काव्य श्रृंखला :
सांध्य दीप भाग-5
-डॉ. अशोक आकाश
काव्य श्रृंखला : सांध्य दीप भाग-5

सांध्य दीप भाग-5
//20//
चलो निरंतर अभिलाषित जन,
मंजिल पहुंचो करते वार |
तुम भी बनोगे सांझ-दीप ,
जगमग होगा सारा संसार ||
आज भरी दुख की बदली,
होगा ही उदित कल सुख सूरज |
अनुराग रखो मुखरित जग हित,
सद्कर्म करो सुख सिरजन सज ||
अनुभव सागर कर मंथन |
रत्न उदित पल-पल छन छन ||
विभूषित वाणी से झंकृत,
कर देखो सबके मन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
//21//
होली आती झूमके गाते,
नाच नाच कर फाग सुघर |
मस्ती में सतरंग उभरता,
संगी रहता बाल कुंवर ||
रात धरा की मनमोहक छवि ,
दूर जहां तक जाय नजर |
शीतल आभा लिए गगन में,
पूर्णिम चांद सुदिव्य सफर ||
जली होलिका धूं धूं कर |
निखरे सत्य अनल छूकर ||
सांध्यदीप टिम-टिम लौ से,
अरविंद करे मन कंचन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
//22//
डूब अंधेरे उम्र गुजारे,
बस बहते मझधारे हैं |
आंख मींच हाथों को मलते,
गुजरी जीवन बहारें हैं ||
पंच रचित दीपक माटी का ,
बाती तेल सहारे हैं |
मृदु वाणी संयम की पूंजी,
थामे उम्र गुजारे हैं ||
स्वर्णिम युग है करो जतन |
त्यागो सुख सपनों की चुभन ||
सांध्यदीप जीना सिखलाता,
सह पाओ इनके हन को |
अंधकार में भटके हैं जो ,
कर उज्जवल उनके तम को ||
//23//
नशा किया वह खाई में गिर ,
पशुवत जकड़न में होता |
परिजन नरक तुल्य दुख सहता,
तन मन धन इज्जत खोता ||
जड़वत जीवन जीता भोगी,
नित्य नवल सपने बोता |
उनको असफलता ही मिलती,
भाग्य का जो रोना रोता ||
कर सत्कर्म मिलेगा फल |
आज नहीं तो निश्चय कल ||
सांध्यदीप जन-जन को झिंझोड़े,
जोड़े अनुपम बंधन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
//24//
मुखरित वाणी पुण्य ऋचाएं,
जग पावन शुचि वेदों से |
झुक झुक नमन करे नवयुग ,
रिपुदमन करे प्रतिवेगों से ||
कर्मठता झलके तन चेतन,
लवण झरे तन स्वेदों से |
जूझ लड़े ज्योति वर्षन करे,
गर्जन सौ सौ मेघों से ||
हार के वह जीते बाजी |
जो हार न मानने को राजी ||
जंग हार कर भी जीता,
जो जीत गया रिपु के मन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
-डाॅॅ. अशोक आकाश
कवि के अन्य काव्य श्रृंखला- किन्नर व्यथा