
तकनीकी क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ डिजिटल माध्यमों पर सिमटता जा रहा है, तब भी किताबों का आकर्षण और महत्व कम नहीं हुआ है। किताबें केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि संस्कृति की जीवन-छवि हैं। वे सभ्यता के मूल्यों को जीवित रखती हैं और आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती हैं। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश का एक सुंदर नगर शाहजहाँपुर अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।
खन्नौत नदी नदी के तट पर एक शांत नीरव भवन है , जिसे लोग स्वामी विवेकानंद पब्लिक लाइब्रेरी के नाम से जानते हैं , कई बड़े कक्षों के बाद आता है इसका ह्रदय स्थल ,जहाँ है शांति , इशारों में संवाद,और पुस्तकों की दुनिया में खोये हैं लगभग डेढ़ सौ ज्ञानार्थी , आयु वर्ग अलग -अलग , पर ज्ञान पिपाशा सभी में। हनुमत धाम के समीप स्थित स्वामी विवेकानंद पब्लिक लाइब्रेरी वास्तव में सुलभ ,दुर्लभ पुस्तकों का एक जीवंत संग्रहालय है।

इस पुस्तकालय की दुनिया में वेद ,पुराण, उपनिषद हैं , पंचतंत्र है , श्रीमद भगवदगीता है कृष्णमूर्ति साहित्य है , राष्ट्रकोष हैं ,विश्वकोश हैं वहीँ विज्ञान, तकनीकी , अर्थशास्त्र , राजनीति से होते हुए विश्व साहित्य की प्रचुरता है। सभी धर्मों का साहित्य है , क्रन्तिकारी साहित्य है ,विधि साहित्य है , राजनेताओं के भाषण है , योग साहित्य है , बौद्ध साहित्य है , श्री हनुमान साहित्य है , और दूसरी और शेक्सपियर मिखाइल शोलोखोव , अप्टन , सिंक्लेयर ,मोपासां ,एमिली ब्रांट भी जीवंत हैं। कागज़ मुद्रा व सिक्के भी हैं , शोध प्रबंध एवं संस्मरण, आत्मकथा ,जीवनी भी, लगभग सब कुछ।

पुस्तकालय के संस्थापक हैं माननीय श्री सुरेश खन्ना जी , प्रख्यात राजनेता एवं विद्वान। कहते हैं जब राजा विद्वान होता है तो वह भूभाग में दिखाई देता है , आज वही चरितार्थ है यहाँ। इस पुस्तकालय में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो हम ज्ञान के एक सुनहरे प्रभामंडल में प्रवेश कर गए हों। यहाँ का बाल साहित्य अनुभाग बच्चों के मानसिक और सांस्कृतिक विकास में अद्भुत योगदान देता है। विज्ञान, इतिहास, भूगोल, अध्यात्म और भाषाओं का समृद्ध संग्रह इस पुस्तकालय को बहुआयामी बनाता है। अंग्रेज़ी, फ्रेंच, इटालियन, स्पेनिश जैसी भाषाओं के अनूदित साहित्य का अध्ययन भी यहाँ संभव है, जिससे युवा विश्व नागरिक बनने की ओर अग्रसर होते हैं।
भारतीय परंपरा में कहा गया है,“विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्” अर्थात् विद्या मनुष्य का ऐसा रूप है जो छिपा हुआ धन है और जिसे कोई चुरा नहीं सकता। सच ही है कि अच्छी किताबें अच्छे मानसिक स्वास्थ्य और सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। जब बच्चा जन्म लेता है, तो भाषा की शक्ति उसके भीतर होती है, लेकिन उसे विकसित करने के लिए किताबें ही सबसे बड़ा साधन बनती हैं। किताबें बचपन से ही मानसिक स्वास्थ्य को मजबूती देती हैं और व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। आज के तकनीकी युग में जब डिजिटल उपकरण आँखों और शरीर पर दुष्प्रभाव डाल रहे हैं, तब किताबें ही स्थायी और सुरक्षित विकल्प हैं।
इस पुस्तकालय की विशेषता यह है कि यहाँ हर कोना एक नई दुनिया खोलता है। बच्चों के लिए बाल साहित्य और विश्व साहित्य, विज्ञान और तकनीकी शोधों का अद्यतन संग्रह, इतिहास और भूगोल की नई संरचनाएँ, अध्यात्म और दर्शन की गहराइयाँ,सब कुछ यहाँ उपलब्ध है। भाषाओं का खजाना यहाँ इस बात का प्रमाण है कि भाषा सीखना मानो ब्रह्मांड को जानने जैसा है।
स्वामी विवेकानंद पब्लिक लाइब्रेरी की उपलब्धियाँ भी उल्लेखनीय हैं। 26 अगस्त 2004 को विद्वान राजनेता एवं समाजसेवी श्री सुरेश कुमार खन्ना द्वारा स्थापित इस पुस्तकालय ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों विद्यार्थियों को सफलता दिलाई है। यहाँ वातानुकूलित वाचनालयऔर वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष व्यवस्था है।
शाहजहाँपुर की यह लाइब्रेरी पुस्तकों का वह अमूल्य कोष है जो नगर को प्रदेश, देश और विश्व पटल पर स्थापित करता है। यह ज्ञान का दीपस्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों तक प्रकाश फैलाता रहेगा। “पुस्तकालय मंदिर हैं और पुस्तकें देवता।” स्वामी विवेकानंद पब्लिक लाइब्रेरी इस सूक्ति को चरितार्थ करती है।

स्वामी विवेकानंद पब्लिक लाइब्रेरी, शाहजहाँपुर में बिताए गए तीन घंटे मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहे। इस दौरान मैंने विभिन्न साहित्यिक विधाओं और महान साहित्यकारों की कृतियों का अध्ययन किया। शरत्चंद्र के साहित्य में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ का गहरा चित्रण मिलता है। उनकी कहानियाँ समाज के दबे-कुचले वर्ग की पीड़ा और संघर्ष को उजागर करती हैं। प्रेमचंद का साहित्य तो भारतीय समाज का दर्पण है, जिसमें किसान, मजदूर और आमजन की समस्याएँ जीवंत रूप में सामने आती हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर का साहित्य आध्यात्मिकता और मानवता का अद्भुत संगम है, उनकी कविताएँ और गीत भारतीय संस्कृति को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित करते हैं।सूरदास का साहित्य भक्ति और माधुर्य का अनुपम उदाहरण है, जिसमें कृष्ण की बाल लीलाओं का मोहक वर्णन मिलता है। कबीर का साहित्य सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है और मानवता का संदेश देता है। तुलसीदास का साहित्य रामचरितमानस के रूप में धर्म, नीति और आदर्श जीवन का मार्गदर्शन करता है। साहित्य निर्माता विषय पर पढ़ते हुए यह अनुभव हुआ कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज निर्माण का साधन है। भारतीय संस्कृति पर आधारित पुस्तकों ने यह स्पष्ट किया कि हमारी परंपराएँ और मूल्य आज भी जीवन को दिशा देने में सक्षम हैं।
यात्रा वृत्त पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो मैं स्वयं उन स्थानों पर पहुँच गया हूँ। हास्य-व्यंग्य की रचनाओं ने समाज की विसंगतियों पर हँसी के माध्यम से गहरी चोट की। शायरी ने भावनाओं को शब्दों में पिरोकर हृदय को स्पर्श किया। उर्दू साहित्य की ग़ज़लें और नज़्में अद्भुत सौंदर्य का अनुभव कराती हैं। विदेशी साहित्यकारों के अनुवाद ने यह दिखाया कि साहित्य की भाषा भले अलग हो, भावनाएँ सार्वभौमिक होती हैं। संस्कृत साहित्य में श्लोकों की गूंज ने मन को प्राचीन ज्ञान की ओर खींचा। अंग्रेज़ी साहित्य ने आधुनिकता और वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान किया। प्रदेश साहित्य ने स्थानीय जीवन और संस्कृति को उजागर किया। विदेशी महापुरुषों की जीवनियाँ प्रेरणा देती हैं, वहीं भारतीय महापुरुषों की गाथाएँ आत्मबल और त्याग का संदेश देती हैं। महान महिलाओं की जीवनियाँ पढ़कर यह अनुभूति हुई कि समाज में परिवर्तन लाने में उनका योगदान अमूल्य है।
इन सब विषयों पर पढ़ते-पढ़ते समय का ध्यान ही नहीं रहा। साहित्य विविधता में एकता का दर्शन कराता है। हर विधा और हर लेखक अपने समय और समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इस पुस्तकालय में उपलब्ध साहित्य ने मुझे यह अनुभव कराया कि किताबें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन भी हैं।
जब मैंने घड़ी देखी तो पाया कि तीन घंटे बीत चुके हैं। यह अनुभव इतना गहन था कि समय जैसे ठहर गया हो। शब्दों और विचारों की दुनिया में डूबते हुए मुझे लगा कि मैं किसी अलौकिक लोक में हूँ, जहाँ किताबें बोलती हैं, पात्र जीवित हो उठते हैं और विचार हवा में तैरते हैं। यह सरयलिस्टिक अनुभव था, मानो मैं वास्तविकता से परे किसी स्वप्निल संसार में विचरण कर रहा हूँ, जहाँ समय का कोई बंधन नहीं और ज्ञान ही एकमात्र सत्य है।
पुस्तकालय से बाहर निकलते ही दृष्टि हनुमान जी की 104 फुट ऊंची प्रतिमा के चरणों में पड़ी जो अपनी कलात्मक वास्तुकृति , भव्यता और आध्यात्मिकता के एक अलग ही संसार में ले जा रही थी। मेरे ये दोनों अनुभव मझोले आकार के नगर शाहजहांपुर में स्वप्न जैसे लग रहे थे , अलौकिक और विराट। बीतते अप्रैल की धूप आज कुछ ज्यादा ही तेज थी , किन्तु शाहजहांपुर में खन्नौत नदी के तट पर ये दोनों निर्मितियाँ मन को बाहरी आकर्षण से दूर खींचती एक नैसर्गिक अध्यात्म एवं समष्टि के साथ प्राकृतिक समन्यवय के लिए आकर्षित कर रही थी।
(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त नाटककार, कवि एवं समालोचक )
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