मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ ?
मैं कौन हूँ ?

आप कौन हैं ? आपका परिचय क्‍या है ? इस प्रश्‍न का उत्‍तर आप प्रतिदिन देते ही होंगे । मैं अमुख हूँ । मेरा परिचय ऐसा है………….. ।  किन्‍तु क्‍या कभी आप ने यह प्रश्‍न अपने आप से पूछा कि- ‘मैं कौन हूॅं’ । जब आप से कोई पूछता है कि आप कौन हैं  तो आप उत्‍तर देते हो – ‘मैं’ अमुख हूँ ।  ऐसा करते समय आप अपने उस नाम का बोध करा रहे होते हो, जो नाम आपके देह के परिचय के लिये रखा गया है ।  यदि वहीं नाम का परिचय होता तो फिर आप हमेशा यही कहते कि मैं अमुख ही हूँ, ये न कहते कि मैं इसका पिता हूँ, उसका पुत्र हूँ, किसी का मित्र हूँ या किसी का शत्रु हूँ ।

ये देहवाची या संबंधवाची संज्ञा शब्‍द अमुख(नाम), पिता, पुत्र, पति, मित्र, शत्रु (संबंधवाची संज्ञा)  क्‍या सापेक्ष है या निरपेक्ष । आपका नाम आपके देह के सापेक्ष है । आप पिता केवल पुत्र के सापेक्ष हैं, पिता के सापेक्ष पुत्र हैं, पत्‍नी के सापेक्ष पति है, मित्र के सापेक्ष मित्र और शत्रु के सापेक्ष शत्रु ये सभी सापेक्षिक परिचय है । तो फिर निरपेक्ष परिचय क्‍या है ? पूछिये अपने आप से -मैं कौन हूँ ?”

क्‍या मैं देह हूँ ? मन, बुद्धि या वाणी हूँ ?

क्‍या मैं देह हूँ ? जिसके लिये मेरा नामकरण किया गया है । यदि मैं देह हूँ ? तो मुझे यह क्‍यों कहना पड़ता है ? यह मेरी देह है । ‘मैं’ और ‘मेरी’ दोनों पृथकता का परिचय देते हैं । दोनों का अपना अलग अस्तित्‍व होता है । जैसे मैं कहूँ कि फला व्‍यक्ति मेरा मित्र है तो उस मित्र का अलग अस्तित्‍व है और मेरा अलग । उसी प्रकार ‘मैं’ का अलग अस्तित्‍व है और ‘मेरा या मेरी’ का अलग । क्‍योंकि ‘मैं’ कर्त्‍तृवाचक और ‘मेरा’ संबंध वाचक है । इस से सिद्ध होता है मैं देह नहीं हूँ । ठीक इसी प्रकार मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरी वाणी कहे जाने से यह स्‍वमेव सिद्ध हो जात है कि -मैं’ न ही मन हूँ, न ही ही बुद्धि और न ही वाणी । तो फिर ‘मैं कौन हूँ ?’ कौन हूँ मैं ?

‘मैं कौन हूँ ?’ का अनवेषण-

श्रीमद्भागवता पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा की उत्‍पत्‍ती हुई तो ब्रह्माजी अपने आप से पूछा -‘मैं कौन हूॅ ? अपने आप के जानने की तीव्र इच्‍छा से इसके उत्‍कंठ प्रयास किये इसके प्रतिउत्‍तर में स्‍वयं परम ईश्‍वरी सत्‍ता नारायण कहते हैं-

ज्ञानं परमगुह्यां मे यद् विज्ञानसमन्वितम् ।
सरहस्‍यं तदगं च गृहाण गदितं मया ।।
(श्रीमद्भागवत 2-9-30)

अर्थात ज्ञान, विज्ञान और गुह्यज्ञान से युक्‍त अत्‍यंत गोपनीय अपने स्‍वरूप ग्रहण करो । नारायण कहते हैं कि मेरा परमगुह्य ज्ञान है इसको ग्रहण करो । मैं जो कहता हूँ उसको जानो, आत्‍मतत्‍व का अनुभव करो ।

‘मैं’ का परिचय-

श्रीमद्भागवत में स्‍वयं भगवान ज्ञान, विज्ञान और गुह्यज्ञान से युक्‍त अत्‍यंत गोपनीय अपने स्‍वरूप के संबंध में कहते हैं-

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मक: ।
तथैव तत्‍वविज्ञानमस्‍तु ते मदनुग्रहात ।।

अर्थात  ‘मैं’  का जिस प्रकार भाव है, जिसप्रकार रूप है, जिसप्रकार गुण है और जिस प्रकार कर्म, उसे उसी तत्‍व ज्ञान के रूप में ज्‍यों का त्‍यों ग्रहण करो । जैसा मैं हूँ ‘मैं’ का जैसा भाव, ‘मैं’ का जैसा रूप, ‘मैं’ का जैसा गुण और ‘मैं’ का जैसा कर्म, इन्‍हीं विषयों का ज्ञान ‘मैं’ आत्‍मा अर्थात आत्‍मतत्‍व का रहस्‍य है ।

महर्षि मुक्‍त के अनुसार आत्‍मतत्‍व-

आत्‍मतत्‍ववेत्‍ता आत्‍मनिष्‍ठ महर्षि मुक्‍त इस संबंध में कहते हैं- ‘मैं’ देह नहीं आत्‍मा हूँ – यह ज्ञान है । ‘मैं’ सर्व हूँ-यह विज्ञान है और ‘मैं’ हूँ यह परमगुह्य ज्ञान है । परमगुह्यज्ञान को समझाते हुये महर्षि मुक्‍त कहते हैं- ‘मैं’ अमुख हूँ ऐसा जानना अज्ञान है । ‘मैं’ हूँ, ‘मैं’ को ‘मैं’ रूप में जानना ज्ञान है । इन दोनों को जानना परमगुह्य ज्ञान है । 

‘मैं’ अमुख हूँ-यह प्रगट ज्ञान है । ‘मैं’ हूँ-गुप्‍त ज्ञान है । इन दोनों प्रगट ज्ञान और गुप्‍त ज्ञान के परिज्ञाता को परमगुह्य ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार ‘मैं’ ही आत्‍मतत्‍व है, ‘मैं’ ही आत्‍मा भगवान है ।

अपना  व्‍यक्तित्‍व अर्थात अपने आप को कुछ मानने का भान रहेगा तब इस आत्‍म तत्‍व को नहीं जाना जा सकता । इसे तो केवल व्‍यक्तित्‍व को लोप करके ही जाना जा सकता है । मैं अमुक हूँ, यह प्रगट ज्ञान है । मैं जानता हूँ कि मैं देह हूँ, जीव हूँ, इसलिये यह प्रगट ज्ञान है । तो क्‍या इस ज्ञान को जानने वाला ‘मैं’ भी जीव हूँ ? क्‍या ‘मैं’ का आधार जीव है ? मैं देह हूँ, मैं जीव हूँ, मैं ब्रह्म हूँ, यह सभी प्रगट ज्ञान है और ‘मैं’ हूँ अर्थात आत्‍मतत्‍व यही ब्रह्म ज्ञान है ।

नारायण ब्रह्माजी के समक्ष ये जो रहस्‍योद्घाटन किये इसमें आत्‍मा तत्‍व को अपने पृथ्‍क मानने वाले उसे परमात्‍मा मानने लगे जबकि आत्‍मतत्‍व को अपने से अभेद जानने वाले ‘मैं’ को आत्‍मा भगवान जाने । मानना किसी न किसी विकल्‍प के आधार पर होता है । जबकि जानना विकल्‍पाधार पर । विकल्‍प ही प्रपंच है । विकल्‍प का अभाव करना ही अपने को जानना है ।

आदि भागवत (चतुषश्‍लोकी भागवत) में आत्‍मतत्‍व-

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत सदसत् परम् ।
पष्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्यते सोऽस्म्यहम।।1ाा

ऋतेऽर्थे यत् प्रतीयेत न प्रतीयते चात्मनि ।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।2।।

यथा महान्ति भूतानि भूतेशूच्चावचेश्वनु ।
प्रविश्टान्यप्रविश्टानि तथा तेशु न तेश्वहम् ।।3।।

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात सर्वत्र सर्वदा ।।।4।।

अर्थात  सृष्टि के पूर्व  केवल ‘मैं’ ही ‘मैं’ था । ‘मैं’ के अतिरिक्‍त न स्‍थूल था न सूक्ष्‍म और न तो दोनों का कारण अज्ञान । जहॉं यह सृष्टि नहीं है वहॉं ‘मैं’ ही ‘मैं’ हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी ‘मैं’ ही ‘मैं’ हूँ । वास्‍तव में न होने पर भी जो कुछ अनिवर्चनीय वस्‍तु मेरे अतिरिक्‍त  मुझ परमात्‍मा ‘मैं’  में दो चन्‍द्रमाओं की तरह मिथ्‍या ही प्रतीत हो रही है , अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश-मण्‍डल के नक्षत्रों में राहू की भॉंति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी (‘मैं’ की) प्रपंच या माया समझना चाहिये ।

जैसे प्राणियों के पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीर में आकाश आदि पंचमहाभूत उन शरीर के कार्य रूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्‍थानों और रूपों में  कारण रूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्‍मा के रूप से प्रवेश किये हुए हूँ और आत्‍मदृष्टि से अपने अतिरिक्‍त और कोई वस्‍तु न होने के कारण उनमें प्रविष्‍ट नहीं भी हूँ । 

यह ब्रह्म नहीं यह ब्रह्म नहीं -इस प्रकार निषेध की पद्यति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है- इस अन्‍वय की पद्यति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्‍वरूप ‘मैं’ भगवान ही सर्वदा अैर सर्वत्र स्थित है, यही वास्‍तविक तत्‍व है । जो आत्‍मा अथवा परमात्‍मा का तत्‍व जानना चाहते हैं, उन्‍हें केवल इतना ही जानने की आवश्‍यकता है । 

सारांश-

महर्षि मुक्‍त के आत्‍मतत्‍वत: किसी कालवाची, स्‍थानवाची या वस्‍तुवाची को कुछ मानना माया और उसको जानना मायापति स्‍वयं आत्‍मा भगवान है । भेदवादी  उस परम शक्ति को अपने से पृथ्‍क मानते  हैं और अपने आप को उसका अंश मात्र मानते जबकि  अभेदवादी उस परमशक्ति और अपने आप को एक जानते हैं । जैसे सोना धातु का एक अंश भी सोना ही होता है उसे सोना से पृथ्‍क नहीं किया जा सकता किन्‍तु उसके आकार, प्रकार में भिन्‍नता मानकर अलग-अलग गहनें के नाम देकर अलग-अलग मान बैठते हैं वस्‍तुत: वह सोना है । सोना को सोना ही जाना जा सकता है । 

मानना पराश्रित होता है किसी साधन  से यथा पढ़कर, सुनकर, देखकर मान्‍यता या धारणा स्‍थापित किया जा सकता है किन्‍तु जानना  स्‍वयंकरके ही संभव है यह केवल और केवल अनुभूति से ही अनुभूत किया जा सकता है । इस निर्देशानुसार ‘मैं’ को आत्‍मा भगवान के रूप में अनुभूत करके स्‍वयं को कहें- ‘मैं’ आत्‍मा भगवान हूँ । यह अनुभूति सतत् आत्‍मावलोकन से ही संभव है ।

''हरि ॐ  तत्‍सत''

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