चपपैया और त्रिभंगी छंद सुनने में एक समान लगता है । ये दोनों ही छंद बहुप्रचलित…
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छंद परिचय
छंद परिचय के अंतर्गत भारतीय शास्त्रीय छंदों की चर्चा की जा रही है । छंद की परिभाषा, आवश्यक अंग, नियम छंदों के प्रकार , छंद विशेष की परिभाषा, गठन के नियम और उदाहरण सविस्तार समझाने का प्रयास किया जा रहा है ।
छंद का महत्व-
दुनिया में जिस भी प्रकार का विद्या पाया जाता, उन सभी विद्ययों का मूल वेद को माना गया है । वेदों के छः अंग में एक प्रमुख अंग छंद है-
छन्द पादौतु वेदस्य हस्तौ कल्पोथ कथ्यते ।
ज्योतिशामयनं नेत्रं निरूक्तं श्रोत्र मुच्यते ।।
षिक्षा घ्राणन्तुवेदस्य मुखं व्याकरणंस्तृतम ।
तस्मात् सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ।।
(वेद का छःअंग छंद, कल्प, ज्योतिष, निरूक्त, षिक्षा, और व्याकरण है । छंद को वेद का पैर, कल्प को हाथ, ज्योतिष को आँख, निरूक्त को कान, षिक्षा को नाक और व्याकरण को मुँह कहा जाता है ।)
छंद वेद का पाद होने के के कारण पूजनीय है । जिस प्रकार से पाद विहिन मनुष्य विकलांग होता है, उसी प्रकार छंद विहिन काव्य भी विकलांग होता है । हमारे देष शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे कविता अच्छा नहीं लगता होगा । बहुत से ऐसे भी काव्य प्रेमी है जो स्वयं छोटी-मोटी रचनायें करने के प्रयास करते हैं किन्तु छंद ज्ञान के बिना वह अधूरा रह जाता है ।
हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों ने वेद के बाद स्मृति-शास्त्र, पुराण जो भी ग्रन्थ लिखे हैं, उन्हें ‘छंदस’ कहा गया । इनको छंदस कहा जाना ही छंद की महत्ता को स्वयं प्रतिपादित करता है । हिन्दी साहित्य के वीरगाथा काल के रासो ग्रन्थ, भक्तिकाल के रामचरित मानस, बीजक, सूरसागर जैसे ग्रन्थ यहां तक आधुनिक काल में छंद की महत्ता कम नहीं हुई है अयोध्या सिंह हरिऔध, सूर्यकांत त्रिपाठी निराली से लेकर आज सौरभ पांडे ‘छंद मंजूशा’ अरूण निगम के ‘षब्द गठरिया बांध’ रचनाओं तक छंद अनवरत जारी है । इस प्रकार वैदिक काल से लेकर आज तक छंद की महत्ता बनी हुई है ।
छंद का इतना महत्व क्यों ?
जिस प्रकार जीवन में अनुशासन का महत्व होता वही महत्व काव्य में छंद का है ।
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सु दुर्लभा ।
कवित्व दुर्लभ तत्र शक्तिस्तत्र सु दुर्लभा ।।
अर्थात इस सृष्टि में एक तो मनुष्य योनी प्राप्त करना दुर्लभ है, यदि मनुष्य योनी मिल भी जाये तो उस जीवन में विद्या प्राप्त करना दुर्लभ है, यदि किसी भी प्रकार विद्या की प्राप्ति हो भी जाये तो उसमें कवित्व का होना अर्थात काव्य रचना करने में सक्षम होना उससे भी दुर्लभ है, यदि किसी प्रकार से कवित्व गुण आ भी जाये तो काव्य का सषक्त होना उससे भी दुर्लभ है । काव्य सषक्त तभी होता है जब कथ्य के साथ-साथ षिल्प भी सषक्त हो और यह केवल छंद ज्ञान से ही संभव है । इस प्रकार काव्य प्रेमी को कुछ ना कुछ छंद का ज्ञान होना ही चाहिये ।
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