एक लघु कथा:जिंदगी, गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारी

जिंदगी, गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारी

डॉ. अर्जुन दुबे

यह एक सच्ची घटना पर आधारित छोटी-सी कहानी है। यह उस महिला के जीवन का चित्र है जिसे मैं पिछले आठ–नौ वर्षों से संघर्ष करते हुए देख रहा हूँ। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने कभी भी अपनी ईमानदारी और आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। कथा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए मैंने पात्र का नाम बदल दिया है।

यह कहानी लगभग चालीस–बयालीस वर्ष की एक विधवा महिला ममता की है, जो अपने चार बच्चों के साथ जीवन का कठिन संघर्ष कर रही है। उसका पति उससे अत्यंत प्रेम करता था। यद्यपि उसे रोज़ शराब पीने की आदत थी, फिर भी स्वभाव से वह सरल और निष्कपट था।

इसी वर्ष जनवरी की कड़ाके की ठंड में एक दर्दनाक दुर्घटना घटी। वह अपने कुछ साथियों के साथ सड़क किनारे आग ताप रहा था। तभी तेज़ रफ्तार से उलटी दिशा में आ रही एक स्कॉर्पियो गाड़ी नियंत्रण खो बैठी और उन पर चढ़ गई। इस दुर्घटना में उसके पति सहित दो लोगों की मृत्यु हो गई। घटना अत्यंत हृदयविदारक थी।

इस महिला के बारे में एक विशेष बात और है—वह बोल सकती है, पर सुन नहीं सकती। सामने वाले के होंठों और हावभाव को देखकर वह बात समझ लेती है और फिर धाराप्रवाह बोलती है। मेरी पत्नी उससे सहजता से संवाद कर लेती है, किंतु मेरे लिए यह उतना सरल नहीं।

ईमानदारी के मामले में उसका कोई मुकाबला नहीं। गरीबी में अक्सर लोग डगमगा जाते हैं और अवसर मिलते ही गलत रास्ता चुन लेते हैं, लेकिन यह महिला एक अपवाद है। उसमें लालच बिल्कुल नहीं है। यदि उसे किसी चीज़ की ज़रूरत होती, तो सीधे कह देती थी। किंतु पति की मृत्यु के बाद तो मानो उसकी अपनी इच्छाएँ ही समाप्त हो गई हों—अब वह केवल अपने बच्चों के लिए जी रही है।

एक बात और उल्लेखनीय है—वह पासवान जाति से है, फिर भी सनातन संस्कारों के अनुरूप सादगी और मर्यादा के साथ जीवन जीती है। वास्तव में ईमानदारी और संस्कार किसी जाति के नहीं, मनुष्य के चरित्र के होते हैं।

अब उसके संघर्ष की बात। वह चार–पाँच घरों में चौका–बर्तन करके अपने परिवार का पालन-पोषण करती है। जब उसका पति जीवित था, तब भी वह इसी प्रकार काम करती थी और घर–परिवार का ध्यान रखती थी। मेरी पत्नी मज़ाक में उसके पति को “पियकड़वा” कहकर बुलाती थी, लेकिन उस संबोधन के पीछे भी उसके प्रति स्नेह और अपनापन ही होता था।

जब उसके पति की मृत्यु हुई, तो उसे इसका पता अगले दिन चला। यह सुनते ही वह बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़ी थी। बाद में अंतिम संस्कार हुआ और उसके मायके वालों ने श्राद्ध-कर्म भी संपन्न कराया।

आज भी वह उसी साहस और संघर्ष के साथ जीवन जी रही है। जब पति जीवित था, तब अभावों के बावजूद उसके जीवन में एक प्रकार की संतोष भरी खुशी थी। आज पति नहीं है, इसलिए मानसिक पीड़ा और जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ गया है। फिर भी उसने हार नहीं मानी है। वह निरंतर संघर्ष कर रही है।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उस महिला और उसके बच्चों का जीवन सुख, सुरक्षा और सम्मान से भर जाए।

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