महिला समाज और संस्कृति पर कविताएँ-
डॉं. अलका सिंह
महिला समाज और संस्कृति पर कविताएँ

1. शक्ति तो बिखरी पड़ी है प्रकृति सी –
शक्ति तो बिखरी पड़ी है प्रकृति सी
बस संजोने की जरुरत,
शक्ति की लय ताल गतियां
बढ़ें सरिता सी निरंतर।
यहाँ लहरों को जरूरत
शक्ति को परखें संजोकर
वृहद् सा आकार ले लें ,
स्वयं को वो ज्योति से भर,
जहाँ भी फैला तिमिर है
किसी भी तह , पक्ष, कण में
स्वयं के उर्जित कणों को
सूर्य सा गतिमान कर दें।
2.बस प्रेरणा की है जरुरत –
तृणों में है शक्ति कितनी
बस प्रेरणा की है जरुरत
एक फैली जीवधारा
बस चेतना की जरुरत।
मातृवन्दन ,प्रेरणा का क्षेत्र यह
हिमालय है यहाँ और नदियां वन रम्य।
जलवायु सुगन्धित
राष्ट्र में सम्यक विवेचन
प्रकृति का भी पुरुष का ,
संस्कृति भूले कहाँ हैं
मिशन शक्ति प्रेरणा है
परिक्षेत्र को परिवेश को
इसकी जरूरत
बस प्रेरणा की है जरूरत।
कवियत्री परिचय
डॉं. अलका सिंह –
डॉ अलका सिंह डॉ राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी लखनऊ में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।शिक्षण एवं शोध के अतिरिक्त डॉ सिंह महिला सशक्तीकरण , विधि एवं साहित्य तथा सांस्कृतिक मुद्दों पर सक्रिय हैं। इसके अतिरिक्त वे रजोधर्म सम्बन्धी संवेदनशील मुद्दों पर पिछले लगभग बारह वर्षों से शोध ,प्रसार एवं जागरूकता का कार्य कर रही है। वे अंग्रेजी और हिंदी में समान रूप से लेखन कार्य करती है और उनकी रचनाएँ देश विदेश के पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती हैं। उनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हैं तथा शिक्षण एवं लेखन हेतु सात पुरस्कार/ सम्मान प्राप्त हैं।