नेत्रदान पर कविता-ऐसा पुण्य महान करो-डॉ. अशोक आकाश

नेत्रदान पर कविता

नेत्रदान पर कविता – “मरकर भी जो दुनिया देखे, ऐसा पुण्य महान करो” डॉं. अशोक आकाश की यह रचना बहुत ही मार्मिक एवं तार्किक है । यह कविता लोगों को नेत्रदान करने के लिये प्रेरित करती है । डॉं. अशोक आकाश एक सामाजिक सरोकार के कवि हैं, जो न केवल लेखनी से समाज से जुड़े हैं अपितु अपने कर्मो से भी समाज से जीवंत संपर्क बनाये हुये हैं ।

नेत्रदान पर कविता-डॉ. अशोक आकाश
नेत्रदान पर कविता

मरकर भी जो दुनिया देखे, ऐसा पुण्य महान करो

ऑखें बिन ये दुनिया अंधेरी  बेरौनक  बेजान ही है |
हर प्राणी के लिये ऑखों की रोशनी वरदान ही है ||
रखें बचाकर ऑखों को अनमोल है कुदरत का तोहफा |
अंधों के लिये जो ऑखों का दान करे भगवान ही है ||

ज्योतिहीन नीरस जीवन को रस दो ऑखें दान करो |
मरकर भी जो दुनिया देखे, ऐसा पुण्य महान् करो ||

जो काला रंग छोड़ जहॉ का , दूजा रंग न जाने ,
शब्द,स्पर्श,आहट से ही जो, दुनिया को पहचाने |
रूप साज श्रृंगारहीन जन, निपट अकिंचन माने, 
उनको ज्योति मिले नयनों की,मिलता विपुल खजाने ||

जीवन भर की दुआएं लेने, उन पर एक एहसान करो….
मरकर भी जो दुनिया देखे ऐसा पुण्य महान् करो….
        ज्योतिहीन नीरस जीवन  को कल दो ऑखें दान करो…. 

मुर्दा देह जलाकर भस्म बहा देते नदियों में ,
या फिर गड्ढे खोद दफन कर नमक भरे हड्डियों में |
जीते जी सुखसागर तर लो पुण्य से दामन भर लो ,
मर कर भी जीवित रहता जन , नेकी और बदियों में ||

नाशवान तन से सद्कर्म का जीते जी ऐलान करो ….  
मर कर भी जो दुनिया देखे ऐसा पुण्य महान करो ….
       ज्योतिहीन नीरस जीवन को रस दो आंखें दान करो….

मृत तन के बेकार अंग से  इतना मोह करे क्यों ?
जलना गलना सड़ना है तो फिर दान से डरे क्यों ?
जान समझ नादान तू मन में यह अभिमान करे क्यों ?
जीवन शुन्य तन जमा रत्न ऐसे बर्बाद करे क्यों ?

निश्चय मान बढ़ेगा साथी, जग से जुदा यह काम करो ….
मरकर भी जो दुनिया देखे ऐसा पुण्य महान करो ….
        ज्योतिहीन नीरस जीवन को रस  दो आंखें दान करो….

परमारथ के पुण्य यज्ञ में हो सहभागी  बन हीरा, 
दृष्टि ज्योति धुन जला निरत गुन,नयन हीन मन की पीड़ा |
सूरदास के जीवन में तुम कृष्ण बनो दो शुभ आशीष ,
खुशियों से इनका जग रौशन करने थामो पावन बीड़ा ||

सद्कर्मों के लिए सर्वदा तन जीवन कुर्बान करो ….
मरकर भी जो दुनिया  देखे ऐसा पुण्य महान् करो…. 
         ज्योतिहीन नीरस जीवन को रस दो आंखें दान करो ….

जीते जी तन की रक्षा का पल पल यत्न किया है ,
मौत के बाद भी जीवित रहे अंग,क्या ये प्रयत्न किया है ?
नश्वर अंग को जीवन दे दो अंधियारे को उजाला ,
तुमसे कोई जिंदगी रोशन हो जाने पर जश्न हुआ है ? 

अगर नहीं तो मौत के बाद भी ,परम पुण्य यह काम करो….
मर कर भी जो दुनिया देखे ऐसा पुण्य महान करो ….
         ज्योतिहीन नीरस जीवन को रस दो आंखें दान करो….

ऋषि दधीचि ने जीते जी अपना तन दान किया था ,
मानवता की रक्षा में जीवन बलिदान किया था |
संहारक शिव शंकर ने हलाहल पान किया था ,
पन्ना धाय बेटे की बलि दे , कर्म महान किया था ||

तुम भी नेत्रदान कर अपने मृत तन का सम्मान करो ….
मर कर भी जो दुनिया देखे ऐसा पुण्य महान करो ….   
 ज्योतिहीन नीरस जीवन को रस दो ऑखें दान करो ….

रंतिदेव राजा का त्याग सुन शंका नहीं तनिक हो, 
गर्वित जन की गुंजन गाथा, गौरव गुण अगणित हो |
कर्ण हरिश्चंद्र राजा बलि सा दिव्य दीप प्रज्वलित हो ,
पावन पद चिन्हों पर चलकर तुम भी जग प्रचलित हो ||

कहे “अशोक आकाश ” देव सम दानी का गुणगान करो ….
मर कर भी जो दुनिया देखे ऐसा पुण्य महान करो ….
 ज्योति नीरस जीवन को रस दो आंखें दान करो…

-डॉ अशोक आकाश 
ग्राम कोहंगाटोला 
तहसील जिला बालोद 
छत्तीसगढ़ भारत
मोबाइल नंबर  9755889199

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7 thoughts on “नेत्रदान पर कविता-ऐसा पुण्य महान करो-डॉ. अशोक आकाश

  1. रचना को स्थान देने के लिए आपका अनंत आभार आदरणीय चौहान जी

    1. बहुत ही सुंदर व उम्दा भरी रचनात्मक कार्य

  2. बहुत ही बेहतरीन रचना। बहुत बहुत बधाई अशोक आकाश भैया जी

    1. आपका अनंत आभार आदरणीय अक्स जी

  3. शानदार रचना के लिए बधाई भैया जी

  4. बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीय गुरुदेव

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