पुरु-उर्वशी-आदर्श उज्जवल उपाध्याय 

वाक्यों, विचार, भावुकता पर
नेत्रों पर और सरलता पर,
देवत्व तिरस्कृत कर उस दिन
उर्वशी मुग्ध थी नरता पर,
अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन
पृथ्वी के दुख सुख सहने को,
स्वीकार पुरु का प्रणय आज
धरती पर आई रहने को,
लेकिन धरती का रहन सहन
अनुकूल भी होगा क्या उसके,
जो ऋषि के उर से प्रकट हुई
देवता दासता में जिसके,
मैं अपने क्षणिक स्वार्थ के हित
अन्याय नहीं कर सकता हूं,
मानव की गरिमा का कलुषित
अध्याय नहीं कर सकता हूं,
बस यही सोच करके पुरु ने
उर्वशी से मार्मिक शब्द कहे,
पृथ्वी पर के जीवन की
परिभाषा उसके अर्थ कहे,
बोले पृथ्वी पर का जीवन
राजा का नहीं यती का है,
होता विलासिता का भ्रम पर
दृढ़ता का और व्रती का है,
अभिसारी भावों ने विवश किया
हो गया धरा पर है आना,
लेकिन कुछ दिवस यहां रह के
अमरावती पुनः लौट जाना,
ये जीवन किसी अप्सरा के
जीने के है अनुकूल नहीं,
अमरत्व त्याग कर करना तुम
नारी बनने की भूल नहीं,
सुख क्षणिक यहां
दुख है अपार,
पीड़ा है विस्तृत द्वार द्वार,
रहने आयी किसलिए भला
कर इंद्र लोक का तिरस्कार,
तुम अमर और नश्वर हूँ मैं
लिख देगा अपना विरह समय,
यह मृत्यु लोक है और यहां
प्रति जीवन की है सीमा तय,
अपने प्रियजन को खोने की
अनुभूति तुम्हें करनी होगी
नारी बनने पर नारी सी ही
प्रसव पीड़ा सहनी होगी,
अतएव बात मानो मेरी
मत करो स्वयं का ह्रास प्रिये,
क्रंदन है ये जीवन पट में
बस ऊपर है अट्टहास प्रिये,

पुरु की बातों का सार समझ
उर्वशी जरा सा मुस्काई
मैं केवल भावों में बह कर
पृथ्वी की ओर नहीं आई,
है देव लोक में सुविधाएं
वैभव विलासिता विचरण है,
पर वास्तव में मुझको लगता कि
पृथ्वी पर वास्तविक जीवन है,
ऐसा जीवन है हेय मुझे
जिसमें किंचित संघर्ष नहीं,
ना जरा, मृत्यु, ना कठिनाई
जीवन के सीमित वर्ष नहीं,
मानव का प्रेम तपस्या है
देवों का है केवल विलास,
और यही लिखा है वेदों में
तप में होता ईश्वर का वास,
नारी बनना है भूल नहीं
नारी है स्वयं सृजनकर्ता
उनके पद तक हैं देव तो क्या
ईश्वर भी नहीं पहुंच सकता,
अपने प्रियजन को खोने की
अनुभूति साथ लेकर जीना,
उस जीवन से तो अच्छा है
जिसमे कोई कष्ट रहे ही ना,
दुख से परिचित होना सुख की
आकांक्षाएं करते रहना,
अच्छा लगता नित नयी नयी
इच्छायें करते रहना,
देवों का प्रेम मिला लेकिन
बालक के नेह से वंचित हूँ,
यदि सहनी पड़ी प्रसव की तो
उस पीड़ा से ना चिंतित हूँ,
नारी बनना तो गौरव है
ये नहीं है मेरा ह्रास प्रिये,
अमरावती से भी सुखकर है
पृथ्वी पर करना वास प्रिये.

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