तीन रंग तीन कवियायें
-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

तीन रंग तीन कवियायें
तीन रंग तीन कवियायें
1.कहीं हे साजिशे मौसम तो नहीं-
शम्मा जलती है मचल के मगर सूना सब क्यों आना भी नहीं , आहट भी नहीं , बेसब्री भी नहीं। एक अरसा सा फंसा उलझा हर पल में क्यूँ, जलता सा कहीं उठता है धुआं , ओझल पर क्यूँ। दूर वैसे ही आज भी डूबा सूरज , ये नया तो नहीं पर वो बदरंग बिलकुल , वो सुर्खियां तो नहीं। ओस छाने सी लगी है , पत्तों पे आकर , पेड़ भी सब्ज़ हैं , नए पत्ते पाकर। पर हर एक साँस यहाँ घुटती सी है, कहीं हे साजिशे मौसम तो नहीं ।
2.फिर चिड़िया पीली वाली-
फिर चिड़िया पीली वाली हरे डंठलों बीच शायद थक कर बैठ गयी है ढूंढी इसने हरियाली। माली ने ही काट गिराये हरे भरे पेड़ों के टल्लव नहीं बचाया कहीं जरा भी जो हरे भरे लटके थे पल्लव।
3.मुर्गा, मालिक और दुपहरी-
दौड़ रहा है मुर्गा बेदम फैली है हर तरफ दुपहरी, मालिक ने फरमान सुनाया लगा, सो गया, बाड़ में कुण्डी। हलक सूखती , पानी अंदर बाहर मुर्गा और दुपहरी , लपट भगाती बोझ लिए सर , मुर्गा , मालिक और दुपहरी।
(डॉ रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं )