
तलवारो पर धार करो
शांति नहीं कोलाहल है,घर -घर जन-जन वाणी में
त्यागो झूठी परंपरा को, आग लगा दो पानी में
गौतम -गांधी की सन्तानो, शस्त्रों पर अधिकार करो
समय पुकारता है युवको,तलवारों पर धार करो
शौर्य तुझे लख रूप तुम्हारा,अरि की छाती दहल उठे
ललकारो- हुँकारो वीरो ! शत्रु सैन्य दल विचल उठे
रग-रग में अपने अटूट दृढ, साहस का संचार करो
समय पुकारता है युवको,तलवारों पर धार करो
भारत के प्रहरी अब चेतो,मर्यादा की शान रखो
तुम प्रताप, तुम वीर शिवाजी,निज पानी का ज्ञान रखो
मातृभूमि रक्षा खातिर, मर -मिटना स्वीकार करो
समय पुकारता है युवको,तलवारों पर धार करो
समझा था दुर्जेय हिमालय, अब उस पर विश्वास नहीं
बीमार लगे, है सिंधु न सक्षम, उनसे भी कुछ आस नहीं
पाक-चीन दुश्मन सा जानो,अरि सा ही व्यवहार करो
समय पुकारता है युवको,तलवारों पर धार करो
युग बदला,जीवन को बदलो,किन्तु तनिक ये ध्यान रहे
अपनी प्रखर तेज प्रतिभा में ,भारत -भाल सम्मान रहे
कोटि-कोटि अभिमन्यु हिन्द के,रण में ललक प्रहार करो
समय पुकारता है युवको,तलवारों पर धार करो
दुश्मन दावादार है
1.
तानाशाही शासन जन का,पा सकता क्या प्यार है
कभी छिपाए छिप ना सकता,बोझिल पापाचार है
पाकिस्तान हिन्द से लड़कर,आज हुआ नापाक है
सिंह साथ लड़ना गीदड़ का ,सचमुच बेकार है
2.
निराधार है यवन सैन्य अब, रहा न कुछ भी सार है
न तो बुद्धि है और न बल है, खाता रह-रह मार है
लानत मिया अय्यूब शान पर, चोरी वह करवाता है
चोरो की नजरों में दिखता, हरदम कारागार है
3.
सान दिया है खुद भारत ने, तलवारों पर धार है
मस्ती मिटी पाक की अब तो,सभी तरह बेजार है
हैरत में है ब्रिटिश- अमरीका,लख भारत बेजोड़ है
बच्चा- बच्चा भारत मां का, सच्चा पहरेदार है ,
4.
कहाँ शत्रु की वह हस्ती है,उसकी कहाँ बहार है
कहाँ हजार बरस लड़ने की,भुट्टो की ललकार है
पाकिस्तान लिए कर झोली,दर-दर मारा फिरता है
त्राहिमाम अब त्राहिमाम अब,इसकी यही पुकार है
5.
लुटा चुका अय्यूब खान निज,खुशियों का त्यौहार है
गुमसुम सुस्त कराची एकदम,ठप्प सभी कारोबार है
चीन बेशर्म के झांसे में ,पाक हुआ वीरान है
वतन -परस्ती यवन भूलते, वे तो सब गद्दार है
रण-भेरी
काश्मीर घाटी में हलचल , झेलम में तूफान उठा l
गगन भेद बंगाल देश में, प्रलनयनकारी तूफान उठा ॥
यवन- उपद्रव घोर भयावह, सीमा पर उनकी फेरी
बुला रहा समरांगण युवको,बाजी देश में रणभेरी ॥
चंचल लहार उठी सागर में, धरती डगमग डोल उठी l
सन पैसठ शहीद की आत्मा,कानो में यह बोल उठी ॥
कर में निज बन्दूक सम्हालो, करो नहीं क्षण -भर देरी l
बुला रहा समरांगण युवको,बाजी देश में रणभेरी ॥
बाँध-बांध हथियार विहंसते, गाते गीत किसान चले l
मातृभूमि की रक्षा खातिर, हिन्दू और पठान चले ॥
पाक -चीन -अमरीका से ही, आई विपदा बहुतेरी l
बुला रहा समरांगण युवको,बाजी देश में रणभेरी ॥
गुरूद्वारे की कसम उठाकर, कर ले सिख्ख कृपाण चले l
जाट,गोरखे, गूजर- छत्रिय, साज-साज धनु बाण चले ॥
अरि के शीश कटे रण भीतर, लगे हजारों की ढेरी ॥
बुला रहा समरांगण युवको,बाजी देश में रणभेरी ॥
भुट्टो तथा याहया के सर,भारी गाज गिराना है l
बने अखण्ड हिन्द यह फिर से, पाकिस्तान मिटाना है ॥
शेख मुजीब छुड़ा लो तरुणों,दुनिया रीझ बने चेरी l
बुला रहा समरांगण युवको,बाजी देश में रणभेरी ॥
रचनाकार- स्व. शिशुपाल सिंह यादव ‘मुकुंद’ सोजन्य’-सुपुत्र सुशिल यादव