सरिता वर्मा की पाँच कविताएँ
सरिता वर्मा जो लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी एवं आधुनिक यूरोपीय भाषा विभाग में अध्ययनरत हैं, हिंदी और अंग्रेजी की नवोदित कवियत्री हैं ‘सरिता वर्मा की पाँच कविताएँ’ में आस्था, विश्वास और आशा से परिपूर्ण भाव उकेरती हैं । ‘शिव’ शिर्षक से शिव के सर्वोच्च शक्ति को नमन करती हैं, परम शक्ति में स्त्री को शक्तिपुज निरूपित करती हैं । नवोदित कवियत्री के रूप यह उनका सराहनीय प्रयास है ।

शिव
शिव में विलीन है कण कण
कण कण में विलीन है शिव
जिसे उस तक या उसे जिस तक पहुंचना है
मार्ग स्वतः पूर्व निर्मित है
वक्त का आगमन जब होगा
शिव में उत्पन्न शिव में व्यस्त शिव में अस्त्र ये जीवन होगा
शिव चेतना का बीज भी शिव है
अंकुर भी शिव है पौधा भी शिव है
वश भी शिव है बाकी सब शव है
अंधकार भी शिव है प्रकाश भी शिव है सर्वथा शिव ही शिव है
शिव विष भी शिव सुधा भी शिव शव का सुन्दर सत्य भी शिव है
शिव है मन में अभी यह विचार आये शिव है
ये शब्द भी शिव है मन की प्रेरणा भी शिव है प्राण भी शिव है
शस्वाश भी शिव है शिव आदि है अनन्त है
शिव का अंश हूँ शिव से निर्मित शिव में अन्त हूँ ।
ॐ नमः शिवाय
परम शक्ति
परम शक्ति को ढूंढे है योगी
स्त्री शक्ति को तोड़े हैं भोगी
ब्रह्मा कहां है शिव कहां है ढूंढो यह योगी
स़्त्री के कदमों में जहां है यह सोचे ना कोई
विष्णु हो या कृष्ण हो आए इस धरती पर
इन सभी पर कर्ज है एक स्त्री के
राम हौ रहीम हो या मोहम्मद साहब
स्त्री शक्ति के बिना यह कैसे आते साहब
दुर्गा को पूजते हैं सरस्वती की वंदना करते हैं
लक्ष्मी को बुलाते हैं और स्त्री को रुलाते हैं
खोजते फिरते हैं काली खप्पर वाली को
पर न सम्मान की नजर है घरवाली को
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा भटके हैं
उसको पूजने पर जो हर गली मोहल्ले गांव की शक्ति है
कोई ना समझे पूछे जाने हैं उस स्त्री शक्ति की शक्ति को
कैसी शिक्षा है यह कैसी तरक्की है
कैसा ज्ञान है कैसा विज्ञान है
जो शक्ति हर पल आपकी नजरों के सामने
हर प्राणी उस शक्ति से अनजान है
कुछ की भागवत गीता और कुछ की कुरान है
वही संस्कृति है वही सभ्यता है जो हर घर का अभिमान है
उसका अपमान पूरी मानव जाति का अपमान है
मेरा उस स्त्री शक्ति को प्रणाम है
स्त्री
वह स्त्री है
वह स्त्री है वह भक्ति है
वह तुलसी है वह शिव की शक्ति है
आस्था की ज्योति है
करुणा की मूर्ति है वह स्त्री है वह भक्ति है
वह ममता की छांव है
ईश्वर के पांव है
अमृत सी मीठी है
बरगद की छांव है
वह स्त्री है वह भक्ति है
जाड़े की धूप से सुनहरी है
बारिश की बूंदों सी है
मौसम की मुस्कान है
स्त्री है वह सब की शान है
स्त्री है वह भक्ति हैं
जिस में समाई इस धरती की शक्ति है।
विचार
विचार भाव उत्पन्न करते हैं
और भाव एक परिकल्प संकल्प को
सच है या व्यर्थ किसी के प्रति कष्टप्रद या सुख प्रद
इसका निर्धारण स्वयं विचार करने वाला व्यक्ति
विचारों से पूर्व ही अपने आत्म सांकेतिक व्याख्यान में
तत्परता से ही स्वयं निर्धारित कर चुका होता है
उसमें ही उसका संपूर्ण व्यक्तित्व छुपा होता है
मात्र एक विचार के कड़ में ही
यह विचार ही है जो धूल अवस्था में है
किसी के मस्तिष्क के अंदर आते हैं
परिलक्षित होते हैं
तत्पश्चात एक दृश्य बनाते हैं
विचारक जो इसे दृष्टि से संपूर्णता के साथ देख सकता है
विश्वास के साथ देख सकता है
एक स्वरूप एक आकार के रूप में प्रस्तुत हो जाएगा
अतः उसे पूर्ण विश्वास की मुद्रा खुद की खोज संपूर्ण रूप से परिलक्षित होगी।
अंकुर से पौधा
बीज को अंकुरित होता देखना अच्छा लगता है
जब भी बारिश में मिट्टी की खुशबू बिखरी
उसकी सोंधी सोंधी महक में महकना अच्छा लगता है
जब फूल की कलियां सर उठाकर निहारती है
उनको खूबसूरत रंगों में खेलते
मासूमियत से देखना अच्छा लगता है
फूलों की जिंदगी भले कुछ दिन की हो
खिलकर बिखर कर यह संदेश देते हैं
जिंदगी को संवारना पड़ता है
जिस प्रकार से नाजुक फूल हर मौसम का सामना करके खिलते है
उसी तरह जीवन की हर तपन में तपकर जीना अच्छा लगता है
जिंदगी कुछ पल की सही कुछ कर गुजर कर जीना
अच्छा लगता है
किसी बीज को अंकुरित होता देखना अच्छा लगता है
जब भी बारिश में मिट्टी की खुशबू बिखरी
सोंधी सोंधी महक में महकना अच्छा लगता है।
-सरिता वर्मा, लखनऊ
Bhav ! Aur lekhan shaili ….
Prabhavit karne vali hai.🌼🌼🌼🌼🌼
ओम नमः शिवाय I really liked your poem
बहुत सुन्दर सृजन…….