हास्य व्यंग आलेख:नव उपनिवेशवाद
-डॉ. अर्जुन दूबे
इस हास्य व्यंग्य आलेख में भारत के मानसिक दास्ता पर व्यंग्य करते हुए दो आलेख प्रकाशित किए जा रहे हैं । एक ‘मुद्रा संकुचन’ और दूसरा ‘श्रेष्ठ है हम’ । जहां ‘मुद्रा संकुचन’ में अर्थशास्त्र को हिन्दी साहित्य के माध्यम समझाने का प्रयास है तो वहीं ‘श्रेष्ठ हैं हम’ में अपनी श्रेष्ठता को भूलकर दूसरों को श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया है ।

मुद्रा संकुचन
मैं भाषा/साहित्य का विद्यार्थी; साहित्य में जो आनंद एवं सुख वह अन्यत्र कहां मिलेगा! भक्ति में मिलेगा, कोशिश तो करो । किस तरह की भक्ति-साकार अथवा निराकार!निराकार से उत्तम क्या है, न कोई खर्चा और न ही कहीं जाना!
सत्य वचन किंतु उस निराकार में कैसा आनंद मिलता है, बिना आकार वाले की कल्पना किये? तुम आकार के फेर में पड़े हो?क्यों न पडूं? तुम बिना आकार के हो? नहीं,नहीं आकार में हूं और आकार को तलाशता हूं, सुंदर आकार में मोह और आशक्ति; तभी तो गोसाईं जी लिखते हैं अथवा यूं कहो कि शब्द के माध्यम से आकार देते हैं -“रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।। “क्या अलौकिक दृश्य रहा होगा ! यह है साहित्य में सौंदर्य ! आंख नहीं तो कैसा सौंदर्य भान! केकरा खातिर करीं श्रृंगार जब पिया मोरे आन्हर! मन की आंख से नहीं हो पायेगा क्या? मन तो निराकार है । हां निराकार से साकार का भान करो और सौंदर्य आनंद लो.वह कैसे! गोस्वामी जी लिखते हैं-
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥”
कान ने सुना और निराकार ध्वनि को आकार दे दिया, वैसे सुनने के माध्यम कान भी आकार लिए होते हैं न!
यह निराकार-आकार की चर्चा क्यों कर रहे हो? कबीरदास जी भक्ति में लीन रहते थे; निराकार ब्रह्म अवधारणा लिए कहते हैं,”दुलहनी गावहु मंगलाचार · हम घरि आए हो राजा राम भरतार ।। · तनरत करि में मनरत करिए , …आकार में निराकार को धारण करें, कैसे! मन मे.मन में धारण करने में धन नहीं लगेगा.वैसे भी आकार को नष्ट होकर निराकार में ही समा जाना होता है।
तो यह ज्ञान वाल्यावस्था में दे देना चाहिए ताकि वह खोजने मे लगा रहे जैसे बालक ध्रुव ने किया था । तब क्यों कहते हैं, माया महा ठगिनी हम जानी? माया न रहे तो कैसा सौंदर्य! कैसा विकास!और तो और कैसा विनाश!
तुम विषयांतर क्यो हो गये हो? क्या मतलब ? खर्चे की बात कर रहे थे न! खर्चा भी माया के कारण है । मतलब मुद्रा से संबध है खर्चे का! हां, ठीक समझे । वर्तमान में क्या स्थिति है? वही,मुद्रा संकुचन । यह क्या होता है? देखो सैद्धांतिक रूप मे “मुद्रा संकुचन या मुद्रा अपस्फीति (Deflation) । जब अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा में कमी एवं वस्तु और सेवा की मात्रा में बढ़ोतरी होती है तो इस स्थिति को मुद्रा अपस्फीति कहा जाता है। मुद्रा की मात्रा कम होने से मांग में कमी आती है, परन्तु वस्तु और सेवाओं की मात्रा अधिक होने के कारण उनकी कीमतें गिर जाती हैं।”
क्या कीमतें गिर गई है? यही तो महामाया है । लगता है कि मुद्रा सिकुड़ कर किसी न किसी के पास चली जा रही है । जैसे गुलाबी मुद्रा का दर्शन करते हो? नहींं। इसका संकुचन हो गया है । हा,हा,हा..
श्रेष्ठ हैं हम!
हमारे श्रृषि मुनियों ने बहुत पहले शोध (परख) करके यह बता दिया था कि अमुक घटना किस कारण से होती है, अमुक बिमारी क्यों होती है और निदान क्या है, ज्ञान का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें उनका कौशल और पारंगता नहीं दिखती है ।
अखबार पढिये तो प्राय: यह देखने को मिलता है कि हमारे देश के अमुक संस्थान/विश्वविद्यालय के अमुक विभाग से अमुक व्यक्ति को अमेरिका, इंग्लैंड अथवा यूरोप के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शोध करने जा रहे हैं । क्यों वहां का उच्चकोटि का है? इसलिए । हमारे यहां का नहीं? बेकार की बात करते हो.वहां से शोध प्रकाशन करो, अहमियत बढ जायेगी,कूड़ा करकट के फेर में मत पडो़ ।
अभी तो कह रहे थे ज्ञान के समस्त विधाओं का भंडार कक्ष हमारा ही है ।
बेवकूफ मत बनो । वही करो जो सभी करने की कोशिश करते हैं । राजनेता, नौकरशाह आदि यूरोप अमेरिका क्यों जाते हैं, जानते हो? वहां की प्रणाली, व्यवस्था देखने, नहीं अध्ययन करने । अध्ययन में अधिक बल है ।अपने देश की प्राचीन सर्वोत्म प्रणाली और व्यवस्था छोड़ कर!
यही तुम्हारी कमी है, प्रश्न बहुत करते हो । देखो, उपनिवेशवाद खत्म हो गया है सैद्धांतिक रूप में किंतु नव उपनिवेशवाद तुम्हें पग पग पर घेरे हुए है । यह नव उपनिवेशवाद क्या होता है? उसी की चाहत जिसके कारण हम गुलामी करते थे ।क्या गुलाम बन कर? नहीं, रिफाइंड तरीके से गुलाम बनाकर शासन करने अथवा श्रेष्ठता सिद्ध करने. तुम कपड़ा किसका पहनना पसंद करते हो? पीटर इंगलैंड अथवा ऐसा किसी अन्य का । खादी का नहीं! उसका भी, जो खादी हो रफ और गवंई नहीं; रिफा़ड और सबसे अलग हो । जी समझ गया.क्या? वही नव उपनिवेशवाद । हम उसी की ओर तो अग्रसर हैं ।