काव्य श्रृंखला :
सांध्य दीप भाग-13
-डॉ. अशोक आकाश

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जो सबको मुस्काता देखे ,
उसका जीवन युग चंदन |
खुद जल जल जग रौशन कर दे,
करता जग शत शत वंदन ||
निर्मल पावन हृदय स्थल में,
जीवन भर का शुचि मंथन |
उनको जीने का कटु अनुभव,
मर्यादित मति दृढ़ बंधन ||
कर्मों से होता गुणगान |
सद्कर्मी बनता भगवान ||
सांध्यदीप प्रतिकूल स्थिति में,
गुंजरित करता चेतन को |
अंधकार में भटके हैं जो
कर उज्जवल उनके तम को ||
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टूटा आईना जुड़कर भी,
कर भी टुकड़ा टुकड़ा रह जाता |
वैसे ही टूटे दिल जुड़कर,
उखड़ा उखड़़ा रह जाता ||
पावन दूध भी बूंद अम्ल को,
सह नही पाता फट जाता |
कैसा भी कर जतन उम्रभर,
फट जाता तो फट जाता ||
दूध फटे बनता पावन |
दिल दर्पण टूटे दुख दारुण ||
सबको मान बराबर दो,
सहेजते दिल दर्पण को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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हरी भरी धरती की बगिया,
तिमिरॉचल में जब खोते |
अलसाई स्वप्निल बाला तब,
इनके आंगन में होते ||
चुस्ती स्फुर्ति भले ही ना हो,
पर झलके द्युत चतुराई |
इन पर बरसे खुदा की रहमत,
खुश होता खुद रघुराई ||
कहीं राम तो कहीं रहीम |
कहीं सीता मरियम परवीन ||
सांध्यदीप नित जाति धर्म से,
दूर रखें वक्षॉगन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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-डॉ. अशोक आकाश