छत्तीसगढ़ी कविता का शिल्प विधान गांव ला सिरजाबो -कवि – डुमन लाल ध्रुव
’छत्तीसगढ़ी’ छत्तीसगढ़ प्रांत की मातृभाषा एवं राजभाषा है। इतिहासकार डॉ. प्यारेलाल गुप्त के अनुसार “छत्तीसगढ़ी भाषा अर्ध मागधी की दुहिता एवं अवधि की सहोदर है।” छत्तीसगढ़ी साहित्य एक समृद्ध साहित्य है, जिस भाषा का व्याकरण हिंदी के पूर्व रचित है, जिस छत्तीसगढ़ी के छंद का आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानू ने हिंदी को छंद प्रभाकर एवं श् काव्य प्रभाकर भेंट किए हों वहां के साहित्य में छंद का स्वर निश्चित ही ध्वनित होगा। छत्तीसगढ़ी साहित्य के आदिकाल से आज तक अनेक कवियों की रचनाओं में छंद विधा के दर्शन होते हैं, किंतु छत्तीसगढ़ी लोक भाषा के रूप में व्यंजित लोकगीत ददरिया, सुआ ,भोजली, पंडवानी, करमा,पंथी आदि को पल्लवित करती रही है। इन लोक गीतों का प्रभाव छत्तीसगढ़ी साहित्य में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य के आधुनिक काल का द्वितीय सोपान स्वतंत्रता आंदोलन एवं आजादी के पश्चात भारत निर्माण काल में उदित हुआ । इस युग के हस्ताक्षर नारायण लाल परमार, कुंज बिहारी चौबे ,द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र ,कोदूराम दलित, श्यामलाल चतुर्वेदी, आदि हैं –
दोहा – पांव जान पनही मिले, घोड़ा जान असवार।
सजन जान समधी मिलय, करम जान ससुरार।।
कोदूराम ’’दलित’’
तृतीय सोपान के आधार स्तंभ नारायण लाल परमार ने मुक्त छंद को जन्म दिया। लाला जगदलपुरी ,विमल पाठक, विनय कुमार पाठक, केयूर भूषण ,दानेश्वर शर्मा ,मुकुंद कौशल ,लक्ष्मण मस्तुरिया ,हरि ठाकुर ,नरेंद्र देव वर्मा आदि कवियों ने अपनी आहुति दी है। लक्ष्मण मस्तुरिया रचित’’ सोना खान के आगी ’’आल्हा छंद से अनुगुंजित है-
धरम धाम भारत भुईयां के मंझ म हे छत्तीसगढ़ राज ।
जिहां के माटी सोना धनहा, लोहा कोईला उगलै राज।।
छत्तीसगढ़ी साहित्य के काव्य शिल्प में अरुण निगम द्वारा 2015 में रचित छंद के छ छत्तीसगढ़ी साहित्य में छंद शिल्प को प्रोत्साहित करने में सफल रहा है। छत्तीसगढ़ी साहित्य में छंद पुष्पित पल्लवित दृष्टिगोचर हो रहा है इसी कड़ी में कवि श्री डुमन लाल ध्रुव जी रचित ’’गांव ला सिरजाबो’’ छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह की चर्चा करना समीचीन है। इस संग्रह की विशेषता है –
01.कवि श्री डुमन लाल ध्रुव की कविता में लोकगीत के स्वर विद्यमान है।
02. उनकी कविताओं में व्यवस्था की जकड़न के विरुद्ध असहमति का स्वर है।
03. उनकी इन कविताओं में विषमता और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर साफ-साफ सुनाई देता है।
04. श्री डुमन लाल ध्रुव इन छत्तीसगढ़ी कविताओं के माध्यम से समता मूलक समाज के आग्रही हैं। वे नया सबेरा लाना चाहते हैं।
छत्तीसगढ़ी अपनी साहित्यिक परंपरा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है, यह बात आज कौन नहीं जानता। इस जनपद का लेखन हिंदी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता संवारता आ रहा है । छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी सांस्कृतिक अस्मिता है। छत्तीसगढ़ मतलब लोक संस्कृति से आलोकित जन संकुल ,भौतिक संसाधन, वन संपदा, कृषि संपदा , आदि छत्तीसगढ़ की पहचान है। इसी वैचारिक और बौद्धिक संपदा व शक्ति के बल पर छत्तीसगढ़ अपनी विशिष्ट पहचान बनाता है।
छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रहश् गांव ला सिरजाबो में 83 कविताएं संग्रहीत हैं। इन कविताओं में गीतात्मकता है , गेय प्रधान है। इन्हें गीतों की तरह गाया जा सकता है। कविताओं को स्वर, लय, ताल में पिरोया गया है, यही इसकी प्रमुख विशेषता है। इन कविताओं को पढ़ते समय कुछ गीतों पर लक्ष्मण मस्तुरिया की छाप दिखाई देता है । इनमें देशभक्ति, देश प्रेम,आध्यात्मिकता ,नैतिकता,उपदेश परक प्रेरणास्पद प्रेरणा परक कहीं उद्बोधन ,कहीं आग्रह, कहीं आह्वान, और कहीं निवेदन (अपील)भी है। इन कविताओं में स्वतंत्रता ,समानता ,बंधुत्व , एकता ,प्रेम ,राग – अनुराग, सौहार्द्र परक ,धार्मिक सामंजस्य का संदेश देती ये रचनाएं काफी महत्वपूर्ण हैं। इन कविताओं में छत्तीसगढ़ की माटी की महिमा का बखान है।, कहीं-कहीं मार्मिक भाव व्यंजनाऐं हैं, लाक्षणिकता है। उपमा, रूपक ,अनुप्रास, यमक अलंकार की छटाओं से ओतप्रोत है । कविताओं का शीर्षक ही बरबस पाठक का ध्यान खींचता है ,जिज्ञासा को बढ़ाता है छत्तीसगढ़ के माटी, सोनहा माटी, माटी के महिमा, माटी में सोनहा उपजाबो,माटी के तन आदि शीर्षकों से पांच कविताएं रची गई हैं। नदिया शीर्षक से तीन कविताएं हैं ’’नदिया के तीर हमर गांव’’ पियास मरे नदिया और नदिया’’। श्रम गीत के रूप में ’’श्रम के गीत सुनाबो, श्रम के कमाई, ’’काम करो रे’’ तीन गीत हैं। ’’पुन्नी के अंजोर’’, ’’पुन्नी के चंदा’’, ’’मोर चंदा बेटी’’ ’’चंदा ला कही देबे संदेश’’ इस तरह चार कविताएं हैं। दिया शब्द से चार कविताएं हैं ’’दिया अंजोर, ’’अंगना म दिया जलाये’’ , ’’दिया जलत हे’’ दिया तिहार के’’ आदि। इन कविताओं में छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक जीवन प्रतिबिंबित है।
समय की धारा के साथ कविता की धारा, शैली व शिल्प में परिवर्तन भी होता रहता है। जीवन, रहन-सहन भौतिक घटनाएं भी परिवर्तित होती रहती हैं ,उसके अनुसार विषय वस्तु भी बदलता है । छत्तीसगढ़ के कृषि जीवन में अब उद्योग धंधे व्यापार ने प्रवेश ले लिया है, राजनीति हावी हो गई है, जीवन में दोहरापन आ गया है। छत्तीसगढ़ का सीधा सहज सरल व्यक्ति शोषण शिकार हो रहा है। अब समय-समय पर जागरण की लहर आने लगी है । ऐसी स्थिति में लोगों को जागृत करते हुए कहता है
जागव छत्तीसगढ़िया जागव,
अब सुते के बेरा नईये
सोसन अउ अत्याचार ला देख के
अब सहे के बेरा नईये,
धरम बेचावत हे मनखे के मोह म
अब बेरा इन ला पाये के
आपसी बैर भाव मिटाये के
अब नई ये बेरा डर्राये के
चिन्हों अपन महतारी के भाखा
एकेच रुखवा ,एकेच शाखा
अब बेरा हे योद्धा बनाये के
जागव जागव छत्तीसगढ़िया जागव रे।
नई दृष्टि, नई उपमा, नई शैली में मुक्त छंद की कविता हमें आह्लादित करती है। नारी और वृक्षारोपण ,नई तपस्या ,भक्ति सेवा ,प्रकृति आदि कवि की विषय वस्तु है। कभी डुमन लाल ध्रुव की प्रगतिशीलता, समसामयिक चिंतन उनकी कविताओं में झलकता है। कवि की कविता राष्ट्रीय एकता का संदेश देती है ,वह क्रांति का आह्वान करती है, जाति -पाति गत भेदभाव को दूर करने के लिए कवि काव्य रचना में निमग्न है। ध्रुव जी छत्तीसगढ़ के माटी शीर्षक कविता में कहते हैं –
सुम्मत के रद्दा धरो रे भईया, एकता में बड़ ताकत हे
झगड़ा लड़ाई झन करो रे भइया जिनगी बर बड़ घातक हे।
कवि देश में नए विकास का स्वप्न देखते हुए कहता है –
नवा अंजोरी लाना हे
दुख सुख ला बांट के संगी अंधियारी ला भगाना हे
चलो चलो मोर देश में भइया नवा अंजोरी लाना हे
जात धरम म होवत लड़ाई घर-घर ला समझाना हे
ऊंच नीच के भेद मिटा के देश ला सरग बनाना हे
गांव के संगी भाई चलव, अत्याचार हटाना हे
चलो चलो मोर देश में भइया नया अंजोरी लाना हे।।
गांव के नए सृजन का स्वप्न देखा हुआ कवि गा उठता है- गांव ला सिरजाबो
भाई भाई मन चलव, बहिनी बहिनी मन जागव
चलो संगी मिलजुल के गांव ला सिरजाबो
प्रेम के दिया बार के ,मन ला उजराबो
बैर भाव ला मेट के, दया माया ला बगराबो
कोनो नईये गरीबी, कोनो नईये अमीरी
कोनो नई ये सेठ, कोनो नई ये साहूकारी
जाति पाति तोड़ के ,जम्मो ला एक म मिलाबो
चलो संगी मिलजुल के गांव ला सिरजाबो ।।
बिना श्रम के यहां कुछ भी संभव नहीं है अतः प्रेरित करते हुए कहते हैं –
काम करो रे भाई काम करो रे
पियासी धरती पानी मांगे,
गांव कहे श्रमदान करो
काम करो रे भाई कम करो,
अपन जिनगी बर काम करो
गीत हिमालय सुनावत हावै,
अपन पांव म खड़े-खड़े
गंगा जमुना के अविरल धारा,
प्रगति पथ म बढ़े- बढ़े
इनकर ले कुछ सीख सीख लो,
आलस के अब तियाग करो
काम करो रे भाई काम करो
अपन जिनगी बर काम करो ।।
’’श्रम के कमाई’’ शीर्षक कविता में कहते हैं –
शंख बजाबो चेतनता के अउ पूजबो परमारथ ला
कभु नई देवन अब पनपे बर थोकिन अइसन सुवारथ ला
श्रम के गीत धरती म गाके धन धरती ला कर देबो
जगत म नई ये काम अंगुठवा ,अंगूठवा हे मोर भाखा म
श्रमिक मजदूर सदा जग जीता हवे ,
जन-जन के परिभाषा म।।
देश में लोकतंत्र से गांव का विकास और हो रहे परिवर्तन को रेखांकित करते हुए ध्रुव जी कहते हैं –
कतेक सुघ्घर मजा आवत हे गांव म
छिगबिग- छिगबिग डोली
हरियर धान मेंछरावत हे
किंदर किंदर के कोलिहा घलो,
हुंआ – हुंआ नरियावत हे ।
अब करमा, ददरिया घलो लगे हावे दांव म
पैरी बाजत हे छुनुर – छुनुर पांव म
चिरई चुरगुन घलो विधुन होके
आपस में करत हे प्रेम विभोर
काकरो नई ये धौंस दपट
सुक्खा रूखवा छांव म
ककारो संग नई ये बैर भाव सब म हे भाईचारा
कांध मे कांध मिला के चलबो
महतारी के राज दुलारा ।।
भावुक कवि का मन बेचौन है वह इस संसार में रह कर कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे समाज में शांति समृद्धि और खुशियाली हो। वे स्वयं कहते हैं –
मोला कांही करना हे
अगास
पिरथी के बीच दूरी म
घपटे अंधियार म
एक दिया जलाना हे
अंजोर बगराना हे
एक दिया जलाना हे।।
अंत में कहना चाहता हूं कि श्री डुमन लाल ध्रुव की मुक्त छंद की कविताएं छत्तीसगढ़ी भाषा में अपना विशिष्ट स्थान बनाएगी ,ऐसा विश्वास है। वह निरंतर यश कीर्ति अर्जित करते रहें । उनकी यह मनोकामना पूरी हो और उनकी कलम इसी तरह चलती रहे इन्हीं शुभकामनाओं और आशीर्वाद के साथ।जय भारत, जय संविधान, जय छत्तीसगढ़।
डॉ. स्वामी राम बंजारे ”सरल”
( शोध निर्देशक एवं हिंदी अध्ययन मंडल अध्यक्ष)
विभागाध्यक्ष – हिंदी विभाग
भा.प्र.दे.शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय कांकेर
(छत्तीसगढ़) मो. नं. 7724017697
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