अनंत आभार
कालजयी रचना है भय्या जी ।
शब्द संयोजन उत्कृष्ठ है ।