काव्य श्रृंखला :
सांध्य दीप भाग-9
-डॉ. अशोक आकाश

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जब मैं नन्हा था तंग करता,
खेलता मॉ की ऑचल से |
अब मैं किसी से कम तो नहीं,
टकरा जाऊं हिमाचल से ||
मेरे बलिष्ठ भुजाओं में ,
सारे भारत की ताकत है |
भारत मॉ पर ऑख उठा दे,
देखें किसकी हिमाकत है ||
मेरी मॉ ने अक्सर ये कहा |
घुटते वो हैं जो जुल्म सहा ||
अब सहनशीलता खत्म हुई,
संदेशा दो तिमिरॉगन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
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कुंठित मनोभाव के लोगों,
कुछ तो ले लो नवल विचार |
तन मन शोणितमय कर देता,
कटु वाणी की प्रबल कुठार ||
सांध्यदीप संसार को करते,
सावधान नित सबल पुकार |
अकड़ अकड़ जग पथ जो चलते,
कटते झट तलवार दुधार ||
होते वो अनुभव की खान |
जिनको हो जीवन पथ ज्ञान ||
मत्था टेके धर्म द्वार पर,
देते शॉति मरू मन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
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नत रहते नित जग कारज हित,
विनयवान जन सुख पाते |
मन क्रंदन संशय मिटता,
जीवन पथ निर्भय हो जाते ||
चलता रहे द्रुत अपनी धुन में,
नित्य समय धारा अनुरूप |
दर दर भटके मन की चाह में,
हैं जो यौवनता के दूत ||
लक्ष्य को नहीं दंभ मंजूर |
दानव बनता मद में चूर ||
गर्व भरे मन दर्प हरे ,
संकल्प धरे सुख चेतन को
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
-डाॅॅ. अशोक आकाश
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