काव्‍य श्रृंखला : सांध्‍य दीप भाग-9-डॉ. अशोक आकाश

गतांक से आगे

काव्‍य श्रृंखला :

सांध्‍य दीप भाग-9

-डॉ. अशोक आकाश

काव्‍य श्रृंखला : सांध्‍य दीप भाग-9-डॉ. अशोक आकाश
काव्‍य श्रृंखला : सांध्‍य दीप भाग-9-डॉ. अशोक आकाश

// 37 //

जब मैं नन्हा था  तंग करता, 
खेलता मॉ की ऑचल  से |
अब मैं किसी से कम तो नहीं, 
टकरा जाऊं हिमाचल से ||

मेरे बलिष्ठ भुजाओं में ,
सारे भारत की ताकत है |
भारत मॉ पर ऑख उठा दे, 
देखें किसकी हिमाकत है ||

मेरी मॉ ने अक्सर ये कहा | 
घुटते वो हैं जो जुल्म सहा ||

अब सहनशीलता खत्म हुई, 
संदेशा दो तिमिरॉगन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
             ***

              // 38 //

कुंठित मनोभाव के लोगों, 
कुछ तो ले लो नवल विचार | 
तन मन शोणितमय कर देता, 
कटु वाणी  की प्रबल कुठार ||

सांध्यदीप संसार को करते, 
सावधान नित सबल पुकार |
अकड़ अकड़ जग पथ जो चलते,
कटते  झट  तलवार दुधार ||

होते वो अनुभव  की खान |
जिनको  हो जीवन पथ ज्ञान ||

मत्था टेके धर्म द्वार पर, 
देते शॉति मरू मन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
             ***

             // 39 //

नत रहते नित जग कारज हित, 
विनयवान जन सुख पाते |
मन क्रंदन संशय  मिटता, 
जीवन पथ निर्भय हो जाते ||

चलता रहे द्रुत अपनी धुन में, 
नित्य  समय धारा अनुरूप |
दर दर भटके मन की चाह में,
हैं जो यौवनता के दूत ||

लक्ष्य को नहीं दंभ मंजूर |
दानव  बनता  मद में चूर ||

गर्व भरे मन दर्प  हरे ,
संकल्प धरे सुख चेतन को
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||

-डाॅॅ. अशोक आकाश

शेष अगले भाग में

कवि के अन्‍य काव्‍य श्रृंखला- किन्‍नर व्‍यथा

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