मनुष्य अपने भावों को अनुभूति के साथ अभिव्यक्त करती है वही भाव भाषिक कला बन जाती है। संवेदना के मानस स्पर्शों को हम यह कहकर व्यक्त करते हैं कि जिस भाव प्रवणता के साथ संवेदनशील व्यक्ति रागात्मक स्थितियों के साथ संवर्धित कथनों को विशिष्ट कलात्मक ढंग से वाणी में प्रस्फुटित होते हैं। शब्द विधान में रचना कौशल आता है तो वह कवि बन जाते हैं और इन कवि हृदयों के भाव संसार से गीत की अंतः प्रस्रवित व्यंजना लिपिबद्ध होकर गीति काव्य साहित्य संसार को निर्मित करती है। वाणी का विस्तार हृदयवान मानवी मन मस्तिष्क में अपनी संप्रेषण शीलता के बल पर-पीढ़ी दर पीढ़ी और युगों-युगों तक भी स्मृति के आधार पर सुरक्षित रहता है। यह तो कवि की सृजन क्षमता का ही सुपरिणाम है कि श्रुति बनकर कविता कभी भी समाप्त नहीं होती। गेयत्व गीत को कण्ठ हार बनाता है, और इस हार में ग्रथित भाव सुमन अपने सौष्ठव को विभिन्न सौन्दर्य बोधक तत्वों से अलंकृत करके देश काल की सीमा से सर्वकालिक और सार्वदेशिक बना देते हैं। भारतीय युग बोध में वैदिक ऋचायें इसका प्रमाण हैं तथा विश्व साहित्य के अमर-काव्य इन्हीं गुणों से संपूरित हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा का गीतिकाव्य भी विश्व साहित्य में अपनी साहित्यिक सुषमा से सुसज्जित है। कवि डुमन लाल ध्रुव हृदयस्पर्शी गीतों के सर्जक हैं। जिन्हें शब्द के अर्थ को अपनी भाषा के समृद्ध कोष से अनुभूति का जो भाव संसार मिला है उसके अभिव्यक्तिकरण में रससिद्ध काव्य की सर्जना का नैसर्गिक वातावरण परिलक्षित होता है। भाव संप्रेषण की गहरी पैठ के कारण गीत की आत्मा कंठ में रच-बस जाती है।
कवि का भाव लोक जिस रसोद्रेक की सुकुमार वृत्तियों से माधुर्य और लावण्य के भावों की अभिव्यक्ति से अभिव्यंजित है वहीं संस्पर्शों की मानस स्मृतियां सौंदर्य बोध की वाणी को स्वर देती है। शब्द सौष्ठव, भाव सौन्दर्य और अर्थ निष्पत्ति की दृष्टि से गीत वृत्तियों में श्रृंगार के रस राजत्व का निरुपण करने लगती है। यह शाश्वत सत्य है सरगम की स्वर लहरी के लिए।
इस गीत में जो जीवन की सहज अनुभूति अदृश्य-दृश्य बनकर अति समीप तन मन आत्मा का प्रतिबिम्ब बनकर उभरी है वह प्रीति की रीति का पावन स्पर्श है।
जीवन सतत गतिशील नदी की तरह है। अनवरत चलना ही उसकी नियति है, और सनातन सत्य ही उसका परिचय है। इसी युग-युगान्तर की सहचरी अनुभूतियों के सहारे कवि श्री डुमन लाल ध्रुव अपनी आत्म संज्ञक अभिव्यक्ति को जिस भाव और भाषा के अवगुंठन में सजा कर अपनी कविता प्रेयसी को समर्पित करता है उसी में तन्मय हो जाना चाहता है, और बिना किसी परिचय की औपचारिकता के भावातीत क्षणों की उपलब्धि का उपभोग करने की अभिलाषा से वाणी के प्रस्फुटन में शब्द की संगति से गीत की गति को गुंजायमान करता है ।
कवि ने शब्द की सुन्दर अवधारणा को भाव सहित मानस लोक में उद्धृत करते हैं।
कविता मन की रुचिराभाव भूमि पर प्रवर्तित रागबोध की छविमान शब्द में व्यक्त भाव चित्रावली की तरह होती है। अनुभूति की अगम्यता से साक्षात्कार निहित है।
कवि डुमन लाल ध्रुव का काव्य रचना संसार व्यापक है। उनकी अनेक रचनाओं में युग अपेक्षाओं के अनुरूप व्यक्ति की समय की ओर समाज की संगतियों से उपजी अनुभूतियों का अनुगूंजन है। अनुभूतियों का चित्रण है। कवि का चिंतन,आत्म परक होते हुए भी विश्व की विवश प्राणवान श्वासों से संवर्धित है। प्रेमगीत मन के गहन गहवरों में छिपे अंधकार को आभासित करते हैं, उनके प्रकाश से जो रूप-विधान साहित्य में कविता का विषय बनता है, वह सार्वजनिक होकर सबका हो जाता है, और जब वह सामाजिक सहृदय में अंतरू संप्रेषित हो जाता है, तब प्रेम करुणा सह अनुभूति की मानवी गुणानुभूति की क्षेम करी वृत्ति का ही विकास होता है जो साहित्य की शुभकांक्षा और सद्वृत्ति है।
सुकुमार मानस संवेगों से अभिव्यक्त होती कल्पना के किसलय में कुसुमित काव्य संग्रह ’’गांव ला सिरजाबो, ’’जो सहृदयी पाठक वर्ग को आनन्दित होने का अवसर प्रदान करती है। ग्रामीण जन जीवन का दर्शन सन्निहित है।
दुर्गा प्रसाद पारकर
भिलाई (छ.ग.)
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