विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे

विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर?

भारतीय जनमानस में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण के संदर्भ में प्रयोग की जाती है, मानो उन्होंने अपने ही कुल का विनाश कराया हो। परंतु क्या वास्तव में विभीषण का चरित्र इतना सरल और एकांगी है? या फिर यह हमारी अधूरी समझ का परिणाम है?

इस प्रश्न को यदि गहराई से देखा जाए, तो विभीषण केवल “घर का भेदी” नहीं, बल्कि सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस रखने वाले एक दुर्लभ व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं।

क्या विभीषण सचमुच “घर के भेदी” थे?

देवी सीता के हरण से पहले भी विभीषण लंका में ही थे। वे रावण के मुख्य सलाहकारों में गिने जाते थे। यदि वे वास्तव में विश्वासघाती होते, तो क्या रावण जैसा प्रज्ञावान और शक्तिशाली राजा उन्हें अपने निकट रखता? स्पष्ट है कि विभीषण की छवि एक महाज्ञानी, शांतिप्रिय और धर्मनिष्ठ व्यक्ति की थी, जो असुर कुल में जन्म लेकर भी भगवद्भक्ति में लीन रहते थे।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—गलत को गलत कहने का साहस।

जब रावण ने सीता हरण किया, तब विभीषण ने न केवल इसका विरोध किया, बल्कि उसे समझाया कि यह कार्य अधर्म है और देवी सीता को ससम्मान श्रीराम को लौटा देना ही उचित होगा। यही नहीं, जब शूर्पणखा ने अपने अपमान का विकृत वर्णन किया, तब भी विभीषण ने सत्य को पहचानने का प्रयास किया।

यहाँ प्रश्न उठता है—क्या सत्य कहना “घर का भेदी” होना है? या यह नैतिक साहस का परिचायक है?

युद्ध के विरोध में एक स्वर

लंका के दरबार में जब युद्ध की तैयारी हो रही थी, तब विभीषण उन विरले व्यक्तियों में थे जो युद्ध के विरुद्ध खड़े थे। वे जानते थे कि यह युद्ध केवल अहंकार का परिणाम है और इसका मूल्य निर्दोष प्रजा को चुकाना पड़ेगा।

उन्होंने सभा में स्पष्ट रूप से कहा कि युद्ध से बचना चाहिए। लेकिन सत्ता के अहंकार को सत्य कभी स्वीकार नहीं होता। परिणामस्वरूप, उन्हें अपमानित कर राज्य से निष्कासित कर दिया गया।

यहाँ विभीषण का श्रीराम की शरण में जाना किसी स्वार्थ का परिणाम नहीं, बल्कि एक उच्चतर नैतिक निर्णय था—अधर्म से विमुख होकर धर्म का साथ देना।

श्रीराम और विभीषण: शांति का प्रयास

यह उल्लेखनीय है कि श्रीराम स्वयं भी युद्ध के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने पहले संधि का प्रयास किया और अंगद को दूत बनाकर लंका भेजा। यह दर्शाता है कि धर्म का मार्ग सदैव युद्ध नहीं, बल्कि पहले संवाद और समाधान का होता है।

जब सभी प्रयास विफल हो गए, तब युद्ध अनिवार्य हुआ और अधर्म का पतन निश्चित था।

आधुनिक संदर्भ में विभीषण की प्रासंगिकता

आज का विश्व भी किसी न किसी रूप में लंका की ही पुनरावृत्ति करता दिखाई देता है। राष्ट्रों के बीच संघर्ष, अहंकार, शक्ति प्रदर्शन और युद्ध की प्रवृत्ति—ये सब आधुनिक “आसुरी वृत्ति” के संकेत हैं।

प्रश्न यह है कि क्या आज कोई विभीषण है, जो साहसपूर्वक यह कह सके कि युद्ध समाधान नहीं है?

जब विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र युद्ध की ओर अग्रसर होते हैं, तब शांति की आवाज़ें अक्सर दबा दी जाती हैं। तकनीकी उन्नति ने युद्ध को और अधिक विनाशकारी बना दिया है। ऐसे में यदि कोई विभीषण उठकर सत्य कहे, तो क्या उसे भी “घर का भेदी” कहकर नकार दिया जाएगा?

इतिहास की सीख: युद्ध और पश्चाताप

इतिहास साक्षी है कि युद्ध के बाद ही प्रायः विवेक जाग्रत होता है।
सम्राट अशोक का परिवर्तन कलिंग युद्ध के पश्चात हुआ। इसी प्रकार, द्वितीय विश्व युद्ध ने मानवता को गहरे घाव दिए।

विचारकों ने बार-बार चेताया है कि युद्ध अंततः विनाश ही लाता है। फिर भी मानव बार-बार वही भूल दोहराता है।

क्या यह उचित नहीं कि हम विभीषण की तरह पहले ही सत्य को स्वीकार कर लें, बजाय इसके कि विनाश के बाद पश्चाताप करें?

अस्तित्ववाद, कर्म और उत्तरदायित्व

यदि हम दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो अस्तित्ववाद भी यही कहता है कि मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है।

भगवद्गीता का कर्म सिद्धांत भी इसी सत्य की पुष्टि करता है—कर्म करो और उसके फल की जिम्मेदारी स्वीकार करो।

तो क्या युद्ध, हिंसा और विनाश के लिए भी हम स्वयं ही उत्तरदायी नहीं हैं?

निष्कर्ष: विभीषण—एक दृष्टि, एक साहस

विभीषण का चरित्र हमें यह सिखाता है कि—

  • सत्य का साथ देना कभी विश्वासघात नहीं होता।
  • अधर्म का विरोध करना ही सच्ची निष्ठा है।
  • शांति के लिए आवाज़ उठाना कायरता नहीं, बल्कि उच्चतम साहस है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “घर का भेदी” जैसी संकीर्ण धारणाओं से ऊपर उठें और विभीषण को एक नैतिक आदर्श के रूप में देखें।

क्योंकि जब-जब संसार में अहंकार और अधर्म बढ़ेगा, तब-तब किसी न किसी विभीषण की आवश्यकता होगी—जो निर्भीक होकर कह सके:
“यह मार्ग विनाश का है, इसे त्यागो।”

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः


Dr. Arjun Dubey
Retired Professor of English,
Madan Mohan Malviya University of Technology,
Gorakhpur (U.P.) 273010
INDIA

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