शादी के दूसरे दिन घर सबसे ज्यादा खाली लगता है।
टेंट की आखिरी बल्ली अभी-अभी ट्रक पर लदी थी। हलवाई का हिसाब हो चुका था। आंगन में बिखरे हुए गुलाब और गेंदे को नौकर झाड़ू से समेट रहा था। कल तक जहाँ शहनाई थी, वहाँ आज सिर्फ झाड़ू की आवाज थी।
रामाधार ओसारे की चौकी पर बैठा था। उसने कुर्ते की जेब में हाथ डाला तो कुछ नरम सा लगा। निकाला तो एक लाल गुलाब था, मुरझाया हुआ, किनारों से काला पड़ा हुआ।
ये वही फूल था जो कल मंडप में गुड़िया के जूड़े से गिरकर उसकी गोद में आ गिरा था। पंडित जी ने कहा था – “शुभ है, संभाल कर रखना।” भीड़ में वो बात वहीं दब गई थी।
“अरे इसे फेंक दीजिए, सब कचरा उठ रहा है,” सुमित्रा ने पीछे से कहा। उसकी आँखें भी सूजी हुई थीं।
रामाधार ने फूल को हथेली पर रखा और देखता रह गया। एक फूल था, पर उसी में हजारों यादें भरी थीं।
पहली बार जब गुड़िया ने फूल माँगा था, वो चार साल की थी।
रामाधार ने आंगन के कोने में गुलाब की एक कलम लगाई थी। गुड़िया दौड़ती हुई आई और सारे पत्ते नोंच दिए। रामाधार चिल्लाया था। गुड़िया रोते हुए बोली थी, “पापा, फू…”
उस दिन पहली बार रामाधार ने बेटी के दो चोटियों में एक छोटा सा गुलाब खोंसा था। सुमित्रा ने हँसकर कहा था – “फूल से ज्यादा तो फूल वाली सुंदर है।”
दूसरी याद उसकी दसवीं क्लास की है। उसे फूल पर निबंध लिखना था। वो पूरे दिन उसी गुलाब के पौधे के सामने बैठी रही। शाम को आकर पूछने लगी, “पापा, गुलाब में कांटे क्यों होते हैं?”
रामाधार ने कहा था, “ताकि उसकी कदर रहे, बिटिया। जो आसानी से मिल जाए, उसकी कीमत नहीं रहती।”
तीसरी याद सबसे खट्टी-मीठी थी।
गुड़िया का कॉलेज का पहला दिन था। जाते-जाते रामाधार ने टोक दिया, “समय से आ जाना, ज्यादा इधर-उधर मत घूमना।” गुड़िया ने गुस्से में आंगन के गुलाब का एक पत्ता तोड़कर फेंक दिया और बिना बोले चली गई। दो दिन तक बाप-बेटी में अबोला रहा। तीसरे दिन वही गुड़िया चुपके से एक गुलाब तोड़कर लाई और उसकी किताब में रखते हुए बोली, “सॉरी पापा।” रामाधार ने कभी उस सॉरी का जवाब नहीं दिया, बस उसके सिर पर हाथ रख दिया था।
कल मंडप में जब गुड़िया विदा हो रही थी, उसने वही किया। रामाधार के पैर छुए और धीरे से बोली, “पापा, पौधे में पानी डालते रहना।”
—
शाम हो गई। सारा घर खाली।
रामाधार ने एक छोटा सा गमला लिया, उसमें मिट्टी भरी और उस मुरझाए हुए गुलाब की पंखुड़ियों को धीरे-धीरे उस मिट्टी में दबा दिया।
सुमित्रा देखकर बोली, “क्या कर रहे हैं? सूखे फूल से पौधा उगता है भला?”
रामाधार बोला, “फूल से नहीं, याद से उगेगा।”
अगले दिन से उसका नया नियम बन गया। सुबह उठते ही सबसे पहले उस गमले में पानी देना। कभी धूप में रखना, कभी छाँव में। सुमित्रा कभी-कभी टोक देती, पर मन ही मन वो भी देखती रहती।
घर में गुड़िया की आवाज नहीं थी, उसकी चप्पलों की छप-छप नहीं थी, पर उस गमले के बहाने घर में फिर से किसी का इंतजार था।
पैंसठ दिन बाद, एक सुबह।
रामाधार ने गमले में पानी डाला और ठिठक गया। काली मिट्टी के बीच से एक नन्ही सी हरी कोंपल बाहर झाँक रही थी।
“सुमित्रा! सुमित्रा! देख तो!” वो बच्चों की तरह चिल्लाया।
सुमित्रा दौड़ी आई। दोनों उस कोंपल को ऐसे देख रहे थे जैसे गुड़िया का बचपन फिर लौट आया हो।
उसी हफ्ते गुड़िया पहली बार ससुराल से मायके आई। हाथ में मिठाई का डिब्बा, आँखों में नमी।
दरवाजे से घुसते ही उसकी नजर उसी गमले पर पड़ी। वो रुक गई।
“पापा… ये तो…”
“तेरी शादी वाला फूल है, गुड़िया,” रामाधार ने कहा।
गुड़िया कुछ नहीं बोली। वो गमले के पास जमीन पर बैठ गई और उस नन्ही कोंपल को सहलाने लगी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर होठों पर वही पुरानी मुस्कान थी।
सुमित्रा ने उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, “मैं कहती थी ना, बेटियाँ कहीं जाती नहीं हैं। बस एक आँगन से दूसरे आँगन में चली जाती हैं। और पीछे एक फूल छोड़ जाती हैं, ताकि बाप का आँगन कभी सूना न लगे।”
रामाधार की आँखें भर आईं। उसे लगा, सच ही तो है। बेटी की शादी का एक फूल कभी मुरझाता नहीं है। वो बस रूप बदल लेता है – कभी चोटी में, कभी मंडप में, और कभी एक नई कोंपल में।
-रमेश चौहान
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