लघु कथा: क्या भूत होते हैं?-रमेश चौहान

रामाधार के पोते चिंटू ने पहली बार ये सवाल रात के दस बजे पूछा।

लाइट चली गई थी। सुमित्रा रसोई में ढिबरी जला रही थी। बाहर बँसवारी में हवा चल रही थी और पीपल के पत्ते सरसराहट कर रहे थे।

“बाबूजी, क्या भूत होते हैं?”

रामाधार जो खाट पर लेटा था, उठकर बैठ गया। चिंटू यानी गुड़िया का बेटा, पहली बार ननिहाल आया था। शहर का बच्चा, हर बात पर सवाल।

“क्यों? डर लग रहा है?” सुमित्रा ने कहा।

“नहीं, मम्मी कहती है इस घर में भूत है। वो जो पीछे वाली कोठरी है, उसमें कोई रहता है। आप लोग उसे खोलते क्यों नहीं?”

घर के पीछे एक कोठरी थी, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। गुड़िया के बचपन से बंद।

रामाधार कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “हाँ बेटा, होते हैं।”

सुमित्रा चौंक गई। चिंटू की आँखें बड़ी हो गईं।

रामाधार ने ढिबरी की रोशनी थोड़ी तेज की और कहानी शुरू की।

“इस कोठरी में एक भूत रहता है। तेरी बड़ी नानी का।”

चिंटू डर गया। सुमित्रा समझ गई रामाधार क्या करने वाला है।

“तेरी बड़ी नानी यानी मेरी माँ, वो इसी कोठरी में रहती थी। जब गुड़िया तेरी माँ जितनी थी, तब वो रोज रात में कहानी सुनाती थी। फिर एक दिन वो चली गई। पर जाते-जाते अपनी सारी यादें इसी कोठरी में छोड़ गई।”

“यादें कैसे भूत बनती हैं बाबूजी?”

“जब हम किसी को बहुत याद करते हैं और उसकी कोई चीज छूते नहीं, बोलते नहीं, तो वही याद भारी होकर भूत बन जाती है। इस कोठरी में तेरी बड़ी नानी की चरखी है, उसकी रामायण है, उसकी लकड़ी की संदूक है। हमने डर के मारे उसे बंद रखा, तो सबको लगा भूत है।”

चिंटू का डर अब जिज्ञासा बन गया था।

रामाधार उठा, चाबियों का गुच्छा निकाला और उस जंग लगे ताले के पास गया। ताला बहुत मुश्किल से खुला।

कोठरी खुली तो धूल की एक चादर उड़ी। अंदर कुछ नहीं था जो डरावना हो। एक पुरानी खाट, एक संदूक, दीवार पर टंगा एक आईना जिस पर कपड़ा पड़ा था, और एक कोने में वही गुलाब का पौधा, जो अब सूख चुका था।

चिंटू ने संदूक खोला। अंदर एक पुरानी फोटो थी – एक बूढ़ी औरत, गोद में एक छोटी बच्ची, यानी गुड़िया। और एक कागज पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था – “गुड़िया के लिए।”

सुमित्रा ने कागज पढ़ा। उसमें लिखा था, “गुड़िया जब बड़ी होकर विदा होगी, तो इस कोठरी में मेरे गुलाब की कलम लगा देना।”

रामाधार की आँखें भर आईं। उसे याद आया, उसकी माँ ने मरने से एक हफ्ते पहले ये बात कही थी, पर बंटवारे और मुकदमों के डर से उसने कोठरी में ताला लगा दिया था।

उस रात रामाधार, सुमित्रा और चिंटू ने मिलकर कोठरी साफ की। आईने से कपड़ा हटाया। चरखी पर से धूल हटाई।

और अगले दिन सुबह, रामाधार ने उसी सूखे गुलाब की एक टहनी फिर से उसी कोठरी के सामने लगा दी।

रात को जब फिर लाइट गई, चिंटू ने पूछा, “बाबूजी, अब भी भूत है क्या इस घर में?”

रामाधार ने हँसकर कहा, “हाँ, अब भी है।”

“कहाँ?”

“तेरे पीछे खड़ा है, देखेगा?”

चिंटू ने डरकर पीछे देखा। वहाँ सुमित्रा खड़ी थी, हाथ में ढिबरी लिए।

रामाधार बोला, “भूत होते हैं बेटा। पर वो पीपल पर नहीं, हमारे अंदर रहते हैं। जो बात हम कह नहीं पाते, जो काम अधूरा छोड़ देते हैं, वही भूत बन जाता है। तेरी बड़ी नानी का भूत अब चला गया, क्योंकि हमने उसकी बात पूरी कर दी।”

चिंटू ने कहा, “तो भूत बुरे नहीं होते?”

“नहीं। कुछ भूत डराने नहीं, याद दिलाने आते हैं कि हम किसी को भूले नहीं हैं।”

उस रात कोठरी में ताला नहीं लगा। ढिबरी की रोशनी में पहली बार कई सालों बाद उस कोठरी की दीवारें रोशन हुईं। हवा से पीपल के पत्ते फिर सरसराए, पर अब वो आवाज डरावनी नहीं लग रही थी।

बाहर से देखने पर लगता था जैसे घर का एक बंद हिस्सा फिर से साँस ले रहा हो।

-रमेश चौहान

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