छत्‍तीसगढ़ी हाइकु पच्‍चासा-रमेश चौहान

छत्‍तीसगढ़ी हाइकु पच्‍चासा

-रमेश चौहान

छत्‍तीसगढ़ी हाइकु पच्‍चासा

छत्‍तीसगढ़ी हाइकु पच्‍चासा-रमेश चौहान
छत्‍तीसगढ़ी हाइकु पच्‍चासा-रमेश चौहान

मया के हाइकु

(1)

हे गुरतुर
बोली भाखा आँखी के
का कहँव रे

(2)

जीव जरय
अंतस सपना हे
जहुँरिया के

(3)

अपन होथे
मया हा मया बर
मया करे मा

(5)

मया के मारे
छोड़ सुवारथ ला
मन ला मारे

(6)

मया बर तो
मांगे न कुछु मोल
तब तो मया

(7)

देह मा लाज
ओठ मा मुसकान
छलकत हे

(8)

ओठ गुलाबी
फूले फूल गुलाबी
हँसे मुस्काय

(9)

आँखी ले आँखी
बने मछरी गरी
आघू हे परी

(10)

अंग ले अंग
जीयत भर संग
मया के ढंग

(11)

आस-विश्‍वास
मन म समावय
मया के प्यास

(12)

मया के भूख
एक चीज मांगय
मन के बात

(13)

मया के रंग
सुख-दुख एके हे
रंग मया के

(14)

आँखी सपना
रात-दिन जागत
आँखी मा गढ़े

(15)

कोन देखय
रूप-रंग काया के
मन देख के

(16)

होथे का छाँव?
कोस भर दूरिहा
तोर काया के

(17)

तैं पुरवाही
मैं पीपर के पाना
नाचत हँव

(18)

स्वाती नक्षत्र
बरस रे बदरी
मैं तो चातक

(19)

मैं तो चिरई
तैं मोर डेना-पाखी
छूबो बादर

(20)

लगे हे प्यास
ओठ सूखावत हे
ए ओठ बर

(21)

मैं तो अंधरा
तैं अंधरा के आँखी
मया संसार

(22)

गुदुम बाजा
डोली अउ बराती
लाबे अँगना

(23)

मया होथे का?
मया तोला बताही
मया कर ले

(24)

मया झकोरा
जिंनगी बर साँस
जीये के आस

(25)

बूढ़ागे तन
हरियर हे मन
मया ल पाके

(26)

अपन मान
मोर कहे मा मोर
मया कहय

(27)

एक घ देख
देखत रहिगेंव
आँखी ल मूंदे

(28)

आँखी पुतरी
घुसरे मन भितरी
मूरती होगे

(29)

मया के तन
छुईमुई के डारा
मयारू बर

(30)

भाखा न बोली
गात हे ददरिया
मया के आँखी

(31)

सुन तो बैरी
मुक्का होके बोलय
आँखी ए खैरी

(32)

अलग हे का?
मोर देह के छाँव
ओही तो आस

(33)

मैं तो नदिया
तैं नदिया के पानी
मया के घाट

(34)

बड़ बिछ्छल
देख-तांक के रेंग
मया के रद्दा

(35)

छोड़े ल होथे
मया बर मयारू
बहुत कुछ

(36)

देह ले नहीं
मया मन ले होथे
मन लगा के

(37)

आँख-आँखी म
झूलत रहिथे न
तोरे चेहरा

(38)

मयारू बिन
गुजर न बसर
सुध न बुध

(39)

मन के हाथ
जपत हवय न
मया के माला

(40)

कहां गवाँ गे?
मयारू ल खोजत
मन के भौरा

(41)

अरे पगली,
मैं होगेंव पगला,
मया के मारे ।

(42)

निंद न भूख,
मया म भरे पेट
आंखी सपना ।

(43)

रात के चंदा,
देखत चांदनी ल,
गिनत हव ।

(44)

कब होही रे,
मया के मिलाप ह,
सोचत हव ।

(45)

मया नई हे,
जोही तोर अंतस,
पथरा जस ।

(46)

एक नजर,
मोरो कोती तो देख,
देखत हव ।

(47)

गुलाबी ओठ,
चंदा बरन मुह,
हे रानी मोर ।

(48)

आवत हँव,
अगोरबे तैं मोला,
आमा के छांव ।

(49)

हाथ गुलाब,
लगा दव गजरा,
मया ले भिंजे ।

(50)

मया पिरीत,
चलत पुरवाही,
करी करार।

(51)

गिरय पानी,
टिपीक टिपक रे,
मनुवा नाचे ।

-रमेश चौहान

Loading

2 thoughts on “छत्‍तीसगढ़ी हाइकु पच्‍चासा-रमेश चौहान

  1. मया के सुग्घर हाइकु-बधाई । बहुत सुंदर, वर्ण विन्यास का पालन सही है। सिंगार के प्रधानता हावय अउ मया ह चारों मुड़ा मं बगर गेहे।
    अइसने लिखत रहाव।
    बधाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *