सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान गौरव गाथा (आल्‍हा छंद)

सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान गौरव गाथा (आल्‍हा छंद)

-रमेश चौहान

सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान गौरव गाथा (आल्‍हा छंद)

सबले पहिली माथ नवावय, हाथ जोर के तोर गणेश ।
अपन वंश के गौरव गाथा, फेर सुनावत हवय ‘रमेश‘ ।।

अपन देश अउ अपन धरम बर, जीना मरना जेखर काम ।
जब तक सूरज चंदा रहिथे, रहिथे अमर ओखरे नाम ।।

पराक्रमी योद्धा बलिदानी, भारत के आखरी सम्राट ।
पृथ्वीराज अमर हावे जग, ऊँचा राखे अपन ललाट ।।

जय हिन्दूपति जय दिल्लीपति, जय हो जय हो पृथ्वीराज ।
अद्भूत योद्धा तैं भारत के, तोरे ऊँपर सबला नाज ।।

स्वाभिमान बर जीना मरना, जाने जेने एके काम ।
क्षत्रीय वर्ण चौहान कहाये, अग्नी वंशी जेखर नाम ।।

आगी जइसे जेठ तिपे जब, अउ रहिस अंधियारी पाख ।
रहिस द्वादशी के तिथि जब, जनमे बालक पृथ्वीराज ।।

कर्पूर देवी दाई जेखर, ददा रहिस सोमेश्वर राय ।
रहिस घात सुग्घर ओ लइका, सबके मन ला लेवय भाय ।।

लइकापन मा शेर हराये, धरे बिना एको हथियार ।
बघवा जइसे तोरे ताकत, जाने तभे सकल संसार ।।

रहे बछर ग्यारा के जब तैं, हाथ ददा के सिर ले जाय ।
अजमेर राज के ओ गद्दी, नान्हेपन ले तैं सिरजाय ।।

अंगपाल दिल्ली के राजा, रिश्ता मा तो नाना तोर ।
ओखर पाछू दिल्ली गद्दी, अपन हाथ धर करे सजोर ।।

एक संघरा दू-दू गद्दी, गढ़ दिल्ली अउ गढ़ अजमेर ।
गढ़े पिथौरागढ़ अउ पाछू, राज बढ़ाये बनके शेर ।।

सोला-सोला बार हराये, आये जब गौरी सुल्तान ।
जीवनदानी फेर कहाये, दिल्ली के राजा चौहान ।।

तोर विरता देख-देख के, जलन-मरय राजा जयचंद ।
सुल्तान संग हाथ मिलाये, दूनों रचय कपट के फंद ।।

हाथ धरे हथियार कपट के, फेर आय गौरी सुल्तान ।
पीठ दिखा के घात करे जब, बंदी बनगे तब चौहान ।।

पृथ्वीराज चंदबरदाई, नान्हेपन के रहय मितान ।
दूनों संगी ला बंदी कर, अपन देश ले गे सुल्तान ।।

खड़े-खड़े सुल्तान सभा जब, आँखी छटकारय चौहान ।
पानी-पानी होके बैरी, देवन लागे तब फरमान ।

पृथ्वीराज नवा तैं आँखी, अब तो हस तैं मोरे दास ।
नहि ते तैं अंधरा कहाबे, अउ बन जाबे जींदा लाश ।।

छाती चौड़ा करके बोलय, तब ओ दिल्लीपति चौहान ।
स्वाभिमान हे जीवन मोरे, कान खोल के सुन सुल्तान ।।

तोला जउने करना हे कर, आँखी झुकय नही सुल्तान ।
बार-बार हारे हस बैरी, तभो न जाने तैं पहिचान ।

दूनों आँखी अपन गवाये, तभो न टूटे ओ चौहान ।
बने अंधरा होके आगी, बदला ले के लेवय ठान ।।

कहय चंदबरदाई जाके, सुनव-सुनव ओ सुल्तान ।
बिन देखे ओ बाण चलाथे, अइसन वीर हमर चौहान ।

बड़ अचरच ओ गौरी मानय, लेहँव ओला आज अजमाय ।
ऊँच सिंहासन गौरी बइठे, अपन सभा ओ लेत लगाय ।

सभा बीच मा बैरी गौरी, पृथ्वीराज लेत बलवाय ।
पृथ्वीराज चंदबरदाई, सभा बीच तब पहुँचे आय । ।

धनुष बाण ला हाथ धरा के, बैरी गौरी हुकुम सुनाय ।
बिना देखे कइसे चलथे, बाण शब्द भेदी देखाव ।

देत ठहाका गौरी हाँसे, तब बरदाई अवसर जान ।
गौरी के मरना पक्का अब, चन्द्र लगे दोहा सिरजान ।।

चार बाँस चौबीसे गज ऊपर, अउ हे अँगुल अष्ट प्रमान ।
जेमा बैरी हा बइठे हे, अब तो मत चूको चौहान ।

पृथ्वीराज ध्यान धर के तब, करय शब्द भेदी संधान ।
बाण धसे गौरी के मुँह मा, तुरते मरगे ओ सुल्तान ।।

घात एक दूसर मा करके, दूनो संगी देइस जान ।
बंदी होके बदला लेलिस, अइसन वीर हमर चौहान ।।

अमर हवय अउ अमर रहिहि गा, दिल्ली के राजा चौहान ।
स्वाभिमान बर जीना मरना, होगे अब हमरे पहिचान ।

जेखर शहिदी के बादे हम, नवा ठिकाना खोजे आय ।
चारो कोती देश धरा के, अग्नी वंशी बिखरे जाय ।।

छत्तीसगढ़ धरा मा आये, हमरो पुरखा एक अनेक ।
मुगल राज ले आज तलक हम, छत्तीसगढ़िया हवन नेक ।

मान धरे हम दिल्लीपति के, स्वाभिमान ला पगड़ी छांध ।
ये धरती के सेवा करबो, अपन कफन ला मुड़ मा बांध ।

हम अब छत्तीसगढिया हवन, धरती के सेवक चौहान ।
इहें जिना मरना हे अब तो, इहें हवय हमरे अभिमान ।।

अपन वंश के गौरव जानव, लइका बच्चा सबो सियान ।
वंश पताका सब फहरावव, मिल के कर लौ गौरव गान ।।

स्वाभिमान ला अपन जगावव, धरम-करम तैं अपने मान ।
स्वाभिमान जब जिंदा रहिही, तब न कहाबो हम चौहान ।।

-रमेश चौहान

सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान गौरव गाथा (आल्‍हा छंद)

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