व्यंग युक्त कुछ लघु आलेख
-डॉ. अर्जुन दूबे

व्यंग युक्त कुछ लघु आलेख
1.मैं करूं तो क्या करूं?
मध्यम वर्ग यह यक्ष प्रश्न पूछता रहता है, किंतु किससे?स्वयं से और व्याख्या भी करता है कि उसके देश में उसकी संख्या अर्थात मध्यम वर्ग की जनसंख्या सबसे अधिक है चाहे वे किसी जाति, धर्म अथवा भाषा के हों । किंतु विडंबना देखिए कि सबसे अधिक कठिनाई में यही वर्ग रहता है। सरकारें किसानों, गरीबों, बेरोजगारों को लेकर पूरी राजनीति करती रहती है , ऐसा करना स्वाभाविक है। मध्यम वर्ग ऐसा है जो सबसे अधिक टैक्स देता है और वह किसी न किसी रूप में टैक्स की परिधि में आ ही जाता है। फ्री की योजनाएं चाहे अन्न हो, रूपए हों, गैस हो, आवास हो, आदि किसे दिया जाता है अथवा भविष्य में दिए जाने की योजनाएं रहती है? उच्च वर्ग जिसमें पूंजीपति, उद्योगपति, बड़े व्यापारी सम्मिलित हैं को किंचित ही हानि होती हो।
मध्यम वर्ग ऐसा वर्ग है जो कानून, नीतियों और नियमों, धर्म, रीति रिवाज, परंपराओं आदि के चक्रव्यूह में अपना संपूर्ण जीवन खपा देता है। मार्क्स जीवित रहता तो उसे अपनी सोच में संशोधन करना पड़ता; राज्य, नियम , कानून शोषण करते हुए पूंजीवाद को बढ़ावा देता है किंतु किसका शोषण? गरीब का? किसान का विशेष रूप से छोटे किसानों का?ये वर्ग भी परिधि में आता है किंतु राजनीतिक लक्ष्य के लिए सुविधाएं भी तो पाता है जिसे लेने के लिए नशे जैसी चाहत बनी रहती है और समय समय पर उपलब्ध भी होता रहता है।
मध्यम वर्ग की तरफ तो कानून, नियम आदि की आंखें चौकन्नी होकर निहारती रहती है और कोई ऐसा छिद्र नहीं छोड़ती अथवा प्रयास करती हैं जिससे वह सांस ले सके और अगर ले भी तो दीर्घ अवधि तक नहीं।
यह मत सोचो कि क्या करूं बल्कि “रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखे होय। सुनि अठिलहियें लोग (कौन लोग! वही जो लहर गिन/गिनवा कर टैक्स ले ही लेते हैं) सब बांट न लैहे कोय।”
2.माया क्रिप्टो करेंसी की
यह Crypto Currency क्या होता है, भोलू ने गोलू से पूछा?
ठीक से तो मुझे भी नहीं पता है, बस इस साल के बजट में इसका जिक्र बहुत जोर से आया था, गोलू ने बताया। हां जहां तक मैं जान पाया हूं कि यह ऐसी मुद्रा अथवा धन है जो तुम्हारा भी है और तुम्हारा नहीं भी है। केवल महसूस करो कि यह तुम्हारे पास है, देख नहीं सकते हो। यह ऐसी विद्या के समान है जिसे कोई छीन नहीं सकता है किंतु समय समय पर इसके ऊपर कर अथवा इसे ही देना पड़ सकता है क्योंकि इसका भी एक मालिक है।
वह कौन,भोलू ने पूछा?
वह है Digital Currency, गोलू ने कहा।
परिहास छोड़ो; तुम साफ-साफ कहो, मैं गोल-मोल उत्तर नहीं समझ पाउंगा, भोलू ने कहा।
तुम बहुत भोला है रे। तुम बोली का खेल जानते नहीं हो, नहीं जानो तो अच्छा है, इस लिए मैं कथा कहानी के द्वारा समझाने की कोशिश करता हूं। गोलू ने कहा।
यह तो बहुत अच्छा रहेगा, यही तो चाहिए, भोलू ने कहा।
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने एक बार सपने में देखा कि उन्होंने संपूर्ण राज्य ऋषि विश्वामित्र जी को दान दे दिया हैं, गोलू ने कहा।
तब क्या हुआ?
दान की महिमा जानते हो न? गोलू ने पूछा।
हां, इसे ही तो जानता हूं। आगे की कथा बताओ, मैं भूल गया हूं।
अच्छा, तो सुनो। विश्वामित्र जी दूसरे दिन दान लेने पहुंच गए और राजा को स्वप्न याद करा दिए जिसे यही दोनों जान देख सकते थे और कोई तीसरा व्यक्ति नहीं। किंतु राजा ने कहा कि ऋषिवर, मैंने सब कुछ भौतिक वस्तुएं अब आपको दे दिया, अब मेरा कुछ नहीं। मैं अध्यात्मिक करेंसी लेकर सपरिवार जा रहा हूं?
जाओ वत्स, समय आने पर अध्यात्मिक करेंसी मैं तुमसे लें लूंगा और भौतिक करेंसी वापस कर दूंगा, यदि परीक्षा में पास हो गये तो!
ऐसा है!
हां, यह शरीर जो तुम्हें जीवन में मिला है में ही Crypto Currency निहित है जिसे यह भौतिक शरीर छू नहीं सकता है बस महसूस कर, कर्म कर। ऋषि विश्वामित्र जी परीक्षा ले रहे हैं, गोलू ने कहा।
जी और विस्तार से फिर बताओ क्योंकि मेरे पल्ले नहीं पड़ा और साथ ही इसके मालिक Digital Currency के बारे में भी प्रकाश डालो, भोलू ने कहा।
सब्र कर। धीरे धीरे सब कुछ स्वयं जान जायेगा। तुम्हीं केवल नहीं, हम सभी। डिजिटल करेंसी की महिमा का वर्णन करने के लिए शब्द अपर्याप्त हैं। सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया।
3.कम डर बघवा के, ढेर टिपटिपवा के
कम डर बाघवा के, ढेर डर टिपटिपवा के। अब का करीं? कोरोना बहुत डराया, डराया ही नहीं कितनों को मारकर खा डाला। लेकिन जानता नहीं है कि आदमी बाघ को कैसे पिंजरे में बंद कर देता है। वह पिंजरा क्या है? तरह-तरह के उपाय, यथा कोवीशील्ड, कोवैक्सीन आदि । किंतु इन हथियारों से मानव लैश हुआ नहीं है कि बाघ ने दहाड़ मारी और मानव डर कर सोचने लगा कि अब क्या हो गया है!
बाघ दहाड़ते हुए बोला वन के गीदड़ जायेंगे किधर! मेरी औलादें तुम्हें चैन से नहीं रहने देंगी। कौन है औलाद तुम्हारी! ओमीक्रान, इसके वैरिएंट, डेल्टा आदि। चले हैं पिंजरे में बंद करने! हमारी औलादें टिपटिपवा हैं, तुम डोज लगवाते रहो ,वे रह-रह कर बदला लेती रहेंगी। क्षमा करें टिपटिपवा, हम आप की महिमा से अनजान हो गये थे। कोई मार्ग दिखावें। मार्ग है, दत्त, दयाध्वम् और दमयत का, जिसका कोई काट नहीं है और जिससे मैं और मेरी औलादें भी डरती हैं, तुम्हारे बनाये पिंजरों से नहीं।
4.आन लाइन के कितने लाभ? चलो इसका, थोड़ा ही सही, लाभ ले लें:
कभी-कभी मैं सोचता हूं, हालांकि यह हकीकत से परे लगता है, कि यदि आज के सूचना प्रौद्योगिकी के एडवांस युग में पठन-पाठन, सेमिनार, कान्फ्रेंस, मनोरंजन इत्यादि शैक्षणिक से लेकर ग़ैर शैक्षणिक गतिविधियों को आन लाइन मोड अथवा ऐसे अन्य वर्चुअल माध्यमों से संपादित किया जा सकता है अथवा यों कहें कि संपादित किया जा रहा है तो राजनीति के क्षेत्र में चुनावी सभाओं को, यदि आवश्यक ही है, क्या नहीं किया जा सकता है? ऐसे प्रयोग प्रारंभ हो चुके हैं जिसे हम टीवी चैनलों के माध्यम से देखते रहते हैं। क्या इसके फायदों से लोग अनभिज्ञ हैं? सभाओं में भीड़ बढ़ाने से लेकर गाड़ियों की संख्या में बेहताशा वृद्धि और परिणाम सड़कें जाम, लोगों को अत्यंत असुविधा आदि परेशानियों से कौन नहीं परिचित है?
उपरोक्त समस्त गतिविधियों–शैक्षणिक अथवा इससे इतर–का उद्देश्य कम्युनिकेशन (संवाद करना) और तदनुरूप मूल्य का सृजन करना, मूल्य को स्थापित करना और मूल्य को संजोना है। हम भाग्यशाली हैं अथवा यह कहें कि हमें आधुनिक सभ्यता में सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न आयाम हमारे ज्ञान व कर्म फल के फलस्वरूप उपहार में मिले हैं और मिलते भी रहेंगे तो क्यों नहीं इसका भरपूर लाभ लें और और होने वाली परेशानियों से छुटकारा पावें!
–
-डा. अर्जुन दूबे
सेवा निवृत्त आचार्य, अंग्रेजी
मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय , गोरखपुर