काव्य श्रृंखला :
सांध्य दीप भाग-12
-डॉ. अशोक आकाश

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अमा निशा जुगनू की फौजें,
बन ठन गगन दमक जाते |
लोहा लेती गहन तिमिर से,
कण कण कनक खनक जाते ||
झिंगूरें बॉधे पग घुंघरू ,
दादुर मगन कुहक गाते |
कड़क जाय छन बिरहन छाती,
तन मन अगन दहक जाते ||
भोर हुआ भौरों की गुनगुन |
फूलों से मधु लेता चुन ||
सांध्यदीप अपने मन भरता,
शब्द सुरों के सरगम को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
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जल जल तेल धुंआ बन फैले,
स्वारथ बाती जल जाते |
डूब तेल में हर हर गंगे,
कीट पतंगे जल जाते ||
समय परखकर जो नही चलता,
उनके सूरज ढल जाते |
औरों को झट मारे लंगड़ी,
दुनिया में वो पिछल जाते ||
देते सहारा सबको चल,
होते जा जीवन में सफल |
सांध्यदीप तो नित रहस्यमय,
रखता मन में मंत्रण को |
अंधकार में भटके हैं जो ,
कर उज्जवल उनके तम को |
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प्रणय कुंड ही हवनकुंड है ,
जो गिरता जल जल जीता |
इन राहों में सजग जो चलता,
नित जीवन मधुरस पीता ||
प्रेयसी में ही जीवन दर्शन,
जो करता भ्रम में जीता |
स्वर्णिम वक्त गुजर जाता,
तब लगे रीता जीवन गीता ||
कर लो कटु सत्य विश्वास |
ले आ जीवन में मधुमास ||
सांध्यदीप सुखमय कर देता,
प्रणययुक्त पीड़ॉगन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
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संगीतमय कीर्तन से कर लो,
आराधना अर्चन वंदन |
श्रवण स्मरण अंतर्मुख से,
आत्म निरूपित कर मंथन ||
अहंकार से पा छुटकारा,
शॉत चित्त कर लो चिंतन |
तभी तो निर्मल चंचल चितवन,
परिणित होगा सुख उपवन ||
नहलाता जब मधुर फुहार |
लहलहाता पतझर में बहार ||
सांध्यदीप जन मन साहस भरे,
कर जागृत अवचेतन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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-डॉ. अशोक आकाश
वाह अद्भुत सृजन गुरुदेव
आनंदित हो गया मन
आपके लेखनी को सौ सौ बार प्रणाम